भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * १५

ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। अतः रावणके भयसे अवश्य हमारा उद्धार करें।*

सीताको बलपूर्वक प्राप्त करना चाहेगा, उस समय वह दोनों स्थितियोंसे तत्काल भ्रष्ट हो जायगा। सीताके अन्वेषणमें तत्पर होकर वह न तो तपस्वी रह जायगा और न भक्त ही। जो अपनेको न दी हुई ब्रह्मविद्याका बलपूर्वक सेवन करना चाहता है, वह पुरुष धर्मसे परास्त होकर सदा सुगमतापूर्वक जीत लेनेयोग्य हो जाता है।'

परम मंगलमय भगवान् विष्णु इस प्रकारके वचनोंद्वारा सम्पूर्ण देवताओंको आश्वासन देकर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सब देवता अवतार धारण करने लगे। इन्द्रके अंशसे वाली उत्पन्न हुए, सुग्रीव सूर्यके पुत्र थे। जाम्बवान् ब्रह्माजीके अंशसे प्रकट हुए थे। शिलादके पुत्र नन्दी जो भगवान् शिवके अनुचर तथा ग्यारहवें रुद्र थे, महाकपि हनुमान् हुए। वे अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी सहायता करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए थे। अन्यान्य श्रेष्ठ देवता मैन्द आदि कपियोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। इसी तरह सभी देवता किसी-न-किसी कपिके रूपमें प्रकट हुए। साक्षात् भगवान् विष्णु ही माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम हुए। सम्पूर्ण विश्व उनके स्वरूपमें रमण करता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उनको 'राम' कहते हैं। भगवान् विष्णुके प्रति भक्ति और तपस्यासे युक्त शेषनाग भी इस पृथ्वीपर लक्ष्मणके रूपमें अवतीर्ण हुए। श्रीविष्णुके भुजदण्डोंसे भी दो प्रतापी वीर प्रकट हुए, जो तीनों लोकोंमें भरत-शत्रुघ्नके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्मवादी पुरुषोंद्वारा जो मिथिलापति जनककी

देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वासुदेवने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'देवगण! तुमलोग अपने प्रस्तावके अनुसार मेरी बात सुनो, नन्दीको आगे करके तुम सभी शीघ्रतापूर्वक वानर-शरीरमें अवतार लो। मैं मायासे अपने स्वरूपको छिपाये हुए मनुष्यरूप होकर अयोध्यामें राजा दशरथके घर प्रकट होऊँगा। तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये मेरे साथ ब्रह्मविद्या भी अवतार लेंगी। राजा जनकके घर साक्षात् ब्रह्मविद्या ही सीतारूपमें प्रकट होंगी। रावण भगवान् शिवका भक्त है। वह सदा साक्षात् शिवके ध्यानमें तत्पर रहता है। उसमें बड़ी भारी तपस्याका भी बल है। जब ब्रह्मविद्यारूप


* नमो भगवते तुभ्यं देवदेव जगत्पते। त्वदाधारमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥
एतल्लिङ्गं त्वया विष्णो धृतं वै पीठरूपिणा। अवताराः कृताः पूर्वमस्मदर्थे त्वया प्रभो॥
मत्स्यो भूत्वा त्वया वेदाः स्थापिता ब्रह्मणो मुखे। हयग्रीवस्वरूपेण घातितौ मधुकैटभौ॥
तथा कमठरूपेण धृतो वै मन्दराचलः। वराहरूपमास्थाय हिरण्याक्षो हतस्त्वया॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नृसिंहरूपिणा हतः। तथा चैव बलिर्बद्धो दैत्यो वामनरूपिणा॥
भृगूणामन्वये भूत्वा कार्तवीर्यात्मजो हतः। हता दैत्यास्त्वया विष्णो त्वमेव परिपालकः॥
रावणस्य भयात्तस्मान्त्रातुमर्हसि च ध्रुवम्।
(स्क० पु०, मा० के० ८। १००–१०६)