संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कन्या बतायी गयी हैं, वे सीता साक्षात् ब्रह्मविद्या थीं; वे भी देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये ही अवतीर्ण हुई थीं। हलसे भूमि जोती जा रही थी; उसी समय सीता (हलकी नोक)-के द्वारा पृथ्वीके खोदे जानेपर पृथ्वीसे ये प्रकट हुई थीं, इसीलिये 'सीता' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। मिथिलामें अवतार लेनेके कारण इन्हें 'मैथिली' भी कहते हैं। जनकके कुलमें जन्म लेनेके कारण ये 'जानकी' नामसे विख्यात हुईं। पूर्वजन्ममें इनका नाम वेदवती था। राजा जनकने ब्रह्मविद्यास्वरूप सीताको परमात्मा ब्रह्मरूप श्रीरामकी सेवामें अर्पित कर दिया। कमलनयन श्रीरामने रावणको जीतनेकी इच्छा तथा देवकार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे वनमें निवास किया। शेषावतार लक्ष्मणने भी उसीके लिये अत्यन्त दुष्कर एवं महान् तप किया। भरत और शत्रुघ्नने भी बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपोबलसम्पन्न हो कपिरूपधारी देवताओंको साथ लेकर श्रीरामने छः महीनेतक युद्ध करके रावणका वध किया। भगवान् विष्णुके द्वारा शस्त्रोंसे मारा गया रावण अपने गणों, पुत्रों तथा बन्धुओंसहित तत्काल भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त हो गया। शंकरजीकी कृपासे उसने सम्पूर्ण द्वैताद्वैत ज्ञान प्राप्त कर लिया।
जो नित्य (द्वादश ज्योतिर्लिंगोंमेंसे किसी भी) लिंगस्वरूप भगवान् शिवकी पूजा करते हैं वे स्त्री, शूद्र, अन्त्यज अथवा चाण्डाल ही क्यों न हों, सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाले शिवको अवश्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनको अपने वशमें करके भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, उनका मायामय अज्ञान शीघ्र दूर हो जाता है, तथा मायाका निवारण हो जानेसे तीनों गुणोंका लय हो जाता है। इस प्रकार मनुष्य जब गुणातीत हो जाता है, तब वह मोक्षका भागी होता है। अतः सम्पूर्ण देहधारियोंके लिये शिव-लिंगका पूजन कल्याणकारी है। भगवान् शिव लिंगरूपमें प्रकट होकर चराचर जगत्का उद्धार करते हैं। विप्रगण! पहले तुम सब लोगोंने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने बतला दिया। तुम्हारा दूसरा प्रश्न यह था कि भगवान् शिवने विष-भक्षण कैसे किया था; वह सब प्रसंग मैं यथावत् रूपसे कह रहा हूँ। तुम सब लोग सावधान होकर सुनो।
गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रकी दैत्योंद्वारा पराजय, समुद्र-मन्थन, शंकरजीकी कृपासे कालकूट विषसे सबकी रक्षा, विविध रत्नोंका प्राकट्य तथा लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
**लोमशजी कहते हैं—**एक समय देवराज इन्द्र सम्पूर्ण लोकपालों तथा ऋषियोंसे घिरे हुए अपनी सुधर्मा सभामें बैठे थे। वहाँ सिद्ध और विद्याधरगण उनकी विजयके गीत गा रहे थे। इसी समय परम बुद्धिमान् देवेन्द्रगुरु महाभाग बृहस्पतिजी अपने शिष्योंके साथ देवसभामें पधारे। उन्हें उपस्थित देख देवताओंने सहसा उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। इन्द्रने भी देखा, गुरुदेव वाचस्पति आगे खड़े हैं। किंतु इन्द्रकी बुद्धि राजमदसे दूषित हो रही थी; इसलिये उन्होंने गुरुके प्रति न तो आदरयुक्त वचन कहा, न उन्हें बुलाया, न बैठनेको आसन दिया और न चले जानेको ही कहा। खोटी बुद्धिवाले इन्द्रको राज्यके मदसे उन्मत्त जानकर देवताओंके आचार्य बृहस्पति कुपित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर देवताओंके मनमें बड़ा खेद हुआ। यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा ऋषिगण भी उदास हो गये। नृत्य और गीत समाप्त होनेपर जब इन्द्र सचेत हुए, तब उन्होंने तुरंत देवताओंसे पूछा—'महातपस्वी गुरुदेव कहाँ चले गये?'
तब नारदजीने देवराज इन्द्रसे कहा—'बलसूदन! निस्सन्देह आपके द्वारा गुरुकी अवहेलना हुई