संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *
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है। गुरुके अनादरसे राज्य अपने हाथसे चला जाता है। अतः आप सब प्रकारसे प्रयत्न करके गुरुसे अपने अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना कीजिये।' महात्मा नारदकी यह बात सुनकर इन्द्र सहसा सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और उन सभी सभासदोंको साथ ले बड़ी उतावलीके साथ गुरुके निवासस्थानपर गये। इस समय इन्द्र अपने कर्तव्यके प्रति सजग हो चुके थे। वहाँ गुरुपत्नी ताराको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और पूछा—'देवि! महातपस्वी गुरुजी कहाँ गये हैं?' ताराने इन्द्रकी ओर देखकर उत्तर दिया—'मैं नहीं जानती।' तब वे चिन्तामग्न होकर अपने घर लौट आये। इसी समय स्वर्गमें अनेक अद्भुत अनिष्टसूचक अपशकुन होने लगे, जो सम्पूर्ण स्वर्गवासियोंको तथा दुरात्मा इन्द्रको भी दुःख-प्राप्तिकी सूचना देनेवाले थे। इन्द्रकी वह करतूत पातालनिवासी राजा बलिने भी सुनी। फिर तो वे दैत्योंकी बहुत बड़ी सेना साथ ले पातालसे अमरावतीपुरीपर चढ़ आये। उस समय देवताओंका दानवोंके साथ बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उसमें दैत्योंने देवताओंको परास्त कर दिया। एक ही क्षणमें दूषित हृदयवाले अविवेकी इन्द्रका सातों ^१ अंगोंसहित सम्पूर्ण राज्य दैत्योंने अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी दैत्य शीघ्र पातालको चले गये। शुक्राचार्यकी कृपासे ही दैत्यगण विजयी हुए थे। इन्द्रकी राज्य-लक्ष्मी नष्ट हो चुकी थी, इसलिये देवताओंने भी सर्वथा उनका त्याग कर दिया। श्रीहीन इन्द्र स्वर्गलोकसे अन्यत्र चले गये। कमलके समान कमनीय नेत्रोंवाली इन्द्रपत्नी शची भी दूसरोंकी दृष्टिसे छिपकर रहने लगीं। ऐरावतनामक महान् गजराज तथा उच्चैःश्रवा अश्व आदि जो बहुत-से रत्न थे, उन्हें दुष्ट दैत्योंने लोभवश स्वर्गलोकसे पातालमें पहुँचा दिया। परंतु वे रत्न पुण्यात्मा पुरुषोंके ही उपभोगमें आनेवाले थे। अतः दैत्योंके अधिकारमें न रहकर समुद्रमें कूद पड़े। उस समय राजा बलिने आश्चर्यचकित होकर अपने गुरु शुक्राचार्यसे कहा—'भगवन्! हम देवताओंको जीतकर बहुत-से रत्न यहाँ लाये थे; किंतु वे सभी समुद्रमें जा पड़े। यह तो बड़ी अद्भुत बात है!' राजा बलिकी यह बात सुनकर शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'राजन्! सौ अश्वमेध यज्ञोंकी दीक्षा लेकर उन्हें पूर्ण करनेपर ही तुम्हारा देवताओंके राज्यपर अधिकार होगा, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है वही स्वर्गलोकके राज्यको भोगनेका अधिकारी होता है। अश्वमेध यज्ञ किये बिना स्वर्गकी कोई भी वस्तु उपभोगमें नहीं लायी जा सकती।' गुरुका यह वचन सुनकर राजा बलि उस समय चुप हो रहे और दानवोंके साथ उचित कार्योंमें लग गये।
इन्द्र बड़ी शोचनीय दशाको प्राप्त हो गये थे। वे ब्रह्माजीके पास गये और स्वर्गके राज्यपर जो भय आदि प्राप्त हुआ था, वह सब समाचार उन्हें कह सुनाया। इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा—'सब देवताओंको एकत्र करके हम सब लोग तुम्हारे साथ सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये चलते हैं।' 'ऐसा ही हो।' यह सलाह करके इन्द्र आदि सम्पूर्ण लोकपाल ब्रह्माजीको आगे रखकर क्षीर-समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन सबने परस्पर विचार करके भगवान् विष्णुकी स्तुति आरम्भ की।
ब्रह्माजी बोले—देवदेव! जगन्नाथ! देवता और दैत्य दोनों आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। आपकी कीर्ति परम पवित्र है, आप अविनाशी और अनन्त हैं। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। रमापते! आप यज्ञ हैं, यज्ञरूप हैं तथा यज्ञांग हैं। अतः आज कृपा करके देवताओंको वरदान दीजिये। भगवन्! गुरुकी अवहेलना करनेके कारण इन्द्र इस समय ऋषियोंसहित
^१. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अंग हैं।