संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्वर्गके राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं; इसलिये इनका उद्धार कीजिये।^१
**श्रीभगवान् बोले—**देवगण ! गुरुकी अवहेलना करनेसे सारा अभ्युदय नष्ट हो जाता है। जो पापी हैं, अधर्ममें तत्पर हैं तथा केवल विषयोंमें ही रचे-पचे रहते हैं और जिनके द्वारा अपने माता-पिताकी निन्दा होती रहती है, वे निस्सन्देह बड़े भाग्यहीन हैं।^२ ब्रह्मन् ! इस इन्द्रने जो अन्याय किया है, उसका फल इसे तत्काल प्राप्त हो गया। केवल इन्द्रके ही कर्मसे सम्पूर्ण देवताओंपर संकट आया है। जब किसी भी पुरुषके लिये विपरीत काल उपस्थित हो जाय, तब उसे दूसरोंका सहयोग प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिके लिये अन्य प्राणियोंके साथ मैत्री करते हैं। अतः इन्द्र ! तुम मेरी बात मानो। इस समय अपना काम बनानेके लिये तुम्हें दैत्योंके साथ मेल-जोल कर लेना चाहिये।
भगवान् विष्णुके इस प्रकार आज्ञा देनेपर परम बुद्धिमान् इन्द्र अमरावती छोड़कर देवताओंके साथ सुतल-लोकमें गये। इन्द्र आये हैं—यह सुनकर राजा इन्द्रसेन (बलि) रोषमें भर गये। उन्होंने अपनी सेनाके साथ जाकर इन्द्रको मार डालनेका विचार किया। उस समय देवर्षि नारदने बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलि और दैत्योंको ऊँच-नीच समझाकर उन्हें इन्द्रके वधसे रोका। देवर्षिके ही कहनेसे राजा बलिने इन्द्रके प्रति अपना रोष त्याग दिया। इतनेमें ही इन्द्र भी अपनी सेनाके साथ आ पहुँचे। राजा बलिने देखा लोकपालोंसे घिरे हुए इन्द्र श्रीहीन हो गये हैं। अब उनमें प्रभुताका मद नहीं रह गया है। उनका तेज चला गया और अब वे ईर्ष्या तथा अहंकारसे रहित हो गये हैं। उन्हें इस अवस्थामें देखकर राजा बलिके मनमें बड़ी दया आयी। वे बड़ी उतावलीके साथ हँसते हुए-से बोले—'देवराज इन्द्र! आप इस सुतल-लोकमें कैसे पधारे? यहाँ आनेका कारण बतलाइये।' बलिकी यह बात सुनकर इन्द्र मुसकराते हुए बोले—'भैया ! हम सब देवता क्रोधके अधीन हो रहे हैं, आप सब लोगोंकी भी यही दशा है। जैसे हम हैं वैसे ही आपलोग भी हैं। अतः हमारा यह कलह निरर्थक है। भाग्यवश आपने मेरा सम्पूर्ण राज्य एक क्षणमें ही ले लिया तथा बहुत-से रत्न भी स्वर्गसे यहाँ उठा लाये। परंतु वे सभी रत्न तत्काल ही जहाँके थे वहीं चले गये। अतः विद्वान् पुरुषको एक-दूसरेसे मिलकर कर्तव्यके विषयमें विचार करना चाहिये। विचार करनेसे ज्ञान होता है और ज्ञान होनेपर संकटसे छुटकारा अवश्य मिल जायगा; इस समय तो मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ आपके समीप त्राण पानेके लिये आया हूँ।'
इन्द्रकी बात समाप्त होनेपर देवर्षि नारदने राजा बलिको समझाते हुए कहा—'दैत्यराज! शरणमें आये हुए प्राणीकी रक्षा करना महापुरुषोंका धर्म है। जो लोग ब्राह्मण, रोगी, वृद्ध तथा शरणागतकी रक्षा नहीं करते वे ब्रह्महत्यारे हैं। इन्द्र इस समय 'शरणागत' शब्दसे अपना परिचय देते हुए तुम्हारे
१. देवदेव जगन्नाथ सुरसुरनमस्कृत । पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
यज्ञोऽसि यज्ञरूपोऽसि यज्ञाङ्गोऽसि रमापते । ततोऽद्य कृपयाविष्टो देवानां वरदो भव ॥
गुरोरवज्ञया चाद्य भ्रष्टराज्यः शतक्रतुः । जातः स ऋषिभिः साकं तस्मादेनं समुद्धर ॥
(स्क० पु०, मा० के० ९।३०—३२)
२. गुरोरवज्ञया सर्वं नश्यते च समुद्भवम् । ये पापिनो ह्यधर्मिष्ठाः केवलं विषयात्मकाः ॥
पितरौ निन्दितौ यैश्च निर्दैवास्ते न संशयः।
(स्क० पु०, मा० के० ९।३३—३४)