भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 48
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ९९

समीप आये हैं, अतः इनका भलीभाँति रक्षण और पोषण करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। इसमें तनिक भी संदेहकी बात नहीं है।'*

देवर्षि नारदके यों कहनेपर कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानमें कुशल दैत्यराज बलिने स्वयं भी अपनी बुद्धिसे विचार किया। तदनन्तर लोकपालों और देवताओंसहित इन्द्रका बड़े सम्मानके साथ स्वागत-सत्कार किया तथा उनके मनमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये अनेक प्रकारकी सच्ची शपथें भी खायीं। इन्द्रने भी राजा बलिको विश्वास दिलानेवाली शपथें खायीं। देवराज इन्द्र स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहते हैं और अर्थशास्त्रमें ही उनकी विशेष प्रवृत्ति है। उन्होंने शपथ खाकर राजा बलिके साथ सुतल-लोकमें ही निवास किया। वहाँ रहते हुए उन्हें अनेक वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन बलिकी सभामें बैठे हुए नीति-निपुण देवराज इन्द्रने बलिको सम्बोधित करके हँसते हुए कहा— 'वीरवर! हमारे हाथी-घोड़े आदि नाना प्रकारके बहुत-से रत्न जो इस समय तुम्हें प्राप्त होनेयोग्य हैं, तत्काल ही समुद्रमें गिर पड़े हैं। अतः हमलोगोंको समुद्रसे उन रत्नोंका उद्धार करनेके लिये बहुत शीघ्र प्रयत्न करना चाहिये। तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये समुद्रका मन्थन करना उचित है।' इन्द्रके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर बलिने शीघ्रतापूर्वक पूछा— 'यह समुद्र-मन्थन किस उपायसे सम्भव होगा?' इसी समय मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई— 'देवताओ और दैत्यो! तुम क्षीर समुद्रका मन्थन करो। इस कार्यमें तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाओ, फिर देवता और दैत्य मिलकर मन्थन आरम्भ करो।' यह आकाशवाणी सुनकर सहस्रों दैत्य और देवता समुद्र-मन्थनके लिये उद्यत हो सुवर्णके सदृश कान्तिमान् मन्दराचलके समीप गये। वह पर्वत सीधा, गोलाकार, बहुत मोटा और अत्यन्त प्रकाशमान था। अनेक प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्दन, पारिजात, नागकेशर, जायफल और चम्पा आदि भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे वह हरा-भरा दिखायी देता था। उस महान् पर्वतको देखकर सम्पूर्ण देवताओंने हाथ जोड़कर कहा— 'दूसरोंका उपकार करनेवाले महाशैल मन्दराचल! हम सब देवता तुमसे कुछ निवेदन करनेके लिये यहाँ आये हैं, उसे तुम सुनो।' उनके यों कहनेपर मन्दराचलने देहधारी पुरुषके रूपमें प्रकट होकर कहा— 'देवगण! आप सब लोग मेरे पास किस कार्यसे आये हैं, उसे बताइये।' तब इन्द्रने मधुर वाणीमें कहा— 'मन्दराचल! तुम हमारे साथ रहकर एक कार्यमें सहायक बनो; हम समुद्रको मथकर उससे अमृत निकालना चाहते हैं, इस कार्यके लिये तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और देवकार्यकी सिद्धिके लिये देवताओं, दैत्यों तथा विशेषतः इन्द्रसे कहा— 'पुण्यात्मा देवराज! आपने अपने वज्रसे मेरे दोनों पंख काट डाले हैं, फिर आपलोगोंके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँतक मैं चल कैसे सकता हूँ?' तब सम्पूर्ण देवताओं और दैत्योंने उस अनुपम पर्वतको क्षीर-समुद्रतक ले जानेकी इच्छासे उखाड़ लिया; परंतु वे उसे धारण करनेमें समर्थ न हो सके। वह महान् पर्वत उसी समय देवताओं और दैत्योंके ऊपर गिर पड़ा। कोई कुचले गये, कोई मर गये, कोई मूर्च्छित हो गये, कोई एक-दूसरेको कोसने और चिल्लाने लगे तथा कुछ लोगोंने बड़े क्लेशका अनुभव किया। इस प्रकार उनका उद्यम और उत्साह भंग हो गया। वे देवता और दानव


* धर्मो हि महतामेष शरणागतपालनम्॥
शरणागतं च विप्रं च रोगिणं वृद्धमेव च। य एतान्न च रक्षन्ति ते वै ब्रह्महणो नराः॥
शरणागतशब्देन आगतस्तव सन्निधौ। संरक्षणीयः पोष्यश्च त्वया नास्त्यत्र संशयः॥
(स्क० पु०, मा० के० ९।५२-५४)

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