संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सचेत होनेपर जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगे—'शरणागतवत्सल महाविष्णो! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है।'
उस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये गरुड़की पीठपर बैठे हुए भगवान् विष्णु सहसा वहाँ प्रकट हो गये। वे सबको अभय देनेवाले हैं। उन्होंने देवताओं और दैत्योंकी ओर दृष्टिपात करके खेल-खेलमें ही उस महान् पर्वतको उठाकर गरुड़की पीठपर रख लिया। फिर वे देवताओं और दैत्योंको क्षीर-समुद्रके उत्तर-तटपर ले गये और पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको समुद्रमें डालकर तुरंत वहाँसे चल दिये। तदनन्तर सब देवता दैत्योंको साथ लेकर वासुकि नागके समीप गये और उनसे भी अपनी प्रार्थना स्वीकार करायी। इस प्रकार मन्दराचलको मथानी और वासुकिनागको रस्सी बनाकर देवताओं और दैत्योंने क्षीर-समुद्रका मन्थन आरम्भ किया। इतनेमें ही वह पर्वत समुद्रमें डूबकर रसातलको जा पहुँचा। तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने कच्छपरूप धारण करके तत्काल ही मन्दराचलको ऊपर उठा दिया। उस समय यह एक अद्भुत घटना हुई। फिर जब देवता और दैत्योंने मथानीको घुमाना आरम्भ किया तब वह पर्वत बिना गुरुके ज्ञानकी भाँति कोई सुदृढ़ आधार न होनेके कारण इधर-उधर डोलने लगा। यह देख परमात्मा भगवान् विष्णु स्वयं ही मन्दराचलके आधार बन गये और उन्होंने अपनी चारों भुजाओंसे मथानी बने हुए उस पर्वतको भली-भाँति पकड़कर उसे सुखपूर्वक घुमाने योग्य बना दिया। तब अत्यन्त बलवान् देवता और दैत्य एकीभूत हो अधिक जोर लगाकर क्षीर-समुद्रका मन्थन करने लगे। कच्छपरूपधारी भगवान्की पीठ जन्मसे ही कठोर थी और उसपर घूमनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल भी वज्रसारकी भाँति दृढ़ था। उन दोनोंकी रगड़से समुद्रमें बड़वानल प्रकट हो गया। साथ ही हालाहल विष उत्पन्न हुआ। उस विषको सबसे पहले नारदजीने देखा। तब अमित-तेजस्वी देवर्षिने देवताओंको पुकारकर कहा—'अदिति-कुमारो! अब तुम समुद्रका मन्थन न करो। इस समय सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाले भगवान् शिवकी प्रार्थना करो। वे परात्पर हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा योगी पुरुष भी उन्हींका ध्यान करते हैं।' देवता अपने स्वार्थसाधनमें संलग्न हो समुद्र मथ रहे थे। वे अपनी ही अभिलाषामें तन्मय होनेके कारण नारदजीकी बात नहीं सुन सके। केवल उद्यमका भरोसा करके वे क्षीर-सागरके मन्थनमें संलग्न थे। अधिक मन्थनसे जो हालाहल विष प्रकट हुआ, वह तीनों लोकोंको भस्म कर देनेवाला था। वह प्रौढ़ विष देवताओंका प्राण लेनेके लिये उनके समीप आ पहुँचा और ऊपर-नीचे तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गया। समस्त प्राणियोंको अपना ग्रास बनानेके लिये प्रकट हुए उस कालकूट विषको देखकर वे सब देवता और दैत्य हाथमें पकड़े हुए नागराज वासुकिको मन्दराचल पर्वतसहित वहीं छोड़ भाग खड़े हुए। उस समय उस लोकसंहारकारी कालकूट विषको भगवान् शिवने स्वयं अपना ग्रास बना लिया। उन्होंने उस विषको निर्मल (निर्दोष) कर दिया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी बड़ी भारी कृपा होनेसे देवता, असुर, मनुष्य तथा सम्पूर्ण त्रिलोकीकी उस समय कालकूट विषसे रक्षा हुई।
तदनन्तर भगवान् विष्णुके समीप मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाकर देवताओंने पुनः समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। तब समुद्रसे देवकार्यकी सिद्धिके लिये अमृतमयी कलाओंसे परिपूर्ण चन्द्रदेव प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवता, असुर और दानवोंने भगवान् चन्द्रमाको प्रणाम किया और गर्गाचार्यजीसे अपने-अपने चन्द्रबलकी यथार्थ-रूपसे