संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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- वैष्णवखण्ड-कार्तिकमास-माहात्म्य * ४३९ पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा षोडशोपचारसे पूजा करे। पहले देश-कालका स्मरण करके गणेशपूजन करे, फिर पुण्याह-वाचन कराकर नान्दीश्राद्ध करे। तत्पश्चात् वेद-मन्त्रोंके उच्चारण और बाजे आदिकी ध्वनिके साथ भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको तुलसीजीके निकट लाकर रखे। प्रतिमाको वस्त्रोंसे आच्छादित किये रहे। उस समय भगवान्का इस प्रकार आवाहन करे— आगच्छ भगवन् देव अर्चयिष्यामि केशव । तुभ्यं दास्यामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव ॥ 'भगवान् केशव ! आइये, देव ! मैं आपकी पूजा करूँगा। आपकी सेवामें तुलसीको समर्पित करूँगा। आप मेरे सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करें।' इस प्रकार आवाहनके पश्चात् तीन-तीन बार अर्घ्य, पाद्य और विष्टरका उच्चारण करके इन्हें बारी-बारीसे भगवान्को समर्पित करे। फिर आचमनीय पदका तीन बार उच्चारण करके भगवान्को आचमन करावे। इसके बाद कांस्यके पात्रमें दही, घी और मधु रखकर उसे कांस्यके पात्रसे ही ढक दे तथा भगवान्को अर्पण करते हुए इस प्रकार कहे—'वासुदेव ! आपको नमस्कार है, यह मधुपर्क ग्रहण कीजिये।' तदनन्तर हरिद्रालेपन और अभ्यंग-कार्य सम्पन्न करके गोधूलिकी बेलामें तुलसी और श्रीविष्णुका पूजन पृथक्- पृथक् करना चाहिये। दोनोंको एक-दूसरेके सम्मुख रखकर मंगल-पाठ करे। जब भगवान् सूर्य कुछ- कुछ दिखायी देते हों, तब कन्यादानका संकल्प करे। अपने गोत्र और प्रवरका उच्चारण करके आदिकी तीन पीढ़ियोंका भी आवर्तन करे। तत्पश्चात् भगवान्से इस प्रकार कहे— अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्यप्रतिपालक। इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर ॥ पार्वतीबीजसम्भूतां वृन्दाभस्मनि संस्थिताम् । अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहम् ॥ पयोघटैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्द्धिता मया । त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं ददामि त्वं गृहाण भोः ॥ 'आदि, मध्य और अन्तसे रहित त्रिभुवन- प्रतिपालक परमेश्वर ! इस तुलसीको आप विवाहकी विधिसे ग्रहण करें। यह पार्वतीके बीजसे प्रकट हुई है, वृन्दाकी भस्ममें स्थित रही है तथा आदि, मध्य और अन्तसे शून्य है। आपको तुलसी बहुत ही प्रिय है, अतः इसे मैं आपकी सेवामें अर्पित करता हूँ। मैंने जलके घड़ोंसे सींचकर और अन्य प्रकारकी सेवाएँ करके अपनी पुत्रीकी भाँति इसे पाला, पोसा और बढ़ाया है, आपकी प्रिया तुलसी मैं आपको ही दे रहा हूँ। प्रभो! आप इसे ग्रहण करें।' इस प्रकार तुलसीका दान करके फिर उन दोनों (तुलसी और विष्णु)-की पूजा करे। विवाहका उत्सव मनाये। सबेरा होनेपर पुनः तुलसी और विष्णुका पूजन करे। अग्निकी स्थापना करके उसमें द्वादशाक्षरमन्त्रसे खीर, घी, मधु और तिलमिश्रित हवनीय द्रव्यकी एक सौ आठ आहुति दे। फिर 'स्विष्टकृत्' होम करके पूर्णाहुति दे। आचार्यकी पूजा करके होमकी शेष विधि पूरी करे। उसके बाद भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करे— 'देव ! प्रभो !! आपकी प्रसन्नताके लिये मैंने यह व्रत किया है। जनार्दन ! इसमें जो न्यूनता हो, वह आपके प्रसादसे पूर्णताको प्राप्त हो जाय।' यदि द्वादशीमें रेवतीका चौथा चरण बीत रहा हो तो उस समय पारण न करे। जो उस समय भी पारण करता है, वह अपने व्रतको निष्फल कर देता है। भोजनके पश्चात् तुलसीके स्वतः गलकर गिरे हुए पत्तोंको खाकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भोजनके अन्तमें ऊख, आँवला और बेरका फल खा लेनेसे उच्छिष्ट- दोष मिट जाता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth