संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * तदनन्तर भगवान्का विसर्जन करते हुए कहे—'भगवन्! आप तुलसीके साथ वैकुण्ठधाममें पधारें। प्रभो! मेरे द्वारा की हुई पूजा ग्रहण करके आप सदा सन्तुष्ट रहें।' इस प्रकार देवेश्वर विष्णुका विसर्जन करके मूर्ति आदि सब सामग्री आचार्यको अर्पण करे। इससे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्षमें एकादशीको प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान करके पाँच दिनका व्रत ग्रहण करे। बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मने राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्मका वर्णन किया, जिसे पाण्डवोंके साथ ही भगवान् श्रीकृष्णने भी सुना। उससे प्रसन्न होकर भगवान् वासुदेवने कहा—'भीष्म! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुमने धर्मोंका स्वरूप अच्छी तरह श्रवण कराया है। कार्तिककी एकादशीको तुमने जलके लिये याचना की और अर्जुनने बाणके वेगसे गंगाजल प्रस्तुत किया, जिससे तुम्हारे तन, मन, प्राण सन्तुष्ट हुए। इसलिये आजसे लेकर पूर्णिमातक तुम्हें सब लोग अर्घ्यदानसे तृप्त करें और मुझको सन्तुष्ट करनेवाले इस भीष्मपंचक नामक व्रतका पालन प्रतिवर्ष करते रहें।' निम्नांकित मन्त्र पढ़कर सव्यभावसे महात्मा भीष्मके लिये तर्पण करना चाहिये। यह भीष्मतर्पण सभी वर्णोंके लोगोंके लिये कर्तव्य है*। मन्त्र इस प्रकार है— सत्यव्रताय शुचये गाङ्गेयाय महात्मने। भीष्मायैतद् ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे॥ 'आजन्म ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले परम पवित्र सत्यव्रतपरायण गंगानन्दन महात्मा भीष्मको मैं यह अर्घ्य देता हूँ।' जो मनुष्य पुत्रकी कामनासे स्त्रीसहित भीष्मपंचकव्रतका पालन करता है, वह वर्षके भीतर ही पुत्र प्राप्त करता है। जो भीष्मपंचकव्रतका पालन करता है, उसके द्वारा सब प्रकारके शुभकृत्योंका पालन हो जाता है। यह महापुण्यमय व्रत महापातकोंका नाश करनेवाला है। अतः मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक इसका अनुष्ठान करना चाहिये। इसमें भीष्मजीके लिये जलदान और अर्घ्यदान विशेष यत्नसे करना चाहिये। जो नीचे लिखे मन्त्रसे भीष्मजीके लिये अर्घ्यदान करता है, वह मोक्षका भागी होता है। अर्घ्य-मन्त्र वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतप्रवराय च। अपुत्राय ददाम्येतदुदकं भीष्मवर्मणे ॥ वसूनामवताराय शन्तनोरत्मजाय च। अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे ॥ 'जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्ररहित भीष्मवर्माको मैं यह जल देता हूँ। वसुओंके अवतार, शन्तनुके पुत्र, आजन्म ब्रह्मचारी भीष्मको मैं अर्घ्य देता हूँ।' पंचगव्य, सुगन्धित चन्दनके जल, चन्दन, उत्तम गन्ध और कुंकुमके द्वारा भक्तिपूर्वक सर्वपापहारी श्रीहरिका पूजन करे। कर्पूर और खस मिले हुए कुंकुमसे भगवान् गरुड़ध्वजके अंगोंमें लेप करे। सुन्दर पुष्प एवं गन्ध, धूप आदिके द्वारा भगवान्की अर्चना करे। पाँच दिनोंतक भगवान्के समीप दिन-रात दीपक जलाता रहे। देवाधिदेव भगवान्के लिये उत्तम- से-उत्तम नैवेद्य निवेदन करे। इस प्रकार भगवान्की पूजा-अर्चा, ध्यान और नमस्कारके पश्चात् 'ॐ नमो वासुदेवाय' इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। फिर घी मिलाये हुए तिल, चावल और जौ आदिके द्वारा स्वाहाविशिष्ट षडक्षर (ॐ रामाय नमः) मन्त्रसे आहुति दे। इसके बाद सायं-सन्ध्या करके
- सव्येनानेन मन्त्रेण तर्पणं सार्ववर्णिकम्। (स्क० पु०, वै० का० मा० ३२। १०) In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth