भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मार्गशीर्षमास-माहात्म्य

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मार्गशीर्षमासमें प्रातःस्नानकी महिमा, स्नानविधि, तिलक-धारण, गोपीचन्दनका माहात्म्य, तुलसीमालाका महत्त्व, भगवत्पूजनका विधान और शंखकी महिमा

सूतजी कहते हैं- देवकीनन्दनं कृष्णं जगदानन्दकारकम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं वन्दे माधवं भक्तवत्सलम्॥

'जो सम्पूर्ण जगत्‌को आनन्द प्रदान करनेवाले तथा भोग और मोक्ष देनेवाले हैं, उन लक्ष्मीपति भक्तवत्सल देवकीनन्दन श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।'

श्वेतद्वीपमें देवाधिदेव भगवान् रमाकान्त सुखसे विराजमान थे। उस समय ब्रह्माजीने उन्हें नमस्कार करके पूछा- 'हृषीकेश ! आप सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले हैं। आपके नामोंका श्रवण और

कीर्तन परम पवित्र है। आपने पहले यह कहा है कि 'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्'—महीनोंमें मैं मार्गशीर्ष हूँ। अतः उस महीनेका माहात्म्य क्या है, यह मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ।'

श्रीभगवान् बोले- ब्रह्मन्! जो कोई पुण्य करनेवाले मेरे भक्त हैं, उन्हें मार्गशीर्षमासका व्रत अवश्य करना चाहिये, क्योंकि यह मेरी प्राप्ति करानेवाला है। मार्गशीर्षमास मुझे सदैव प्रिय है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर मार्गशीर्षमें विधिपूर्वक स्नान करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर मैं अपने-आपको भी उसे समर्पित कर देता हूँ। इस विषयमें इस इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं—इस पृथ्वीपर महात्मा नन्दगोप सर्वत्र विख्यात थे। उनके रमणीय गोकुलमें सहस्रों गोपकन्याएँ थीं। उन सबका चित्त मेरे स्वरूपमें लग गया। तब मैंने उन्हें मार्गशीर्षमें स्नान करनेकी सलाह दी। उन्होंने उस समय प्रतिदिन प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान और पूजन किया, हविष्यान्न भोजन किया और अपने इष्टदेवको नमस्कार किया। इस प्रकार विधिपूर्वक मार्गशीर्षव्रतका पालन करनेसे मैं उनपर बहुत प्रसन्न हुआ और वरदानके रूपमें मैंने अपने-आपको ही उनके अर्पित कर दिया। अतः सब लोगोंको मार्गशीर्ष-व्रतकी विधिका पालन करना चाहिये।

रात्रिके अन्तमें शयनसे उठकर विधिपूर्वक आचमन करके अपने गुरुको नमस्कार करे तथा आलस्य छोड़कर मेरा चिन्तन करे। भक्तिपूर्वक सहस्रनामोंका पाठ एवं कीर्तन करे। फिर मौन होकर गाँवके बाहर जाय और विधिपूर्वक मल-मूत्रका त्याग करके हाथ-मुँह धोवे, यथोचित रीतिसे कुल्ला करे तथा शुद्ध होकर दन्तधावनपूर्वक स्नान करे। स्नानकी विधि इस प्रकार है-तुलसीके