संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * | ४४५ ---|---
जड़की मिट्टीको उसके पत्रके साथ लेकर मूलमन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय) अथवा गायत्रीमन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित करे। मन्त्रसे ही उस मृत्तिकाको अपने अंगोंमें लगावे और जलमें प्रवेश करके अघमर्षण स्नान करे। विद्वान् पुरुष उक्त अष्टाक्षर मन्त्रसे ही तीर्थकी कल्पना करे। 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रको ही मूलमन्त्र कहा गया है। स्नान करते समय निम्नांकित मन्त्रसे गंगाजीकी प्रार्थना करे।
विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।
त्राहि नस्त्वमघादस्मादाजन्ममरणान्तिकात्॥
'गंगे! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, इसलिये वैष्णवी हो। श्रीविष्णु ही तुम्हारे देवता हैं। तुम जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त सभी पापोंसे मेरी रक्षा करो।'
इस प्रकार सात बार जप करके हाथ जोड़कर तीर्थजलको प्रणाम करे और तीन, चार, पाँच या सात बार जलमें गोता लगावे। तत्पश्चात् पूर्ववत् मिट्टीको भी अभिमन्त्रित करके उसका शरीरमें लेप करे तथा नहावे। मृत्तिकाको अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥
उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
नमस्ते सर्वभूतानां प्रभवारणि सुव्रते॥
'वसुन्धरे! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चलते हैं, भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने पगोंसे नाप लिया था। मृत्तिके! मैंने जो दुष्कर्म किया है, उस मेरे सारे पापको तुम हर लो। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवी! जैसे अरणीसे अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार तुम समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका अधिष्ठान हो। तुम्हें सैकड़ों भुजाओंवाले वराहावतारधारी भगवान् विष्णुने एकार्णवके जलसे ऊपर निकाला है, तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक आचमन करे और जलाशयके किनारे आकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् पुनः आचमन करके देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंका तर्पण करनेके बाद खोले हुए वस्त्रको निचोड़े। तदनन्तर पुनः आचमन करके धौत वस्त्रसे अपनेको आच्छादित कर तीर्थकी विमल मृत्तिका हाथमें ले और उक्त मन्त्रसे ही अभिमन्त्रित करके उसके द्वारा वैष्णव पुरुष ललाट आदि अंगोंमें ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। ललाटमें तिलक लगाते समय 'केशवाय नमः' कहकर भगवान् केशवका चिन्तन करे। इसी प्रकार उदरमें नारायण, वक्षःस्थलमें माधव, कण्ठकूपमें गोविन्द, दाहिनी कुक्षिमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, कानोंके मूलभागमें त्रिविक्रम, वामपार्श्वमें वामन, बायीं भुजामें श्रीधर, पीठमें पद्मनाभ, गर्दनके पीछे दामोदर और मस्तकमें भगवान् वासुदेवका न्यास एवं चिन्तन करे। इस प्रकार भगवान् विष्णुके सालोक्यकी सिद्धिके लिये नित्य ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये।
जो द्वारकाकी मृत्तिकाको हाथमें लेकर उससे प्रतिदिन अपने ललाटमें ऊर्ध्वपुण्ड्र करता है, उसके द्वारा किये जानेवाले सत्कर्मोंका फल कोटिगुना हो जाता है। ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक करनेसे मनुष्य अपने कर्मोंका अक्षय फल पाता है। जो ब्राह्मण गोपीचन्दनका सुन्दर ऊर्ध्वपुण्ड्र प्रतिदिन अपने ललाटमें धारण करता है, वह मेरे धाममें स्थित होता है और मैं लक्ष्मीजीके साथ उस घरमें सदैव निवास करता हूँ। मृत्युकालमें जिसकी भुजाओंमें, ललाटमें, हृदयमें और मस्तकमें गोपीचन्दन लगा होता है, वह मुझ लक्ष्मीपतिके लोकमें जाता है। जिसके ललाटमें गोपीचन्दन विद्यमान है, उसको मेरे प्रभावसे ग्रह, राक्षस, यक्ष, पिशाच, नाग और भूत आदि पीड़ा नहीं देते हैं। चतुरानन! मेरा प्रिय करनेके लिये तथा अपने कल्याण और रक्षाके लिये मेरा भक्त प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल मेरी पूजा और होममें एकाग्रचित्त हो, ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। ऊर्ध्वपुण्ड्र संसारबन्धनका नाश करनेवाला है।