संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जो तुलसीकाष्ठकी माला मुझे भक्तिपूर्वक निवेदन करके फिर प्रसादरूपसे उसको स्वयं धारण करता है, उसके पातकोंका नाश हो जाता है और उसके ऊपर मैं सदैव प्रसन्न रहता हूँ। जिसके घरमें तुलसीका काष्ठ अथवा तुलसीका हरा या सूखा पत्ता रहता है, उसके घरमें कलियुगका पाप नहीं फैलता। इसलिये तुलसीकी मालाको प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिये। पद्माक्ष और आँवलेकी माला भी भक्तिपूर्वक मुझे निवेदन करके धारण की जाय, तो वह उत्तम पुण्य देनेवाली होती है।
रत्नमय सिंहासनकी भावना करके उसके ऊपर अष्टदल कमलका चिन्तन करे। उसके प्रत्येक दलमें 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर मन्त्रका एक-एक अक्षर है—उस कमलपर बैठे हुए कोटि-कोटि चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुझ चतुर्भुज विष्णुका ध्यान करे। उस समय मेरे हाथोंमें महान् पद्म, शंख, चक्र और गदा सुशोभित हैं, नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल हैं, विग्रह समस्त शुभ लक्षणोंसे लक्षित है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न और कौस्तुभमणि शोभा पा रहे हैं, कटिप्रदेशमें पीताम्बर शोभायमान है मेरा स्वरूप दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत, दिव्य चन्दनोंसे चर्चित दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित तथा तुलसीके कोमल दल और वनमालासे विभूषित है। मेरी अंगकान्ति करोड़ों प्रभातकालीन सूर्योंके सदृश उद्भासित हो रही है। मेरे साथ समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दिव्यरूपा महालक्ष्मीजी भी विराजमान हैं। इस प्रकार मेरा ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त हो मेरे मन्त्रका यथाशक्ति हजार या सौ बार जप करे। पहले मानसिक पूजन करके फिर पूजन-सामग्रियोंद्वारा विधिपूर्वक बाह्य पूजा करे। मेरा स्मरण करके पूजनके प्रारम्भमें मंगलपाठ करे। उसके बाद मेरे परम प्रिय पांचजन्य शंखकी पूजा करे। शंखके पूजनमें निम्नांकित मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए प्रार्थना करे—
त्वं पुरा सागरोत्पन्न विष्णुना विधृतः करे।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥
तव नादेन जीमूता वित्रसन्ति सुरासुराः।
शशाङ्कायुतदीप्ताभ पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥
‘पांचजन्य शंख! तुम पूर्वकालमें समुद्रसे उत्पन्न हुए और भगवान् श्रीविष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया तथा सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर तुम्हें सँवारा है। तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारी गम्भीर ध्वनिसे मेघ डर जाते हैं, देवता और असुर थर्रा उठते हैं, तुम्हारी उज्ज्वल आभा दस हजार चन्द्रमाओंसे भी अधिक उद्दीप्त है। पांचजन्य! तुम्हें नमस्कार है।’
तत्पश्चात् सुगन्धित तेलसे मेरे विग्रहमें अभ्यंग (आमर्दन) करे। फिर कस्तूरीके चन्दनसे उबटन आदि लगावे। उत्तम गन्धसे वासित शुभ जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक नहलाकर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय अर्पण करे। उसके बाद अन्य सब उपचारोंको भी क्रमशः चढ़ावे। पीठको दिव्य वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत करके पुष्पोंसे उसकी पूजा करे। उसके ऊपर मेरे विग्रहको पधराकर श्रद्धापूर्वक मेरे लिये वस्त्र, अलंकार और गन्ध आदि निवेदन करे। खीर तथा पूआ आदिके साथ नाना प्रकारका नैवेद्य भोग लगावे। फिर भक्तिपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल भेंट करे। उत्तम गन्धवाले पुष्पोंको भक्तिभावसे निवेदन करे। दशांग अथवा अष्टांग धूप देकर अतिशय सुन्दर दीप जलाकर रखे। प्रणाम करके आदरपूर्वक स्तुति करे। तदनन्तर पलंगपर सुलाकर मंगल अर्घ्य निवेदन करे।
द्वादशी अथवा पूर्णिमाको यदि गायके दूधसे मुझे स्नान कराया जाय तो वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य मार्गशीर्षमासमें मुझको मधु और शक्करसे स्नान कराता है, वह स्वर्गसे इस लोकमें लौटनेपर राजा होता है। जो अगहनमें मुझे दूधसे नहलाता है, वह