संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 476, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४४७
स्वर्गलोकमें चन्द्रमा, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गणोंपर विजय पाता है। जो उपासक मार्गशीर्षके महीनेमें शंखमें तीर्थका जल लेकर उसकी एक बूँदसे भी मुझे नहलाता है, वह अपने समूचे कुलको तार देता है। जो अगहनमासमें भक्तिपूर्वक शंखध्वनि करके मुझे स्नान कराता है, उसके पितर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। जो शंखमें जल लेकर ‘ॐ नमो नारायणाय' का उच्चारण करते हुए मुझे नहलाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। नदी, तड़ाग, बावड़ी और कूँआँ आदिका जो जल शंखमें रखा जाता है, वह सब गंगाजलके समान हो जाता है। जो वैष्णव मेरे चरणोदकको शंखमें रखकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह तपस्वी मुनियोंमें सबसे श्रेष्ठ है। तीनों लोकोंमें जितने तीर्थ हैं, वे सब मेरी आज्ञासे शंखमें निवास करते हैं, इसलिये शंख श्रेष्ठ माना गया है। जो शंखमें फूल, जल और अक्षत रखकर मुझे अर्घ्य देता है, उसे अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो वैष्णव मेरे मस्तकपर शंखका जल घुमाकर उससे अपने घरको सींचता है, उसके घरमें कोई अशुभ नहीं होता है। बाजोंके उच्च स्वर और गीत-कीर्तन आदिके मंगलमय शब्दोंके साथ जो भक्तिपूर्वक मुझे स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
~~ ० ~~
भगवान्के पूजनमें घण्टानाद, चन्दन, पुष्प, तुलसीदल, धूप और दीपका माहात्म्य
श्रीभगवान् कहते हैं—घण्टा सर्ववाद्यमय है, वह मुझे सर्वदा प्रिय है। मेरी पूजाके समय उसे बजानेसे मनुष्य सौ कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। घण्टानाद सदा ही करने योग्य है। विशेषतः मेरी पूजाके समय घण्टा अवश्य बजाना चाहिये। मृदंग और शंखकी ध्वनि तथा प्रणवके उच्चारणके साथ किया हुआ मेरा पूजन मनुष्योंको सदैव मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मेरे पूजनके समय जो घण्टानाद करता है, उसके सौ जन्मोंके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य गरुड़की पीठपर लक्ष्मीके साथ बैठे हुए मुझ शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी विष्णुकी पूजा करते हैं, वे मेरे धामको प्राप्त होते हैं। मेरे समीप गीत, कीर्तन और नृत्य करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता है। जो गरुड़चिह्नसे युक्त घण्टा हाथमें लेकर धूप, आरती, स्नान, पूजा और विलेपनके समय मेरे आगे प्रतिदिन बजाता है, वह प्रत्येक उपचारमें बजानेके बदले सौ-सौ चान्द्रायणसे प्राप्त होनेवाले फलको पाता है। जो तुलसीकाष्ठका घिसा हुआ चन्दन मुझे अर्पण करता है, उसके सौ जन्मोंके समस्त पातकोंको मैं भस्म कर देता हूँ। जो कलियुगके मार्गशीर्षमासमें मुझे तुलसीकाष्ठका चन्दन देते हैं, वे निश्चय ही कृतार्थ हो जाते हैं। जो शंखमें चन्दन रखकर मार्गशीर्षमासमें मेरे अंगोंमें लगाता है, उसके ऊपर मैं विशेष प्रेम करता हूँ। जो अगहनमें तुलसीदल और आँवलोंसे भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है।
बेला, चमेली, जूही, अतिमुक्ता (माधवी लता), कनेर, वैजयन्ती, विजया, चमेलीके गुच्छे, कर्णिकार, कुरैया, चम्पक, चातक, कुन्द, कर्चूर, मल्लिका, अशोक, तिलक तथा अपरयूथिका इत्यादि फूल मेरी पूजाके लिये उत्तम होते हैं। केतकीका पत्ता और पुष्प, भृंगराज, तुलसीका पत्ता और फूल—ये सब मुझे शीघ्र प्रसन्न करनेवाले हैं। लाल, नील और सफेद कमल मार्गशीर्षमासमें मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। मेरी पूजाके लिये वे ही फूल उत्तम माने गये हैं, जो सुन्दर रंगवाले होनेके साथ ही सरस