भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और सुगन्धित हों। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृंगराजपत्र और आमलकीपत्र—ये मेरे पूजनके लिये शुभ हैं। वन अथवा पर्वतमें उत्पन्न होनेवाले फूल और पत्र यदि तुरंतके तोड़े हुए छिद्ररहित और कीटवर्जित हों, तो उन्हें जलसे धोकर उनके द्वारा मेरी पूजा करनी चाहिये। बगीचेमें खिलनेवाले फूलोंसे भी मेरी पूजा की जा सकती है। जिन वृक्षोंके फूल मेरी पूजाके लिये उत्तम माने गये हैं, उनके पत्ते भी उत्तम हैं। फूलों और पत्तोंके अभावमें उनके फल भी चढ़ाये जा सकते हैं। इन पत्तों, फलों और फूलोंसे जो अगहनमें मेरी पूजा करता है, उसपर प्रसन्न होकर मैं अपनी भक्ति देता हूँ।

जो मनुष्य तुलसीकी मंजरियोंसे मेरी पूजा करता है, वह मोक्षका भागी होता है। जो तुलसीका पौधा लगाकर उसके पत्तोंसे मेरी पूजा करता है, वह मेरे निवासस्थान श्वेतद्वीपमें आनन्दका अनुभव करता है। जो तुलसीदलसे प्रतिदिन मुझ लक्ष्मीपतिकी पूजा करता है, उसके महापातक भी नष्ट हो जाते हैं, फिर उपपातकोंकी तो बात ही क्या है। बासी फूल और बासी जल पूजाके लिये वर्जित हैं। परंतु तुलसीदल और गंगाजल बासी होनेपर भी वर्जित नहीं हैं।* बिल्वपत्र, शमीपत्र, चमेलीपत्र और कमल तथा कौस्तुभमणिसे भी तुलसीदल मुझे अधिक प्रिय है। जिसके पत्ते कटे न हों और जो मंजरीके साथ हो, ऐसी तुलसी मुझे लक्ष्मीके समान प्रिय है। जैसी कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशी मुझे प्रिय है, उसी प्रकार गौर और कृष्ण दोनों प्रकारकी तुलसी मुझे प्रिय है। कौस्तुभ आदि असंख्य रत्न तभीतक गर्जते हैं, जबतक कि श्यामा तुलसीकी श्याम मंजरी नहीं मिलती है। जो मेरी पूजाके लिये माँगनेवालोंको तुलसीदल देते हैं तथा अन्य भक्तोंको भी तुलसीदल अर्पण करते हैं, वे मेरे अविनाशी धामको जाते हैं।

जो काले अगरुके बने हुए धूपसे मेरे मन्दिरको सुवासित करता है, वह वैष्णव नरक-समुद्रसे मुक्त हो जाता है। गुग्गुलमें भैंसका घी और शक्कर मिलाकर जो मुझे धूप देता है, उसकी अभिलाषाको मैं पूर्ण करता हूँ। अगरुका धूप देह और गेह दोनोंको पवित्र करता है, रालका बना हुआ धूप यक्षों और राक्षसोंका नाश करता है। चमेलीका फूल, इलायची, गुग्गुल, हरें, कूट, राल, गुड़, छडछरीला और वज्रनखी नामक गन्ध-द्रव्य—इनके साथ धूपका संयोग होनेसे इन सबको दशांग धूप कहते हैं†। यदि मेरे अत्यन्त प्रिय मार्गशीर्षमासमें कोई मनुष्य दशांग धूप देता है, तो मैं उसे अत्यन्त दुर्लभ मनोरथ, बल, पुष्टि, स्त्री, पुत्र और भक्ति देता हूँ।

अनेक बत्तियोंसे युक्त और घीसे भरे हुए दीपको जलाकर जो मनुष्य मेरी आरती उतारता है, वह कोटि कल्पोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो अगहनके महीनेमें मेरे आगे होती हुई आरतीका दर्शन करता है, वह अन्तमें परमपदको प्राप्त होता है। जो मेरे आगे भक्तिपूर्वक कपूरकी आरती करता है, वह मुझ अनन्तमें प्रवेश कर जाता है। जो मन्त्रहीन और क्रियाहीन मेरा पूजन किया गया है, वह मेरी आरती कर देनेपर सर्वथा परिपूर्ण हो जाता है। जो मार्गशीर्षमासमें कपूरसे दीपक जलाकर मुझे अर्पण करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है।


* वर्ज्यं पर्युषितं पुष्पं वर्ज्यं पर्युषितं जलम्। न वर्ज्यं तुलसीपत्रं न वर्ज्यं जाह्नवीजलम्॥
† जातिपुष्पमथैला च गुग्गुलश्च हरीतकी। कूटः सर्जरसश्चैव गुडः शैलाच्छडस्तथा॥
नखयुक्तानि चैतानि दशाङ्गो धूप उच्यते।
(स्क० पु०, वै० मा० मा० ८। ९, ८। २७)