संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४४८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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और सुगन्धित हों। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृंगराजपत्र और आमलकीपत्र—ये मेरे पूजनके लिये शुभ हैं। वन अथवा पर्वतमें उत्पन्न होनेवाले फूल और पत्र यदि तुरंतके तोड़े हुए छिद्ररहित और कीटवर्जित हों, तो उन्हें जलसे धोकर उनके द्वारा मेरी पूजा करनी चाहिये। बगीचेमें खिलनेवाले फूलोंसे भी मेरी पूजा की जा सकती है। जिन वृक्षोंके फूल मेरी पूजाके लिये उत्तम माने गये हैं, उनके पत्ते भी उत्तम हैं। फूलों और पत्तोंके अभावमें उनके फल भी चढ़ाये जा सकते हैं। इन पत्तों, फलों और फूलोंसे जो अगहनमें मेरी पूजा करता है, उसपर प्रसन्न होकर मैं अपनी भक्ति देता हूँ।
जो मनुष्य तुलसीकी मंजरियोंसे मेरी पूजा करता है, वह मोक्षका भागी होता है। जो तुलसीका पौधा लगाकर उसके पत्तोंसे मेरी पूजा करता है, वह मेरे निवासस्थान श्वेतद्वीपमें आनन्दका अनुभव करता है। जो तुलसीदलसे प्रतिदिन मुझ लक्ष्मीपतिकी पूजा करता है, उसके महापातक भी नष्ट हो जाते हैं, फिर उपपातकोंकी तो बात ही क्या है। बासी फूल और बासी जल पूजाके लिये वर्जित हैं। परंतु तुलसीदल और गंगाजल बासी होनेपर भी वर्जित नहीं हैं।* बिल्वपत्र, शमीपत्र, चमेलीपत्र और कमल तथा कौस्तुभमणिसे भी तुलसीदल मुझे अधिक प्रिय है। जिसके पत्ते कटे न हों और जो मंजरीके साथ हो, ऐसी तुलसी मुझे लक्ष्मीके समान प्रिय है। जैसी कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशी मुझे प्रिय है, उसी प्रकार गौर और कृष्ण दोनों प्रकारकी तुलसी मुझे प्रिय है। कौस्तुभ आदि असंख्य रत्न तभीतक गर्जते हैं, जबतक कि श्यामा तुलसीकी श्याम मंजरी नहीं मिलती है। जो मेरी पूजाके लिये माँगनेवालोंको तुलसीदल देते हैं तथा अन्य भक्तोंको भी तुलसीदल अर्पण करते हैं, वे मेरे अविनाशी धामको जाते हैं।
जो काले अगरुके बने हुए धूपसे मेरे मन्दिरको सुवासित करता है, वह वैष्णव नरक-समुद्रसे मुक्त हो जाता है। गुग्गुलमें भैंसका घी और शक्कर मिलाकर जो मुझे धूप देता है, उसकी अभिलाषाको मैं पूर्ण करता हूँ। अगरुका धूप देह और गेह दोनोंको पवित्र करता है, रालका बना हुआ धूप यक्षों और राक्षसोंका नाश करता है। चमेलीका फूल, इलायची, गुग्गुल, हरें, कूट, राल, गुड़, छडछरीला और वज्रनखी नामक गन्ध-द्रव्य—इनके साथ धूपका संयोग होनेसे इन सबको दशांग धूप कहते हैं†। यदि मेरे अत्यन्त प्रिय मार्गशीर्षमासमें कोई मनुष्य दशांग धूप देता है, तो मैं उसे अत्यन्त दुर्लभ मनोरथ, बल, पुष्टि, स्त्री, पुत्र और भक्ति देता हूँ।
अनेक बत्तियोंसे युक्त और घीसे भरे हुए दीपको जलाकर जो मनुष्य मेरी आरती उतारता है, वह कोटि कल्पोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो अगहनके महीनेमें मेरे आगे होती हुई आरतीका दर्शन करता है, वह अन्तमें परमपदको प्राप्त होता है। जो मेरे आगे भक्तिपूर्वक कपूरकी आरती करता है, वह मुझ अनन्तमें प्रवेश कर जाता है। जो मन्त्रहीन और क्रियाहीन मेरा पूजन किया गया है, वह मेरी आरती कर देनेपर सर्वथा परिपूर्ण हो जाता है। जो मार्गशीर्षमासमें कपूरसे दीपक जलाकर मुझे अर्पण करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है।
* वर्ज्यं पर्युषितं पुष्पं वर्ज्यं पर्युषितं जलम्। न वर्ज्यं तुलसीपत्रं न वर्ज्यं जाह्नवीजलम्॥
† जातिपुष्पमथैला च गुग्गुलश्च हरीतकी। कूटः सर्जरसश्चैव गुडः शैलाच्छडस्तथा॥
नखयुक्तानि चैतानि दशाङ्गो धूप उच्यते।
(स्क० पु०, वै० मा० मा० ८। ९, ८। २७)
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४४९
स्तुतिपाठ, मन्त्रजप, साष्टांग प्रणाम तथा दामोदरमन्त्रके जपका माहात्म्य
श्रीभगवान् कहते हैं—तदनन्तर नैवेद्यका भोग लग जानेपर कर्पूरवासित जलसे मुझे आचमन करावे, पान दे और हाथ धोनेके लिये चन्दन अर्पण करे। फिर पुष्पांजलि देकर भक्तिपूर्वक कपूरसे आरती करे। मुकुट और आभूषण आदि समर्पित करके छत्र, चँवर भेंट करे तथा श्यामसुन्दर विग्रहवाले भगवान् विष्णु मेरे प्रति कृपापूर्वक प्रसन्नमुख हैं, ऐसा ध्यान करते हुए अष्टाक्षर मन्त्रका एक सौ आठ बार जप और स्तोत्रोंद्वारा भगवान्का स्तवन करे। विद्वान् पुरुष चलते, हँसते और अगल-बगलमें देखते हुए तथा पैरसे पैरको दबाकर हाथको मस्तकपर रखकर, खड़े होकर और व्यग्रचित्त होकर मेरे मन्त्रका जप न करे। जपके समय तथा व्रत, होम और पूजन आदिमें दूसरोंसे वार्तालाप न करे। जपका फल तीर्थ आदिमें सहस्रगुना और मेरे समीप अनन्तगुना होता है।
इस प्रकार अगहनके महीनेमें मेरी पूजा करके जो प्रदक्षिणा करता है, वह पग-पगपर सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्यफल पाता है। सहस्रनामका पाठ अथवा केवल एक नामका उच्चारण करते हुए जो भक्तिपूर्वक मेरी एक परिक्रमा भी करता है, वह प्रतिदिनके पापको भस्म कर डालता है। जिसने भक्तिभावके साथ मेरी एक सौ आठ बार परिक्रमा की है, उसने उत्तम दक्षिणावाले सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया। अब तुम एक गूढ़ रहस्यकी बात सुनो। अपने दामोदर नामसे मुझे ऐसी प्रसन्नता होती है कि जिसकी कहीं तुलना नहीं है। गोकुलमें जब मैंने दहीका मटका फोड़ डाला, तब मैया यशोदाने मेरी कमरमें रस्सी लपेटकर मुझे खूब कसकर ओखलीमें बाँध दिया, तभीसे मेरा दामोदर नाम प्रसिद्ध हुआ। जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त हो सूर्योदयकालमें पवित्रतापूर्वक 'दामोदराय नमः' इस मन्त्रका तीन हजार जप करता है और साढ़े तीन लाख जप पूरा होनेपर उसका उद्यापन करता है, जपके दशांशका हवन, तर्पण और ब्राह्मण-भोजन कराता है और इस प्रकार भक्तिपूर्वक इस अनुष्ठानको पूरा करता है, उसे मैं मनोवांछित वस्तुएँ देता हूँ। 'दामोदराय नमः' इस मन्त्रराजका जप करते हुए प्रतिदिन मेरी प्रदक्षिणा और दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर सदैव मुझे साष्टांग प्रणाम करना चाहिये। दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती, मस्तक, मन, वाणी और दृष्टिसे जो प्रणाम किया जाता है, उसे साष्टांग प्रणाम कहते हैं*। अपने मस्तकको मेरे चरणोंपर रखकर दोनों भुजाओंको परस्पर मिला दे और प्रार्थना करे, 'हे परमेश्वर! मैं मृत्युरूपी ग्राहसे परिपूर्ण इस संसारसमुद्रसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें।' फिर मेरेद्वारा दी हुई प्रसाद-माला आदिको सादर मस्तकपर चढ़ाकर मेरी पूजाकी पूर्तिके लिये इस प्रकार कहे 'देव जनार्दन! मैंने मन्त्रहीन, भक्तिहीन और क्रियाहीन जो पूजन किया है, वह सब आपकी कृपासे परिपूर्ण हो।'†
विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, गजेन्द्रमोक्ष,
* पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा। मनसा वचसा दृष्ट्या प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥
† मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १०।३०, ३३)
४५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अनुस्मृति तथा गीता—ये पाँच प्रकारके स्तोत्र मुझे अभीष्ट हैं। महाभाग! इन्हें सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। जो मनुष्य एक बूँद भी शालग्रामशिलाका जल पी लेता है, वह मोक्षका भागी होता है। जिनके मस्तकपर शालग्राम-शिलाका चरणोदक है तथा जो उस चरणोदकको पीते हैं, उनपर सूतक और मृतकका भी अशौच लागू नहीं होता। मृत्युकालमें जिसको वह चरणामृत दिया जाता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है।
राजा वीरबाहुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं एकादशीव्रत और उसका उद्यापन
श्रीभगवान् कहते हैं—ब्रह्मन्! काम्पिल्य नगरमें वीरबाहु नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे सत्यवादी, क्रोधपर विजय पानेवाले, ब्रह्मज्ञानी तथा मेरे भक्त थे। उनका स्वभाव बड़ा दयालु था। वे वैष्णवोंके भक्त थे और मेरी कथा सुननेमें सदा रुचि रखते थे। दानी, विद्वान्, क्षमाशील, पराक्रमी, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे स्नेह रखनेवाले थे। उनकी स्त्री पतिव्रता, परम साध्वी तथा मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाली थी। अपनी उस रानीके साथ वे समूची पृथ्वीका पालन करते और मेरे सिवा दूसरे किसी देवताको नहीं जानते थे। एक दिन महामुनि भारद्वाज महात्मा वीरबाहुके घर पधारे। उन्हें देखकर राजाने विधिपूर्वक अर्घ्य दे उनका स्वागत-सत्कार किया। अपने ही हाथसे उनके लिये आसन बिछाया और बड़ी भक्तिसे प्रणाम करके मुनिके आगे खड़े होकर कहा—'ब्रह्मर्षे! आज मेरा जन्म सफल हो गया। परमात्मा भगवान् विष्णु मुझपर बहुत प्रसन्न हैं, जिससे आप-जैसे योगिराजने आज मेरे घरपर पदार्पण किया। आपकी पवित्र दृष्टि पड़नेसे आज मैं कोटि-कोटि पापोंसे मुक्त हो गया।'
भारद्वाज बोले—महाभाग! तुम भगवान् विष्णुके भक्त हो। उत्तम प्रजाओंसे युक्त वह धरती धन्य है, जिसकी तुम रक्षा करते हो। जहाँका राजा भगवान् विष्णुका भक्त न हो, उस राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। जंगल और तीर्थमें निवास करना अच्छा है, परंतु वैष्णवहीन राज्यमें रहना कदापि श्रेयस्कर नहीं। जहाँ भगवद्भक्त राजा इस पृथ्वीका शासन करता है, उस पापशून्य राज्यको वैकुण्ठ मानना चाहिये। जैसे मन्त्रहीन आहुति, मरे हुए बछड़ेवाली गायका दूध, दशमी-विद्धा एकादशी, लम्बे-लम्बे केश रखनेवाली विधवा तथा स्नानके बिना व्रत—ये सब श्रेष्ठ नहीं माने जाते, उसी प्रकार बिना वैष्णवका राज्य भी अच्छा नहीं है।*
राजन्! मैंने जो तुम्हारी ओर देखा है, उससे मेरी दृष्टि सफल हो गयी। जो तुम्हारे साथ वार्तालाप करती है, वह मेरी वाणी भी आज सफल हो गयी। तुम भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर रहनेवाले परम पवित्र राजा हो। मैंने तुम्हारा दर्शन कर लिया। तुम्हारा कल्याण हो, तुम सुखी रहो, अब मैं जाऊँगा।
इसी समय महारानी कान्तिमतीने भी आकर मुनिश्रेष्ठ भारद्वाजको प्रणाम किया। तब मुनिने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा—'सुन्दरि! तुम
* यथाऽऽहुतिर्मन्त्रहीना मृतवत्सापयो यथा॥
सकेशा विधवा यद्वद् व्रतं स्नानविवर्जितम्। एकादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्॥
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५१
सौभाग्यवती और पतिव्रता रहो। शुभे! भगवान् विष्णुमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो।' तत्पश्चात्
राजाने पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा पुण्य किया है, जिससे मुझे अकण्टक राज्य, गुणवान् पुत्र, मुझमें मन लगाये रहनेवाली परम सुन्दरी एवं भगवद्भक्त पत्नी आदिकी प्राप्ति हुई? मुने! मैं कौन था और मेरी यह स्त्री कौन थी?'
भारद्वाजने कहा—राजन्! तुम पूर्वजन्ममें जीवहिंसापरायण शूद्र थे। नास्तिक, दुराचारी, परस्त्रीगामी, कृतघ्न, उद्धण्ड और सदाचारशून्य थे। परंतु तुम्हारी जो यह स्त्री है, यह पूर्वजन्ममें भी तुम्हारी ही पत्नी थी। इसके लिये मन, वाणी और क्रियाद्वारा सेवन करने योग्य तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं था। यह पतिव्रता नारी निरन्तर तुम्हारी ही सेवामें रहती थी। तुम पापकर्मी थे इसलिये मित्रोंने तुम्हारा साथ छोड़ा, भाई-बन्धुओंने तुम्हें त्याग दिया, तुम्हारे पूर्वजोंने जो धन संचित कर रखा था, वह सब नष्ट हो गया। धन नष्ट हो जानेपर भी तुम्हें भोगकी अभिलाषा ज्यों-की-त्यों बनी रही। पूर्वकर्मोंके परिणामसे तुम्हारी खेती भी चौपट हो गयी।
उस दशामें सबने तुम्हें छोड़ दिया, परंतु इस साध्वी स्त्रीने प्रतिदिन क्षीणकाय होती हुई भी तुम्हें नहीं छोड़ा। सब ओरसे विफलमनोरथ होकर तुम निर्जन वनमें चले गये और वहाँ अनेक प्रकारके जीवोंको मारकर अपना पोषण करने लगे। इस प्रकार रहते हुए तुम्हें बहुत वर्ष बीत गये।
एक दिनकी बात है, एक महामुनि राह भूलकर उधर आ निकले। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण थे और उनका नाम देवशर्मा था। उन्हें दिशाका भी ज्ञान नहीं रह गया था। वे भूख और प्याससे अत्यन्त पीड़ित होकर दोपहरके समय वनमें गिर पड़े। उस दुःखसे पीड़ित ब्राह्मणको देखकर तुम्हारे मनमें दया आ गयी। वे बूढ़े थे और तुमसे अपरिचित भी थे, तो भी तुमने उनका हाथ पकड़कर उठाया और कहा—'ब्रह्मर्षे! तुम कृपा करके मेरे आश्रमपर चलो। वहाँ जलसे भरा हुआ सरोवर है, जो कमलोंके समुदायसे सदा सुशोभित रहता है। वह आश्रम सुन्दर फल-फूलोंवाले मनोहर वृक्षोंसे घिरा हुआ है। वहाँ ठंडे जलमें स्नान करके नित्यकर्म करो, उसके बाद फल खाओ और शीतल जल पीओ।' ब्राह्मणको कुछ-कुछ चेत हुआ और वे उस शूद्रका हाथ पकड़कर जलाशयके समीप गये। वहाँ सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठे। फिर विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुकी पूजा की और शीतल जल पिया। वृक्षके नीचे आकर जब वे विश्राम करने लगे, तब उस शूद्रने अपनी स्त्रीके साथ आकर मुनिको साष्टांग प्रणाम किया और बड़ी भक्तिसे कहा—'ब्रह्मर्षे! आप हमारे अतिथि हैं और हम दोनोंका उद्धार करनेके लिये यहाँ पधारे हैं। आपके दर्शनमात्रसे हमारे सब पापोंका नाश हो गया।' यह कहकर उसने अपनी स्त्रीसे कहा—'प्रिये! इन ब्राह्मण देवताके लिये
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तुम स्वादिष्ट, कोमल, सरस, पके हुए तथा प्रिय लगनेवाले फल अर्पण करो।'
ब्राह्मण बोले—बेटा! मैं तुम्हें नहीं जानता। पहले तुम अपनी जाति और कुलका परिचय दो, क्योंकि बिना जाने हुए ब्राह्मणके यहाँ भी भोजन नहीं करना चाहिये।
शूद्रने कहा—द्विजश्रेष्ठ! मैं शूद्र हूँ, मेरे दुष्ट बन्धुओंने मुझे त्याग दिया है।
वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे। इतनेमें ही शूद्रकी पत्नीने ब्राह्मणके आगे फल परोस दिये। ब्राह्मणने उन फलोंका भोजन किया और ठंडा जल पीकर उनका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। वहाँ सुख पाकर उन्होंने वृक्षके नीचे विश्राम किया। शूद्रने भी घरमें जाकर अपनी पत्नीके साथ भोजन किया और फिर ब्राह्मणके समीप आकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! आप कहाँसे इस निर्जन वनमें आये हैं।'
ब्राह्मणने उत्तर दिया—महाभाग! मैं ब्राह्मण हूँ और प्रयाग जाना चाहता हूँ। अपरिचित मार्गसे चलकर इस भयंकर वनमें आ गया हूँ। तुमने आज मुझे जीवनदान दिया है। बोलो, मैं तुम्हारा क्या उपकार करूँ? शूद्र बोला—'राजा भीमसे सुरक्षित विदर्भ नगरी मेरा निवासस्थान है, मैं महाराष्ट्र प्रान्तका रहनेवाला हूँ, मेरी जाति शूद्र है, मैं सदा पापमें ही लगा रहा, अपने वर्णधर्मको मैंने छोड़ दिया, फिर बन्धुओंने मुझे त्याग दिया और मैं इस वनमें चला आया। यहाँ प्रतिदिन जीवहिंसा करके अपनी स्त्रीके साथ जीवन-निर्वाह करता हूँ। महामुने! अब इस पातकसे मुझे अत्यन्त खेद और वैराग्य हो गया है। प्रभो! मुझ पापीके ऊपर कुछ अनुग्रह कीजिये। द्विजश्रेष्ठ! मेरे किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे आप यहाँ आये हैं। आप कृपा करके ऐसा उपदेश दें, जिसके प्रभावसे मुझे अपनी पत्नीके साथ यमराजका दर्शन न करना पड़े। मैं भगवान् विष्णुको छोड़कर और कुछ नहीं चाहता।'
देवशर्माने कहा—शूद्र! सहसा तुम्हारे मनमें भगवान् विष्णुके ऊपर जो ऐसी पूर्ण श्रद्धाबुद्धि हुई है, इससे तुम तीर्थ और व्रतके बिना ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो गये। आतिथ्य-सत्कार और भक्तिसे तुम्हें भगवान् विष्णुका पद प्राप्त हुआ। यों कहकर देवशर्मा ब्राह्मण तीर्थराज प्रयागको चले गये। राजन्! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने तुमसे कह सुनाया।
राजा बोले—ब्रह्मन्! सम्पूर्ण एकादशीकी उत्तम विधिक उपदेश कीजिये, जिससे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नता प्राप्त हो।
ऋषिने कहा—नृपश्रेष्ठ! मार्गशीर्ष आदि महीनोंमें सभी द्वादशी तिथियोंको कल्याणमय अखण्ड एकादशी-व्रतका पालन करना चाहिये। दशमीको नक्तव्रत करे, एकादशीको दिनमें और रात्रिमें भी उपवास करे तथा द्वादशीको पारणाके रूपमें केवल एक बार भोजन करे। इसे अखण्डा एकादशी कहते हैं। दिनके आठवें भागमें जब सूर्यकी ज्योति मन्द हो गयी हो, उसी समयको नक्त जानना चाहिये; उसीमें किये हुए भोजनको नक्तव्रत कहते हैं। रात्रिमें भोजन करनेका नाम नक्तव्रत नहीं है।^१ काँस्यके बर्तनमें भोजन, उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, शहद, दूसरेका अन्न, दुबारा भोजन और मैथुन—इन दस वस्तुओंको विष्णुभक्त मनुष्य दशमीको त्याग दे।^२ बार-बार
१- दशम्यां चैव नक्तं च एकादश्यामुपोषणम्। द्वादश्यामेकभुक्तं च अखण्डा इति कथ्यते॥
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे। तद्धि नक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। २२-२४)
२- कांस्यं माषं मसूरांच्च चणकान् कोद्रवांस्तथा। शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने॥
विष्णुभक्तो नरो वापि दशम्यां दश वर्जयेत्।
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। २४-२५)
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * | ४५३ ---|---
जलपान, हिंसा, अपवित्रता, असत्य-भाषण, पान चबाना, दाँतन करना, दिनमें सोना, मैथुन-सेवन, जुआ खेलना, रातमें सोना और पतित मनुष्योंसे वार्तालाप करना—विष्णुभक्त पुरुष इन ग्यारह बातोंको एकादशीके दिन त्याग दे। एकादशीको भगवान्से प्रार्थना करे कि—‘हे केशव! आज आपकी प्रसन्नताके लिये मेरे द्वारा दिन और रातमें संयम-नियमका पालन हो। मेरी सोयी हुई इन्द्रियोंके द्वारा यदि स्वप्नमें कोई विकलता, भोजन या मैथुनकी क्रिया हो जाय अथवा मेरे दाँतोंके अंदर यदि पहलेसे अन्न सटा हुआ हो तो हे पुरुषोत्तम! इन सब बातोंको क्षमा कीजिये।’
पापोंसे उपावृत्त (निवृत्त) होकर जो गुणोंके साथ वास किया जाय, उसीको ‘उपवास’ समझना चाहिये। शरीरको सुखा डालनेका नाम ‘उपवास’ नहीं है*। पहले कही हुई दस बातें तथा पराया अन्न, शहद और शरीरमें तेल मलना आदि कार्य द्वादशीके दिन विष्णुभक्त पुरुष न करे। फिर द्वादशी आनेपर भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करे—‘हे भगवान् गरुड़ध्वज! आज सब पापोंका नाश करनेवाली पुण्यमयी पवित्र द्वादशी तिथि मेरे लिये प्राप्त हुई है। इसमें मैं पारण करूँगा। आप प्रसन्न होइये।’
तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भोजन करे। इस विधिसे जबतक वर्षकी समाप्ति हो, तबतक विद्वान् पुरुष एकादशी-व्रत करता रहे। वर्ष पूरा होनेपर उसका उद्यापन करे। मार्गशीर्षमासके शुभ शुक्ल पक्षमें एकादशीका उद्यापन किया जाता है। उसमें विधिके जाननेवाले बारह ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके तेरहवें विधिज्ञ आचार्यको पत्नीसहित आमन्त्रित करे। यजमान स्नान करके पवित्र हो श्रद्धा एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक पाद्य, अर्घ्य और वस्त्र आदि सामग्रियोंसे आचार्य आदिका पूजन करे। तत्पश्चात् आचार्य उत्तम रंगोंसे चक्र-कमलसंयुक्त सर्वतोभद्रमण्डल बनावे। उस मण्डलको श्वेत वस्त्रसे आवेष्टित करे। फिर पंचपल्लव तथा पंचरत्नसे युक्त कर्पूर और अगुरुके सुगन्धसे वासित जलपूर्ण कलशको लाल कपड़ेसे वेष्टित करके उसके ऊपर ताँबेका पूर्णपात्र रखे। साथ ही उस कलशको फूलोंकी मालाओंसे भी आवेष्टित करे और उसे सर्वतोभद्रमण्डलके ऊपर स्थापित कर दे। कलशके ऊपर भगवान् श्रीलक्ष्मीनारायणकी स्थापना करे। तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलमें बारह मासोंके अधिपतियोंकी स्थापना करके अखण्ड व्रतकी पूर्तिके लिये उनका पूजन करना चाहिये। मण्डलसे पूर्वभागमें शुभ शंखकी स्थापना करते हुए कहे—‘हे पांचजन्य! तुम पहले समुद्रसे उत्पन्न हुए, फिर भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथोंमें धारण किया। सम्पूर्ण देवताओंने तुम्हारे रूपको सँवारा है, तुम्हें नमस्कार है।’
सर्वतोभद्रमण्डलसे उत्तर दिशामें हवनके लिये वेदी बनावे और संकल्पपूर्वक वेदोक्त विष्णुसम्बन्धी मन्त्रोंसे हवन करे। फिर भगवान् विष्णुकी प्रतिमाका स्थापन और पुरुषसूक्त एवं पौराणिक शुभ मन्त्रोंसे उसका पूजन करे। नैवेद्य चढ़ावे, धूप-दीप आदि उपहार भेंट करके आरती उतारे। फिर यक्ष-कर्दम (कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलसे बनाये हुए अंगलेप)-से पूजा करके परिक्रमा करे। ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर नमस्कार करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचार्य आदि क्रमसे वैदिक मन्त्रोंका जप करना चाहिये। जपके लिये पवमानसूक्त, मण्डलब्राह्मण ‘मधुव्वाता ऋतायते०’ इत्यादि तीन मन्त्र ‘तेजोऽसि०’, ‘सुक्रजं०’, ‘वाचं ब्रह्म०’ (साम०), ‘पवित्रवन्तं सूर्यस्य०’ तथा ‘विष्णोर्महसि०’ इत्यादि वैदिक
* उपावृत्तस्तु पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह। उपवासः स विज्ञेयो न शरीरस्य शोषणम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। ३०)
४५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
संहितोक्त मन्त्र श्रेष्ठ माने गये हैं। जपके अन्तमें भगवान् विष्णुका कलशके ऊपर स्थापन करना चाहिये। सबेरे दिन निकलनेपर नीचे लिखे क्रमसे हवन करे। यज्ञाग्निक्रियापरायण पुरुष पहले पात्र-स्थापन करके विधिपूर्वक पूजा करनेके पश्चात् स्तुति करे। उसके बाद अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार चुरूपूर्वक होम करे। चरु दो पात्रोंमें तैयार करे। पुरुषसूक्तके मन्त्रसे चरुकी सोलह आहुतियाँ दे तथा घृतयुक्त पायसद्वारा चार बार श्रेष्ठ आहुति प्रदान करे। उसके बाद प्रादेशमात्र (अँगुठेसे लेकर तर्जनीतककी लंबी) एक सौ पलाशकी समिधाएँ लेकर उन्हें घीमें डुबो दे और ‘इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ इत्यादि मन्त्रोंसे कर्मकी सिद्धिके लिये उनका हवन करे। समिधाओंकी एक सौ आहुति देनेके बाद तिलकी दो सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार वैष्णव होम करके ग्रहयज्ञ प्रारम्भ करे। उसमें भी क्रमशः समिधाहोम, चरुहोम और तिलहोम करने चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन कराकर पूजन करे। फिर ऋत्विजोंको दक्षिणा दे और भगवान्की प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको एक दूध देनेवाली गौ तथा सुन्दर बैल दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको तेरह पद दान करे। सपत्नीक आचार्यको वस्त्रोंसे सन्तुष्ट करे और धनसहित महादान दे। पारण कर लेनेपर रातको ब्राह्मणोंको जलसे भरे हुए वस्त्र-वेष्टित पचीस कलश दान करे। अपनी शक्तिके अनुसार व्रतका उद्यापन करना चाहिये। इस प्रकार अखण्ड एकादशी-व्रतका वर्णन किया गया।
एकादशीके जागरण और मत्स्योत्सवकी विधि एवं माहात्म्य
श्रीभगवान् कहते हैं— गीत, वाद्य, नृत्य, पुराणपाठ, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन, अनुलेपन, फल-निवेदन, श्रद्धा, दान, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण, निद्रात्याग, प्रसन्नतापूर्वक मेरा पूजन, आश्चर्य और उत्साहसहित पाप और आलस्यादिका त्याग, प्रदक्षिणा, नमस्कार, हर्षयुक्त हृदयसे नीराजन तथा प्रत्येक पहरमें आरती—इन गुणोंसे युक्त जागरण एकादशीकी रात्रिमें करना चाहिये। जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता। यदि कोई कथावाचक मिले तो एकादशीके जागरणमें पहले पुराणपाठकी व्यवस्था करनी चाहिये। जो अविद्ध एकादशीके दिन-रातमें मेरे लिये जागरण करते हैं, उनके बीचमें मैं प्रसन्न होकर नृत्य करता हूँ। जो एकादशीकी रातमें जागरण करते समय दीप-दान करता है, वह एक-एक निमेषमें गोदानका फल पाता है। जो जागरणमें मेरे लिये कपूर और गुग्गुल मिलाया हुआ धूप देता है, वह अपने लाखों जन्मोंकी पापराशिको भस्म कर डालता है। मेरे लिये जागरण करते समय जो भक्तिपूर्वक पुराणकी पुस्तक बाँचता है, वह मेरे समीप निवास करता है। मेरी परिक्रमा करनेसे विद्वानोंने जिस फलकी प्राप्ति बतायी है, वह पुण्यफल चार करोड़ यज्ञोंसे भी नहीं प्राप्त हो सकता। जो जागरणकालमें मेरे बालचरित्रोंका पाठ करता है, वह कोटि सहस्र युगोंतक श्वेतद्वीपमें निवास करता है। जो रात्रिमें गीता और श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह उसके साथ जागरण करनेसे वेद और पुराणोंमें बताये हुए सभी पुण्यफलोंको पाता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा जागरण करते हैं, उनकी मेरे लोकसे किसी प्रकार भी पुनरावृत्ति नहीं होती। बहुत पुत्रोंके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ, एक ही गुणवान् एवं भक्त पुत्र हो तो एकादशीके जागरणसे समस्त पूर्वजोंको तार दे। जो मेरे द्वारा कहे हुए जागरणके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक पढ़ता
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५५
है, वह सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। अनजानेमें या जान-बूझकर जो पातक किया गया है, पूर्वजन्ममें और इस जन्ममें ही जिस पापराशिका संचय किया गया है, एकादशीके जागरणसे उन सबका नाश हो जाता है। चतुरानन ! जो द्वादशीके इस माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर सनातन गतिको प्राप्त होता है। द्वादशी-व्रतके प्रभावसे सदा धर्मपर बुद्धि स्थिर रहती है, मेरे प्रति अत्यन्त निर्मल भक्तिका उदय होता है और मनुष्यको पाप नहीं लगता।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिमें विद्वानोंको प्रातःकाल विधिपूर्वक मत्स्योत्सव मनाना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है— मार्गशीर्षमासकी दशमी तिथिको मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए बुद्धिमान् पुरुष देवपूजनके पश्चात् विधिपूर्वक अग्निस्थापन करे। उसके बाद शंख, चक्र, गदा, किरीट तथा पीताम्बर धारण करनेवाले सर्वलक्षणलक्षित मुझ प्रसन्नवदनारविन्द गोविन्दका ध्यान करके हाथमें अर्घ्यके लिये जल ले और मुझे सूर्यमण्डलमें स्थित जानकर उस हाथके जलसे अर्घ्य दे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये— 'कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा, आप मेरे रक्षक हों।'
तदनन्तर रात्रिमें मेरे विग्रहके समीप बैठकर विधिपूर्वक 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका जप करे। एकादशीको प्रातःकाल किसी स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदीके समीप जाकर अथवा दूसरी किसी नदी या तड़ागके समीप पहुँचकर आगे बताये जानेवाले मन्त्रसे वहाँकी मिट्टी ले—
धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा।
तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि ! सम्पूर्ण भूतोंका धारण और पोषण सदा तुमसे ही होता है, इस सत्यके प्रभावसे तुम मेरे समस्त पापोंको छुड़ाओ।'
तत्पश्चात् वरुणसे प्रार्थना करे—
त्वयि नित्यं रसाः सर्वे स्थिता वरुण सर्वदा।
तेनेमां मृत्तिकां प्लाव्य पूतां कुरुष्व मा चिरम्॥
'हे वरुण ! सब रस सदा आपमें ही स्थित रहते हैं, इसलिये इस मृत्तिकाको आप्लावित करके आप शीघ्र पवित्र कीजिये।'
इस प्रकार मृत्तिका और जलके अधिष्ठाता देवताओंको प्रसन्न करके उस मिट्टी और जलको अपने शरीरमें लगावे। समूची मिट्टीके तीन भाग करके उसे जलमें मिलाकर नाभिसे नीचेके भागोंमें, नाभि और वक्षःस्थलके बीचमें तथा वक्षःस्थलसे ऊपरके भागमें लगाना चाहिये। उसके बाद जलमें, जहाँ मगर और कछुओंका भय न हो, नहाकर नित्यकर्म करके फिर मेरे मन्दिरमें आवे और मुझ भगवान् नारायणकी आराधना करे। 'केशवाय नमः' इस मन्त्रसे मेरे दोनों पैरोंकी पूजा करे। इसी प्रकार 'दामोदराय नमः' से कटिभागकी, 'नृसिंहाय नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'श्रीवत्सधारिणे नमः' से वक्षःस्थलकी, 'कौस्तुभनाभाय नमः' से कण्ठकी, 'श्रीपतये नमः' से हृदयकी, 'त्रैलोक्यविजयाय नमः' से बाहुकी, 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी, 'रथाङ्गधारिणे नमः' से चक्रकी, 'श्रीकराय नमः' से शंखकी, 'गम्भीराय नमः' से गदाकी और 'शान्तमूर्तये नमः' से पद्मकी पूजा करे। इस प्रकार सबके स्वामी मुझ देवेश्वर नारायणकी पूजा करके मेरे आगे चार कलशोंकी स्थापना करे, जो जलसे भरे हुए, मालासे सुशोभित, श्वेत चन्दनसे चर्चित, आम्रपल्लवोंसे संयुक्त, श्वेत वस्त्रोंसे अवगुण्ठित तथा सुवर्णयुक्त तिलसहित ताँबेके पूर्णपात्रोंसे आच्छादित हों। उन सबके मध्यमें एक पीठ (छोटी-सी चौकी) स्थापित करे;
४५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जिसके ऊपर वस्त्र बिछा हुआ हो। उस पीठके ऊपर एक पात्र रखे और उसे जलसे भर दे। फिर उसमें मत्स्यावतार भगवान्की सुवर्णमयी प्रतिमा रखे। उस प्रतिमामें देवाधिदेव भगवान्के सभी अंग स्पष्ट होने चाहिये। उनके हाथ श्रुतियों और स्मृतियोंके ग्रन्थोंसे विभूषित हों। वहाँ अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थों, फल, फूल, गन्ध, धूप और वस्त्र आदि सामग्रियोंसे विधिपूर्वक भगवान्की पूजा करके यह प्रार्थना करे—
रसातलगता वेदा यथा देव त्वयोद्धृताः।
मत्स्यरूपेण तद्वन्मां भवादुद्धर केशव॥
‘देव! केशव! पूर्वकालमें मत्स्यरूप धारण करके आपने जिस प्रकार रसातलमें गये हुए वेदोंका उद्धार किया, उसी प्रकार मेरा भी इस संसारसे उद्धार कीजिये।’
ऐसा कहकर भगवान्के आगे जागरण करे। फिर प्रातःकाल होनेपर वे चारों कलश चार ब्राह्मणोंको दे दे। भगवान् मत्स्यकी मूर्तिको गन्ध, धूप और वस्त्र आदिसे पूजित करके आचार्यको दे दे। जो मनुष्य इस विधिसे मत्स्योत्सव करता है और भक्तिपूर्वक इस उत्तम द्वादशीव्रतको सुनता-सुनाता है, वह सभी पातकोंसे छूट जाता है।
ब्राह्मण-भोजन, प्रसाद-भक्षण और श्रीकृष्णकीर्तनकी महिमा
श्रीभगवान् कहते हैं— मार्गशीर्षमासमें कीर्तियुक्त भगवान् केशवकी पूर्वोक्त विधिसे पूजा करनी चाहिये। जो प्रतिदिन एक बार भोजन करके समूचे मार्गशीर्षको व्यतीत करता है और भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोगों और पातकोंसे मुक्त हो जाता है। मानद! अग्नि और ब्राह्मण दोनों ही मेरे मुख हैं, परंतु ब्राह्मण नामक मुख जैसा श्रेष्ठ है, वैसा अग्नि नहीं है। अग्नि नामक मुख तो ब्राह्मणके अधीन है, परंतु ब्राह्मण स्वतन्त्र है। अगहनमें कुमुदके समान स्वच्छ और सुगन्धदायक सुन्दर भात, मूँगकी दाल और गायके प्रचुर घीसे पूर्ण भोजनका ब्राह्मणके मुखमें हवन करे। चतुर्मुख! मेरे भक्तोंको मेरा प्रसाद भोजन करना चाहिये। वह पवित्र करनेवाला तथा पापियोंको भी मुक्त करनेवाला है। इसलिये अन्न-पानादि ओषधि मुझको अर्पण करे और अशुद्धको भी शुद्ध करनेवाले उस प्रसादको भक्तिपूर्वक भोजन करे। अन्य देवताओंका नैवेद्य न ग्रहण करे। अगहनके महीनेमें विशेषरूपसे ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहकर मेरा नाम लेना चाहिये। यह मुझे अत्यन्त प्रसन्न करनेवाला है। मेरी एक प्रतिज्ञा है, जिसे देवता और असुर भी नहीं जानते। वह प्रतिज्ञा इस प्रकार है—जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा मेरी शरणमें आ जाता है, वह यहाँ सम्पूर्ण लौकिक कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें सर्वोत्कृष्ट वैकुण्ठधाममें जाता है। जो ‘हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे कृष्ण!!!’ ऐसा कहकर मेरा प्रतिदिन स्मरण करता है, उसे जिस प्रकार कमल जलको भेदकर ऊपर निकल आता है, उसी प्रकार मैं नरकसे निकाल लाता हूँ।* जो विनोदसे, पाखण्डसे, मूर्खतासे, लोभसे अथवा छलसे भी मेरा भजन करता है, वह मेरा भक्त कभी कष्टमें नहीं पड़ता। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर जो कृष्ण-नामकी रट लगाते हैं, वे यदि पापी हों तो भी कभी यमराजका दर्शन नहीं करते। पूर्व अवस्थामें किसीने सम्पूर्ण पाप किये हों तथापि यदि वह अन्तकालमें श्रीकृष्णका स्मरण कर लेता है, तो निश्चय ही
* कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ३६)
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५७
मुझे प्राप्त होता है। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर यदि कोई 'परमात्मा श्रीकृष्णको नमस्कार है' ऐसा विवश होकर भी कहे, तो वह अविनाशी पदको प्राप्त होता है। जो श्रीकृष्णका उच्चारण करके प्राण त्याग करता है, उसे प्रेतराज यम दूरसे ही खड़े होकर स्वर्गमें जाते देखते हैं। यदि कृष्ण-कृष्णका उच्चारण करता हुआ कोई श्मशानमें अथवा सड़कपर भी मर जाता है तो वह मुझे ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। जो मेरे भक्तोंका दर्शन करके कहीं मृत्युको प्राप्त होता है, वह मनुष्य मेरा स्मरण किये बिना भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है*। बेटा! पापरूपी प्रज्वलित अग्निसे भय न करो, श्रीकृष्णके नामरूपी मेघोंके जलकी बूँदोंसे उसे सींचकर बुझा दिया जाता है। तीखे दाढ़ोंवाले कलिकालरूपी सर्पका क्या भय है? श्रीकृष्णके नामरूपी इन्धनसे उत्पन्न आगके द्वारा वह जलकर नष्ट हो जाता है। पापरूपी अग्निसे दग्ध होकर जो सत्कर्मकी चेष्टासे शून्य हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये श्रीकृष्णके नामस्मरणके सिवा दूसरी कोई ओषधि नहीं है। जैसे प्रयागमें गंगा, शुक्लतीर्थमें नर्मदा और कुरुक्षेत्रमें सरस्वती हैं, उसी प्रकार सर्वत्र श्रीकृष्णका कीर्तन सब पापोंका नाश करनेवाला है। संसार-समुद्रमें डूबकर जो महान् पापोंकी लहरोंमें गिर गये हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये श्रीकृष्ण-स्मरणके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है। जो पापी हैं, जिनमें श्रीकृष्ण-स्मरणकी इच्छा नहीं है, ऐसे मनुष्योंके लिये मृत्युकालमें तथा परलोककी यात्राके समय श्रीकृष्ण-चिन्तनके सिवा दूसरा कोई पाथेय (राहखर्च) नहीं है। बेटा! जिस मन्दिरमें प्रतिदिन कृष्ण-कृष्णका कीर्तन होता है, वहाँ गया, काशी, पुष्कर और कुरुक्षेत्र सब तीर्थ हैं। उसीका जन्म और जीवन सफल है तथा उसीका मुख सार्थक है, जिसकी जिह्वा सदा 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन करती है। जिसने एक बार भी 'हरि' इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षके लिये जानेको कमर कस ली है। समस्त पापोंको भस्म कर डालनेके लिये मुझ भगवान्के नाममें जितनी शक्ति है, उतना पातक कोई पातकी मनुष्य कर ही नहीं सकता†। 'कृष्ण-कृष्ण'के कीर्तनसे मनुष्यका शरीर और मन कभी श्रान्त नहीं होता, उसे पाप नहीं लगता और विकलता भी नहीं होती। जो श्रीकृष्णनामोच्चारणरूपी पथ्यका कलियुगमें त्याग नहीं करता, उसके चित्तमें पापरूपी रोग नहीं पैदा होते। श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए मनुष्यकी आवाज सुनकर दक्षिण दिशाके अधिपति यमराज उसके सौ जन्मोंके पापोंका परिमार्जन कर देते हैं। सैकड़ों चान्द्रायण और सहस्रों पराक व्रतसे जो पाप नष्ट नहीं होता, वह कृष्ण-कृष्णके कीर्तनसे चला जाता है। श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेसे मेरी अधिकाधिक प्रीति बढ़ती है। कोटि-कोटि चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणमें स्नान करनेसे जो फल बतलाया गया है, उसे मनुष्य कृष्ण-कृष्णके कीर्तनमात्रसे पा लेता है। जैसे सूर्य-किरणोंके तापसे बर्फ गल जाती है, उसी
* श्मशाने यदि रथ्यायां कृष्ण कृष्णेति जल्पति। म्रियते यदि चेत्पुत्र मामेवैति न संशयः॥
दर्शनान्मम भक्तानां मृत्युमाप्नोति यः क्वचित्। विना मत्स्मरणात्पुत्र मुक्तिमेति स मानवः॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ४२-४३)
† जीवितं जन्मसाफल्यं मुखं तस्यैव सार्थकम्। सततं रसना यस्य कृष्ण कृष्णेति जल्पति॥
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥
नाम्नोश्च यावती शक्तिः पापनिर्दहने मम। तावत् कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ५१-५३)
| ४५८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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प्रकार श्रीकृष्ण-कीर्तनसे गुरुपत्नीगमन और सुवर्णकी चोरी आदि महापातक नष्ट हो जाते हैं। अगम्यागमन आदि महापापोंसे युक्त मनुष्य भी अन्तकालमें एक बार श्रीकृष्णनामका कीर्तन कर ले तो वह उससे पापमुक्त हो जाता है। जो जिह्वा कलिकालमें श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन नहीं करती, वह दुष्टा मुँहमें न रहे, रसातलको चली जाय। जो कलियुगमें श्रीकृष्णके गुणोंका प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करती है, वह जिह्वा अपने मुखमें हो या दूसरेके मुखमें, वन्दना करने योग्य है। जो दिन-रात श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन नहीं करती, वह जिह्वा नहीं—मुखमें कोई पापमयी लता है, जिसे जिह्वाके नामसे पुकारा जाता है। जो 'श्रीकृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-श्रीकृष्ण' इस प्रकार श्रीकृष्णनामका कीर्तन नहीं करती, वह रोगरूपिणी जिह्वा सौ टुकड़े होकर गिर जाय*।
जो श्रीकृष्णके नामकी इस महिमाका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसके लिये निश्चय ही मैं कल्याणदाता होता हूँ। जो तीनों सन्ध्याओंके समय श्रीकृष्णनामके माहात्म्यका पाठ करता है, वह जीते-जी सम्पूर्ण कामनाओंको और मरनेपर परम गतिको पाता है।
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श्रीकृष्णके बालस्वरूपका ध्यान, दामोदरमन्त्रके अधिकारी शिष्य और गुरुका लक्षण और श्रीमद्भागवतकी महिमा
श्रीभगवान् कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं ध्यानका वर्णन करता हूँ। शोभाशाली उद्यानसे घिरी हुई एक सुवर्णमयी स्थली है। उसमें जगमगाते हुए रत्नोंका बना हुआ एक प्रकाशमान मण्डप है। उसके भीतर कल्पवृक्ष शोभा पा रहा है। उसके नीचे उद्दीप्त रत्नमय सिंहासन है, जिसके ऊपर कमलका आसन है। उसके ऊपर बालगोपाल श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति महानील-मणिके समान श्याम है। उनकी अत्यन्त बाल्यावस्था है। मुखके समीपतक चिकने काले, घुँघराले बाल बिखरे हुए हैं। उनसे उनके मुग्ध मुखारविन्दकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो खिले हुए कमलपर भ्रमरोंके समूह छा रहे हों। उनके नेत्र नीलकमलके समान परम सुन्दर हैं। फूलके समान खिले हुए गाल हिलते हुए कुण्डलोंसे अतिशय सुशोभित हो रहे हैं। उनकी नुकीली नाक, लाल ओष्ठ और मन्द-मुसकानसे सुशोभित मुख सभी सुन्दर हैं। कण्ठमें अनेकानेक चमकते हुए आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे विकसित कमलके समान बघनखा पहने हुए हैं। उनके नेत्र सुन्दर हैं। गौओंकी धूलि पड़नेसे उनका वक्षःस्थल धूसरित हो रहा है। उनके सभी अंग हृष्ट-पुष्ट हैं। सुवर्णमय अलंकारोंसे उनकी दीप्ति बढ़ रही है। मनोहर पिण्डलियों और जाँघोंसे सुशोभित कटिप्रदेशमें करधनी बँधी हुई है, जिसकी क्षुद्रघण्टिकाओंसे मधुर झनकार हो रही है। बन्धुजीव पुष्पके समान लाल-लाल हथेली और लाल कमलके समान चरणोंकी उदार शोभासे वे सुशोभित हैं। वे मन्द-मन्द हँस रहे हैं। उनके दाहिने हाथमें खीर है और बायें हाथमें वे तुरंतका निकाला हुआ शुद्ध माखन लिये हुए हैं। गायें और गोपियाँ उन्हें घेरकर बैठी हैं। इन्द्र आदि देवता भी उनके चरणोंमें मस्तक
* पततां शतखण्डा तु सा जिह्वा रोगरूपिणी। श्रीकृष्णकृष्णकृष्णेति श्रीकृष्णोति न जल्पति ॥
\hspace{300pt}(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ६६)$
- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५९
झुकाते हैं। शेषनाग और वज्र आदिसे उपलक्षित उन देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके भक्तिभावसे नम्र हो प्रातःकाल उनकी पूजा करे और माखन-मिश्री, दही-दूध एवं कमल आदि अर्पण करके उन्हें प्रसन्न करे।
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल आस्तिक भावसे युक्त होकर सदा इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, वह शीघ्र ही इस लोकमें समग्र लक्ष्मीको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् शुद्ध परम धाममें गमन करता है। उनका लोकमनोहर मन्त्र पहले ही बतलाया गया है। उसका नाम है श्रीमद्दामोदर-मन्त्र (श्रीदामोदराय नमः)। इस मन्त्रके कौन-कौन अधिकारी हैं, उनका वर्णन सुनो। इस मन्त्रराजका उपदेश किसी अयोग्य व्यक्तिको नहीं देना चाहिये। यह शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला एक रहस्य है, इसलिये यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिये। आलसी, मलिन, क्लेशग्रस्त, दम्भी, मोहयुक्त, दरिद्र, रोगी, क्रोधी, रागी, भोगलोलुप, दोषदर्शी, ईर्ष्या रखनेवाला, शठ, कटुवादी, अन्यायपूर्वक धन कमानेवाला, परस्त्रियोंमें आसक्त रहनेवाला, विद्वानोंका वैरी, मूर्ख, अपनेको पण्डित माननेवाला, व्रतभ्रष्ट, जीविकाके क्लेशसे युक्त, चुगलखोर, दुष्टचित्त, बहुभोजी, निर्दयतापूर्ण चेष्टावाला, दुष्टोंका नेता, कंजूस, पापी, भयंकर, आश्रितोंको भय देनेवाला—इस प्रकारके दुर्गुणोंसे युक्त शिष्यको इस मन्त्रके उपदेशके लिये कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई ग्रहण करता है तो शिष्यका दोष प्रायः गुरुमें भी आ जाता है। मन्त्रीका दोष राजामें, स्त्रीका दोष पतिमें और शिष्यका दोष गुरुमें आता है—इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिये गुरुको चाहिये कि वह सदा शिष्यकी परीक्षा लेकर ही उसे ग्रहण करे।
जो मन, वाणी और शरीरसे गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला हो, जिसमें चोरीकी वृत्तिका सर्वथा अभाव हो, जो आस्तिक होनेके साथ ही मोक्षके लिये उद्योगशील हो, ब्रह्मचर्यका पालन करता हो, सदा दृढ़तापूर्वक व्रतमें स्थित रहता हो, जिसकी पापमें प्रवृत्ति न हो, जिसका चित्त प्रसन्न और अन्तःकरण निर्मल हो, जिसमें शठताका अभाव हो, जो शुद्ध, परोपकारी और स्वार्थकामनासे रहित हो, अपने तन, मन और धनसे गुरुको सन्तुष्ट रखनेवाला हो, आश्रितजनोंको प्रसन्न रखनेवाला और पवित्र हो—ऐसे ही शिष्यको मन्त्रका उपदेश दे, अन्यथा नहीं।
अब गुरुका लक्षण बतलाता हूँ। जिसका चित्त सम और शान्त हो, जो क्रोधरहित, सब लोगोंका सुहृद्, साधु, महात्मा, लोकमें सबपर समान दृष्टि रखनेवाला हो, वह गुरु कहा गया है। जो सदा मेरे व्रतको धारण करता है, वैष्णवगण जिसे सम्मानकी दृष्टिसे देखते हैं, जो मेरी कथावार्तामें अनुरक्त और मेरे उत्सवोंमें संलग्न रहता है, जो दयासागर, पूर्णकाम, सर्वभूतोपकारी, सब ओरसे निःस्पृह, सिद्ध, सर्वविद्याविशारद, समस्त संशयोंको निवारण करनेवाला और आलस्यरहित है, जो सब कालोंका ज्ञाता है तथा सबपर अनुग्रह रखता है, ऐसा आदरणीय ब्राह्मण गुरु कहा गया है। पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त शिष्य ऐसे गुरुसे मेरी प्राप्ति करानेवाले मार्गशीर्षमासमें उक्त दामोदर-मन्त्रका उपदेश ग्रहण करे।
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वैष्णवोंके व्रतोंको स्वीकार करे। जो मुझे प्रिय लगनेवाले परम उत्तम श्रीमद्भागवतपुराणका पाठ करता है, उसे प्रत्येक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन श्रीमद्भागवतके आधे या चौथाई श्लोकका पाठ करता अथवा सुनता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन पवित्रचित्त हो भागवतके श्लोकका पाठ करता है, उसे अठारह पुराणोंके पाठ करनेका फल मिलता है। जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ वैष्णवगण स्थित होते हैं। जो सदा मेरी
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पूजा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगके बाहर हैं। जो कलियुगमें अपने घरपर प्रतिदिन भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके ऊपर मैं प्रसन्न होता हूँ। बेटा! जितने दिनोंतक घरमें भागवतशास्त्र रहता है, उतने दिनोंतक पितर दूध, घी और मधुके साथ जल पीते हैं। जो भक्तिपूर्वक वैष्णव विद्वान्को भागवतशास्त्र देते हैं, वे मेरे लोकमें निवास करते हैं। जो अपने घरपर सदा भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके उस पूजनसे सब देवता प्रलयकालतकके लिये तृप्त हो जाते हैं। सदा मेरी प्रसन्नताके लिये सबको वैष्णव-शास्त्रोंका संग्रह करना चाहिये। कलियुगमें जहाँ-जहाँ परम पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ सदैव निवास करता हूँ। वहीं सम्पूर्ण तीर्थ, नदी, नद, सरोवर, यज्ञ, सातों पुरी तथा सम्पूर्ण पवित्र पर्वत निवास करते हैं। धर्मबुद्धि पुरुषको पापके नाश और मोक्षकी प्राप्तिके लिये सदा भागवतशास्त्र श्रवण करना चाहिये। श्रीमद्भागवत परम पवित्र, आयु, आरोग्य तथा पुष्टिको देनेवाला है। इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो परम उत्तम श्रीमद्भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनपर सदा यमराजका प्रभुत्व रहता है, यह सर्वथा सत्य बात है। जिसके घरमें भागवतका एक या आधा श्लोक भी लिखकर रखा हुआ है, उसके यहाँ मैं स्वयं निवास करता हूँ। जो मेरी कथा बाँचता है, मेरी कथा सुननेमें संलग्न रहता है और मेरी कथा सुनकर जिसका मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यको मैं कभी नहीं छोड़ता। जो श्रीमद्भागवतका दर्शन करके उठकर खड़ा हो जाता और बारंबार प्रणामके द्वारा उसका सम्मान करता है, उसको देखकर मुझे अनुपम प्रसन्नता होती है। जो दूरसे भागवतशास्त्रको देखकर उसके सामने जाता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। जो श्रीमद्भागवतको सुनते हैं, मैं उनके वशमें होता हूँ। जो वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप, दीप और नाना प्रकारके उपहारोंके साथ भक्तिपूर्वक मेरी प्रसन्नताके लिये श्रीमद्भागवत सुनते हैं, वे मुझे वशमें कर लेते हैं। ठीक उसी तरह जैसे साध्वी स्त्री अपने श्रेष्ठ पतिको वशमें कर लेती है।
मार्गशीर्षमासमें मथुरासेवनका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार
श्रीभगवान् कहते हैं— मथुरा नामसे विख्यात जो मेरा उत्तम क्षेत्र है, वह मेरी परम प्रिय प्रशस्त एवं रमणीय जन्मभूमि है। चतुर्मुख! मथुरामें जहाँ कहीं भी मनुष्य स्नान करता है, घोर पापसे मुक्त हो जाता है। सब धर्मोंसे रहित दुष्टात्मा पुरुषोंके लिये पापनाशिनी मथुरा नरककी पीड़ा दूर करनेवाली है। कृतघ्न, शराबी, चोर तथा प्रतिज्ञा भंग करनेवाला मनुष्य मथुरामें जाकर घोर पापसे मुक्त हो जाता है। जो किसी दूसरे प्रसंगसे अथवा व्यापार या नौकरीके लिये भी जाते हैं, वे भी मथुरामें स्नान करनेमात्रसे पापरहित होकर स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। मथुराका नाम लेनेवाले लोगोंकी भी मुक्ति होती है। जो मनुष्य वहाँ तीन रात भी निवास करते हैं, वे अपने दर्शन तथा चरणरेणुके स्पर्शसे भी दूसरोंको पवित्र कर देते हैं। जैसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ घास-फूसके बड़े भारी ढेरको भी जला डालती हैं, उसी प्रकार मथुरापुरी बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर देती है। अन्य स्थानोंमें किया हुआ पाप तीर्थस्थानमें जानेसे नष्ट होता है, किंतु तीर्थोंमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है*। चतुरानन! अन्य स्थानोंमें जिस पापका
* अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य नश्यति। तीर्थेषु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥ (स्क० पु० वै० मा० मा० १७। १७)
| * वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * | ४६१ |
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भोग दस वर्षमें पूरा होता है, वह मथुरामें दस दिनमें ही पूरा हो जाता है। स्वर्ग, पाताल, अन्तरिक्ष तथा मनुष्यलोकमें मथुरापुरीके समान मेरा प्रिय क्षेत्र दूसरा नहीं है।
तीर्थराज प्रयागमें एक हजार वर्षतक निवास करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मथुरापुरीमें केवल अगहनमें निवास करनेसे मिल जाता है। जिसने कभी मथुरापुरी नहीं देखी है और उसे देखनेकी इच्छा रखता है, उसकी कहीं भी मृत्यु क्यों न हो, वह मथुरामें जन्म लेता है। मेरे प्रिय भक्तो! तुम मथुरापुरीमें निवास करो, निवास करो। वहाँ गोपकन्याओंसे घिरा हुआ मैं सदैव निवास करता हूँ। संसारमें डूबे हुए शिष्यो! मेरी बात सुनो—यदि तुम घनीभूत आनन्द पाना चाहते हो, तो मथुरापुरीमें निवास करो। अहो! यह संसार बड़ा अंधा है, आँखें होते हुए भी नहीं देखता। मुक्तिदायिनी मथुराके होते हुए भी सदा जन्म-मरणरूपी संसार-चक्रका ही सेवन करता है। सौभाग्यवश अनुपम मनुष्ययोनि पाकर भी जिन्होंने मथुरापुरी नहीं देखी, उनकी आयु व्यर्थ ही बीत गयी। अहो! यह कैसी बुद्धिकी दुर्बलता है, मोहकी कितनी अद्भुत महिमा है कि मनुष्य मथुरापुरीका सेवन नहीं करते। जो मथुरापुरीको पाकर भी अन्यत्र जानेकी अभिलाषा करता है, वह अज्ञानसे ही सम्पन्न है। जो पापकी राशियोंसे आक्रान्त हैं, दरिद्रतासे पराजित हैं और जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन सबके लिये मेरी मथुरापुरी आश्रय है। यह सारसे भी अतिशय सारभूत स्थान है, गोपनीयसे भी अति गोपनीय परम रहस्य है। उत्तम गतिकी खोज करनेवाले पुरुषोंके लिये मथुरापुरी परम गति है। योगयुक्त ब्रह्मज्ञानी मनीषी पुरुषकी जो गति होती है, वही मथुरामें प्राणत्याग करनेवाले मनुष्यकी भी होती है। संसारमें काशी आदि पुरियाँ भी मोक्ष देनेके लिये प्रसिद्ध हैं तथापि उनमें मथुरा ही धन्य है; क्योंकि वह मनुष्योंको चार प्रकारकी मुक्ति प्रदान करती है। मथुरामें आकर मरे हुए कीट, पतंग आदि भी चतुर्भुजरूप हो जाते हैं। मथुरामें जिसे साँप डँस लेता है, जो पशुओंसे मारे जाते हैं, आगमें जलकर या पानीमें डूबकर मरते हैं—इस प्रकार अपमृत्यु पानेवाले लोग भी मेरे लोकमें जाते हैं। जो कामना रखनेवाले पुरुषोंको धर्म, अर्थ और काम देनेवाली है, मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करती है और भक्तिकी इच्छा रखनेवालोंको भक्ति देती है, उस मथुराका कौन विद्वान् पुरुष आश्रय नहीं लेगा। ऐसी महिमामयी मधुपुरी मार्गशीर्षमासमें सेवन करने योग्य है। मार्गशीर्षमासमें जो पूर्णिमा होती है, उसमें जो पुण्य किया जाता है, वह मुझे अधिक प्रसन्न करनेवाला होता है। पुष्कर और मथुरामें पूर्णिमा तिथिको स्नान अवश्य करना चाहिये। मार्गशीर्षकी पूर्णिमा अनन्त फल देनेवाली है। अतः सब प्रकारके प्रयत्नोंसे उसका आदर करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक मेरे परम प्रिय मार्गशीर्षमासका व्रत करता है, वह पुत्ररहित हो तो पुत्र पाता है, निर्धन हो तो उसे धन मिलता है, विद्यार्थी हो तो विद्या और रूपार्थी हो तो रूप प्राप्त करता है। ब्राह्मण ब्रह्मतेजको पाता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य खजानेका मालिक होता है और शूद्र पापसे शुद्ध होता है। तीनों लोकोंमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह सब मनुष्य मार्गशीर्षमासमें स्नान एवं व्रत करनेसे प्राप्त कर लेता है। मुझको वशमें करनेवाली उत्तम भक्ति सर्वथा दुर्लभ है। वह भी इस मार्गशीर्षमासका माहात्म्य श्रवण करनेपर प्राप्त हो जाती है।
मार्गशीर्षमास-माहात्म्य सम्पूर्ण
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९. वैष्णवखण्ड (श्रीमद्भागवत-माहात्म्य)
४६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
श्रीमद्भागवत-माहात्म्य
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परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्य मुनिके मुखसे भगवान्की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन
महर्षि व्यास कहते हैं—
श्रीसच्चिदानन्दघनस्वरूपिणे
कृष्णाय चानन्तसुखाभिवर्षिणे।
विश्वोद्भवस्थाननिरोधहेतवे
नुमो वयं भक्तिरसाप्तयेऽनिशम्॥
'जिनका स्वरूप सच्चिदानन्दघन है, जो अपने सौन्दर्य और माधुर्यादि गुणोंसे सबका मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और सदा-सर्वदा अनन्त सुखकी वर्षा करते रहते हैं, जिनकी ही शक्तिसे इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं—उन भगवान् श्रीकृष्णको हम भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये नित्य-निरन्तर प्रणाम करते हैं।'
नैमिषारण्यक्षेत्रकी बात है, श्रीसूतजी स्वस्थ चित्तसे अपने आसनपर बैठे हुए थे। उस समय भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाके रसिक, उसके रसास्वादनमें अत्यन्त कुशल शौनकादि ऋषियोंने सूतजीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! धर्मराज युधिष्ठिर जब मथुरामण्डलमें अनिरुद्धनन्दन वज्रका और हस्तिनापुरमें अपने पौत्र परीक्षित्का राज्याभिषेक करके हिमालयपर चले गये, तब राजा वज्र और परीक्षित्ने कैसे-कैसे कौन-कौन-सा कार्य किया?
सूतजी बोले—शौनकादि ब्रह्मर्षियो! जब धर्मराज युधिष्ठिर आदि पाण्डवगण स्वर्गारोहणके लिये हिमालय चले गये, तब सम्राट् परीक्षित् एक दिन मथुरा गये। उनकी इस यात्राका उद्देश्य इतना ही था कि वहाँ जाकर वज्रनाभसे मिल-जुल आयें। जब वज्रनाभको यह समाचार मालूम हुआ कि मेरे पितातुल्य परीक्षित् मुझसे मिलनेके लिये आ रहे हैं, तब उनका हृदय प्रेमसे भर गया। उन्होंने नगरसे आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, चरणोंमें प्रणाम किया और बड़े प्रेमसे उन्हें वे अपने महलमें ले आये। वीर परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेमी भक्त थे। उनका मन नित्य-निरन्तर आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रमें ही रमता रहता था। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके प्रपौत्र वज्रनाभका बड़े प्रेमसे आलिंगन किया। इसके बाद अन्तःपुरमें जाकर भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियोंको नमस्कार किया। श्रीकृष्ण-पत्नियोंने भी सम्राट् परीक्षित्का अत्यन्त सम्मान किया। वे जब आरामसे बैठ गये, तब उन्होंने वज्रनाभसे यह बात कही।
राजा परीक्षित्ने कहा—तुम्हारे पिता और पितामहोंने मेरे पिता-पितामहको बड़े-बड़े संकटोंसे बचाया है। मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है।
वज्रनाभ बोले—महाराज! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा आपके अनुरूप है। आपके पिताने भी मुझे धनुर्वेदकी शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किया है। इसलिये मुझे किसी बातकी तनिक भी चिन्ता नहीं है। क्योंकि उनकी कृपासे मैं क्षत्रियोचित शूरवीरतासे भली-भाँति सम्पन्न हूँ। मुझे चिन्ता है, तो केवल एक बातकी। सचमुच वह बहुत बड़ी चिन्ता है। आप उसके सम्बन्धमें कुछ विचार कीजिये। वह चिन्ता यह है कि यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्यपर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस
- वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६३ बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है जब प्रजा रहे। जब वज्रनाभने परीक्षित्से यह बात कही, तब उन्होंने वज्रनाभका सन्देह मिटानेके लिये महर्षि शाण्डिल्यको बुलवाया। ये ही महर्षि शाण्डिल्य पहले नन्द आदि गोपोंके पुरोहित थे। परीक्षित्का सन्देश पाते ही महर्षि शाण्डिल्य वहाँ आ पहुँचे। वज्रनाभने विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया और वे एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए एवं उनको सान्त्वना देते हुए कहने लगे। शाण्डिल्यजीने कहा - प्रिय परीक्षित् और वज्रनाभ ! मैं तुमलोगोंसे व्रजभूमिका रहस्य बतलाता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो ! 'व्रज' शब्दका अर्थ है व्याप्ति। व्यापक होनेके कारण ही इस भूमिका नाम 'व्रज' पड़ा है। सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणोंसे अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक है। इसलिये उसे 'व्रज' कहते हैं। वह सदानन्दस्वरूप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है। जीवन्मुक्त पुरुष उसीमें स्थित रहते हैं। इस परब्रह्मस्वरूप व्रजधाममें नन्दनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निवास है। उनका एक-एक अंग सच्चिदानन्दस्वरूप है। वे आप्तकाम हैं। प्रेमरसमें डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं। 'काम' शब्दका अर्थ है - कामना, अभिलाषा; व्रजमें भगवान् श्रीकृष्णके वांछित पदार्थ हैं- गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ और उनके साथ लीला-विहार आदि; वे सब-के-सब यहाँ नित्य प्राप्त हैं। इसीसे श्रीकृष्णको 'आप्तकाम' कहा गया है। भगवान् श्रीकृष्णकी यह रहस्यलीला प्रकृतिसे परे है। वे जिस समय प्रकृतिके साथ खेलने लगते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी लीलाका अनुभव करते हैं। प्रकृतिके साथ होनेवाली लीलामें ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है। इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान्की लीला दो प्रकारकी है - एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी। वास्तवी लीला स्वसंवेद्य है - उसे स्वयं भगवान् और उनके रसिक भक्तजन ही जानते हैं। जीवोंके सामने जो लीला होती है, वह व्यावहारिकी लीला है। वास्तवी लीलाके बिना व्यावहारिकी लीला नहीं हो सकती; परंतु व्यावहारिक लीलाका वास्तवी लीलाके राज्यमें कभी प्रवेश नहीं हो सकता। तुम दोनों भगवान्की जिस लीलाको देख रहे हो, यह व्यावहारिक लीला है। यह पृथ्वी और स्वर्ग आदि लोक इसी लीलाके अन्तर्गत हैं। इसी पृथ्वीपर यह मथुरामण्डल है। यहीं वह व्रजभूमि है, जिसमें भगवान्की वह वास्तवी रहस्यलीला गुप्तरूपसे सदा होती रहती है। वह कभी-कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तोंको सब ओर दीखने लगती है। कभी अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें जब भगवान्की रहस्य-लीलाके अधिकारी भक्तजन यहाँ एकत्र होते हैं, जैसा कि इस समय भी कुछ काल पहले हुए थे, उस समय भगवान् अपने अन्तरंग प्रेमियोंके साथ अवतार लेते हैं। उनके अवतारका यह प्रयोजन होता है कि रहस्यलीलाके अधिकारी भक्तजन भी अन्तरंग परिकरोंके साथ सम्मिलित होकर लीला-रसका आस्वादन कर सकें। इस प्रकार जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उस समय भगवान्के अभिमत प्रेमी देवता और ऋषि आदि भी सब ओर अवतार लेते हैं। अभी-अभी जो अवतार हुआ था, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियोंकी अभिलाषाएँ पूर्ण करके अब अन्तर्धान हो चुके हैं। इससे यह निश्चय हुआ कि यहाँ पहले तीन प्रकारके भक्तजन उपस्थित थे; ऐसा माननेमें तनिक भी सन्देहके लिये गुंजाइश नहीं है। उन तीनोंमें प्रथम तो उनकी श्रेणी है, जो भगवान्के नित्य 'अन्तरंग' पार्षद हैं - जिनका भगवान्से कभी वियोग होता ही नहीं। दूसरे वे हैं, जो एकमात्र भगवान्को पानेकी इच्छा रखते .279 Skandpuran_Section_17_1_Frontublic Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
४६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| हैं—उनकी अन्तरंग लीलामें अपना प्रवेश चाहते हैं। तीसरी श्रेणीमें देवता आदि हैं। इनमेंसे जो देवता आदिके अंशसे अवतीर्ण हुए थे, उन्हें भगवान्ने ब्रजभूमिसे हटाकर पहले ही द्वारका पहुँचा दिया था; फिर जब ब्राह्मणोंके शापसे यदुवंशका संहार करनेके लिये साम्बके पेटसे मूसल प्रकट हुआ और उस मूसलके चूरेसे प्रभासक्षेत्रमें एरका नामकी घास उत्पन्न हो गयी, उस समय परस्पर कलह होनेपर सभी यदुवंशी उन एरकाओंसे एक-दूसरेको मारकर मर गये। इस प्रकार भगवान्ने उस मूसलके मार्गसे यदुकुलमें उत्पन्न हुए देवताओंको स्वर्गमें भेजकर पुनः अपने-अपने अधिकारपर स्थापित कर दिया। तथा जिन्हें एकमात्र भगवान्को ही पानेकी इच्छा थी, उन्हें प्रेमानन्दस्वरूप बनाकर श्रीकृष्णने सदाके लिये अपने नित्य अन्तरंग पार्षदोंमें सम्मिलित कर लिया। जो नित्य पार्षद हैं, वे यद्यपि यहाँ गुप्तरूपसे होनेवाली नित्यलीलामें सदा ही रहते हैं, परंतु जो उनके दर्शनके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पुरुषोंके लिये वे भी अदृश्य हो गये हैं। जो लोग व्यावहारिक लीलामें स्थित हैं, वे नित्यलीलाका दर्शन पानेके अधिकारी नहीं हैं; इसीलिये यहाँ आनेवालोंको सब ओर निर्जन वन—सूना-ही-सूना दिखायी देता है, क्योंकि वे वास्तविक लीलामें स्थित भक्तजनोंको देख नहीं सकते।<br><br>इसलिये वज्रनाभ! तुम्हें तनिक भी चिन्ता न करनी चाहिये। तुम मेरी आज्ञासे यहाँ बहुत-से गाँव बसाओ; इससे निश्चय ही तुम्हारे | मनोरथोंकी सिद्धि होगी। भगवान् श्रीकृष्णने जहाँ जैसी लीला की है, उसके अनुसार उस स्थानका नाम रखकर तुम अनेकों गाँव बसाओ और इस प्रकार परम उत्तम ब्रजभूमिका सम्यक् प्रकारसे सेवन करते रहो। गोवर्धन, दीर्घपुर (डीग), मथुरा, महावन (गोकुल), नन्दिग्राम (नन्दगाँव) और वृहत्सानु (बरसाना) आदिमें तुम्हें अपने लिये छावनी बनवानी चाहिये और उन-उन स्थानोंमें रहकर भगवान्की लीलाके स्थल नदी, पर्वत, कन्दरा, सरोवर और कुण्ड तथा कुंज-वन आदिका सेवन करते रहना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हारे राज्यमें प्रजा बहुत ही सम्पन्न होगी और तुम भी अत्यन्त प्रसन्न रहोगे। यह ब्रजभूमि सच्चिदानन्दमयी है—इसके कण-कणमें भगवान् श्रीकृष्ण रम रहे हैं; अतः तुम्हें हर तरहसे प्रयत्नपूर्वक इस भूमिका सेवन करना चाहिये। मैं आशीर्वाद देता हूँ; मेरी कृपासे भगवान्की लीलाके जितने भी स्थल हैं, सबकी तुम्हें ठीक-ठीक पहचान हो जायगी। वज्रनाभ! एक और बड़े महत्त्वकी बात बतलाता हूँ। इस ब्रजभूमिका सेवन करते रहनेसे तुम्हें किसी दिन उद्धवजी मिल जायँगे। फिर तो अपनी माताओंसहित तुम उन्हींसे इस भूमिका तथा भगवान्की लीलाका रहस्य भी जान लोगे।<br><br>मुनिवर शाण्डिल्यजी उन दोनोंको इस प्रकार समझा-बुझाकर भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए अपने आश्रमपर चले गये। उनकी बातें सुनकर राजा परीक्षित् और वज्रनाभ दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए। |
यमुना और श्रीकृष्णपत्नियोंका संवाद, कीर्तनोत्सवमें उद्धवजीका प्रकट होना
| सूतजी कहने लगे—महाराज परीक्षित्को भगवान् श्रीकृष्णने ही जीवन-दान दिया था; अतः वे | उनके पौत्र वज्रनाभके लिये क्या नहीं कर सकते थे? अखिल भूमण्डलके सम्राट् तो थे ही, उनकी |
* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६५
आज्ञा कौन नहीं मानता? उन्होंने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली)-से हजारों बड़े-बड़े सेठोंको बुलवाकर उन्हें मथुरामें रहनेकी जगह दी। इनके अतिरिक्त मथुरामण्डलके ब्राह्मणोंको, जो भगवान्के बड़े ही प्रेमी थे, बुलवाया और उन्हें आदरके योग्य समझकर मथुरानगरीमें बसाया। इस प्रकार राजा परीक्षित्की सहायता और महर्षि शाण्डिल्यकी कृपासे वज्रनाभने क्रमशः उन सभी स्थानोंकी खोज की, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रेमी गोप-गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी लीलाएँ करते थे। लीलास्थानोंका ठीक-ठीक निश्चय हो जानेपर उन्होंने वहाँ-वहाँकी लीलाके अनुसार उस-उस स्थानका नामकरण किया, भगवान्के लीलाविग्रहोंकी स्थापना की तथा उन-उन स्थानोंपर अनेकों गाँव बसाये। स्थान-स्थानपर भगवान्के नामसे कुण्ड और कुएँ खुदवाये। कुंज और बगीचे लगवाये, शिव आदि देवताओंकी स्थापना की तथा गोविन्ददेव, हरिदेव आदि नामोंसे भगवद्विग्रह स्थापित किये। इन सब शुभ कर्मोंके द्वारा वज्रनाभने अपने राज्यमें सब ओर एकमात्र श्रीकृष्णभक्तिका प्रचार किया और ऐसा करके वे बड़े ही प्रसन्न हुए। उनके प्रजाजनोंको भी बड़ा आनन्द था। वे सदा भगवान्के मधुर नाम तथा लीलाओंके कीर्तनमें संलग्न हो परमानन्दके समुद्रमें डूबे रहते थे और सदा ही वज्रनाभके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे।
एक दिनकी बात है, भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियाँ यमुनाके तटपर स्नानके लिये गयीं। वे सभी निरन्तर भगवान्की विरह-वेदनासे व्याकुल रहती थीं। यमुनाजी भी भगवान्की ही पत्नी थीं, पर उनपर भगवान्के वियोगका कुछ असर न था। श्रीकृष्णकी पत्नियोंने देखा—यमुनाजी बहुत प्रसन्न हैं, उनके अंदरसे आनन्दकी लहरें उठ रही हैं। सौतकी यह प्रसन्नता देखकर भी रानियोंके मनमें डाह नहीं हुई। वे सरलभावसे पूछ बैठीं।
श्रीकृष्णकी रानियोंने कहा—बहिन कालिन्दी! जैसे हम सब श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हैं, वैसे ही तुम भी तो हो। हम तो उनकी विरहाग्निमें जली जा रही हैं, उनके वियोगदुःखसे हमारा हृदय व्यथित हो रहा है; किंतु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है, तुम प्रसन्न हो। इसका क्या कारण है? कल्याणी! कुछ बताओ तो सही।
उनका प्रश्न सुनकर यमुनाजी हँस पड़ीं। साथ ही यह सोचकर कि मेरे प्रियतमकी पत्नी होनेके कारण ये भी मेरी ही बहिनें हैं, पिघल गयीं; उनका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। अतः वे इस प्रकार कहने लगीं।
यमुनाजी बोलीं—अपनी आत्मामें ही रमण करनेके कारण भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं—श्रीराधाजी। मैं दासीकी भाँति राधाजीकी सेवा करती रहती हूँ; अवश्य ही उनकी सेवाका यह फल है कि मैं प्रसन्न हूँ। उनकी दासताके प्रभावसे ही विरह-शोक मुझे छू भी नहीं सकता। भगवान् श्रीकृष्णकी जितनी भी रानियाँ हैं, सब-की-सब श्रीराधाके ही अंशका विस्तार हैं। भगवान् श्रीकृष्ण और राधा सदा एक-दूसरेके सम्मुख हैं, उनका परस्पर नित्य संयोग है, इसलिये राधाके स्वरूपमें अंशतः विद्यमान जो श्रीकृष्णकी अन्य रानियाँ हैं, उनको भी भगवान्का नित्य संयोग प्राप्त है। श्रीकृष्ण ही राधा हैं और राधा ही श्रीकृष्ण हैं। उन दोनोंका प्रेम ही वंशी है तथा राधाकी प्यारी सखी चन्द्रावली भी श्रीकृष्णचरणोंके नखरूपी चन्द्रमाओंकी सेवामें आसक्त रहनेके कारण ही 'चन्द्रावली' नामसे कही जाती है। श्रीराधा और श्रीकृष्णकी सेवामें उसकी बड़ी लालसा, बड़ी लगन है। इसीलिये वह कोई दूसरा स्वरूप धारण
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नहीं करती। मैंने श्रीराधामें ही रुक्मिणी आदिका भी समावेश देखा है। यह सब तरहसे निश्चित बात है कि तुमलोगोंका भी श्रीकृष्णसे वियोग नहीं हुआ है; किंतु तुम इस रहस्यको इस रूपमें जानती नहीं हो, इसीलिये इतनी व्याकुल हो रही हो। इसी प्रकार पहले भी जब अक्रूर श्रीकृष्णको नन्दगाँवसे मथुरामें ले आये थे, उस अवसरपर जो गोपियोंको श्रीकृष्णसे विरहकी प्रतीति हुई थी, वह भी वास्तविक विरह नहीं, केवल विरहका आभास था। इस बातको जबतक वे नहीं जानती थीं, तबतक उन्हें बड़ा कष्ट था; फिर जब उद्धवजीने आकर उनका समाधान किया, तब वे इस बातको समझ सकीं। उद्धवजीने उनके इस विरहको विरहाभास ही बतलाया, वास्तवमें तो उनका भगवान्से नित्य संयोग था। यदि तुम्हें भी उद्धवजीका सत्संग प्राप्त हो जाय, तो तुम सब भी अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साथ नित्य विहारका सुख प्राप्त कर लोगी।
**सूतजी कहते हैं—**ऋषिगण! जब उन्होंने इस प्रकार समझाया, तब श्रीकृष्णकी पत्नियाँ सदा प्रसन्न रहनेवाली यमुनाजीसे पुनः बोलीं। उस समय उनके हृदयमें इस बातकी बड़ी लालसा थी कि किसी उपायसे उद्धवजीका दर्शन हो, जिससे हमें अपने प्रियतमके नित्य संयोगका सौभाग्य प्राप्त हो सके।
**श्रीकृष्णपत्नियोंने कहा—**सखी! तुम्हारा ही जीवन धन्य है; क्योंकि तुम्हें कभी भी अपने प्राणनाथके वियोगका दुःख नहीं भोगना पड़ता। जिन श्रीराधिकाजीकी कृपासे तुम्हारे अभीष्ट अर्थकी सिद्धि हुई है, उनकी अब हमलोग भी दासी हुईं। किंतु तुम अभी कह चुकी हो कि उद्धवजीके मिलनेपर ही हमारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे; इसलिये कालिन्दी! अब ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे उद्धवजी भी शीघ्र ही मिल जायँ।
**सूतजी कहते हैं—**श्रीकृष्णकी रानियोंने जब यमुनाजीसे इस प्रकार कहा, तब वे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी सोलह कलाओंका चिन्तन करती हुई उनसे कहने लगीं—‘‘उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णके मन्त्री थे। जब भगवान् अपने परमधामको पधारने लगे, तब उन्होंने मन्त्री उद्धवसे कहा—'उद्धव! साधना करनेकी भूमि है बदरिकाश्रम, अतः अपनी साधना पूर्ण करनेके लिये तुम वहीं जाओ।' भगवान्की इस आज्ञाके अनुसार उद्धवजी इस समय अपने साक्षात् स्वरूपसे बदरिकाश्रममें विराजमान हैं और वहाँ जानेवाले जिज्ञासु लोगोंको भगवान्के बताये हुए ज्ञानका उपदेश करते रहते हैं। साधनकी फलरूपा भूमि है—ब्रजभूमि; इसे भी इसके रहस्योंसहित भगवान्ने पहले ही उद्धवको दे दिया था। किंतु वह फलभूमि यहाँसे भगवान्के अन्तर्धान होनेके साथ ही स्थूल दृष्टिसे परे जा चुकी है; इसीलिये इस समय यहाँ उद्धव प्रत्यक्ष दिखायी नहीं पड़ते। फिर भी एक स्थान है, जहाँ उद्धवजीका दर्शन हो सकता है। गोवर्धन पर्वतके निकट भगवान्की लीलासहचरी गोपियोंकी विहार-स्थली है; वहाँकी लता, अंकुर और बेलोंके रूपमें अवश्य ही उद्धवजी वहाँ निवास करते हैं। लताओंके रूपमें उनके रहनेका यही उद्देश्य है कि भगवान्की प्रियतमा गोपियोंकी चरणरज उनपर पड़ती रहे। उद्धवजीके सम्बन्धमें एक निश्चित बात यह भी है कि उन्हें भगवान्ने अपना उत्सव-स्वरूप प्रदान किया है। भगवान्का उत्सव उद्धवजीका अंग है, वे उससे अलग नहीं रह सकते; इसलिये अब तुमलोग वज्रनाभको साथ लेकर वहाँ जाओ और कुसुम सरोवरके पास ठहरो। भगवद्भक्तोंकी मण्डली एकत्रित करके वीणा, वेणु और मृदंग आदि बाजोंके साथ भगवान्के नाम और लीलाओंके कीर्तन, भगवत्सम्बन्धी काव्य-कथाओंके श्रवण तथा भगवद्गुणगानसे युक्त सरस संगीतोंद्वारा महान् उत्सव आरम्भ करो। इस प्रकार जब उस महान्
* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६७
उत्सवका विस्तार होगा, तब निश्चय है कि वहाँ उद्धवजीका दर्शन मिलेगा। उद्धवजी ही भलीभाँति तुम सब लोगोंके मनोरथ पूर्ण करेंगे।'
सूतजी कहते हैं—यमुनाजीकी बतायी हुई बातें सुनकर श्रीकृष्णकी रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने यमुनाजीको प्रणाम किया और वहाँसे लौटकर वज्रनाभ तथा परीक्षित्से वे सारी बातें कह सुनायीं। सब बातें सुनकर परीक्षित्को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वज्रनाभ तथा श्रीकृष्णपत्नियोंको उसी समय साथ ले उस स्थानपर पहुँचकर तत्काल वह सब कार्य आरम्भ करवा दिया, जो कि यमुनाजीने बताया था। गोवर्धनके निकट वृन्दावनके भीतर कुसुम सरोवरपर, जो सखियोंकी विहार-स्थली है, वहाँ ही श्रीकृष्णकीर्तनका उत्सव आरम्भ हुआ। श्रीराधाजी तथा उनके प्रियतम श्रीकृष्णकी वह लीलाभूमि जब साक्षात् संकीर्तनकी शोभासे सम्पन्न हो गयी, उस समय वहाँ रहनेवाले सभी भक्तजन एकाग्र हो गये; उनकी दृष्टि, उनके मनकी वृत्ति कहीं अन्यत्र न जाती थी। तदनन्तर सबके देखते-देखते वहाँ फैले हुए तृण, गुल्म और लताओंके समूहसे प्रकट होकर श्रीउद्धवजी सबके सामने आये। उनका शरीर श्यामवर्ण था, उसपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे गलेमें वनमाला और गुंजाकी माला धारण किये हुए थे तथा मुखसे बारंबार गोपीवल्लभ श्रीकृष्णकी मधुर लीलाओंका गान कर रहे थे। उद्धवजीके आगमनसे उस संकीर्तनोत्सवकी शोभा कई गुनी बढ़ गयी। उस समय सभी लोग आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो अपना सब कुछ भूल गये, सारी सुध-बुध खो बैठे। थोड़ी देर बाद जब उनकी चेतना दिव्य लोकसे नीचे आयी, अर्थात् जब उन्हें होश हुआ तब उद्धवजीको भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपमें उपस्थित देख, अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेके कारण प्रसन्न हो वे उनकी पूजा करने लगे।
श्रीमद्भागवतका माहात्म्य, भागवतश्रवणसे श्रोताओंको भगवद्धामकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—उद्धवजीने वहाँ एकत्र हुए सब लोगोंको श्रीकृष्णकीर्तनमें लगा देखकर सभीका सत्कार किया और राजा परीक्षित्को हृदयसे लगाकर कहा।
उद्धवजी बोले—राजन्! तुम्हारा मन इस श्रीकृष्णकीर्तनके उत्सवमें रम रहा है, अतः तुम धन्य हो; तुम्हारा अन्तःकरण सदा ही केवल श्रीकृष्ण-भक्तिसे परिपूर्ण रहता है। तात! तुम जो कुछ कर रहे हो, सब तुम्हारे अनुरूप ही है। क्यों न हो, श्रीकृष्णने ही तुम्हें शरीर और वैभव प्रदान किया है; अतः तुम्हारा उनके प्रपौत्रपर प्रेम होना स्वाभाविक ही है। इसमें