भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 480
  • वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५१

सौभाग्यवती और पतिव्रता रहो। शुभे! भगवान् विष्णुमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो।' तत्पश्चात्

राजाने पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा पुण्य किया है, जिससे मुझे अकण्टक राज्य, गुणवान् पुत्र, मुझमें मन लगाये रहनेवाली परम सुन्दरी एवं भगवद्भक्त पत्नी आदिकी प्राप्ति हुई? मुने! मैं कौन था और मेरी यह स्त्री कौन थी?'

भारद्वाजने कहा—राजन्! तुम पूर्वजन्ममें जीवहिंसापरायण शूद्र थे। नास्तिक, दुराचारी, परस्त्रीगामी, कृतघ्न, उद्धण्ड और सदाचारशून्य थे। परंतु तुम्हारी जो यह स्त्री है, यह पूर्वजन्ममें भी तुम्हारी ही पत्नी थी। इसके लिये मन, वाणी और क्रियाद्वारा सेवन करने योग्य तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं था। यह पतिव्रता नारी निरन्तर तुम्हारी ही सेवामें रहती थी। तुम पापकर्मी थे इसलिये मित्रोंने तुम्हारा साथ छोड़ा, भाई-बन्धुओंने तुम्हें त्याग दिया, तुम्हारे पूर्वजोंने जो धन संचित कर रखा था, वह सब नष्ट हो गया। धन नष्ट हो जानेपर भी तुम्हें भोगकी अभिलाषा ज्यों-की-त्यों बनी रही। पूर्वकर्मोंके परिणामसे तुम्हारी खेती भी चौपट हो गयी।

उस दशामें सबने तुम्हें छोड़ दिया, परंतु इस साध्वी स्त्रीने प्रतिदिन क्षीणकाय होती हुई भी तुम्हें नहीं छोड़ा। सब ओरसे विफलमनोरथ होकर तुम निर्जन वनमें चले गये और वहाँ अनेक प्रकारके जीवोंको मारकर अपना पोषण करने लगे। इस प्रकार रहते हुए तुम्हें बहुत वर्ष बीत गये।

एक दिनकी बात है, एक महामुनि राह भूलकर उधर आ निकले। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण थे और उनका नाम देवशर्मा था। उन्हें दिशाका भी ज्ञान नहीं रह गया था। वे भूख और प्याससे अत्यन्त पीड़ित होकर दोपहरके समय वनमें गिर पड़े। उस दुःखसे पीड़ित ब्राह्मणको देखकर तुम्हारे मनमें दया आ गयी। वे बूढ़े थे और तुमसे अपरिचित भी थे, तो भी तुमने उनका हाथ पकड़कर उठाया और कहा—'ब्रह्मर्षे! तुम कृपा करके मेरे आश्रमपर चलो। वहाँ जलसे भरा हुआ सरोवर है, जो कमलोंके समुदायसे सदा सुशोभित रहता है। वह आश्रम सुन्दर फल-फूलोंवाले मनोहर वृक्षोंसे घिरा हुआ है। वहाँ ठंडे जलमें स्नान करके नित्यकर्म करो, उसके बाद फल खाओ और शीतल जल पीओ।' ब्राह्मणको कुछ-कुछ चेत हुआ और वे उस शूद्रका हाथ पकड़कर जलाशयके समीप गये। वहाँ सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठे। फिर विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुकी पूजा की और शीतल जल पिया। वृक्षके नीचे आकर जब वे विश्राम करने लगे, तब उस शूद्रने अपनी स्त्रीके साथ आकर मुनिको साष्टांग प्रणाम किया और बड़ी भक्तिसे कहा—'ब्रह्मर्षे! आप हमारे अतिथि हैं और हम दोनोंका उद्धार करनेके लिये यहाँ पधारे हैं। आपके दर्शनमात्रसे हमारे सब पापोंका नाश हो गया।' यह कहकर उसने अपनी स्त्रीसे कहा—'प्रिये! इन ब्राह्मण देवताके लिये