संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अनुस्मृति तथा गीता—ये पाँच प्रकारके स्तोत्र मुझे अभीष्ट हैं। महाभाग! इन्हें सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। जो मनुष्य एक बूँद भी शालग्रामशिलाका जल पी लेता है, वह मोक्षका भागी होता है। जिनके मस्तकपर शालग्राम-शिलाका चरणोदक है तथा जो उस चरणोदकको पीते हैं, उनपर सूतक और मृतकका भी अशौच लागू नहीं होता। मृत्युकालमें जिसको वह चरणामृत दिया जाता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है।
राजा वीरबाहुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं एकादशीव्रत और उसका उद्यापन
श्रीभगवान् कहते हैं—ब्रह्मन्! काम्पिल्य नगरमें वीरबाहु नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे सत्यवादी, क्रोधपर विजय पानेवाले, ब्रह्मज्ञानी तथा मेरे भक्त थे। उनका स्वभाव बड़ा दयालु था। वे वैष्णवोंके भक्त थे और मेरी कथा सुननेमें सदा रुचि रखते थे। दानी, विद्वान्, क्षमाशील, पराक्रमी, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे स्नेह रखनेवाले थे। उनकी स्त्री पतिव्रता, परम साध्वी तथा मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाली थी। अपनी उस रानीके साथ वे समूची पृथ्वीका पालन करते और मेरे सिवा दूसरे किसी देवताको नहीं जानते थे। एक दिन महामुनि भारद्वाज महात्मा वीरबाहुके घर पधारे। उन्हें देखकर राजाने विधिपूर्वक अर्घ्य दे उनका स्वागत-सत्कार किया। अपने ही हाथसे उनके लिये आसन बिछाया और बड़ी भक्तिसे प्रणाम करके मुनिके आगे खड़े होकर कहा—'ब्रह्मर्षे! आज मेरा जन्म सफल हो गया। परमात्मा भगवान् विष्णु मुझपर बहुत प्रसन्न हैं, जिससे आप-जैसे योगिराजने आज मेरे घरपर पदार्पण किया। आपकी पवित्र दृष्टि पड़नेसे आज मैं कोटि-कोटि पापोंसे मुक्त हो गया।'
भारद्वाज बोले—महाभाग! तुम भगवान् विष्णुके भक्त हो। उत्तम प्रजाओंसे युक्त वह धरती धन्य है, जिसकी तुम रक्षा करते हो। जहाँका राजा भगवान् विष्णुका भक्त न हो, उस राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। जंगल और तीर्थमें निवास करना अच्छा है, परंतु वैष्णवहीन राज्यमें रहना कदापि श्रेयस्कर नहीं। जहाँ भगवद्भक्त राजा इस पृथ्वीका शासन करता है, उस पापशून्य राज्यको वैकुण्ठ मानना चाहिये। जैसे मन्त्रहीन आहुति, मरे हुए बछड़ेवाली गायका दूध, दशमी-विद्धा एकादशी, लम्बे-लम्बे केश रखनेवाली विधवा तथा स्नानके बिना व्रत—ये सब श्रेष्ठ नहीं माने जाते, उसी प्रकार बिना वैष्णवका राज्य भी अच्छा नहीं है।*
राजन्! मैंने जो तुम्हारी ओर देखा है, उससे मेरी दृष्टि सफल हो गयी। जो तुम्हारे साथ वार्तालाप करती है, वह मेरी वाणी भी आज सफल हो गयी। तुम भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर रहनेवाले परम पवित्र राजा हो। मैंने तुम्हारा दर्शन कर लिया। तुम्हारा कल्याण हो, तुम सुखी रहो, अब मैं जाऊँगा।
इसी समय महारानी कान्तिमतीने भी आकर मुनिश्रेष्ठ भारद्वाजको प्रणाम किया। तब मुनिने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा—'सुन्दरि! तुम
* यथाऽऽहुतिर्मन्त्रहीना मृतवत्सापयो यथा॥
सकेशा विधवा यद्वद् व्रतं स्नानविवर्जितम्। एकादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्॥