संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 478, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४४९
स्तुतिपाठ, मन्त्रजप, साष्टांग प्रणाम तथा दामोदरमन्त्रके जपका माहात्म्य
श्रीभगवान् कहते हैं—तदनन्तर नैवेद्यका भोग लग जानेपर कर्पूरवासित जलसे मुझे आचमन करावे, पान दे और हाथ धोनेके लिये चन्दन अर्पण करे। फिर पुष्पांजलि देकर भक्तिपूर्वक कपूरसे आरती करे। मुकुट और आभूषण आदि समर्पित करके छत्र, चँवर भेंट करे तथा श्यामसुन्दर विग्रहवाले भगवान् विष्णु मेरे प्रति कृपापूर्वक प्रसन्नमुख हैं, ऐसा ध्यान करते हुए अष्टाक्षर मन्त्रका एक सौ आठ बार जप और स्तोत्रोंद्वारा भगवान्का स्तवन करे। विद्वान् पुरुष चलते, हँसते और अगल-बगलमें देखते हुए तथा पैरसे पैरको दबाकर हाथको मस्तकपर रखकर, खड़े होकर और व्यग्रचित्त होकर मेरे मन्त्रका जप न करे। जपके समय तथा व्रत, होम और पूजन आदिमें दूसरोंसे वार्तालाप न करे। जपका फल तीर्थ आदिमें सहस्रगुना और मेरे समीप अनन्तगुना होता है।
इस प्रकार अगहनके महीनेमें मेरी पूजा करके जो प्रदक्षिणा करता है, वह पग-पगपर सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्यफल पाता है। सहस्रनामका पाठ अथवा केवल एक नामका उच्चारण करते हुए जो भक्तिपूर्वक मेरी एक परिक्रमा भी करता है, वह प्रतिदिनके पापको भस्म कर डालता है। जिसने भक्तिभावके साथ मेरी एक सौ आठ बार परिक्रमा की है, उसने उत्तम दक्षिणावाले सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया। अब तुम एक गूढ़ रहस्यकी बात सुनो। अपने दामोदर नामसे मुझे ऐसी प्रसन्नता होती है कि जिसकी कहीं तुलना नहीं है। गोकुलमें जब मैंने दहीका मटका फोड़ डाला, तब मैया यशोदाने मेरी कमरमें रस्सी लपेटकर मुझे खूब कसकर ओखलीमें बाँध दिया, तभीसे मेरा दामोदर नाम प्रसिद्ध हुआ। जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त हो सूर्योदयकालमें पवित्रतापूर्वक 'दामोदराय नमः' इस मन्त्रका तीन हजार जप करता है और साढ़े तीन लाख जप पूरा होनेपर उसका उद्यापन करता है, जपके दशांशका हवन, तर्पण और ब्राह्मण-भोजन कराता है और इस प्रकार भक्तिपूर्वक इस अनुष्ठानको पूरा करता है, उसे मैं मनोवांछित वस्तुएँ देता हूँ। 'दामोदराय नमः' इस मन्त्रराजका जप करते हुए प्रतिदिन मेरी प्रदक्षिणा और दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर सदैव मुझे साष्टांग प्रणाम करना चाहिये। दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती, मस्तक, मन, वाणी और दृष्टिसे जो प्रणाम किया जाता है, उसे साष्टांग प्रणाम कहते हैं*। अपने मस्तकको मेरे चरणोंपर रखकर दोनों भुजाओंको परस्पर मिला दे और प्रार्थना करे, 'हे परमेश्वर! मैं मृत्युरूपी ग्राहसे परिपूर्ण इस संसारसमुद्रसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें।' फिर मेरेद्वारा दी हुई प्रसाद-माला आदिको सादर मस्तकपर चढ़ाकर मेरी पूजाकी पूर्तिके लिये इस प्रकार कहे 'देव जनार्दन! मैंने मन्त्रहीन, भक्तिहीन और क्रियाहीन जो पूजन किया है, वह सब आपकी कृपासे परिपूर्ण हो।'†
विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, गजेन्द्रमोक्ष,
* पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा। मनसा वचसा दृष्ट्या प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥
† मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १०।३०, ३३)