संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तुम स्वादिष्ट, कोमल, सरस, पके हुए तथा प्रिय लगनेवाले फल अर्पण करो।'
ब्राह्मण बोले—बेटा! मैं तुम्हें नहीं जानता। पहले तुम अपनी जाति और कुलका परिचय दो, क्योंकि बिना जाने हुए ब्राह्मणके यहाँ भी भोजन नहीं करना चाहिये।
शूद्रने कहा—द्विजश्रेष्ठ! मैं शूद्र हूँ, मेरे दुष्ट बन्धुओंने मुझे त्याग दिया है।
वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे। इतनेमें ही शूद्रकी पत्नीने ब्राह्मणके आगे फल परोस दिये। ब्राह्मणने उन फलोंका भोजन किया और ठंडा जल पीकर उनका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। वहाँ सुख पाकर उन्होंने वृक्षके नीचे विश्राम किया। शूद्रने भी घरमें जाकर अपनी पत्नीके साथ भोजन किया और फिर ब्राह्मणके समीप आकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! आप कहाँसे इस निर्जन वनमें आये हैं।'
ब्राह्मणने उत्तर दिया—महाभाग! मैं ब्राह्मण हूँ और प्रयाग जाना चाहता हूँ। अपरिचित मार्गसे चलकर इस भयंकर वनमें आ गया हूँ। तुमने आज मुझे जीवनदान दिया है। बोलो, मैं तुम्हारा क्या उपकार करूँ? शूद्र बोला—'राजा भीमसे सुरक्षित विदर्भ नगरी मेरा निवासस्थान है, मैं महाराष्ट्र प्रान्तका रहनेवाला हूँ, मेरी जाति शूद्र है, मैं सदा पापमें ही लगा रहा, अपने वर्णधर्मको मैंने छोड़ दिया, फिर बन्धुओंने मुझे त्याग दिया और मैं इस वनमें चला आया। यहाँ प्रतिदिन जीवहिंसा करके अपनी स्त्रीके साथ जीवन-निर्वाह करता हूँ। महामुने! अब इस पातकसे मुझे अत्यन्त खेद और वैराग्य हो गया है। प्रभो! मुझ पापीके ऊपर कुछ अनुग्रह कीजिये। द्विजश्रेष्ठ! मेरे किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे आप यहाँ आये हैं। आप कृपा करके ऐसा उपदेश दें, जिसके प्रभावसे मुझे अपनी पत्नीके साथ यमराजका दर्शन न करना पड़े। मैं भगवान् विष्णुको छोड़कर और कुछ नहीं चाहता।'
देवशर्माने कहा—शूद्र! सहसा तुम्हारे मनमें भगवान् विष्णुके ऊपर जो ऐसी पूर्ण श्रद्धाबुद्धि हुई है, इससे तुम तीर्थ और व्रतके बिना ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो गये। आतिथ्य-सत्कार और भक्तिसे तुम्हें भगवान् विष्णुका पद प्राप्त हुआ। यों कहकर देवशर्मा ब्राह्मण तीर्थराज प्रयागको चले गये। राजन्! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने तुमसे कह सुनाया।
राजा बोले—ब्रह्मन्! सम्पूर्ण एकादशीकी उत्तम विधिक उपदेश कीजिये, जिससे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नता प्राप्त हो।
ऋषिने कहा—नृपश्रेष्ठ! मार्गशीर्ष आदि महीनोंमें सभी द्वादशी तिथियोंको कल्याणमय अखण्ड एकादशी-व्रतका पालन करना चाहिये। दशमीको नक्तव्रत करे, एकादशीको दिनमें और रात्रिमें भी उपवास करे तथा द्वादशीको पारणाके रूपमें केवल एक बार भोजन करे। इसे अखण्डा एकादशी कहते हैं। दिनके आठवें भागमें जब सूर्यकी ज्योति मन्द हो गयी हो, उसी समयको नक्त जानना चाहिये; उसीमें किये हुए भोजनको नक्तव्रत कहते हैं। रात्रिमें भोजन करनेका नाम नक्तव्रत नहीं है।^१ काँस्यके बर्तनमें भोजन, उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, शहद, दूसरेका अन्न, दुबारा भोजन और मैथुन—इन दस वस्तुओंको विष्णुभक्त मनुष्य दशमीको त्याग दे।^२ बार-बार
१- दशम्यां चैव नक्तं च एकादश्यामुपोषणम्। द्वादश्यामेकभुक्तं च अखण्डा इति कथ्यते॥
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे। तद्धि नक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। २२-२४)
२- कांस्यं माषं मसूरांच्च चणकान् कोद्रवांस्तथा। शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने॥
विष्णुभक्तो नरो वापि दशम्यां दश वर्जयेत्।
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। २४-२५)