संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * | ४५३ ---|---
जलपान, हिंसा, अपवित्रता, असत्य-भाषण, पान चबाना, दाँतन करना, दिनमें सोना, मैथुन-सेवन, जुआ खेलना, रातमें सोना और पतित मनुष्योंसे वार्तालाप करना—विष्णुभक्त पुरुष इन ग्यारह बातोंको एकादशीके दिन त्याग दे। एकादशीको भगवान्से प्रार्थना करे कि—‘हे केशव! आज आपकी प्रसन्नताके लिये मेरे द्वारा दिन और रातमें संयम-नियमका पालन हो। मेरी सोयी हुई इन्द्रियोंके द्वारा यदि स्वप्नमें कोई विकलता, भोजन या मैथुनकी क्रिया हो जाय अथवा मेरे दाँतोंके अंदर यदि पहलेसे अन्न सटा हुआ हो तो हे पुरुषोत्तम! इन सब बातोंको क्षमा कीजिये।’
पापोंसे उपावृत्त (निवृत्त) होकर जो गुणोंके साथ वास किया जाय, उसीको ‘उपवास’ समझना चाहिये। शरीरको सुखा डालनेका नाम ‘उपवास’ नहीं है*। पहले कही हुई दस बातें तथा पराया अन्न, शहद और शरीरमें तेल मलना आदि कार्य द्वादशीके दिन विष्णुभक्त पुरुष न करे। फिर द्वादशी आनेपर भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करे—‘हे भगवान् गरुड़ध्वज! आज सब पापोंका नाश करनेवाली पुण्यमयी पवित्र द्वादशी तिथि मेरे लिये प्राप्त हुई है। इसमें मैं पारण करूँगा। आप प्रसन्न होइये।’
तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भोजन करे। इस विधिसे जबतक वर्षकी समाप्ति हो, तबतक विद्वान् पुरुष एकादशी-व्रत करता रहे। वर्ष पूरा होनेपर उसका उद्यापन करे। मार्गशीर्षमासके शुभ शुक्ल पक्षमें एकादशीका उद्यापन किया जाता है। उसमें विधिके जाननेवाले बारह ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके तेरहवें विधिज्ञ आचार्यको पत्नीसहित आमन्त्रित करे। यजमान स्नान करके पवित्र हो श्रद्धा एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक पाद्य, अर्घ्य और वस्त्र आदि सामग्रियोंसे आचार्य आदिका पूजन करे। तत्पश्चात् आचार्य उत्तम रंगोंसे चक्र-कमलसंयुक्त सर्वतोभद्रमण्डल बनावे। उस मण्डलको श्वेत वस्त्रसे आवेष्टित करे। फिर पंचपल्लव तथा पंचरत्नसे युक्त कर्पूर और अगुरुके सुगन्धसे वासित जलपूर्ण कलशको लाल कपड़ेसे वेष्टित करके उसके ऊपर ताँबेका पूर्णपात्र रखे। साथ ही उस कलशको फूलोंकी मालाओंसे भी आवेष्टित करे और उसे सर्वतोभद्रमण्डलके ऊपर स्थापित कर दे। कलशके ऊपर भगवान् श्रीलक्ष्मीनारायणकी स्थापना करे। तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलमें बारह मासोंके अधिपतियोंकी स्थापना करके अखण्ड व्रतकी पूर्तिके लिये उनका पूजन करना चाहिये। मण्डलसे पूर्वभागमें शुभ शंखकी स्थापना करते हुए कहे—‘हे पांचजन्य! तुम पहले समुद्रसे उत्पन्न हुए, फिर भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथोंमें धारण किया। सम्पूर्ण देवताओंने तुम्हारे रूपको सँवारा है, तुम्हें नमस्कार है।’
सर्वतोभद्रमण्डलसे उत्तर दिशामें हवनके लिये वेदी बनावे और संकल्पपूर्वक वेदोक्त विष्णुसम्बन्धी मन्त्रोंसे हवन करे। फिर भगवान् विष्णुकी प्रतिमाका स्थापन और पुरुषसूक्त एवं पौराणिक शुभ मन्त्रोंसे उसका पूजन करे। नैवेद्य चढ़ावे, धूप-दीप आदि उपहार भेंट करके आरती उतारे। फिर यक्ष-कर्दम (कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलसे बनाये हुए अंगलेप)-से पूजा करके परिक्रमा करे। ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर नमस्कार करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचार्य आदि क्रमसे वैदिक मन्त्रोंका जप करना चाहिये। जपके लिये पवमानसूक्त, मण्डलब्राह्मण ‘मधुव्वाता ऋतायते०’ इत्यादि तीन मन्त्र ‘तेजोऽसि०’, ‘सुक्रजं०’, ‘वाचं ब्रह्म०’ (साम०), ‘पवित्रवन्तं सूर्यस्य०’ तथा ‘विष्णोर्महसि०’ इत्यादि वैदिक
* उपावृत्तस्तु पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह। उपवासः स विज्ञेयो न शरीरस्य शोषणम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२। ३०)