भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 483

४५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

संहितोक्त मन्त्र श्रेष्ठ माने गये हैं। जपके अन्तमें भगवान् विष्णुका कलशके ऊपर स्थापन करना चाहिये। सबेरे दिन निकलनेपर नीचे लिखे क्रमसे हवन करे। यज्ञाग्निक्रियापरायण पुरुष पहले पात्र-स्थापन करके विधिपूर्वक पूजा करनेके पश्चात् स्तुति करे। उसके बाद अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार चुरूपूर्वक होम करे। चरु दो पात्रोंमें तैयार करे। पुरुषसूक्तके मन्त्रसे चरुकी सोलह आहुतियाँ दे तथा घृतयुक्त पायसद्वारा चार बार श्रेष्ठ आहुति प्रदान करे। उसके बाद प्रादेशमात्र (अँगुठेसे लेकर तर्जनीतककी लंबी) एक सौ पलाशकी समिधाएँ लेकर उन्हें घीमें डुबो दे और ‘इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ इत्यादि मन्त्रोंसे कर्मकी सिद्धिके लिये उनका हवन करे। समिधाओंकी एक सौ आहुति देनेके बाद तिलकी दो सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार वैष्णव होम करके ग्रहयज्ञ प्रारम्भ करे। उसमें भी क्रमशः समिधाहोम, चरुहोम और तिलहोम करने चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन कराकर पूजन करे। फिर ऋत्विजोंको दक्षिणा दे और भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको एक दूध देनेवाली गौ तथा सुन्दर बैल दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको तेरह पद दान करे। सपत्नीक आचार्यको वस्त्रोंसे सन्तुष्ट करे और धनसहित महादान दे। पारण कर लेनेपर रातको ब्राह्मणोंको जलसे भरे हुए वस्त्र-वेष्टित पचीस कलश दान करे। अपनी शक्तिके अनुसार व्रतका उद्यापन करना चाहिये। इस प्रकार अखण्ड एकादशी-व्रतका वर्णन किया गया।


एकादशीके जागरण और मत्स्योत्सवकी विधि एवं माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं— गीत, वाद्य, नृत्य, पुराणपाठ, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन, अनुलेपन, फल-निवेदन, श्रद्धा, दान, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण, निद्रात्याग, प्रसन्नतापूर्वक मेरा पूजन, आश्चर्य और उत्साहसहित पाप और आलस्यादिका त्याग, प्रदक्षिणा, नमस्कार, हर्षयुक्त हृदयसे नीराजन तथा प्रत्येक पहरमें आरती—इन गुणोंसे युक्त जागरण एकादशीकी रात्रिमें करना चाहिये। जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता। यदि कोई कथावाचक मिले तो एकादशीके जागरणमें पहले पुराणपाठकी व्यवस्था करनी चाहिये। जो अविद्ध एकादशीके दिन-रातमें मेरे लिये जागरण करते हैं, उनके बीचमें मैं प्रसन्न होकर नृत्य करता हूँ। जो एकादशीकी रातमें जागरण करते समय दीप-दान करता है, वह एक-एक निमेषमें गोदानका फल पाता है। जो जागरणमें मेरे लिये कपूर और गुग्गुल मिलाया हुआ धूप देता है, वह अपने लाखों जन्मोंकी पापराशिको भस्म कर डालता है। मेरे लिये जागरण करते समय जो भक्तिपूर्वक पुराणकी पुस्तक बाँचता है, वह मेरे समीप निवास करता है। मेरी परिक्रमा करनेसे विद्वानोंने जिस फलकी प्राप्ति बतायी है, वह पुण्यफल चार करोड़ यज्ञोंसे भी नहीं प्राप्त हो सकता। जो जागरणकालमें मेरे बालचरित्रोंका पाठ करता है, वह कोटि सहस्र युगोंतक श्वेतद्वीपमें निवास करता है। जो रात्रिमें गीता और श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह उसके साथ जागरण करनेसे वेद और पुराणोंमें बताये हुए सभी पुण्यफलोंको पाता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा जागरण करते हैं, उनकी मेरे लोकसे किसी प्रकार भी पुनरावृत्ति नहीं होती। बहुत पुत्रोंके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ, एक ही गुणवान् एवं भक्त पुत्र हो तो एकादशीके जागरणसे समस्त पूर्वजोंको तार दे। जो मेरे द्वारा कहे हुए जागरणके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक पढ़ता