संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५५
है, वह सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। अनजानेमें या जान-बूझकर जो पातक किया गया है, पूर्वजन्ममें और इस जन्ममें ही जिस पापराशिका संचय किया गया है, एकादशीके जागरणसे उन सबका नाश हो जाता है। चतुरानन ! जो द्वादशीके इस माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर सनातन गतिको प्राप्त होता है। द्वादशी-व्रतके प्रभावसे सदा धर्मपर बुद्धि स्थिर रहती है, मेरे प्रति अत्यन्त निर्मल भक्तिका उदय होता है और मनुष्यको पाप नहीं लगता।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिमें विद्वानोंको प्रातःकाल विधिपूर्वक मत्स्योत्सव मनाना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है— मार्गशीर्षमासकी दशमी तिथिको मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए बुद्धिमान् पुरुष देवपूजनके पश्चात् विधिपूर्वक अग्निस्थापन करे। उसके बाद शंख, चक्र, गदा, किरीट तथा पीताम्बर धारण करनेवाले सर्वलक्षणलक्षित मुझ प्रसन्नवदनारविन्द गोविन्दका ध्यान करके हाथमें अर्घ्यके लिये जल ले और मुझे सूर्यमण्डलमें स्थित जानकर उस हाथके जलसे अर्घ्य दे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये— 'कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा, आप मेरे रक्षक हों।'
तदनन्तर रात्रिमें मेरे विग्रहके समीप बैठकर विधिपूर्वक 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका जप करे। एकादशीको प्रातःकाल किसी स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदीके समीप जाकर अथवा दूसरी किसी नदी या तड़ागके समीप पहुँचकर आगे बताये जानेवाले मन्त्रसे वहाँकी मिट्टी ले—
धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा।
तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि ! सम्पूर्ण भूतोंका धारण और पोषण सदा तुमसे ही होता है, इस सत्यके प्रभावसे तुम मेरे समस्त पापोंको छुड़ाओ।'
तत्पश्चात् वरुणसे प्रार्थना करे—
त्वयि नित्यं रसाः सर्वे स्थिता वरुण सर्वदा।
तेनेमां मृत्तिकां प्लाव्य पूतां कुरुष्व मा चिरम्॥
'हे वरुण ! सब रस सदा आपमें ही स्थित रहते हैं, इसलिये इस मृत्तिकाको आप्लावित करके आप शीघ्र पवित्र कीजिये।'
इस प्रकार मृत्तिका और जलके अधिष्ठाता देवताओंको प्रसन्न करके उस मिट्टी और जलको अपने शरीरमें लगावे। समूची मिट्टीके तीन भाग करके उसे जलमें मिलाकर नाभिसे नीचेके भागोंमें, नाभि और वक्षःस्थलके बीचमें तथा वक्षःस्थलसे ऊपरके भागमें लगाना चाहिये। उसके बाद जलमें, जहाँ मगर और कछुओंका भय न हो, नहाकर नित्यकर्म करके फिर मेरे मन्दिरमें आवे और मुझ भगवान् नारायणकी आराधना करे। 'केशवाय नमः' इस मन्त्रसे मेरे दोनों पैरोंकी पूजा करे। इसी प्रकार 'दामोदराय नमः' से कटिभागकी, 'नृसिंहाय नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'श्रीवत्सधारिणे नमः' से वक्षःस्थलकी, 'कौस्तुभनाभाय नमः' से कण्ठकी, 'श्रीपतये नमः' से हृदयकी, 'त्रैलोक्यविजयाय नमः' से बाहुकी, 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी, 'रथाङ्गधारिणे नमः' से चक्रकी, 'श्रीकराय नमः' से शंखकी, 'गम्भीराय नमः' से गदाकी और 'शान्तमूर्तये नमः' से पद्मकी पूजा करे। इस प्रकार सबके स्वामी मुझ देवेश्वर नारायणकी पूजा करके मेरे आगे चार कलशोंकी स्थापना करे, जो जलसे भरे हुए, मालासे सुशोभित, श्वेत चन्दनसे चर्चित, आम्रपल्लवोंसे संयुक्त, श्वेत वस्त्रोंसे अवगुण्ठित तथा सुवर्णयुक्त तिलसहित ताँबेके पूर्णपात्रोंसे आच्छादित हों। उन सबके मध्यमें एक पीठ (छोटी-सी चौकी) स्थापित करे;