भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 485

४५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जिसके ऊपर वस्त्र बिछा हुआ हो। उस पीठके ऊपर एक पात्र रखे और उसे जलसे भर दे। फिर उसमें मत्स्यावतार भगवान्‌की सुवर्णमयी प्रतिमा रखे। उस प्रतिमामें देवाधिदेव भगवान्‌के सभी अंग स्पष्ट होने चाहिये। उनके हाथ श्रुतियों और स्मृतियोंके ग्रन्थोंसे विभूषित हों। वहाँ अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थों, फल, फूल, गन्ध, धूप और वस्त्र आदि सामग्रियोंसे विधिपूर्वक भगवान्‌की पूजा करके यह प्रार्थना करे—

रसातलगता वेदा यथा देव त्वयोद्धृताः।
मत्स्यरूपेण तद्वन्मां भवादुद्धर केशव॥

‘देव! केशव! पूर्वकालमें मत्स्यरूप धारण करके आपने जिस प्रकार रसातलमें गये हुए वेदोंका उद्धार किया, उसी प्रकार मेरा भी इस संसारसे उद्धार कीजिये।’

ऐसा कहकर भगवान्‌के आगे जागरण करे। फिर प्रातःकाल होनेपर वे चारों कलश चार ब्राह्मणोंको दे दे। भगवान् मत्स्यकी मूर्तिको गन्ध, धूप और वस्त्र आदिसे पूजित करके आचार्यको दे दे। जो मनुष्य इस विधिसे मत्स्योत्सव करता है और भक्तिपूर्वक इस उत्तम द्वादशीव्रतको सुनता-सुनाता है, वह सभी पातकोंसे छूट जाता है।


ब्राह्मण-भोजन, प्रसाद-भक्षण और श्रीकृष्णकीर्तनकी महिमा

श्रीभगवान् कहते हैं— मार्गशीर्षमासमें कीर्तियुक्त भगवान् केशवकी पूर्वोक्त विधिसे पूजा करनी चाहिये। जो प्रतिदिन एक बार भोजन करके समूचे मार्गशीर्षको व्यतीत करता है और भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोगों और पातकोंसे मुक्त हो जाता है। मानद! अग्नि और ब्राह्मण दोनों ही मेरे मुख हैं, परंतु ब्राह्मण नामक मुख जैसा श्रेष्ठ है, वैसा अग्नि नहीं है। अग्नि नामक मुख तो ब्राह्मणके अधीन है, परंतु ब्राह्मण स्वतन्त्र है। अगहनमें कुमुदके समान स्वच्छ और सुगन्धदायक सुन्दर भात, मूँगकी दाल और गायके प्रचुर घीसे पूर्ण भोजनका ब्राह्मणके मुखमें हवन करे। चतुर्मुख! मेरे भक्तोंको मेरा प्रसाद भोजन करना चाहिये। वह पवित्र करनेवाला तथा पापियोंको भी मुक्त करनेवाला है। इसलिये अन्न-पानादि ओषधि मुझको अर्पण करे और अशुद्धको भी शुद्ध करनेवाले उस प्रसादको भक्तिपूर्वक भोजन करे। अन्य देवताओंका नैवेद्य न ग्रहण करे। अगहनके महीनेमें विशेषरूपसे ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहकर मेरा नाम लेना चाहिये। यह मुझे अत्यन्त प्रसन्न करनेवाला है। मेरी एक प्रतिज्ञा है, जिसे देवता और असुर भी नहीं जानते। वह प्रतिज्ञा इस प्रकार है—जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा मेरी शरणमें आ जाता है, वह यहाँ सम्पूर्ण लौकिक कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें सर्वोत्कृष्ट वैकुण्ठधाममें जाता है। जो ‘हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे कृष्ण!!!’ ऐसा कहकर मेरा प्रतिदिन स्मरण करता है, उसे जिस प्रकार कमल जलको भेदकर ऊपर निकल आता है, उसी प्रकार मैं नरकसे निकाल लाता हूँ।* जो विनोदसे, पाखण्डसे, मूर्खतासे, लोभसे अथवा छलसे भी मेरा भजन करता है, वह मेरा भक्त कभी कष्टमें नहीं पड़ता। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर जो कृष्ण-नामकी रट लगाते हैं, वे यदि पापी हों तो भी कभी यमराजका दर्शन नहीं करते। पूर्व अवस्थामें किसीने सम्पूर्ण पाप किये हों तथापि यदि वह अन्तकालमें श्रीकृष्णका स्मरण कर लेता है, तो निश्चय ही


* कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्॥
(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ३६)