संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पूजा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगके बाहर हैं। जो कलियुगमें अपने घरपर प्रतिदिन भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके ऊपर मैं प्रसन्न होता हूँ। बेटा! जितने दिनोंतक घरमें भागवतशास्त्र रहता है, उतने दिनोंतक पितर दूध, घी और मधुके साथ जल पीते हैं। जो भक्तिपूर्वक वैष्णव विद्वान्को भागवतशास्त्र देते हैं, वे मेरे लोकमें निवास करते हैं। जो अपने घरपर सदा भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके उस पूजनसे सब देवता प्रलयकालतकके लिये तृप्त हो जाते हैं। सदा मेरी प्रसन्नताके लिये सबको वैष्णव-शास्त्रोंका संग्रह करना चाहिये। कलियुगमें जहाँ-जहाँ परम पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ सदैव निवास करता हूँ। वहीं सम्पूर्ण तीर्थ, नदी, नद, सरोवर, यज्ञ, सातों पुरी तथा सम्पूर्ण पवित्र पर्वत निवास करते हैं। धर्मबुद्धि पुरुषको पापके नाश और मोक्षकी प्राप्तिके लिये सदा भागवतशास्त्र श्रवण करना चाहिये। श्रीमद्भागवत परम पवित्र, आयु, आरोग्य तथा पुष्टिको देनेवाला है। इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो परम उत्तम श्रीमद्भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनपर सदा यमराजका प्रभुत्व रहता है, यह सर्वथा सत्य बात है। जिसके घरमें भागवतका एक या आधा श्लोक भी लिखकर रखा हुआ है, उसके यहाँ मैं स्वयं निवास करता हूँ। जो मेरी कथा बाँचता है, मेरी कथा सुननेमें संलग्न रहता है और मेरी कथा सुनकर जिसका मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यको मैं कभी नहीं छोड़ता। जो श्रीमद्भागवतका दर्शन करके उठकर खड़ा हो जाता और बारंबार प्रणामके द्वारा उसका सम्मान करता है, उसको देखकर मुझे अनुपम प्रसन्नता होती है। जो दूरसे भागवतशास्त्रको देखकर उसके सामने जाता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। जो श्रीमद्भागवतको सुनते हैं, मैं उनके वशमें होता हूँ। जो वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप, दीप और नाना प्रकारके उपहारोंके साथ भक्तिपूर्वक मेरी प्रसन्नताके लिये श्रीमद्भागवत सुनते हैं, वे मुझे वशमें कर लेते हैं। ठीक उसी तरह जैसे साध्वी स्त्री अपने श्रेष्ठ पतिको वशमें कर लेती है।
मार्गशीर्षमासमें मथुरासेवनका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार
श्रीभगवान् कहते हैं— मथुरा नामसे विख्यात जो मेरा उत्तम क्षेत्र है, वह मेरी परम प्रिय प्रशस्त एवं रमणीय जन्मभूमि है। चतुर्मुख! मथुरामें जहाँ कहीं भी मनुष्य स्नान करता है, घोर पापसे मुक्त हो जाता है। सब धर्मोंसे रहित दुष्टात्मा पुरुषोंके लिये पापनाशिनी मथुरा नरककी पीड़ा दूर करनेवाली है। कृतघ्न, शराबी, चोर तथा प्रतिज्ञा भंग करनेवाला मनुष्य मथुरामें जाकर घोर पापसे मुक्त हो जाता है। जो किसी दूसरे प्रसंगसे अथवा व्यापार या नौकरीके लिये भी जाते हैं, वे भी मथुरामें स्नान करनेमात्रसे पापरहित होकर स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। मथुराका नाम लेनेवाले लोगोंकी भी मुक्ति होती है। जो मनुष्य वहाँ तीन रात भी निवास करते हैं, वे अपने दर्शन तथा चरणरेणुके स्पर्शसे भी दूसरोंको पवित्र कर देते हैं। जैसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ घास-फूसके बड़े भारी ढेरको भी जला डालती हैं, उसी प्रकार मथुरापुरी बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर देती है। अन्य स्थानोंमें किया हुआ पाप तीर्थस्थानमें जानेसे नष्ट होता है, किंतु तीर्थोंमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है*। चतुरानन! अन्य स्थानोंमें जिस पापका
* अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य नश्यति। तीर्थेषु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥ (स्क० पु० वै० मा० मा० १७। १७)