संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 488, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५९
झुकाते हैं। शेषनाग और वज्र आदिसे उपलक्षित उन देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके भक्तिभावसे नम्र हो प्रातःकाल उनकी पूजा करे और माखन-मिश्री, दही-दूध एवं कमल आदि अर्पण करके उन्हें प्रसन्न करे।
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल आस्तिक भावसे युक्त होकर सदा इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, वह शीघ्र ही इस लोकमें समग्र लक्ष्मीको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् शुद्ध परम धाममें गमन करता है। उनका लोकमनोहर मन्त्र पहले ही बतलाया गया है। उसका नाम है श्रीमद्दामोदर-मन्त्र (श्रीदामोदराय नमः)। इस मन्त्रके कौन-कौन अधिकारी हैं, उनका वर्णन सुनो। इस मन्त्रराजका उपदेश किसी अयोग्य व्यक्तिको नहीं देना चाहिये। यह शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला एक रहस्य है, इसलिये यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिये। आलसी, मलिन, क्लेशग्रस्त, दम्भी, मोहयुक्त, दरिद्र, रोगी, क्रोधी, रागी, भोगलोलुप, दोषदर्शी, ईर्ष्या रखनेवाला, शठ, कटुवादी, अन्यायपूर्वक धन कमानेवाला, परस्त्रियोंमें आसक्त रहनेवाला, विद्वानोंका वैरी, मूर्ख, अपनेको पण्डित माननेवाला, व्रतभ्रष्ट, जीविकाके क्लेशसे युक्त, चुगलखोर, दुष्टचित्त, बहुभोजी, निर्दयतापूर्ण चेष्टावाला, दुष्टोंका नेता, कंजूस, पापी, भयंकर, आश्रितोंको भय देनेवाला—इस प्रकारके दुर्गुणोंसे युक्त शिष्यको इस मन्त्रके उपदेशके लिये कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई ग्रहण करता है तो शिष्यका दोष प्रायः गुरुमें भी आ जाता है। मन्त्रीका दोष राजामें, स्त्रीका दोष पतिमें और शिष्यका दोष गुरुमें आता है—इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिये गुरुको चाहिये कि वह सदा शिष्यकी परीक्षा लेकर ही उसे ग्रहण करे।
जो मन, वाणी और शरीरसे गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला हो, जिसमें चोरीकी वृत्तिका सर्वथा अभाव हो, जो आस्तिक होनेके साथ ही मोक्षके लिये उद्योगशील हो, ब्रह्मचर्यका पालन करता हो, सदा दृढ़तापूर्वक व्रतमें स्थित रहता हो, जिसकी पापमें प्रवृत्ति न हो, जिसका चित्त प्रसन्न और अन्तःकरण निर्मल हो, जिसमें शठताका अभाव हो, जो शुद्ध, परोपकारी और स्वार्थकामनासे रहित हो, अपने तन, मन और धनसे गुरुको सन्तुष्ट रखनेवाला हो, आश्रितजनोंको प्रसन्न रखनेवाला और पवित्र हो—ऐसे ही शिष्यको मन्त्रका उपदेश दे, अन्यथा नहीं।
अब गुरुका लक्षण बतलाता हूँ। जिसका चित्त सम और शान्त हो, जो क्रोधरहित, सब लोगोंका सुहृद्, साधु, महात्मा, लोकमें सबपर समान दृष्टि रखनेवाला हो, वह गुरु कहा गया है। जो सदा मेरे व्रतको धारण करता है, वैष्णवगण जिसे सम्मानकी दृष्टिसे देखते हैं, जो मेरी कथावार्तामें अनुरक्त और मेरे उत्सवोंमें संलग्न रहता है, जो दयासागर, पूर्णकाम, सर्वभूतोपकारी, सब ओरसे निःस्पृह, सिद्ध, सर्वविद्याविशारद, समस्त संशयोंको निवारण करनेवाला और आलस्यरहित है, जो सब कालोंका ज्ञाता है तथा सबपर अनुग्रह रखता है, ऐसा आदरणीय ब्राह्मण गुरु कहा गया है। पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त शिष्य ऐसे गुरुसे मेरी प्राप्ति करानेवाले मार्गशीर्षमासमें उक्त दामोदर-मन्त्रका उपदेश ग्रहण करे।
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वैष्णवोंके व्रतोंको स्वीकार करे। जो मुझे प्रिय लगनेवाले परम उत्तम श्रीमद्भागवतपुराणका पाठ करता है, उसे प्रत्येक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन श्रीमद्भागवतके आधे या चौथाई श्लोकका पाठ करता अथवा सुनता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन पवित्रचित्त हो भागवतके श्लोकका पाठ करता है, उसे अठारह पुराणोंके पाठ करनेका फल मिलता है। जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ वैष्णवगण स्थित होते हैं। जो सदा मेरी