संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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माता महालक्ष्मीकी कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय श्रीसम्पन्न हो गये। वे तत्काल राज्याधिकारीके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दिखायी देने लगे।
तदनन्तर देवी लक्ष्मीने भगवान् मुकुन्दकी ओर देखा। उनके श्रीअंग तमालके समान श्यामवर्ण थे। कपोल और नासिका बड़ी सुन्दर थी। वे परम मनोहर दिव्य शरीरसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। भगवान्के एक हाथमें कौमोदकी गदा शोभा पा रही थी। भगवान् नारायणकी उस दिव्य शोभाको देखते ही लक्ष्मीजी आश्चर्यचकित हो उठीं और हाथमें वनमाला ले सहसा हाथीसे उतर पड़ीं। वह माला श्रीजीने अपने ही हाथों बनायी थीं, उसके ऊपर भ्रमर मँडरा रहे थे। देवीने वह सुन्दर वनमाला परमपुरुष भगवान् विष्णुके कण्ठमें पहना दी और स्वयं उनके वाम भागमें जाकर खड़ी हो गयीं। उन शोभाशाली दम्पतिका वहाँ दर्शन करके सम्पूर्ण देवता, दैत्य, सिद्ध, अप्सराएँ, किन्नर तथा चारणगण परम आनन्दको प्राप्त हुए।
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अमृतकी उत्पत्ति, भगवान्का मोहिनीरूपद्वारा देवताओंको अमृत पिलाना, शिवके द्वारा राहुसे चन्द्रमाकी रक्षा तथा शिवके लिये दीपदान, रुद्राक्षधारण और विभूति-धारणका माहात्म्य
लोमशजी कहते हैं— तदनन्तर लक्ष्मीजीके साथ परमानन्दमय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके देवता और दैत्य पुनः अमृतके लिये समुद्र मथने लगे। उस समय समुद्रसे महायशस्वी धन्वन्तरिजी प्रकट हुए। उनकी तरुण अवस्था थी तथा वे द्वितीय शंकरकी भाँति मृत्युपर विजय पा चुके थे। उन्होंने अपने दोनों हाथोंमें अमृतसे भरा हुआ कलश ले रखा था। देवता जबतक उनके मनोहर स्वरूपका दर्शन करनेमें लगे थे, तबतक वृषपर्वा दैत्यने बलपूर्वक उनके हाथका कलश छीन लिया। इस प्रकार उस सुधापूर्ण कलशको लेकर अमृतपानके लिये उत्सुक हुए दैत्य पाताललोकमें चले आये। जब पीछे-पीछे देवता भी वहाँ आये, तब राजा बलिने उनसे कहा—'देवताओ! तुम सब लोग तो रत्नमय सामग्रियाँ पाकर कृतार्थ हो चुके हो। हमने तो केवल इस अमृतको ही पाकर सन्तोष किया है। अब तुमलोग प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र यहाँसे स्वर्गलोकको चले जाओ।' राजा बलिके द्वारा इस प्रकार फटकारे जानेपर सम्पूर्ण देवता भगवान् नारायणके समीप गये। भगवान्ने देखा, देवताओंका मनोरथ भंग हो चुका है। तब उन्होंने अपनी वाणीसे आश्वासन देते हुए कहा—'देवताओ! डरो मत, मैं योगमायाके प्रभावसे दानवोंको मोहित करके तुम्हारे लिये अमृत ले आऊँगा।' यों कहकर अनाथोंको शरण देनेवाले भगवान् विष्णुने सब देवताओंको वहीं ठहराकर मोहिनीरूप धारण किया। इधर दैत्य आपसमें ही रोषपूर्ण बातें कर रहे थे। उनमें अमृतके लिये परस्पर विवाद छिड़ गया था। इसी समय मोहिनी देवी वहाँ आयीं। सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाली उस युवतीको देखकर दैत्यलोग आश्चर्यचकित हो उठे और प्यासी आँखोंसे उसकी ओर देखने लगे।
राजा बलिने कहा— महाभागे! मेरी एक बात मानो; हम सब लोगोंके विवादकी शीघ्र शान्ति हो जाय, इसके लिये तुम्हीं इस अमृतका विभाजन कर दो।
श्रीमोहिनी बोलीं— विद्वान् पुरुषको स्त्रियोंका विश्वास नहीं करना चाहिये। झूठ, साहस, माया, मूर्खता, अत्यन्त लोभ, अपवित्रता और निर्दयता—ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं। उनमें स्नेहहीनता