संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २५
और धूर्तता भी होती है। इस बातको यथार्थ जानना चाहिये। जैसे पक्षियोंमें कौआ और शिकारी जीवोंमें सियार धूर्त हैं, वैसे ही मनुष्योंमें स्त्री सदा धूर्त होती है। यह बात बुद्धिमान् पुरुषोंको भलीभाँति समझ लेनी चाहिये। मेरे साथ आपलोग मित्रभाव कैसे प्रकट कर रहे हैं? यहाँ यह बात सर्वथा अज्ञात है कि आप कौन हैं और मैं कौन हूँ। आप सब लोग कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानमें निपुण हैं। अतः आपको भलीभाँति सोच-विचारकर ही परायी बुद्धिसे अपने हित-साधनका प्रयास करना चाहिये।
राजा बलिने कहा—देवि! तुम यथोचित विभाग करके आज हम सबको अमृत बाँट दो। तुम जिसे जितना दोगी, उतना ही हम ग्रहण कर लेंगे। यह बात तुमसे सत्य-सत्य कह रहे हैं।
राजा बलिके यों कहनेपर सर्वमंगला महादेवी मोहिनी दैत्योंको लौकिकी गतिका दर्शन कराती हुई-सी बोलीं—'श्रेष्ठ असुरगण! आपलोग किसी अनिर्वचनीय दैवकी सहायतासे अपने कार्यमें सफल हुए हैं। अतः अमृतका अधिवासन करें—इसे घरके भीतर सुरक्षित रूपसे रख दें। आज व्रती रहकर कल सबेरे अमृतका पारण करें। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपने न्यायपूर्वक उपार्जित धनका दसवाँ भाग ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये किसी सत्कर्ममें लगावें।'^१
दैत्यगण योगमायासे मोहित हो चुके थे। वे अधिक समझदार भी नहीं थे। अतः मोहिनी देवीने जो कुछ कहा, उसे ठीक मानकर उन्होंने सब वैसा ही किया। रातको सबने बड़ी प्रसन्नताके साथ जागरण किया और उषाकाल आते ही प्रातःस्नान किया। समस्त आवश्यक कृत्य पूरा करके बलि आदि असुर अमृतपान करनेके लिये आये और क्रमशः पंगत लगाकर बैठ गये। बलि, वृषपर्वा, नमुचि, शंख, बुद्बुद, सुदंष्ट्र, संह्लाद, कालनेमि, विभीषण, वातापि, इल्वल, कुम्भ, निकुम्भ, प्रघस, सुन्द, उपसुन्द, निशुम्भ, शुम्भ तथा अन्यान्य दैत्य-दानव एवं राक्षस क्रमशः पंक्ति लगाकर बैठे। उस समय मोहिनी देवी हाथमें सुधा-कलश लिये अपनी उत्तम कान्तिसे बड़ी शोभा पा रही थीं। इसी समय सम्पूर्ण देवता भी हाथोंमें भोजन-पात्र लिये असुरोंके समीप आये। उन्हें देखकर मोहिनी देवीने असुरोंसे कहा—'इन्हें आपलोग अपने अतिथि समझें। ये धर्मको ही सर्वस्व मानकर उसका साधन करनेवाले हैं। इनके लिये यथाशक्ति दान देना चाहिये। जो लोग अपनी शक्तिके अनुसार दूसरोंका उपकार करते हैं, उन्हें ही धन्य मानना चाहिये। वे ही सम्पूर्ण जगत्के रक्षक तथा परम पवित्र हैं।^२ जो केवल अपना ही पेट भरनेके लिये उद्योग करते हैं, वे क्लेशके भागी होते हैं।'
मोहिनी देवीके यों कहनेपर असुरोंने इन्द्रादि देवताओंको भी अमृत पीनेके लिये बुलाया। तब सभी देवता सुधापानके लिये वहाँ बैठे। उनके बैठ जानेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाली तथा देवताओंका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली मोहिनी देवीने यह उत्तम बात कही—'वैदिकी श्रुति कहती है कि सबसे पहले अतिथियोंका सत्कार होना चाहिये।^३ अब आप ही लोग बतावें—महाभाग राजा बलि आदि स्वयं कहें, मैं पहले किनको अमृत परोसूँ?' बलिने उत्तर दिया—'देवि! तुम्हारी जैसी रुचि हो, वैसे ही करो।' पवित्रात्मा राजा बलिके द्वारा
१. न्यायोपार्जितवित्तस्य दशांशेन धीमता। कर्तव्यो विनियोगश्च ईशप्रीत्यर्थमेव च॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।३५)
२. परेषामुपकारं च ये कुर्वन्ति स्वशक्तितः। धन्यास्त एव विज्ञेयाः पवित्रा लोकपालकाः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५२-५३)
३. आदौ ह्यभ्यागताः पूज्या इति वै वैदिकी श्रुतिः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५८)