भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २५


और धूर्तता भी होती है। इस बातको यथार्थ जानना चाहिये। जैसे पक्षियोंमें कौआ और शिकारी जीवोंमें सियार धूर्त हैं, वैसे ही मनुष्योंमें स्त्री सदा धूर्त होती है। यह बात बुद्धिमान् पुरुषोंको भलीभाँति समझ लेनी चाहिये। मेरे साथ आपलोग मित्रभाव कैसे प्रकट कर रहे हैं? यहाँ यह बात सर्वथा अज्ञात है कि आप कौन हैं और मैं कौन हूँ। आप सब लोग कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानमें निपुण हैं। अतः आपको भलीभाँति सोच-विचारकर ही परायी बुद्धिसे अपने हित-साधनका प्रयास करना चाहिये।

राजा बलिने कहा—देवि! तुम यथोचित विभाग करके आज हम सबको अमृत बाँट दो। तुम जिसे जितना दोगी, उतना ही हम ग्रहण कर लेंगे। यह बात तुमसे सत्य-सत्य कह रहे हैं।

राजा बलिके यों कहनेपर सर्वमंगला महादेवी मोहिनी दैत्योंको लौकिकी गतिका दर्शन कराती हुई-सी बोलीं—'श्रेष्ठ असुरगण! आपलोग किसी अनिर्वचनीय दैवकी सहायतासे अपने कार्यमें सफल हुए हैं। अतः अमृतका अधिवासन करें—इसे घरके भीतर सुरक्षित रूपसे रख दें। आज व्रती रहकर कल सबेरे अमृतका पारण करें। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपने न्यायपूर्वक उपार्जित धनका दसवाँ भाग ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये किसी सत्कर्ममें लगावें।'^१

दैत्यगण योगमायासे मोहित हो चुके थे। वे अधिक समझदार भी नहीं थे। अतः मोहिनी देवीने जो कुछ कहा, उसे ठीक मानकर उन्होंने सब वैसा ही किया। रातको सबने बड़ी प्रसन्नताके साथ जागरण किया और उषाकाल आते ही प्रातःस्नान किया। समस्त आवश्यक कृत्य पूरा करके बलि आदि असुर अमृतपान करनेके लिये आये और क्रमशः पंगत लगाकर बैठ गये। बलि, वृषपर्वा, नमुचि, शंख, बुद्बुद, सुदंष्ट्र, संह्लाद, कालनेमि, विभीषण, वातापि, इल्वल, कुम्भ, निकुम्भ, प्रघस, सुन्द, उपसुन्द, निशुम्भ, शुम्भ तथा अन्यान्य दैत्य-दानव एवं राक्षस क्रमशः पंक्ति लगाकर बैठे। उस समय मोहिनी देवी हाथमें सुधा-कलश लिये अपनी उत्तम कान्तिसे बड़ी शोभा पा रही थीं। इसी समय सम्पूर्ण देवता भी हाथोंमें भोजन-पात्र लिये असुरोंके समीप आये। उन्हें देखकर मोहिनी देवीने असुरोंसे कहा—'इन्हें आपलोग अपने अतिथि समझें। ये धर्मको ही सर्वस्व मानकर उसका साधन करनेवाले हैं। इनके लिये यथाशक्ति दान देना चाहिये। जो लोग अपनी शक्तिके अनुसार दूसरोंका उपकार करते हैं, उन्हें ही धन्य मानना चाहिये। वे ही सम्पूर्ण जगत्के रक्षक तथा परम पवित्र हैं।^२ जो केवल अपना ही पेट भरनेके लिये उद्योग करते हैं, वे क्लेशके भागी होते हैं।'

मोहिनी देवीके यों कहनेपर असुरोंने इन्द्रादि देवताओंको भी अमृत पीनेके लिये बुलाया। तब सभी देवता सुधापानके लिये वहाँ बैठे। उनके बैठ जानेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाली तथा देवताओंका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली मोहिनी देवीने यह उत्तम बात कही—'वैदिकी श्रुति कहती है कि सबसे पहले अतिथियोंका सत्कार होना चाहिये।^३ अब आप ही लोग बतावें—महाभाग राजा बलि आदि स्वयं कहें, मैं पहले किनको अमृत परोसूँ?' बलिने उत्तर दिया—'देवि! तुम्हारी जैसी रुचि हो, वैसे ही करो।' पवित्रात्मा राजा बलिके द्वारा


१. न्यायोपार्जितवित्तस्य दशांशेन धीमता। कर्तव्यो विनियोगश्च ईशप्रीत्यर्थमेव च॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।३५)
२. परेषामुपकारं च ये कुर्वन्ति स्वशक्तितः। धन्यास्त एव विज्ञेयाः पवित्रा लोकपालकाः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५२-५३)
३. आदौ ह्यभ्यागताः पूज्या इति वै वैदिकी श्रुतिः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५८)

२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इस प्रकार सम्मान दिये जानेपर मोहिनी देवीने परोसनेके लिये अमृतका कलश हाथमें उठा लिया और पहले देवताओंके समुदायको ही शीघ्रतापूर्वक अमृत देना आरम्भ किया। मोहिनी देवी अपने सुधा-सदृश हासरसामृतकी ही भाँति उस अमृत-रसको भी देवताओंके आगे बारंबार उँडेलने लगीं। उनके दिये हुए सुधारसको सम्पूर्ण देवताओं, देवेश्वरों, लोकपालों, गन्धर्वों, यक्षों और अप्सराओंने खूब छककर पीया। उस समय राहुनामक दैत्य अमृत पीनेके लिये देवताओंकी पंक्तिमें जा बैठा। उसने ज्यों ही अमृत पीनेकी इच्छा की, सूर्य और चन्द्रमाने अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुको इसकी सूचना दे दी। तब भगवान्ने विकृत एवं विकराल शरीरवाले राहुका मस्तक काट डाला। उसका कटा हुआ मस्तक आकाशमें उड़ गया और धड़ पृथ्वीपर गिर पड़ा।

उस समय सौ करोड़ मुख्य-मुख्य दैत्य गर्जते तथा महान् बल-पराक्रमवाले देवताओंको युद्धके लिये ललकारते हुए आगे बढ़े। महाकाय राहु चन्द्रमाको अपना ग्रास बनाकर इन्द्रके पीछे दौड़ा। वह सम्पूर्ण देवताओंपर ग्रास लगाता जा रहा था। राहु यद्यपि एक ही था, तथापि वह सर्वत्र पहुँचा हुआ दिखायी देता था। यह देख देवता भयसे विह्वल हो चन्द्रमाको आगे करके बड़ी उतावलीके साथ भागे और पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। वे स्वर्गमें ज्यों ही पहुँचे, त्यों ही राहु भी महान् वेगसे उनके आगे आकर खड़ा हो गया। वह चन्द्रमाको निगल जाना चाहता था। यह देख चन्द्रमाने भयसे व्याकुल होकर भगवान् शंकरकी शरणमें जानेका विचार किया। वे मन-ही-मन शिवजीका स्मरण करके स्तुति करने लगे—‘देवेश! आप हमारे रक्षक हों, वृषभध्वज! मुझे संकटसे उबारें। शरणागतकी रक्षा करनेवाले श्रीपार्वतीपते! अपनी शरणमें आये हुए मेरी रक्षा करें।’

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सबका कल्याण करनेवाले भगवान् सदाशिव वहीं प्रकट हो गये और चन्द्रमासे बोले—‘डरो मत।’ यों कहकर उन्होंने चन्द्रमाको अपने जटा-जूटके ऊपर रख लिया। तबसे चन्द्रमा उनके मस्तकपर श्वेत कमलपुष्पकी भाँति शोभा पा रहे हैं। चन्द्रमाकी रक्षा होनेके पश्चात् राहु भी वहाँ आ पहुँचा और भगवान् शिवकी स्तुति करने लगा—‘शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। आप ही ब्रह्म और परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। लिंगरूपधारी महादेव! जगत्पते! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण भूतोंके निवासस्थान, दिव्य प्रकाशस्वरूप तथा सब भूतोंके पालक हैं। आपको नमस्कार है। महादेव! आप समस्त जगत्की आनन्दप्राप्तिके कारण हैं। आपको प्रणाम है। मेरा भक्ष्य चन्द्रमा इस समय आपके समीप आया है। उसे आप मुझे दे दीजिये।’

राहुकी इस प्रार्थनासे भगवान् सोमनाथ बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने राहुसे इस प्रकार कहा—‘मैं सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हूँ, देवता और असुर सबको मैं प्रिय हूँ।’ भगवान् शिवके यों कहनेपर राहु भी उन्हें प्रणाम करके उनके मस्तकमें स्थित हो गया। तब चन्द्रमाने भयके मारे अमृतका स्राव किया। उस अमृतके सम्पर्कसे राहुके अनेक सिर

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २७

हो गये। भगवान् शंकरने उन सबको देखा। देवकार्यकी सिद्धिके लिये उन्होंने राहुके मुण्डोंकी माला बना ली।

जो भगवान् शिवके ऊपर सुशोभित दूसरोंद्वारा चढ़ायी हुई पूजा-सामग्री देखकर सन्तोष प्राप्त करता है, वह श्रेष्ठ लोकोंमें जाता है। जो कार्तिकमासकी रात्रिमें श्रद्धापूर्वक शिवजीके समीप दीपमाला समर्पित करता है, उसके चढ़ाये हुए वे दीप शिवलिंगके सामने जितने समयतक जलते हैं, उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिन्होंने भगवान् शिवके मन्दिरमें कुसुम्भके तेलसे युक्त दीपक अर्पित किये हैं, वे अपने ऊपर और नीचेकी दस-दस पीढ़ियोंके साथ शिवलोकमें निवास करते हैं। दीपदानके फलसे वे ज्ञानी होते हैं। जो कपूर, अगर और धूपसे भगवान् सदाशिवकी पूजा करते हैं और प्रतिदिन कपूरकी आरती उतारते हैं वे सायुज्य-मुक्तिको प्राप्त होते हैं। जो दानके समय, तपस्यामें, तीर्थमें और पर्वकालमें आलस्य छोड़कर रुद्राक्ष-धारणपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, उनका पुण्य अक्षय होता है।

द्विजवरो! भगवान् शिवने जिन रुद्राक्षोंका वर्णन किया है, उसे आपलोग सुनें। रुद्राक्ष एक मुखसे लेकर सोलह मुखतकके होते हैं। उनमेंसे पंचमुख तथा एकमुख—ये दो प्रकारके रुद्राक्ष मनुष्योंद्वारा धारण करने योग्य एवं श्रेष्ठ समझने चाहिये। जो प्रतिदिन एकमुख रुद्राक्ष धारण करते हैं, उन मनुष्योंको जीवन्मुक्त जानना चाहिये। जो प्रतिदिन पंचमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह रुद्रलोकमें जाता और उन्हींके साथ आनन्दका भागी होता है। जप, तप, क्रिया-योग, स्नान और देवपूजा आदि जो भी शुभ कर्म किया जाता है, वह रुद्राक्षधारणसे अनन्त फल देनेवाला हो जाता है। जो मन्त्र-पूत विभूतिसे अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे रुद्रलोकमें रुद्र होंगे। कपिला गायके गोबरको भूमिपर गिरनेसे पहले ही हाथपर ले ले और उसे सुखाकर विभूतिके लिये संग्रह करे। विभूति सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी है। पहले ललाटमें प्रयत्नपूर्वक अँगूठेसे एक रेखा बनानी चाहिये। फिर मध्यमा अँगुलीको छोड़कर अनामिका और तर्जनी—इन दो अँगुलियोंसे दो रेखाएँ खींचे। इस प्रकार जिसके ललाटमें तीन सफल रेखाएँ देखी जाती हैं, उस शिवभक्तको साक्षात् शिवके ही समान जानना चाहिये। वह दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।


इन्द्रकी विजय, इन्द्रद्वारा विश्वरूपका वध, नहुषका स्वर्गसे पतन, ब्रह्महत्यासे इन्द्रकी मुक्ति तथा पुनः राज्यकी प्राप्ति

लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर उस देवासुर-संग्राममें इन्द्रने भी दैत्योंका बड़ा भयंकर संहार किया। उनका वह कृत्य अद्भुत था। उस समय अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर शचीपति इन्द्र दुर्जय दैत्योंके लिये कालरूप हो रहे थे। जब इस प्रकार असुर मारे जा रहे थे, उस समय इन्द्रको रोकनेके लिये भगवान् नारदजी वहाँ पधारे और यों बोले—'असुरोंके मण्डलमें जो वीर योद्धा मारे गये हैं, उनके बाद अब तुम भयभीत सैनिकोंकी हत्या क्यों कर रहे हो? जो भयभीत होकर शरणमें आ जाते हैं, ऐसे सैनिकोंकी जो लोग विजय-मदसे उन्मत्त होकर हत्या करते हैं, उन्हें महापातकी और ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।* इसलिये तुम्हें मनसे भी किसी भयभीत प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।'

महात्मा नारदके यों कहनेपर इन्द्र देवसेनाके


* ये भीताश्च प्रपन्नाश्च घ्नन्ति तान् ये मदोद्धताः। ब्रह्मघ्नास्तेऽपि विज्ञेया महापातकसंयुताः॥
(स्क० पु०, मा० के० १४। १९)

२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


साथ तत्काल स्वर्गमें चले आये। उस समय सब देवता परस्पर अधिक हर्ष प्रकट करने लगे। यक्ष, गन्धर्व और किन्नरगण भी बड़े आनन्दित हुए। श्रेष्ठ देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने अमरावतीके सिंहासनपर शचीसहित इन्द्रका अभिषेक किया। इन्द्र भगवान् शंकरके प्रसादसे विजयी हुए। उस समय देवलोकमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। शंख, पटह, मृदंग, ढोल, आनक, भेरी और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। देवताओंद्वारा मारे गये दैत्य पृथ्वीपर पड़े थे। महात्मा राजा बलि आदि भी प्राण त्याग चुके थे। उस समय भृगुवंशी शुक्राचार्यजी तपस्या करनेके लिये अपने शिष्योंके साथ मानसोत्तर पर्वतपर गये थे। इसीलिये वे युद्धमें उपस्थित न हो सके थे। उस युद्धमें जो दैत्य जीवित बच गये थे, वे शुक्राचार्यजीके पास गये। उन्होंने वह सारा वृत्तान्त, जो असुरोंके संहारका कारण हुआ था, विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर भृगुनन्दन शुक्रको खेद और क्रोध भी हुआ। वे शिष्योंके साथ युद्धस्थलमें आये और अपनी मृतसंजीवनी विद्याके प्रभावसे उन्होंने मरे हुए असुरोंको भी जीवित कर दिया। शुक्राचार्यकी प्रेरणासे बलि आदि सब दैत्य पातालमें लौट आये और सुखपूर्वक रहने लगे।

ऋषियोंने पूछा—देवराज इन्द्रने गुरुके बिना ही कैसे राज्य प्राप्त किया? क्योंकि गुरुकी अवहेलनासे ही उन्हें अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा था। किसकी प्रेरणासे इन्द्र चिरंकालतक राजसिंहासनपर बैठे रहे। ये सब बातें आप शीघ्र बतावें। हमें यह सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है।

लोमशजी बोले—गुरु बृहस्पतिके बिना भी शचीपति इन्द्रने कुछ कालतक राज्य-शासन किया। उस समय विश्वरूपजी इन्द्रके पुरोहित हुए थे। विश्वरूपके तीन मस्तक थे; वे यज्ञ और पूजनमें उचित भाग देकर देवताओं, असुरों और मनुष्योंको भी तृप्त करते थे। यह बात शचीपति इन्द्रसे छिपी न रह सकी। पुरोहित विश्वरूपजी देवताओंका भाग उच्चस्वरसे बोलकर देते थे। दैत्योंको चुपचाप बिना बोले ही देते थे और मनुष्योंको मध्यम स्वरसे मन्त्र पढ़कर भाग समर्पित करते थे। यह उनका प्रतिदिनका कार्य था। एक दिन इन्द्रको गुरुजीकी फुर्ती देखकर इस बातका पता लग गया। तब उन्होंने छिपे-छिपे यह जान लिया कि विश्वरूपजी क्या करना चाहते हैं। 'ये दैत्योंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्हें भाग अर्पण करते हैं, हमारे पुरोहित होकर दूसरोंको फल देते हैं।' यों समझकर इन्द्रने सौ पर्ववाले वज्रसे विश्वरूपके मस्तक काट डाले। वज्रके आघातसे तत्काल उनकी मृत्यु हो गयी। इन्द्र ब्रह्महत्याके अपराधी हुए। पर ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन आदि महापाप करनेवाले पापियोंके भी उद्धारका यही एक उपाय है कि वे भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करें, जिससे बुद्धि भगवन्मयी हो जाती है।*

तदनन्तर धुएँके समान रंगवाली तथा तीन मस्तकोंवाली ब्रह्महत्या इन्द्रको निगल जानेके लिये उनके पास आयी। उसे देखकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, अतः वे वहाँसे भाग चले। उन्हें भागते देख भयदायिनी ब्रह्महत्या उनका पीछा करने लगी। जब वे भागते तब वह भी पीछे-पीछे दौड़ती, और उनके खड़े होनेपर खड़ी हो जाती। अपने शरीरकी परछाईंके समान वह इन्द्रके पीछे लगी रहती। जाते-जाते सहसा वह इन्द्रको लपेट लेनेके लिये झपटी, इतनेमें ही इन्द्र बड़ी फुर्तीके साथ पानीमें कूद पड़े और वहीं गोता लगा गये, मानो वे चिरकालसे जलमें ही निवास करनेवाले कोई जलचर जीव हों। इस प्रकार उस जलमें बड़े


* ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। इत्येषामप्यघवतामिदमेव च निष्कृतिः॥
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मतिः॥
(स्क० पु०, मा० के० १५। ११-१२)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *

दुःखसे निवास करते हुए इन्द्रके तीन सौ दिव्य वर्ष पूरे हो गये। उस समय स्वर्गलोकमें भयंकर अराजकता छा गयी। देवता और तपस्वी ऋषि भी चिन्तित हो उठे। तीनों लोक विपत्तिग्रस्त हो गये। जिस राज्यमें एक भी ब्रह्महत्यारा निर्भय होकर निवास करता है, वहाँ साधु पुरुषोंकी अकालमृत्यु होती है। विप्रगण! जिस राज्यमें पापात्मा राजा निवास करता है, वहाँ प्रजाके विनाशके लिये दुर्भिक्ष, मृत्यु, उपद्रव तथा और भी बहुत-से अनर्थ उत्पन्न होते हैं। अतः राजाको श्रद्धापूर्वक धर्मका पालन करना चाहिये। राजाके पवित्र होनेसे ही उसकी प्रजा पवित्र रहकर स्थिरता प्राप्त करती है।* इन्द्रने जो पाप किया था, उसके कारण सम्पूर्ण जगत् नाना प्रकारके सन्तापोंसे पीड़ित और उपद्रवग्रस्त हो गया।

शौनकने पूछा—सूतजी! इन्द्रने तो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका विशाल राज्य प्राप्त किया है, फिर उसमें विघ्न क्यों उत्पन्न होता है?

सूतजी बोले—देवताओं, दानवों और विशेषतः मनुष्योंके सुख और दुःखका कारण कर्म ही है—इसमें संशय नहीं है। इन्द्रने बड़ा ही अद्भुत एवं घृणित कर्म किया। उन्होंने गुरुकी अवहेलनाके साथ ही विश्वरूपका वध भी कर डाला। इतना ही नहीं, गुरु-तुल्य महर्षि गौतमकी पत्नीका भी सेवन (उपभोग) किया। इन्हीं सब बुरे कर्मोंका फल देवराज इन्द्रको प्राप्त हुआ, जिसे टालनेका कोई उपाय नहीं था। जो पाप-कर्म करनेवाले मनुष्य उस पापके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं करते—उनका वह पाप थोड़ा हो या अधिक, उससे एक दिन वे पीड़ित होते ही हैं। विप्रगण! यदि पाप बन जाय तो उसकी पूर्णतः शान्तिके लिये तत्काल प्रायश्चित्त करना चाहिये। पापोंका प्रायश्चित्त अनेक प्रकारका बतलाया गया है। उपपातक अधिक कालतक रह जाने या बार-बार उसकी आवृत्ति होनेपर महापातकके रूपमें परिणत हो जाता है। जो मनुष्य सबेरे, दोपहर और शामको सदा स्वधर्मपालनस्वरूप तपस्या करते हैं, उनका पाप नष्ट हो जाता है तथा वे उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। इसलिये दुराचारपरायण इन्द्रको इस पाप-कर्मका ही फल मिला है।

विप्रगण! उस समयकी परिस्थितिपर भलीभाँति विचार करके सम्पूर्ण लोकपाल एकत्र हो बृहस्पतिके पास गये और अपना सब मनोगत विचार उनपर प्रकट किया। उन्होंने स्थिरचित्त होकर इन्द्रकी सब बातें गुरु बृहस्पतिसे कह सुनायीं। देवताओंकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् बृहस्पतिजीने सर्वत्र फैली हुई अराजकताको लक्ष्य करके सोचा, ‘अब क्या करना चाहिये? इस समय हमारा कर्तव्य क्या है? देवताओं, पवित्रात्मा ऋषियों तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण कैसे होगा?’ मन-ही-मन इन सब बातोंको सोचकर और कर्तव्य-अकर्तव्यका विचार करके महायशस्वी बृहस्पतिजी देवताओंके साथ इन्द्रके पास चले; वे तुरंत ही उस जलाशयपर जा पहुँचे, जिसमें इन्द्र छिपे हुए थे और जिसके तटपर भयानक चाण्डालीके रूपमें ब्रह्महत्या खड़ी थी। वे सम्पूर्ण देवता और महर्षि जलाशयके किनारे बैठ गये। गुरु बृहस्पतिजीने स्वयं ही इन्द्रको पुकारा। उनकी आवाज सुनकर इन्द्र उठकर खड़े हो गये। उस समय उन्हें अपने


* एकोऽपि ब्रह्महा यत्र राष्ट्रे वसति निर्भयः। अकालमरणं तत्र साधूनामुपजायते॥
राजा पापयुतो यस्मिन् राष्ट्रे वसति तत्र वै। दुर्भिक्षं चैव मरणं तथैवोपद्रवा द्विजाः॥
भवन्ति बहवोऽनर्थाः प्रजानां नाशहेतवे। तस्माद्राज्ञा प्रकर्तव्यो धर्मः श्रद्धापरेण हि॥
तथा प्रकृतयो राज्ञः शुचित्वेन प्रतिष्ठिताः।
(स्क० पु०, मा० के० १५। १८-२१)

३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गुरु बृहस्पतिजीका दर्शन हुआ। इन्द्रके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने सामने खड़े हुए बृहस्पतिजीको तथा वहाँ आये हुए सम्पूर्ण तपस्वी मुनियोंको शीघ्रतापूर्वक प्रणाम किया। फिर दीनवदन हो अपने ही किये हुए अज्ञानसूचक महान् कुकर्मोंपर मन-ही-मन भलीभाँति विचार करके वे बोले—'प्रभो! इस समय मेरेद्वारा पालन करनेयोग्य कौन-सा कर्तव्य है? बताइये!' उदार बुद्धिवाले भगवान् बृहस्पतिने हँसकर उत्तर दिया—'इन्द्र! पहले तुमने जो कुछ किया था, उसी कर्मका यह फल आज तुम्हें मिल रहा है। केवल भोगसे ही इसका क्षय होगा। धर्मशास्त्रकारोंने ब्रह्महत्याके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा है। उनकी दृष्टिमें ब्रह्महत्या दूर करनेके लिये कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं। अनजानमें जो पाप हो जाता है, उसीके निवारणका उपाय धर्मशास्त्रज्ञ विद्वानोंने बताया है। जो पाप स्वेच्छापूर्वक जान-बूझकर किया जाता है, उसके प्रतिकारका कोई उपाय नहीं। इच्छापूर्वक जान-बूझकर किया हुआ पाप अनिच्छा या अज्ञानपूर्वक किये हुए पापकी श्रेणीमें नहीं आ सकता। विषय-भेदसे इन दोनों प्रकारके पापोंका प्रायश्चित्त नियत किया गया है। जान-बूझकर किये हुए पापके लिये मरणान्त प्रायश्चित्तका विधान है। अज्ञानजनित पापके लिये विशेष-विशेष प्रायश्चित्त बताया गया है। तुमने जो पाप किया है, वह अनजानमें नहीं हुआ है; तुम्हारे द्वारा स्वयं जान-बूझकर विद्वान् पुरोहित ब्राह्मणका वध किया गया है। अतः उसके निवारणका कोई उपाय नहीं है। जबतक मृत्यु नहीं हो जाती, तबतक तुम इस जलमें ही स्थिरभावसे पड़े रहो। दुर्मते! तुम्हारे सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल तो उसी समय नष्ट हो गया, जब तुमने ब्राह्मणकी हत्या की थी। जैसे छेदवाले घड़ेमें थोड़ा भी जल नहीं ठहरता, उसी प्रकार पापी मनुष्यका पुण्य प्रतिक्षण नष्ट होता रहता है।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'गुरुदेव! इसमें सन्देह नहीं कि मेरे कुकर्मसे ही मुझे ऐसी दुर्दशा प्राप्त हुई है। अब आप इन देवर्षियोंके साथ शीघ्र ही अमरावतीपुरीको पधारें और देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आपके मनमें जो अच्छे प्रतीत हों, उन्हें इन्द्र बना लें। मैं तो इस ब्रह्महत्यासे आवृत्त होनेके कारण अब मरे हुएके ही समान हूँ।' इन्द्रके यों कहनेपर बृहस्पतिको आगे करके सम्पूर्ण देवता तुरंत अमरावतीपुरीमें लौट आये और इन्द्रका जो विचार था, वह सब शचीके सामने उन्होंने यथार्थरूपसे कह सुनाया। सब देवता बार-बार विचार करने लगे कि अब इस राज्यका संचालन करनेके लिये हमें क्या करना चाहिये। इसी समय अमित तेजस्वी देवर्षि नारद इच्छानुसार घूमते हुए वहाँ आ पहुँचे और देवताओंद्वारा पूजित होकर बोले—'देवगण! आपलोग अनमने कैसे हो रहे हैं?' उनके पूछनेपर देवताओंने इन्द्रकी सारी करतूतें कह सुनायीं। तब नारदजी बोले—'देवताओ! इन्द्रके ये सारे चरित्र मैंने पहलेसे ही सुन रखे हैं, अब तो इस महान् पापके कारण इन्द्रकी सारी श्रेष्ठता चली गयी। आप सब देवता सर्वज्ञ हैं, तपस्या और पराक्रमसे सम्पन्न हैं; अतः आपलोग चंद्रवंशी राजा नहुषको इन्द्र बना लें। इस राज्यपर उन्हें शीघ्र ही बिठा लेना चाहिये। महात्मा नहुषने यज्ञकी दीक्षा लेकर निन्यानबे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये हैं।'

सब देवताओं और महर्षियोंने इन्द्रका राज्य नहुषको सौंप दिया। तबसे अगस्त्य आदि सभी महर्षि नहुषकी सेवामें उपस्थित रहने लगे। गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, विद्याधर, महानाग, सुपर्ण और पक्षी आदि जो भी स्वर्गवासी प्राणी थे, वे सब नहुषकी सेवा करने लगे।

इस प्रकार उत्तम कलाओंसे सुशोभित तथा सम्पूर्ण देवताओंसे सुपूजित राजा नहुष जब स्वर्गलोकके अधिपति हो गये, तब उन्हें महान् कामानल सन्तप्त करने लगा। राजा नहुषने पूछा—

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३१

'देवताओ! क्या कारण है कि अभीतक इन्द्राणी मेरे समीप नहीं आ रही हैं? उन्हें शीघ्र बुलाओ।'

नहुषकी यह बात सुनकर उदार बुद्धिवाले बृहस्पतिजी शचीके भवनमें गये और बोले—'कल्याणी! इन्द्रके दुष्कर्मसे विवश होकर यहाँका राज्य सँभालनेके लिये हमलोग नहुषको ले आये हैं। परंतु तुम इस कार्यके विरुद्ध जान पड़ती हो। तभी तो अबतक वहाँ उपस्थित नहीं हुईं।' शचीने पापहीन गुरु बृहस्पतिजीसे हँसकर कहा—'नहुष मुझे प्राप्त करनेयोग्य नहीं है; आप स्वयं ही तत्त्वतः विचार करके देखें, क्या वह मुझे प्राप्त करनेका अधिकारी है? मैं परायी स्त्री हूँ; यदि वह मुझे पानेकी अभिलाषा करता है तो उस अज्ञानीसे कहिये—जो वाहन बनाने योग्य न हो, ऐसे वाहनपर बैठकर वह यहाँ आवे; तब मुझे प्राप्त कर सकता है।' 'तथास्तु' कहकर बृहस्पतिजी शीघ्रतापूर्वक लौट गये और कामसन्तप्त नहुषसे शचीदेवीकी कही हुई सब बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं। नहुष कामसे मोहित हो रहे थे। उन्होंने 'ठीक है' यों कहकर शचीदेवीकी शर्त स्वीकार कर ली। फिर वे अपनी बुद्धिद्वारा विचार करने लगे कि 'वाहन न बनानेयोग्य ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो प्रशंसनीय मानी जाती है। तदनन्तर उन्होंने यह निश्चय किया कि तपस्वी ब्राह्मण ही ऐसे हैं, जो वाहन बनानेके योग्य नहीं हैं। अतः उन्हींको आज अपना वाहन बनाता हूँ। आज इन्द्राणीको प्राप्त करनेके लिये दो तपस्वी ब्राह्मणोंसे वाहनका काम लूँ, ऐसी अभिलाषा मेरे मनमें उत्पन्न हुई है।' इस निश्चयके अनुसार काममोहित नहुषने दो ब्राह्मणोंको पालकी दे दी और स्वयं उस पालकीमें बैठकर बोले—'सर्प-सर्प'—शीघ्र चलो, शीघ्र चलो। नहुषके 'सर्प-सर्प' कहनेसे कुपित हुए एक तपस्वी ब्राह्मणने उन्हें शाप देकर नीचे गिरा दिया। नहुष अजगर होकर स्वर्गसे नीचे गिर पड़े। वे ऊँचे पदको पाकर भी ब्राह्मणके दुर्लङ्घ्य शापसे तिर्यग्योनिमें पड़ गये। जैसी दशा राजा नहुषकी हुई, वैसी ही उनके-जैसे आचरण करनेवाले सबकी होती है। जो राजमद पाकर उन्मत्त हो उठते हैं, उनपर भारी विपत्ति आती है। जो राजमदसे अन्धे, दुराचारी, कामी तथा विषयोंमें रचे-पचे रहनेवाले हैं, वे ब्राह्मणोंका अपमान करके अपवित्र नरकमें पड़ते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि इहलोक और परलोकमें सुख पानेकी इच्छा होनेपर वह सर्वथा प्रयत्न करके उत्तम पदको पाकर कभी प्रमादमें न पड़े*—सदा अपने कर्तव्यके प्रति सावधान रहे। वैसा अनुचित कर्म करनेके कारण ही राजा नहुष महाभयानक जंगलमें सर्प हुए।

ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होनेपर देवलोकमें फिर अराजकता छा गयी। सब देवता उस समय विस्मितचित्त होकर कहने लगे—अहो, इस राजाने बड़ा भारी कष्ट पाया। इस दुरात्माके लिये न तो मर्त्यलोकमें स्थान रहा, न स्वर्गलोकमें। महापुरुषोंकी अवहेलना करनेसे इसका सारा पुण्य एक ही क्षणमें भस्म हो गया। अब पृथ्वीपर दूसरा कोई यज्ञकर्ता राजा नहीं दिखायी देता था, जिसका इन्द्रके सिंहासनपर अभिषेक किया जा सके। इसलिये सब देवता, ऋषि, नाग, गन्धर्व, यक्ष, पक्षी, किन्नर, चारण, विद्याधर, असुरगण, अप्सराएँ तथा मनुष्य चिन्तित हो गये।

तदनन्तर शचीदेवीने धर्म और अर्थयुक्त वाणीमें कहा—'गुरुदेव बृहस्पति तथा अन्य देवताओ! चिन्ता न करो; तुम सब लोगोंको अब वहीं जाना चाहिये, जहाँ हमारे स्वामी रहते हैं।' इन्द्राणीकी बात सुनकर बृहस्पतिजी देवताओंके साथ ब्रह्महत्या-पीड़ित इन्द्रके समीप गये। जलाशयके


* ये मदान्धा दुराचाराः कामुका विषयात्मकाः। विप्राणामवमानेन पतन्ति नरकेऽशुचौ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पदं प्राप्य विचक्षणैः। अप्रमत्तैर्नर्भाव्यमिहामुत्र च लब्धये॥
(स्क० पु०, मा० के० १५।८७-८८)

३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

किनारे पहुँचकर देवताओंने इन्द्रको पुकारा। इन्द्रने जलमें खड़े होकर देवताओंपर दृष्टिपात किया और कहा—'अब तुमलोग यहाँ क्यों आये हो? मैं तो पापसे पीड़ित हूँ, ब्रह्महत्यामें डूबा हुआ हूँ और यहाँ अकेले ही तपस्या करते हुए इस जलमें निवास करता हूँ।' उनकी बात सुनकर देवता विह्वल हो गये और बोले—'देवराज! विश्वकर्माके पुत्र विश्वरूपने ऐसा यज्ञ कराना आरम्भ किया था, जिससे देवता और तपस्वी ऋषि विनाशको प्राप्त हो जाते। इस कारण परोपकारकी दृष्टिसे ही आपने उसका वध किया था। इसलिये हम सब लोग आपको अमरावती ले चलनेके लिये आये हैं।'

देवताओंमें जब इस प्रकार बातचीत हो रही थी, ब्रह्महत्या भी तुरंत बोल उठी—'मैं देवराज इन्द्रको अमरावती जानेसे रोकती हूँ।' यह सुनकर बृहस्पतिने सहसा उसको उत्तर दिया—'ब्रह्महत्ये! हम तुम्हारे निवासके लिये दूसरे स्थान नियत करेंगे।' कार्यकी गुरुताको दृष्टिमें रखकर देवताओंने उस समय ब्रह्महत्याको शान्त कर दिया। फिर सबने विचार करके ब्रह्महत्याको चार भागोंमें बाँटा। तत्पश्चात् देवताओंने सबसे पहले पृथ्वीसे कहा—'देवि! देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये इन्द्रकी ब्रह्महत्याका एक अंश तुम्हें ग्रहण करना चाहिये।' देवताओंकी यह बात सुनकर पृथ्वी काँप उठी और बोली—'आप लोग ही विचार करें, मैं ब्रह्महत्याका अंश कैसे ग्रहण कर सकती हूँ? मैं सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाली तथा विश्वका भरण-पोषण करनेवाली हूँ। मैं इस पापपंकमें डूबकर अधिक अपवित्र हो जाऊँगी।' पृथ्वीका यह वचन सुनकर बृहस्पतिजीने कहा—'सुन्दरि! तुम भय मत करो। तुम तो सर्वथा निष्पाप हो। जिस समय यदुकुलमें भगवान् वासुदेव अवतार लेंगे, उस समय उनके चरणोंके स्पर्शसे यह ब्रह्म-हत्याका आंशिक पाप भी निवृत्त हो जायगा और तुम पूर्णतः निष्पाप होकर रहोगी।' उनके यों कहनेपर पृथ्वीने उनकी आज्ञाका पालन किया।

इसके बाद सब देवताओंने वृक्षोंको बुलाकर कहा—'आपलोग देवकार्यकी सिद्धिके लिये ब्रह्महत्याका एक अंश ग्रहण करें।' तब वृक्षोंने वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'यदि हम सब लोग ब्रह्महत्याके पापसे लिप्त हो जायँगे तो सम्पूर्ण महात्मा भी ब्रह्महत्यायुक्त होकर पापी हो जायँगे।' यह सुनकर बृहस्पतिजीने कहा—'तुमलोग चिन्ता न करो, इन्द्रके प्रसादसे तुमलोग काटे जानेपर भी अनेक अंशोंमें विभक्त हो शाखा और डालियोंसे सम्पन्न हो जाओगे और इस प्रकार सदा शुद्ध बने रहोगे।' बृहस्पतिके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सब वृक्षोंने उस आंशिक ब्रह्महत्याको आपसमें बाँट लिया।

तदनन्तर देवताओंने जलोंको बुलाकर कहा—'तुमलोग भी देवकार्यकी सिद्धिके लिये इस समय ब्रह्महत्याका एक अंश स्वीकार करो।' तब सब जल एकत्र हो बृहस्पतिजीसे बोले—'जो कोई भी पाप या दुष्कर्म हैं, वे हमारे सम्पर्क और सम्बन्धसे दूर होते हैं। हमारे द्वारा स्नान, शौच एवं हमारा पान आदि करनेसे सम्पूर्ण पापाक्रान्त प्राणी पवित्र हो जाते हैं। (ब्रह्महत्यासे अभिभूत होनेपर हमारी यह शक्ति नष्ट हो जायगी!)' उनकी बात सुनकर बृहस्पतिने उत्तर दिया—'तुम दुस्तर पापसे भय न करो; मैं वरदान देता हूँ—'चराचर जगत्में निवास करनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको जल पवित्र करे।' उनके यों कहनेपर जलने ब्रह्महत्याका तीसरा अंश ग्रहण किया। इसके बाद बृहस्पतिजीने स्त्रियोंको बुलाकर कहा—'तुमलोग भी इस समय सब कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्रह्महत्याका शेष अंश ग्रहण करो।' देवगुरुका यह वचन सुनकर सब स्त्रियाँ बोलीं—'भगवन्! सम्पूर्ण स्त्रियाँ धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुई हैं। यदि नारी पापाचार करे तो उस पापसे अनेक पक्ष (पिता, नाना तथा पतिके कुल) लिप्त होते हैं—ऐसी वेदोंकी आज्ञा है; क्या आपने ऐसी कोई बात

  • माहे‌श्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३३
नहीं सुनी है ? फिर स्वयं विचार कर लें, हमारा क्या कर्तव्य है।' स्त्रियोंके यों कहनेपर बृहस्पतिजीने वरदान दिया—'देवियो! तुम सब इस पापसे भय न करो, तुम्हारे द्वारा स्वीकृत ब्रह्महत्याका यह अंश भावी पीढ़ियोंके लिये तथा दूसरोंके लिये भी शुभ फल देनेवाला होगा। तुम सबको इच्छानुसार काम-सुख प्राप्त होगा।'<br><br>इस प्रकार देवताओंने ब्रह्महत्याके चार भागकिये और वे अंश तत्काल ही पूर्वोक्त समुदायोंमें स्थित हो गये। उस समय इन्द्रका पाप सर्वथा नष्ट हो गया। अतः देवताओं और ऋषियोंने देवपुरीमें शचीसहित इन्द्रका पुनः अभिषेक किया। महात्मा इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं, महानुभावों, मुनीश्वरों तथा सिद्धगणोंके साथ पुनः लोकपाल-पदपर प्रतिष्ठित हो गये। उस समय इन्द्रलोकके सम्पूर्ण निवासियोंके मनमें महान् उत्साह और अपार आनन्द छा गया।

## विश्वकर्माके तपसे वृत्रासुरकी उत्पत्ति तथा दधीचिद्वारा देवताओंको अस्थिदान

लोमशजी कहते हैं—इसी बीचमें इन्द्रका महान् उत्सव देखकर पुत्र-शोकसे पीड़ित विश्वकर्माके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। वे बहुत खिन्न होकर अत्यन्त उग्र तपस्या करनेके लिये गये। उस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर लोकपितामह ब्रह्माजीने प्रजापति त्वष्टासे कहा—'सुव्रत! तुम कोई वर माँगो।' तब त्वष्टाने अत्यन्त हर्षमें भरकर वर माँगा—'भगवन्!

हमें ऐसा पुत्र दीजिये, जो देवताओंके लिये भयंकर हो तथा सम्पूर्ण देवताओं और इन्द्रको भी शीघ्र मार डालनेकी इच्छा रखता हो।' 'तथास्तु' कहकर परमेष्ठी ब्रह्माने वरदान दे दिया। उस वरदानसे तत्काल ही वहाँ एक बड़ा अद्भुत दैत्य प्रकट हुआ, जो वृत्र नामसे प्रसिद्ध था। वह असुर प्रतिदिन सौ धनुष (चार सौ हाथ) बढ़ता था। पूर्वकालमें अमृत-मन्थनके समय देवताओंने जिन दैत्योंको मार डाला था और शुक्राचार्यने पुनः जिन्हें जीवित कर दिया था, उनमेंसे राजा बलिको छोड़कर शेष सभी दैत्य पातालसे निकलकर वृत्रासुरके पास चले आये। पातालसे आये हुए असुरोंके साथ वृत्रासुरने अकेले ही अपने विशाल शरीरद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको ढक लिया। उस समय उससे पीड़ित हुए तपस्वी ऋषि तुरंत ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपनी सारी कष्ट-कथा कह सुनायी। तब ब्रह्माजीने गन्धर्वों, मरुद्गणों तथा इन्द्रादि देवताओंसे, विश्वकर्मा क्या करना चाहते हैं, यह बताया और कहा—'विश्वकर्माने बड़ी भारी तपस्या करके तुम सब लोगोंका वध करनेके लिये अत्यन्त तेजस्वी वृत्रासुरको उत्पन्न किया है। वह सब दैत्योंका महान् अधीश्वर बना हुआ है। अब तुमलोग ऐसा प्रयत्न करो, जिससे वह तुम्हारे द्वारा मारा जा सके।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि देवताओंने कहा—'भगवन्! जब हमारे ये इन्द्र ब्रह्महत्यासे मुक्त होकर स्वर्गके सिंहासनपर बिठाये गये, उस समय हमलोगोंके
३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

द्वारा एक न करनेयोग्य कार्य हो गया है। अब उस भूलके दुष्परिणामसे पार पाना हमारे लिये कठिन है। भूल यह हुई कि हम अज्ञानियोंने अपने अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र महर्षि दधीचिके आश्रममें रख दिये थे। उन शस्त्रोंके बिना इस समय हम क्या कर सकते हैं?'

तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवता दधीचिके आश्रमपर गये और उनसे बोले—'देव! हमने पूर्वकालमें जो अस्त्र-शस्त्र यहाँ रख दिये थे, वे सब हमें दे दिये जायें।' यह सुनकर दधीचिने हँसते हुए कहा—'बड़भागी देवताओ! आपके उन अस्त्रोंको बहुत कालसे यहाँ व्यर्थ रखा हुआ जानकर मैंने सबको पी लिया।' उनकी यह बात सुनकर देवता बहुत चिन्तित हुए और पुनः ब्रह्माजीके पास लौटकर मुनिकी सब बातें कह सुनायीं। तब ब्रह्माजीने सबके अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये देवताओंसे कहा—'तुम लोग दधीचिसे उनकी हड्डियाँ ही माँगो। माँगनेपर वे देंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर इन्द्र बोले—'वृत्रासुर नामक जो दैत्यराज है, उसे विश्वकर्माने उत्पन्न किया है (अतः वह ब्राह्मण ही है); यद्यपि वह निरन्तर अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है, तथापि ब्राह्मण होनेके कारण मैं उसका वध कैसे कर सकता हूँ।' इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने अर्थशास्त्रको प्रधानता देनेवाली युक्तिसे उन्हें समझाया और इस प्रकार कहा—'देवराज! यदि कोई आततायी मारनेकी इच्छासे आ रहा हो तो वह तपस्वी ब्राह्मण ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालनेकी इच्छा करे। ऐसा करनेसे वह ब्रह्महत्यारा नहीं हो सकता।'* ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन्! दधीचिके वधसे निश्चय ही मेरा पतन हो जायगा। उस ब्राह्मणकी हत्यासे सभी तरहके महान् पाप अपनेको लगेंगे। अतः हमें ब्राह्मणोंका अनादर नहीं करना चाहिये। परम धर्म अदृष्टरूप है। विज्ञ पुरुषको उचित है कि वह श्रेष्ठ विधिके अनुसार मनोयोगपूर्वक उस धर्मका पालन करे।'

इन्द्रके निःस्पृह वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले—'देवेन्द्र! तुम अपनी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करो और शीघ्र ही दधीचिके पास जाओ। कार्यकी गुरुताको दृष्टिमें रखकर दधीचिकी हड्डियाँ माँगो।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञा स्वीकार की और गुरु बृहस्पति तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ दधीचिके मंगलमय आश्रमपर गये। वह आश्रम नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे संयुक्त होनेपर भी पारस्परिक वैर-भावसे रहित था। वहाँ बिल्ली और चूहे एक-दूसरेको देखकर प्रसन्न होते थे। एक ही स्थानपर सिंह, हथिनियाँ, हाथीके बच्चे और हाथी परस्पर मिलकर नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते थे। नेवलोंके साथ मिले हुए सर्प एक-दूसरेसे आनन्दका अनुभव करते थे। ऐसी-ऐसी अनेक आश्चर्यभरी बातें उस आश्रमपर दिखायी देती थीं। दधीचि मुनि अपने उत्तम तेजसे सूर्य अथवा दूसरे अग्निदेवकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सुवर्चा भी थीं। जैसे सावित्रीके साथ ब्रह्माजी शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे मुनिश्रेष्ठ दधीचि भी अपनी धर्मपत्नीके साथ सुशोभित थे। सम्पूर्ण देवताओंने मुनिका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुने! हमें पहलेसे ही विदित है कि आप तीनों लोकोंमें सबसे बड़े दाता हैं।' देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि बोले—'श्रेष्ठ देवगण! आपलोग जिस कामके लिये आये हैं, उसे बतावें। आपकी माँगी हुई वस्तु मैं अवश्य दूँगा, इसमें सन्देह नहीं है। मेरी बात कभी मिथ्या नहीं होती।' तब अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी इच्छावाले सब देवता एक साथ बोले—'ब्रह्मन्! हमलोग भयभीत होकर आपके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ


* आततायिनमायान्तं ब्राह्मणं वा तपस्विनम्। हन्तुकामं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्॥
(स्क० पु०, मा० के० १६।७३)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *३५

आये हैं।' उनकी ये बातें सुनकर दधीचिने कहा—'बताइये, आपलोगोंके लिये क्या देना है?' यों कहकर महर्षिने अपनी पत्नीको आश्रमके भीतर भेज दिया। तदनन्तर देवता बोले—'विप्रवर! आप अपने शरीरकी हड्डियाँ हमें अर्पित करें, जिनसे दैत्योंका संहार हो।' महर्षिने कहा—'मैंने हड्डियाँ आपको दे दीं।' तब देवता बोले—'भगवन्! आपके जीते-जी इन हड्डियोंको हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?' ब्रह्मर्षिने हँसकर उत्तर दिया—'बस, क्षणभर खड़े रहिये, मैं अभी अपना शरीर त्याग देता हूँ।' ऐसा कहकर दधीचिने समाधि लगा ली। उस परम समाधिके द्वारा अपना शरीर त्यागकर वे तत्काल उस ब्रह्मधाममें चले गये, जहाँसे फिर इस संसारमें लौटना नहीं पड़ता। इस प्रकार भगवान् शंकरके प्रिय भक्त मुनिवर दधीचि परोपकारके लिये शरीर त्यागकर ब्रह्मपदको प्राप्त हुए।


## पिप्पलादका जन्म, सुवर्चाका पतिलोकगमन, देवासुर-संग्राममें नमुचिका वध, प्रदोषव्रतकी विधि और उद्यापन, इन्द्र और वृत्रासुरका युद्ध तथा इन्द्रकी विजय

लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर महर्षि दधीचिको ब्रह्मलीन हुआ देख इन्द्रने सुरभिको बुलाकर कहा—'तुम दधीचिके शरीरको चाटो।' 'बहुत अच्छा' कहकर सुरभिने तत्काल दधीचिके शरीरको चाटना आरम्भ किया। उसने सब ओरसे चाटकर उस शरीरको मांसरहित कर दिया। तब देवताओंने वे हड्डियाँ ले लीं और उनके शस्त्र बनाये। उनकी पीठकी हड्डीसे 'वज्र' बना और शिरसे 'ब्रह्मशिर' नामक अस्त्र तैयार किया गया। ऋषिके शरीरकी जो और भी बहुत-सी हड्डियाँ थीं, उन्हें भी उस समय देवताओंने ग्रहण कर लिया। इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करके महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हुए देवता वृत्रासुरको मारनेके लिये उद्यत हो बड़ी उतावलीके साथ स्वर्गलोकमें गये।

तत्पश्चात् महर्षि दधीचिकी पत्नी सुवर्चा देवी, जिन्हें देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये महर्षिने आश्रमके भीतर भेज दिया था, वहाँ पुनः लौटकर आयीं और वहाँ जो कुछ हुआ था वह सब उन्होंने अपनी आँखोंसे देखा—'यह सब देवताओंकी ही करतूत है' ऐसा जानकर उस सती-साध्वी सुवर्चाके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अत्यन्त रुष्ट होकर शाप देते हुए कहा—'देवता आजसे सन्तानहीन रहें। तपस्विनी सुवर्चाने इस प्रकार देवताओंको शाप दे दिया और स्वयं एक पीपल-वृक्षके मूल भागमें बैठकर रोदन करने लगीं। इसी समय उनके उदरसे महात्मा दधीचिके पुत्र महातेजस्वी पिप्पलाद प्रकट हुए। माता सुवर्चा प्यासी आँखोंसे पुत्र पिप्पलादकी ओर देखती हुई हँसकर बोलीं—'महाभाग! तुम दीर्घकालतक इस वृक्षके ही समीप रहना। तुम मेरे आशीर्वादसे शीघ्र ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करोगे।' अपने पुत्रके प्रति ऐसा कहकर साध्वी सुवर्चा श्रेष्ठ समाधि लगाकर पतिके समीप चली गयीं। इस प्रकार उन्होंने पतिके साथ सत्यलोक प्राप्त किया।

इधर वे देवतालोग अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करके युद्धके लिये उत्सुक हो दैत्योंके सामने गये। इन्द्र आदि देवता महान् बल और पराक्रमसे युक्त थे। वे गुरु बृहस्पतिको आगे करके भूमिपर आकर मध्य देशमें ठहरे। उन सबके पास बड़े उत्तम शस्त्र थे। इन्द्र आदि देवताओंको आया हुआ सुनकर महातेजस्वी वृत्रासुर दैत्यवृन्दके साथ उनके समीप गया। महेन्द्रने उस समरांगणमें महादैत्य वृत्रासुरको देखा। देवताओं और दानवोंका एक-दूसरेकी ओर दृष्टिपात बड़ा अद्भुत था। उनमें वैर-भाव बहुत बढ़ा हुआ था। वे एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रोधमें भरकर

३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अद्भुत स्वरमें गर्जना करने लगे। देवताओं और दानवोंके उस युद्धमें बजाये जानेवाले भयानक बाजे बड़ी गम्भीर ध्वनिमें सुनायी देते थे। उस युद्धमें समस्त चराचर जगत् महान् भयके कारण अचेत हो गया। उस समय नमुचि नामक दैत्य इन्द्रके साथ युद्ध करने लगा। देवराज इन्द्रने बड़े वेगसे उस दैत्यपर वज्रका प्रहार किया, परंतु वज्रके आघातसे भी नमुचिका एक रोम भी न टूट सका। तब इन्द्रने नमुचिपर गदा मारी, किंतु वह गदा भी चूर-चूर हो गयी। यह देख इन्द्रने एक बहुत बड़े शूलसे उस दैत्यपर प्रहार किया। नमुचिके अंगका स्पर्श होते ही उस शूलके सैकड़ों टुकड़े हो गये। इसी प्रकार नमुचिने भी हँसते हुए अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे देवताओंको मारा, परंतु इन्द्रपर प्रहार नहीं किया। उस समय इन्द्र मौन होकर बड़ी भारी चिन्तामें डूब गये। इसी बीचमें उस महाभयानक संग्रामके भीतर इन्द्रको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—‘महेन्द्र! यह दैत्य देवताओंके लिये बड़ा भयंकर और घोरतर है। इसके लिये जलसे निकला हुआ फेन ही दुर्लङ्घ्य शस्त्र है। अतः उसीके द्वारा इस महान् असुरका शीघ्र संहार करो। दूसरे किसी शस्त्रसे आघात करनेपर यह असुर कभी मारा नहीं जा सकता।’ इस मंगलमयी दैवी वाणीको सुनकर अनन्त पराक्रमवाले इन्द्र समुद्रके तटपर गये और फेन प्राप्त करनेके लिये प्रयास करने लगे। इन्द्रको समुद्रतटपर आया हुआ देख नमुचि क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और शूलसे आघात करके उन्हें कटुवचन सुनाने लगा। तब इन्द्रने भी क्रोधमें भरकर अद्भुत फेन ग्रहण किया और उस फेनका प्रहार करके महादैत्य नमुचिको मार गिराया। इस प्रकार नमुचिके मारे जानेपर सब देवता और ऋषि साधुवाद देते हुए इन्द्रके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे।

इसी समय महातेजस्वी वृत्रासुर इन्द्रके समीप आया। वृत्रासुरको देखकर सब देवता और मनुष्य महान् भयसे युक्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े। तब प्रतापी इन्द्र हाथमें वज्र लिये ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। सब देवता प्रतापी लोकपालोंके साथ युद्धके लिये एकत्र हो गये; परंतु वृत्रासुरको देखते ही सब लोकपाल अपने स्वामी इन्द्रसहित भयभीत हो गये। अतः वे भगवान् शिवकी शरणमें गये। महेन्द्र विजयके इच्छुक थे। अतः उन्होंने गुरु बृहस्पतिके बताये अनुसार बड़े विश्वासके साथ तत्काल ही विधिपूर्वक शिवलिंगका पूजन किया। फिर उदार बुद्धिवाले बृहस्पतिजी इन्द्रसे इस प्रकार बोले—‘‘देवराज! कार्तिकमासके शुक्ल पक्षमें शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी मिले तो यह समझना चाहिये कि मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। उस दिन प्रदोषकालमें सब कामनाओंकी सिद्धिके लिये लिंगरूपधारी भगवान् सदाशिवका पूजन करना चाहिये। दोपहरके समय स्नान करके तिल और आँवलेके साथ गन्ध, पुष्प और फल आदिके द्वारा शिवजीकी पूजा करे। फिर प्रदोषकालमें स्थावर लिंगका पूजन करे। गाँवसे बाहर जो शिवलिंग स्थित है, उसके पूजनका फल ग्रामकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। उससे भी सौगुना अधिक माहात्म्य उस शिवलिंगके पूजनका है, जो वनमें स्थित हो। वनकी अपेक्षा भी सौगुना पुण्य पर्वतपर स्थित शिवलिंगके पूजनका है। पर्वतीय शिवलिंगकी अपेक्षा तपोवनमें स्थित शिवलिंगके पूजनका फल दस हजार गुना अधिक है। वह महान् फलदायक है। अतः विद्वानोंको इस विभागके अनुसार शिवलिंगका पूजन करना चाहिये और तडाग आदि तीर्थोंमें विधिवत् स्नान आदि करना चाहिये। मिट्टीके पाँच पिण्ड निकाले बिना किसी बावड़ीमें स्नान करना शुभकारक नहीं है। कुएँमेंसे अपने हाथसे जल निकालकर स्नान नहीं करना चाहिये (रस्सी आदिकी सहायतासे किसी पात्रमें जल निकालकर ही स्नान करना चाहिये)। पोखरेमेंसे मिट्टीके दस पिण्ड निकालकर ही स्नान करना चाहिये। नदीमें स्नान करना सबसे उत्तम है, यदि कोई बड़ी नदी मिल जाय

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३७


तो उसमें नहाना और भी उत्तम है। सब तीर्थोंमें गंगाका स्नान सर्वोत्तम है।

'प्रदोषकालमें स्नान करके मौन रहना चाहिये। भगवान् सदाशिवके समीप एक हजार दीपक जलाकर प्रकाश करना चाहिये। इतना सम्भव न हो तो सौ अथवा बत्तीस दीपोंसे भी भगवान्‌के समीप प्रकाश किया जा सकता है। शिवकी प्रसन्नताके लिये घीसे दीपक जलाना चाहिये। इसी प्रकार फल, धूप, नैवेद्य, गन्ध और पुष्प आदि षोडश उपचारोंसे लिंगरूपी भगवान् सदाशिवकी प्रदोषकालमें पूजा करनी चाहिये। वे भगवान् सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले हैं। यदि जलहरीका जल न उलाँघना पड़े तो पूजनके पश्चात् भगवान् शिवकी एक सौ आठ परिक्रमा करनी चाहिये। फिर यत्नपूर्वक एक सौ आठ बार ही नमस्कार भी करने चाहिये। इस प्रकार परिक्रमा और नमस्कारसे भगवान् सदाशिवको प्रसन्न करना उचित है। तत्पश्चात् सौ नामोंसे विधिपूर्वक भगवान् रुद्रकी स्तुति करनी चाहिये। रुद्र, नील, भीम और परमात्माको नमस्कार है! कपर्दी (जटाजूटधारी), सुरेश्वर (देवताओंके स्वामी) तथा आकाशरूप केशवाले श्रीव्योमकेशको नमस्कार है! जो अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेके कारण वृषभध्वज हैं, उमाके साथ विराजमान होनेसे सोम हैं, चन्द्रमाके भी रक्षक होनेसे सोमनाथ हैं, उन भगवान् शम्भुको नमस्कार है! सम्पूर्ण दिशाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेके कारण जो दिगम्बर कहलाते हैं, भजनीय तेजस्वरूप होनेसे जिनका नाम भर्ग है, उन उमाकान्तको नमस्कार है! जो तपोमय, भव्य (कल्याणरूप), शिवश्रेष्ठ, विष्णुरूप, व्यालप्रिय (सर्पोंको प्रिय माननेवाले), व्याल (सर्पस्वरूप) तथा सर्पोंके पालक हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है! जो महीधर (पृथ्वीको धारण करनेवाले), व्याघ्र (विशेषरूपसे सूँघनेवाले), पशुपति (जीवोंके पालक), त्रिपुरनाशक, सिंहस्वरूप, शार्दूलरूप और यज्ञमय हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जो मत्स्यरूप, मत्स्योंके स्वामी, सिद्ध तथा परमेष्ठी हैं, जिन्होंने कामदेवका नाश किया है, जो ज्ञानस्वरूप तथा बुद्धि-वृत्तियोंके स्वामी हैं, उनको नमस्कार है! जो कपोत (ब्रह्माजी जिनके पुत्र हैं), विशिष्ट (सर्वश्रेष्ठ), शिष्ट (साधुपुरुष) तथा सर्वात्मा हैं, उन्हें नमस्कार है! जो वेदस्वरूप वेदको जीवन देनेवाले तथा वेदोंमें छिपे हुए गूढ़ तत्त्व हैं, उनको नमस्कार है! जो दीर्घ, दीर्घरूप, दीर्घार्थस्वरूप तथा अविनाशी हैं, जिनमें ही सम्पूर्ण जगत्‌की स्थिति है तथा जो सर्वव्यापी व्योमरूप हैं, उन्हें नमस्कार है! जो गजासुरके महान् काल हैं, जिन्होंने अन्धकासुरका विनाश किया है, जो नील, लोहित और शुक्लरूप हैं तथा चण्ड-मुण्ड नामक पार्षद जिन्हें विशेष प्रिय हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है! जिनको भक्ति प्रिय है, जो द्युतिमान् देवता हैं, ज्ञाता और ज्ञान हैं, जिनके स्वरूपमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो महेश, महादेव तथा हर नामसे प्रसिद्ध हैं, उनको नमस्कार है! जिनके तीन नेत्र हैं, तीनों वेद और वेदांग जिनके स्वरूप हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है! नमस्कार है! जो अर्थ (धन), अर्थरूप (काम) तथा परमार्थ (मोक्षरूप) हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है! जो सम्पूर्ण विश्वकी भूमिके पालक, विश्वरूप, विश्वनाथ, शंकर, काल तथा कालावयवरूप हैं, उन्हें नमस्कार है! जो रूपहीन, विकृत रूपवाले तथा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, उनको नमस्कार है! जो श्मशान-भूमिमें निवास करनेवाले तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं, उनको नमस्कार है! जो ईश्वर होकर भी भयानक भूमिमें शयन करते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरको नमस्कार है! जो दुर्गम हैं, जिनका पार पाना अत्यन्त कठिन है तथा जो दुर्गम अवयवोंके साक्षी अथवा दुर्गारूपा पार्वतीके सब अंगोंका

३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दर्शनं करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है! जो लिंगरूप, लिंग (कारण) तथा कारणोंके भी अधिपति हैं, उन्हें नमस्कार है! महाप्रलयरूप रुद्रको नमस्कार है! प्रणवके अर्थभूत ब्रह्मरूप शिवको नमस्कार है! जो कारणोंके भी कारण, मृत्युंजय तथा स्वयम्भू-रूप हैं, उन्हें नमस्कार है! हे श्रीत्र्यम्बक ! हे नीलकण्ठ ! हे शर्व ! हे गौरीपते ! आप सम्पूर्ण मंगलोंके हेतु हैं; आपको नमस्कार है!' १

'प्रदोष-व्रत करनेवालेको महादेवजीके इन सौ नामोंका पाठ अवश्य करना चाहिये। महामते इन्द्र ! इस प्रकार तुमसे मैंने शिव-प्रदोष-व्रतकी विधि बतलायी है। महाभाग ! शीघ्रतापूर्वक इस व्रतका पालन करो। तत्पश्चात् युद्ध करना। भगवान् शिवकी कृपासे तुम्हें विजय आदि सब कुछ प्राप्त होगा।'

'एक समयकी बात है, राजा चित्ररथ विमानपर बैठकर नाना प्रकारके द्वीपोंका दर्शन करते हुए भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलास पर्वतपर गया। वहाँ उसने परम अद्भुत एवं अनुपम छबिवाले भगवान् शंकरके दर्शन किये। वे अपने आधे अंगमें पार्वती देवीको बिठाकर शोभा पा रहे थे। कर्पूरके समान गौरवर्ण, कमलनयन भगवान् शिवको पार्वती देवीके साथ देखकर राजा चित्ररथने उपहासपूर्वक कहा—'शम्भो ! संसारमें जो विषयी मनुष्य आदि हैं तथा स्त्रियोंके वशीभूत रहनेवाले जो दूसरे-दूसरे लोग हैं, वे तथा हम-जैसे अज्ञानी जीव भी जनसमुदायमें संकोचवश स्त्री-सेवन नहीं करते।' यह सुनकर गिरिराजनन्दिनी उमाने कहा—'अरे दुरात्मन् ! रे मूढ़ ! तूने मेरे साथ बैठे हुए भगवान् शिवका उपहास किया है। अतः इस कर्मका फल तू शीघ्र ही देखेगा। जो समतायुक्त चित्तवाले साधु पुरुषोंका उपहास करता है, वह देवता हो या मनुष्य, उसे अधमसे भी अधम जानना चाहिये। २ तू देवता और द्विज दोनोंकी श्रेणीसे बहिष्कृत है। अपनेको बड़ा ज्ञानी माननेवाले तुझ अधमको आज मैं दैत्य बनाये देती हूँ।'


१. नमो रुद्राय नीलाय भीमाय परमात्मने।कपर्दिने सुरेशाय व्योमकेशाय वै नमः॥
वृषभध्वजाय सोमाय सोमनाथाय शम्भवे।दिगम्बराय भर्गाय उमाकान्ताय वै नमः॥
तपोमयाय भव्याय शिवश्रेष्ठाय विष्णवे।व्यालप्रियाय व्यालाय व्यालानां पतये नमः॥
महीधराय व्याघ्राय पशूनां पतये नमः।पुरान्तकाय सिंहाय शार्दूलाय मखाय च॥
मीनाय मीननाथाय सिद्धाय परमेष्ठिने।कामान्तकाय बुद्धाय बुद्धीनां पतये नमः॥
कपोताय विशिष्टाय शिष्टाय सकलात्मने।वेदाय वेदजीवाय वेदगुह्याय वै नमः॥
दीर्घाय दीर्घरूपाय दीर्घार्थायविनाशिने।नमो जगत्प्रतिष्ठाय व्योमरूपाय वै नमः॥
गजासुरमहाकालायान्धकासुरभेदिने ।नीललोहितशुक्लाय चण्डमुण्डप्रियाय च॥
भक्तिप्रियाय देवाय ज्ञात्रे ज्ञानाव्ययाय च।महेशाय नमस्तुभ्यं महादेव हराय च॥
त्रिनेत्राय त्रिवेदाय वेदाङ्गाय नमो नमः।अर्थाय चारुरूपाय परमार्थाय वै नमः॥
विश्वभूपाय विश्वाय विश्वनाथाय वै नमः।शंकराय च कालाय कालावयवरूपिणे॥
अरूपाय विरूपाय सूक्ष्मसूक्ष्माय वै नमः।श्मशानवासिने भूयो नमस्ते कृत्तिवाससे॥
शशाङ्कशेखरायाशायोगभूमिशयाय च।दुर्गाय दुर्गपाराय दुर्गावयवसाक्षिणे॥
लिंगरूपाय लिंगाय लिंगानां पतये नमः।नमः प्रलयरूपाय प्रणवार्थाय वै नमः॥

नमो नमः कारणकारणाय मृत्युञ्जयायात्मभवस्वरूपिणे।
श्रीत्र्यम्बकायासितकण्ठशर्व गौरीपते सकलमङ्गलहेतवे नमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। ७६–९०)

२. साधूनां समचित्तानामुपहासं करोति यः। देवो वाप्यथवा मर्त्यः स विज्ञेयोऽधमाधमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। १०८)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३९

'पार्वती-देवीके इस प्रकार शाप देनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ चित्ररथ सहसा स्वर्गसे नीचे गिर पड़ा। वही इस समय आसुरी योनिमें आकर वृत्रासुरके नामसे प्रसिद्ध हुआ है। विश्वकर्माकी भारी तपस्यासे युक्त होनेके कारण इस समय वृत्रासुर अजेय बतलाया जाता है। इसलिये तुम प्रदोषकालमें विधिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये महादैत्य वृत्रासुरका वध करो।'

गुरु बृहस्पतिकी यह बात सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस समय मुझे इस प्रदोषव्रतके उद्यापनकी विधि बतलाइये।' बृहस्पतिजीने कहा—'कार्तिकमास आनेपर शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी हो तो वह व्रतकी सिद्धिके लिये ग्राह्य है। आज वह तिथि स्वतःप्राप्त है। इसमें चाँदीका वृषभ बनवाना चाहिये। उस वृषभकी पीठपर सुन्दर सिंहासन रखना चाहिये। उस सिंहासनपर उमाकान्त भगवान् शिवकी स्थापना करनी चाहिये। भगवान्‌के तीन नेत्र, पाँच मुख और दस भुजाएँ हों। उनके आधे अंगमें सती-साध्वी पार्वतीका निवास हो। इस प्रकार उमा और महेश्वरकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। उस प्रतिमाको वृषभकी पीठपर वस्त्रसे ढके हुए ताँबेके पात्रमें स्थापित करके रात्रिमें श्रद्धा और विधिके साथ जागरण करना चाहिये। पहले यत्नपूर्वक प्रतिमाको पंचामृतसे स्नान कराना चाहिये। देवराज! मैं पूजाके मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो—

( दुग्धसे स्नान करानेका मन्त्र ) गोक्षीरधाम देवेश गोक्षीरेण मया कृतम्। स्नपनं देवदेवेश गृहाण परमेश्वर ॥ 'गायके दूधमें निवास करनेवाले देवेश! देवदेवेश्वर ! परमेश्वर ! मैंने गायके दूधसे आपको स्नान कराया है, कृपया इसे स्वीकार करें।'

( दधि-स्नान-मन्त्र ) दध्ना चैव महादेव स्नपनं कार्यते मया। गृहाण च मया दत्तं सुप्रसन्नो भवाद्य वै॥ 'महादेवजी! मैं दहीसे आपको स्नान करवा रहा हूँ। मेरे द्वारा समर्पित यह दधि-स्नान आप स्वीकार करें तथा आज मुझपर निश्चय ही अत्यन्त प्रसन्न हों।'

( घृत-स्नान-मन्त्र ) सर्पिषा च मया देव स्नपनं क्रियतेऽधुना। गृहाण श्रद्धया दत्तं तव प्रीत्यर्थमेव च॥ 'देव! अब मैं घीसे आपको स्नान करा रहा हूँ। मेरे द्वारा आपकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक समर्पित यह घृत-स्नान आप अंगीकार करें।'

( मधु-स्नान-मन्त्र ) इदं मधु मया दत्तं तव तुष्ट्यर्थमेव च। गृहाण त्वं हि देवेश मम शान्तिप्रदो भव॥ 'देवेश्वर ! आपके सन्तोषके लिये मेरा दिया हुआ यह मधु आप ग्रहण करें तथा मेरे लिये शान्तिदायक बनें।'

( शर्करा-स्नान-मन्त्र ) सितया देवदेवेश स्नपनं क्रियते मया। गृहाण श्रद्धया दत्तां सुप्रसन्नो भव प्रभो॥ 'देवदेवेश्वर ! मैं मिश्री (या शर्करा)-से आपको स्नान करा रहा हूँ। प्रभो! श्रद्धापूर्वक दी हुई इस मिश्री (या शर्करा)-को आप स्वीकार करें तथा मुझपर भलीभाँति प्रसन्न हों।'

४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


इस प्रकार पंचामृतद्वारा भगवान् वृषभध्वजको स्नान कराना चाहिये। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष ताँबेके अर्घ्यपात्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे—

( अर्घ्य-मन्त्र )

अर्च्योऽसि त्वमुमाकान्त त्वर्घ्येणानेन वै प्रभो।
गृहाण त्वं मया दत्तं प्रसन्नो भव शंकर॥

‘उमावल्लभ! प्रभो! आप इस अर्घ्यद्वारा पूजन करनेयोग्य हैं। भगवान् शंकर! मेरे दिये हुए अर्घ्यको आप ग्रहण करें और मुझपर प्रसन्न हों।’

( पाद्य-मन्त्र )

मया दत्तं तु ते पाद्यं पुष्पगन्धसमन्वितम्।
गृहाण देवदेवेश प्रसन्नो वरदो भव॥

‘देवदेवेश! मेरे द्वारा आपको समर्पित गन्ध-पुष्पयुक्त यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) आप ग्रहण करें तथा प्रसन्न होकर मेरे लिये वरदायक बनें।’

( आसनसमर्पण-मन्त्र )

विष्टरं विष्टरेणैव मया दत्तं च वै प्रभो।
शान्त्यर्थं तव देवेश वरदो भव मे सदा॥

‘प्रभो! मैंने आपके सन्तोषके लिये कुशनिर्मित आसन समर्पित किया है। देवेश्वर! आप मेरे लिये सदा वरदायक बने रहें।’

( आचमन-मन्त्र )

आचमनं मया दत्तं तव विश्वेश्वर प्रभो।
गृहाण परमेशान तुष्टो भव ममाद्य वै॥

‘प्रभो! विश्वेश्वर! मैंने आपको यह आचमनार्थ जल समर्पित किया है। परमेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और आज मुझपर प्रसन्न हों।’

( यज्ञोपवीत-मन्त्र )

ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं ब्रह्मकर्मप्रवर्तकम्।
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं तव प्रभो॥१

‘प्रभो! यह सुवर्णरंगका (पीत) यज्ञोपवीत मैंने आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है; यह ब्रह्मग्रन्थिसे युक्त है तथा ब्रह्मकर्म (वैदिक यज्ञ-यागादि तथा भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म)-में लगानेवाला है।’

( वस्त्र-मन्त्र )

एतद् वासो मया दत्तं सोत्तरीयं सुशोभनम्।
गृहाण त्वं महादेव ममायुष्यप्रदो भव॥

‘महादेवजी! मैंने यह चादरसहित परम सुन्दर वस्त्र आपको भेंट किया है; आप इसे ग्रहण करें और मुझे आयु प्रदान करें।’

( चन्दन-मन्त्र )

सुगन्धं चन्दनं देव मया दत्तं तु ते प्रभो।
भक्त्या परमया शम्भो सुगन्धं कुरु मां भव॥

‘देव! शम्भो! मैंने आपको बड़ी भक्तिसे सुगन्धित चन्दन समर्पित किया है; सबके जन्मदाता भगवान् शिव! आप मुझे उत्तम गन्धसे युक्त करें।’

( धूप-मन्त्र )

धूपं विशिष्टं परमं सर्वौषधिविजृम्भितम्।
गृहाण परमेशान मम शान्त्यर्थमेव च॥

‘परमेश्वर! सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा बहुत ही विशिष्ट बनी हुई यह धूप आपकी सेवामें समर्पित है। मेरी शान्तिके लिये आप इसे ग्रहण करें।’

( दीप-मन्त्र )

दीपं हि परमं शम्भो घृतप्रज्वलितं मया।
दत्तं गृहाण देवेश मम ज्ञानप्रदो भव॥

‘शम्भो! मैंने घीसे जलाया हुआ यह उत्तम दीप आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है। देवेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और मेरे लिये ज्ञानदाता बनें।’

( आरती-मन्त्र )

दीपावलिं मया दत्तां गृहाण परमेश्वर।
आरार्तिकप्रदानेन मम तेजःप्रदो भव॥२

‘परमेश्वर! मेरी दी हुई यह दीप-माला आप ग्रहण करें, तथा इस आरती उतारनेसे सन्तुष्ट होकर आप मुझे तेज प्रदान करें।’


१. पाठान्तर इस प्रकार है—
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं च शंकर। गृहाण परया तुष्ट्या तुष्टो भव तु सर्वदा॥
२. ये पूजासम्बन्धी मन्त्र स्क० पु०, मा० के० अध्याय १७ के श्लोक १२१ से १३६ तक आये हैं।

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४१

'इसी प्रकार फल, दीप आदि तथा नैवेद्य और ताम्बूल आदि सामग्रियाँ क्रमशः चढ़ाकर विधिज्ञ पुरुष भगवान् शिवकी पूजा करे तथा रात्रिमें यत्नपूर्वक जागरण करे। अपने घरमें या देवालयमें चंदोवा तनाकर अद्भुत सामग्रियोंसे सजा हुआ एक मण्डप बनावे। उसमें गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा भगवान् सदाशिवकी पूजा करे। इन्द्र! प्रदोष-व्रतके उद्यापनकी यही विधि है। विधिज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिके लिये इसी प्रकारसे सब कुछ करे।'

गुरु बृहस्पतिजीने जो कुछ बताया, उसके अनुसार इन्द्रने सब विधिका पालन किया।

नमुचिके मारे जानेपर सब देवता हर्ष और उत्साहमें भरे हुए थे। उनका दैत्योंके साथ घोर युद्ध हुआ। देवताओं और दैत्योंका संहार करनेवाले उस घोर संग्राममें अत्यन्त भयंकर तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। इसी समय पूर्वोक्त प्रकारसे भगवान् शंकरकी आराधना करके इन्द्र भी युद्धमें लग गये। उन्होंने देवताओंको साथ लेकर वृत्रासुरका पीछा किया। व्योमासुरने यमराजके साथ तथा तीक्ष्णकोपने अग्निके साथ युद्ध आरम्भ किया। वायुके साथ धूम और नैर्ऋतके साथ अतिकोपन लड़ने लगा। कुबेरके साथ कूष्माण्ड तथा ईशके साथ दुःसह भिड़ गया। इनके सिवा और भी बहुतसे महाबली दैत्य देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध करने लगे। उन्होंने गदा, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, तोमर, मुद्गर, ऋष्टि, भिन्दिपाल, पास, प्रास तथा मुष्टिक आदिसे प्रहार किया। उसी प्रकार देवता भी दधीचिकी हड्डियोंसे बने हुए उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा असुरोंको विदीर्ण करने लगे। देवताओंकी मार खाकर दैत्य पुनः पराजयको प्राप्त हुए। उन्हें भयभीत देख वृत्रासुरने समझाया— 'वीरो! युद्ध स्वर्गका द्वार है, इसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। जिनकी संग्राममें मृत्यु होती है, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। विद्वान् पुरुष जहाँ कहीं भी सम्भव हो संग्राममें मृत्युकी अभिलाषा करते हैं। जो लोग युद्ध छोड़कर भागते हैं, वे निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं। महापातकी मनुष्य भी यदि गौ, ब्राह्मण, भृत्य, कुटुम्ब तथा स्त्रीकी रक्षाके लिये हाथमें शस्त्र लेकर युद्ध करें तथा वे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो जायें अथवा युद्धस्थलमें ही प्राण त्याग दें तो उन्हें निश्चय ही उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। वे ज्ञानियोंके लिये भी दुर्लभ उत्कृष्ट पदको प्राप्त कर लेते हैं। अतः तुमलोगोंको अपने स्वामीके कार्य-साधनमें पूर्णतः तत्पर रहकर युद्ध करना चाहिये।' वृत्रके इस प्रकार समझानेपर असुरोंने उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और देवताओंके साथ ऐसा घमासान युद्ध आरम्भ किया, जो सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर था। इधर मारनेकी इच्छासे इन्द्रको आते देख वृत्रासुर ठठाकर हँस पड़ा; उसका वह अट्टहास इन्द्रको भी भयभीत कर देनेवाला था। वीर वृत्रासुर बड़ा तेजस्वी था। उस समय वह दैत्योंका अधिपति बना हुआ था। उसके मनमें सुरश्रेष्ठ इन्द्रको निगल जानेकी इच्छा हुई और वह बहुत बड़ा मुँह फैलाकर इन्द्रकी ओर बढ़ा। समीप आनेपर उसने ऐरावत हाथी, वज्र और किरीटसहित इन्द्रको सहसा निगल लिया और वह नाचने तथा गर्जना करने लगा। पलक मारते-मारते इन्द्र वृत्रासुरके ग्रास बन गये। वहाँ उपस्थित रहकर यह दुर्घटना देखनेवाले देवताओंमें बड़ा हाहाकार मचा। धरती काँप उठी। हजारों उल्कापात होने लगे तथा सम्पूर्ण चराचर जगत्में अन्धकार छा गया। उस समय सब देवता चिन्तामग्न हो ब्रह्माजीके पास गये और वृत्रासुरकी सारी करतूत उन्होंने ब्रह्माजीसे कह सुनायी। सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके भगवान् शंकरका स्तवन किया। उसी समय आकाशवाणी हुई—'इन्द्रने प्रदोषव्रतका अनुष्ठान करते समय कुछ विपरीत कार्य कर डाला है। जो मूर्ख शिवनिर्माल्य, अर्घा, शिवलिंगकी छाया तथा देव-मन्दिरका लंघन करते हैं, वे शिव-गणोंमें प्रधान चण्डेशके द्वारा दण्डनीय हैं; इसमें

४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये लिंगपूजनपूर्वक प्रदक्षिणा और नमस्कार करनेसे अवश्य कल्याण होता है। ऐसी उत्तम बुद्धि रखकर प्रयत्नपूर्वक लिंगपूजन करना चाहिये। कनेर, मदार, भटकटइया, धतूर, शतपत्र, अमलतास, पुन्नाग (सँदैसरा), मौलसिरी, नागकेसर, नीलकमल, कदम्ब, आक तथा नाना प्रकारके कमल आदि पुष्प तीनों कालमें सदा पवित्र जानने चाहिये। चमेली, बेला, सेवती, श्यामपुष्प, कुटज, कर्णिकार, कुसुम्भ, लाल कमल— ये पुष्प विशेषतः सायंकालमें शिवलिंगपूजनके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं। कमलके फूल तीनों कालमें पवित्र माने गये हैं। रात्रिमें केवल कुमुदके फूल विशेष पवित्र बताये गये हैं। इस प्रकार पूजा-भेदको जानकर शिवलिंगका पूजन करना चाहिये। विधिज्ञ पुरुषोंको शिवालयमें सदा शास्त्रीय विधिको पालन करना चाहिये। शिवलिंग और नन्दिकेश्वरके बीचमें होकर अथवा अर्धान्तरकी परिक्रमा नहीं करनी चाहिये। यदि कोई करता है तो पापका भागी होता है। इस इन्द्रने राजस्वभावका आश्रय लेकर वैसी ही प्रदक्षिणा (जिसका कि निषेध किया गया है) की है। इसीलिये इसका किया हुआ सब कुछ निष्फल हो गया और यही कारण है कि आज वृत्रासुरने इन्द्रको अपना ग्रास बना लिया। देवताओ! अब तुम्हीं लोग महारुद्र-विधानके अनुसार शिवलिंगपूजन करो, जिससे इन्द्र शीघ्र ही छुटकारा पा सकें।'

आकाशवाणीके कथनानुसार देवताओंने प्रतिदिन भगवान् शंकरका पूजन और दशांश हवन आरम्भ किया। तब देवराज इन्द्र भगवान् शिवके प्रसादसे सहसा वृत्रासुरका पेट फाड़कर बाहर निकल आये। हाथी, वज्र, किरीट और कुण्डलसहित परम शोभासम्पन्न महातेजस्वी इन्द्रको देखकर सब देवता, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषि-मुनि बड़े प्रसन्न हुए। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। अनेक शंखोंकी ध्वनि होने लगी। इन्द्रके संकटमुक्त होते ही समस्त देवलोक-निवासियोंमें एक ही साथ महान् हर्षोल्लास छा गया। इन्द्र जहाँ संकटमुक्त हुए थे, वहाँ शची देवी भी आ पहुँचीं। महर्षियोंने शचीके साथ इन्द्रका अभिषेक किया तथा सबने यत्नपूर्वक उनके लिये पुण्याहवाचन किया। विप्रवरो! इस प्रकार जब महर्षियोंने इन्द्रका अभिषेक किया, तब इस पृथ्वीपर अधिकाधिक मंगल-उत्सव होने लगे। इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण किया हुआ वृत्रासुरका अत्यन्त अद्भुत शरीर वहीं गिरकर मेरुगिरिके शिखरकी भाँति सुशोभित होने लगा। उसी भूमिमें ब्रह्महत्या है, जहाँ वृत्रासुरका भयानक शरीर गिरा था। गंगा और यमुनाके बीचमें जो भूमि है, जिसे अन्तर्वेदी कहते हैं, वह पुण्य-भूमि बतायी गयी है। वह लोकपावन भूमि सर्वत्र प्रसिद्ध है। वृत्रासुरके वधसे उत्पन्न होनेवाली ब्रह्महत्या जिस देशमें प्रविष्ट हुई, वह पापी बताया गया है। उस मल-भूमिमें ही वृत्रासुरका महान् मस्तक पड़ा था जिसे इन्द्र आदि देवताओंने छः महीनोंमें काटा है। इस प्रकार वृत्रासुरका वध करके इन्द्रने विजय प्राप्त की और वे शचीनाथ निर्भय होकर इन्द्रासनपर विराजमान हुए।


बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, अदितिके व्रत-तपस्यासे सन्तुष्ट हो भगवान्‌का वामनरूपमें अवतार, बलिके पूर्वजन्मका प्रसंग तथा बलिपर वामनजीकी कृपा

लोमशजी कहते हैं—इसी बीचमें दैत्योंने पाताल-निवासी राजा बलिके पास आकर इन्द्रकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। उनकी यह बात सुनकर उदार बुद्धिवाले विरोचनपुत्र बलिने शुक्राचार्यसे पूछा—'भगवन्! इन्द्र किस प्रकार हमारे अधीन हो सकते हैं।' शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'दैत्यराज! तुम विश्वजित्

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४३

नामक यज्ञ करो। यज्ञके बिना कार्य सिद्ध नहीं होगा।' 'ऐसा ही करूँगा' यों कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करनेके पश्चात् दैत्यराज बलिने यज्ञ करनेका विचार किया। बलिको हृदय बड़ा उदार था। उन्होंने यज्ञके लिये जो-जो पदार्थ आवश्यक थे, उन सबका प्रयत्नपूर्वक संग्रह किया। महामना शुक्रने वह महायज्ञ आरम्भ कराया। यज्ञकी दीक्षा लेकर राजा बलिने अग्निदेवको हविष्यसे तृप्त किया। विधिपूर्वक यज्ञ-कर्मद्वारा जब अग्निदेवको आहुति दी जा रही थी उसी समय अग्निमेंसे बड़ा ही अद्भुत रथ प्रकट हुआ। उसमें चार घोड़े जुते हुए थे। अनेक ध्वज फहरा रहे थे। वह महान् कान्तिमान् रथ भाँति-भाँतिके शस्त्रोंसे संयुक्त और अनेकानेक अस्त्रोंसे अलङ्कृत था। रथ प्रकट होनेके पश्चात् शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर बलिने 'अवभृथ-स्नान' किया। फिर उस रथकी पूजा करके राजा बलि उसपर आरूढ़ हुए और दैत्योंकी सेना साथ लेकर इन्द्रसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। देवपुरीको दैत्योंद्वारा घिरी हुई देख वे श्रेष्ठ देवता बहुत देरतक परस्पर विचार करके बृहस्पतिजीसे बोले— 'महाभाग! अब हम क्या करें। दैत्योंके प्रधान-प्रधान वीर युद्धकी इच्छासे यहाँ आ पहुँचे हैं।'

उनकी बात सुनकर बृहस्पतिजीने कहा— 'देवताओ! ये दैत्यलोग अभी-अभी यज्ञ समाप्त करके शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर यहाँ आये हैं। ये सभी इस समय तपस्या और पराक्रमके द्वारा अजेय हैं।' गुरुका यह वचन सुनकर सम्पूर्ण देवता लज्जित हो गये। इन्द्रकी भी बुद्धि काम नहीं दे रही थी। वे गुरुकी फटकार पाकर लज्जायुक्त और चिन्तामग्न हो गये। सब देवता भयसे व्याकुल हो कश्यपजीके पवित्र आश्रमपर गये। वहाँ उन सबने माता अदितिसे दैत्योंकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। वह अप्रिय समाचार सुनकर पुत्रवत्सला अदितिने कश्यपजीसे कहा— 'महर्षे! देवताओंपर बड़ी भारी विपत्ति आयी है; मेरी बात सुनें और सुनकर उसके लिये कोई उपाय करें। प्रजापते! देवता अमरावती छोड़कर आपके आश्रममें आये हैं। आप उनकी रक्षा करें।' अदितिकी बात सुनकर कश्यपने कहा— 'भामिनि! इस समय असुरोंका क्षय बड़ी भारी तपस्याके द्वारा ही हो सकता है। देवताओंकी कार्य-सिद्धि बहुत शीघ्र नहीं हो सकती। महाभागे! मैं तुम्हारे मनोरथकी सिद्धिके लिये यह व्रत बतला रहा हूँ। शुभे! इसे प्रयत्नपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करो। देवि! भाद्रपदमासमें दशमी तिथिको मनुष्य संयम-नियमके साथ पवित्रतापूर्वक रहकर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये एकभुक्तव्रत करे (एक ही बार भोजन करे)। सुन्दरि! भगवद्भक्तोंको चाहिये कि वे सम्पूर्ण मनोवांछित वरोंके ईश्वर साक्षात् श्रीहरिकी प्रार्थना करें। प्रार्थनाका मन्त्र इस प्रकार है—

तव भक्तोऽस्म्यहं नाथ दशम्यादि दिनत्रयम्।
व्रतं चराम्यहं विष्णो अनुज्ञां दातुमर्हसि॥

'हे नाथ! मैं आपका भक्त हूँ और दशमीसे लेकर तीन दिनतक व्रत करना चाहता हूँ। विष्णो! इसके लिये आप आज्ञा दें।'

'इसी मन्त्रसे जगदीश्वर श्रीहरिकी प्रार्थना करनी चाहिये। एक ही बार भोजन करे। वह एक बारका भोजन भी केलेके पत्तेमें ही ग्रहण करना चाहिये। उस भोजनमें नमक वर्जित है। व्रती पुरुष एकादशी तिथिको यत्नपूर्वक उपवास करे और रात्रिकालमें विशेष चेष्टा करके जागता रहे। फिर द्वादशी तिथिमें विधिपूर्वक भलीभाँति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कुटुम्बी-जनोंके साथ पारण करे। इस प्रकार बारह महीनोंतक प्रतिमास आलस्य छोड़कर इस व्रतका अनुष्ठान करे। वर्षके अन्तमें पुनः भाद्रपदमास आनेपर एकादशीको अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीकी विष्णु प्रतिमा बनाकर उसे कलशपर स्थापित करे। उसीमें यत्नपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रती पुरुष सब दोषोंकी शान्तिके लिये श्रवण-नक्षत्रयुक्त पापनाशिनी द्वादशी तिथिको उपवास करे। महाभागे! इस प्रकार तुम इस कल्याणमय व्रतका अनुष्ठान करो।'

४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पतिव्रता अदितिने देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये पूर्ण एकाग्रताके साथ कश्यपजीके बताये हुए उस व्रतका पालन किया। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करनेसे भगवान् श्रीहरि सन्तुष्ट हो गये। ब्राह्मणो! उस समय श्रवण-नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथिको भगवान्‌का 'वामन' रूपमें प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मचारी बालकका रूप धारण करके परम शोभायमान दिखायी देते थे। उनके दो भुजाएँ थीं, कमलके समान खिले हुए सुन्दर नेत्र थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। वे वनमालासे अलंकृत थे। अदिति देवी पूजाके मध्यमें ही भगवान्‌का इस रूपमें दर्शन पाकर आश्चर्यचकित हो उठीं। उस समय उन्होंने कश्यपजीके साथ भगवान्‌का इस प्रकार स्तवन किया—'जो कारणके भी परम कारण हैं उन विश्वात्मा, विश्वस्रष्टा तथा अजन्मा श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। अनन्तरूप श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। जिनका परम धाम अनन्त है तथा जो साक्षात् परमात्मरूप हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। हे सच्चिदानन्दमय परमात्मदेव! आप पर, अपर तथा ज्ञानवान् सबके आत्मा हैं। आपको नमस्कार है। परावरात्मन्! (कार्य-कारणरूप) आपका स्वरूप सबसे श्रेष्ठ है, आपका बोध कभी कुण्ठित नहीं होता। आपको बारंबार नमस्कार है।'*

इस प्रकार अदितिद्वारा स्तुति की जानेपर देवताओंके पालक भगवान् विष्णु देवमाता अदितिसे बोले—'देवि! मैं तुम्हारी उत्कृष्ट तपस्यासे सन्तुष्ट होकर इसी शरीरसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ।' भगवान्‌का वचन सुनकर अदितिने कहा—'भगवन्! महाबली असुरोंने देवताओंको परास्त कर दिया है। जनार्दन! अब सभी देवता आपकी शरणमें आये हैं, आप उन शरणागतोंकी रक्षा करें।' संतोंके आश्रय तथा वैकुण्ठधामके स्वामी एकमात्र श्रीहरिने अदितिकी बात सुनकर तथा देवताओं और राजा बलिकी सारी चेष्टाएँ जानकर मन-ही-मन विचार किया कि आज मुझे कौन-सा कार्य करना चाहिये, जिससे देवताओंको विजय प्राप्त हो और प्रधान-प्रधान दैत्योंको भी हार खानी पड़े।

उधर बलि आदि असुरोंको यह मालूम नहीं था कि देवता नाना प्रकारके रूप धारण करके स्वर्गसे निकलकर कश्यपजीके आश्रमपर चले गये हैं। उस समय दैत्योंने अमरावतीपुरीकी चहारदीवारीपर चढ़कर देवराज इन्द्रको शीघ्र मार डालनेकी इच्छासे ज्यों ही उसके भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उन्हें वह सारी नगरी सूनी दिखायी दी। तब शुक्राचार्यने महाभिषेककी विधिसे असुरोंद्वारा घिरे हुए राजा बलिको इन्द्रके सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। इस प्रकार स्वर्गलोकके राज्यपर प्रतिष्ठित हुए विरोचनकुमार बलि वहाँकी उत्तम विभूतिके द्वारा महेन्द्रसे भी अधिक शोभायमान हुए। ऋषि, अप्सरा, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा असुरसमुदाय इन्द्रकी ही भाँति उनकी सेवा करने लगे। सम्पूर्ण


* प्रादुर्बभूव द्वादश्यां श्रवणेन तदा द्विजः। वटुरूपधरः श्रीमान् द्विभुजः कमलेक्षणः॥
अतसीपुष्पसङ्काशो वनमालाविभूषितः। तं दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा पूजामध्येऽदितिस्तदा॥
कश्यपेन समायुक्ता सास्तौषीत् कमलेक्षणा।

अदितिरुवाच
नमो नमः कारणकारणाय विश्वात्मने विश्वसृजेऽभवाय।
अनन्तरूपाय नमो नमस्ते त्वनन्तधाम्ने परमात्मरूपिणे॥
परापराणां परमात्मदैवतं चिन्मात्रकं ज्ञानवतां स्वरूपिणे।
वरेण्यरूपाय परावरात्मनकुण्ठबोधाय नमो नमस्ते॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। २४—२८)