संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 56, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २७
हो गये। भगवान् शंकरने उन सबको देखा। देवकार्यकी सिद्धिके लिये उन्होंने राहुके मुण्डोंकी माला बना ली।
जो भगवान् शिवके ऊपर सुशोभित दूसरोंद्वारा चढ़ायी हुई पूजा-सामग्री देखकर सन्तोष प्राप्त करता है, वह श्रेष्ठ लोकोंमें जाता है। जो कार्तिकमासकी रात्रिमें श्रद्धापूर्वक शिवजीके समीप दीपमाला समर्पित करता है, उसके चढ़ाये हुए वे दीप शिवलिंगके सामने जितने समयतक जलते हैं, उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिन्होंने भगवान् शिवके मन्दिरमें कुसुम्भके तेलसे युक्त दीपक अर्पित किये हैं, वे अपने ऊपर और नीचेकी दस-दस पीढ़ियोंके साथ शिवलोकमें निवास करते हैं। दीपदानके फलसे वे ज्ञानी होते हैं। जो कपूर, अगर और धूपसे भगवान् सदाशिवकी पूजा करते हैं और प्रतिदिन कपूरकी आरती उतारते हैं वे सायुज्य-मुक्तिको प्राप्त होते हैं। जो दानके समय, तपस्यामें, तीर्थमें और पर्वकालमें आलस्य छोड़कर रुद्राक्ष-धारणपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, उनका पुण्य अक्षय होता है।
द्विजवरो! भगवान् शिवने जिन रुद्राक्षोंका वर्णन किया है, उसे आपलोग सुनें। रुद्राक्ष एक मुखसे लेकर सोलह मुखतकके होते हैं। उनमेंसे पंचमुख तथा एकमुख—ये दो प्रकारके रुद्राक्ष मनुष्योंद्वारा धारण करने योग्य एवं श्रेष्ठ समझने चाहिये। जो प्रतिदिन एकमुख रुद्राक्ष धारण करते हैं, उन मनुष्योंको जीवन्मुक्त जानना चाहिये। जो प्रतिदिन पंचमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह रुद्रलोकमें जाता और उन्हींके साथ आनन्दका भागी होता है। जप, तप, क्रिया-योग, स्नान और देवपूजा आदि जो भी शुभ कर्म किया जाता है, वह रुद्राक्षधारणसे अनन्त फल देनेवाला हो जाता है। जो मन्त्र-पूत विभूतिसे अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे रुद्रलोकमें रुद्र होंगे। कपिला गायके गोबरको भूमिपर गिरनेसे पहले ही हाथपर ले ले और उसे सुखाकर विभूतिके लिये संग्रह करे। विभूति सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी है। पहले ललाटमें प्रयत्नपूर्वक अँगूठेसे एक रेखा बनानी चाहिये। फिर मध्यमा अँगुलीको छोड़कर अनामिका और तर्जनी—इन दो अँगुलियोंसे दो रेखाएँ खींचे। इस प्रकार जिसके ललाटमें तीन सफल रेखाएँ देखी जाती हैं, उस शिवभक्तको साक्षात् शिवके ही समान जानना चाहिये। वह दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
इन्द्रकी विजय, इन्द्रद्वारा विश्वरूपका वध, नहुषका स्वर्गसे पतन, ब्रह्महत्यासे इन्द्रकी मुक्ति तथा पुनः राज्यकी प्राप्ति
लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर उस देवासुर-संग्राममें इन्द्रने भी दैत्योंका बड़ा भयंकर संहार किया। उनका वह कृत्य अद्भुत था। उस समय अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर शचीपति इन्द्र दुर्जय दैत्योंके लिये कालरूप हो रहे थे। जब इस प्रकार असुर मारे जा रहे थे, उस समय इन्द्रको रोकनेके लिये भगवान् नारदजी वहाँ पधारे और यों बोले—'असुरोंके मण्डलमें जो वीर योद्धा मारे गये हैं, उनके बाद अब तुम भयभीत सैनिकोंकी हत्या क्यों कर रहे हो? जो भयभीत होकर शरणमें आ जाते हैं, ऐसे सैनिकोंकी जो लोग विजय-मदसे उन्मत्त होकर हत्या करते हैं, उन्हें महापातकी और ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।* इसलिये तुम्हें मनसे भी किसी भयभीत प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।'
महात्मा नारदके यों कहनेपर इन्द्र देवसेनाके
* ये भीताश्च प्रपन्नाश्च घ्नन्ति तान् ये मदोद्धताः। ब्रह्मघ्नास्तेऽपि विज्ञेया महापातकसंयुताः॥
(स्क० पु०, मा० के० १४। १९)