संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
साथ तत्काल स्वर्गमें चले आये। उस समय सब देवता परस्पर अधिक हर्ष प्रकट करने लगे। यक्ष, गन्धर्व और किन्नरगण भी बड़े आनन्दित हुए। श्रेष्ठ देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने अमरावतीके सिंहासनपर शचीसहित इन्द्रका अभिषेक किया। इन्द्र भगवान् शंकरके प्रसादसे विजयी हुए। उस समय देवलोकमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। शंख, पटह, मृदंग, ढोल, आनक, भेरी और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। देवताओंद्वारा मारे गये दैत्य पृथ्वीपर पड़े थे। महात्मा राजा बलि आदि भी प्राण त्याग चुके थे। उस समय भृगुवंशी शुक्राचार्यजी तपस्या करनेके लिये अपने शिष्योंके साथ मानसोत्तर पर्वतपर गये थे। इसीलिये वे युद्धमें उपस्थित न हो सके थे। उस युद्धमें जो दैत्य जीवित बच गये थे, वे शुक्राचार्यजीके पास गये। उन्होंने वह सारा वृत्तान्त, जो असुरोंके संहारका कारण हुआ था, विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर भृगुनन्दन शुक्रको खेद और क्रोध भी हुआ। वे शिष्योंके साथ युद्धस्थलमें आये और अपनी मृतसंजीवनी विद्याके प्रभावसे उन्होंने मरे हुए असुरोंको भी जीवित कर दिया। शुक्राचार्यकी प्रेरणासे बलि आदि सब दैत्य पातालमें लौट आये और सुखपूर्वक रहने लगे।
ऋषियोंने पूछा—देवराज इन्द्रने गुरुके बिना ही कैसे राज्य प्राप्त किया? क्योंकि गुरुकी अवहेलनासे ही उन्हें अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा था। किसकी प्रेरणासे इन्द्र चिरंकालतक राजसिंहासनपर बैठे रहे। ये सब बातें आप शीघ्र बतावें। हमें यह सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है।
लोमशजी बोले—गुरु बृहस्पतिके बिना भी शचीपति इन्द्रने कुछ कालतक राज्य-शासन किया। उस समय विश्वरूपजी इन्द्रके पुरोहित हुए थे। विश्वरूपके तीन मस्तक थे; वे यज्ञ और पूजनमें उचित भाग देकर देवताओं, असुरों और मनुष्योंको भी तृप्त करते थे। यह बात शचीपति इन्द्रसे छिपी न रह सकी। पुरोहित विश्वरूपजी देवताओंका भाग उच्चस्वरसे बोलकर देते थे। दैत्योंको चुपचाप बिना बोले ही देते थे और मनुष्योंको मध्यम स्वरसे मन्त्र पढ़कर भाग समर्पित करते थे। यह उनका प्रतिदिनका कार्य था। एक दिन इन्द्रको गुरुजीकी फुर्ती देखकर इस बातका पता लग गया। तब उन्होंने छिपे-छिपे यह जान लिया कि विश्वरूपजी क्या करना चाहते हैं। 'ये दैत्योंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्हें भाग अर्पण करते हैं, हमारे पुरोहित होकर दूसरोंको फल देते हैं।' यों समझकर इन्द्रने सौ पर्ववाले वज्रसे विश्वरूपके मस्तक काट डाले। वज्रके आघातसे तत्काल उनकी मृत्यु हो गयी। इन्द्र ब्रह्महत्याके अपराधी हुए। पर ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन आदि महापाप करनेवाले पापियोंके भी उद्धारका यही एक उपाय है कि वे भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करें, जिससे बुद्धि भगवन्मयी हो जाती है।*
तदनन्तर धुएँके समान रंगवाली तथा तीन मस्तकोंवाली ब्रह्महत्या इन्द्रको निगल जानेके लिये उनके पास आयी। उसे देखकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, अतः वे वहाँसे भाग चले। उन्हें भागते देख भयदायिनी ब्रह्महत्या उनका पीछा करने लगी। जब वे भागते तब वह भी पीछे-पीछे दौड़ती, और उनके खड़े होनेपर खड़ी हो जाती। अपने शरीरकी परछाईंके समान वह इन्द्रके पीछे लगी रहती। जाते-जाते सहसा वह इन्द्रको लपेट लेनेके लिये झपटी, इतनेमें ही इन्द्र बड़ी फुर्तीके साथ पानीमें कूद पड़े और वहीं गोता लगा गये, मानो वे चिरकालसे जलमें ही निवास करनेवाले कोई जलचर जीव हों। इस प्रकार उस जलमें बड़े
* ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। इत्येषामप्यघवतामिदमेव च निष्कृतिः॥
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मतिः॥
(स्क० पु०, मा० के० १५। ११-१२)