भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *

दुःखसे निवास करते हुए इन्द्रके तीन सौ दिव्य वर्ष पूरे हो गये। उस समय स्वर्गलोकमें भयंकर अराजकता छा गयी। देवता और तपस्वी ऋषि भी चिन्तित हो उठे। तीनों लोक विपत्तिग्रस्त हो गये। जिस राज्यमें एक भी ब्रह्महत्यारा निर्भय होकर निवास करता है, वहाँ साधु पुरुषोंकी अकालमृत्यु होती है। विप्रगण! जिस राज्यमें पापात्मा राजा निवास करता है, वहाँ प्रजाके विनाशके लिये दुर्भिक्ष, मृत्यु, उपद्रव तथा और भी बहुत-से अनर्थ उत्पन्न होते हैं। अतः राजाको श्रद्धापूर्वक धर्मका पालन करना चाहिये। राजाके पवित्र होनेसे ही उसकी प्रजा पवित्र रहकर स्थिरता प्राप्त करती है।* इन्द्रने जो पाप किया था, उसके कारण सम्पूर्ण जगत् नाना प्रकारके सन्तापोंसे पीड़ित और उपद्रवग्रस्त हो गया।

शौनकने पूछा—सूतजी! इन्द्रने तो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका विशाल राज्य प्राप्त किया है, फिर उसमें विघ्न क्यों उत्पन्न होता है?

सूतजी बोले—देवताओं, दानवों और विशेषतः मनुष्योंके सुख और दुःखका कारण कर्म ही है—इसमें संशय नहीं है। इन्द्रने बड़ा ही अद्भुत एवं घृणित कर्म किया। उन्होंने गुरुकी अवहेलनाके साथ ही विश्वरूपका वध भी कर डाला। इतना ही नहीं, गुरु-तुल्य महर्षि गौतमकी पत्नीका भी सेवन (उपभोग) किया। इन्हीं सब बुरे कर्मोंका फल देवराज इन्द्रको प्राप्त हुआ, जिसे टालनेका कोई उपाय नहीं था। जो पाप-कर्म करनेवाले मनुष्य उस पापके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं करते—उनका वह पाप थोड़ा हो या अधिक, उससे एक दिन वे पीड़ित होते ही हैं। विप्रगण! यदि पाप बन जाय तो उसकी पूर्णतः शान्तिके लिये तत्काल प्रायश्चित्त करना चाहिये। पापोंका प्रायश्चित्त अनेक प्रकारका बतलाया गया है। उपपातक अधिक कालतक रह जाने या बार-बार उसकी आवृत्ति होनेपर महापातकके रूपमें परिणत हो जाता है। जो मनुष्य सबेरे, दोपहर और शामको सदा स्वधर्मपालनस्वरूप तपस्या करते हैं, उनका पाप नष्ट हो जाता है तथा वे उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। इसलिये दुराचारपरायण इन्द्रको इस पाप-कर्मका ही फल मिला है।

विप्रगण! उस समयकी परिस्थितिपर भलीभाँति विचार करके सम्पूर्ण लोकपाल एकत्र हो बृहस्पतिके पास गये और अपना सब मनोगत विचार उनपर प्रकट किया। उन्होंने स्थिरचित्त होकर इन्द्रकी सब बातें गुरु बृहस्पतिसे कह सुनायीं। देवताओंकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् बृहस्पतिजीने सर्वत्र फैली हुई अराजकताको लक्ष्य करके सोचा, ‘अब क्या करना चाहिये? इस समय हमारा कर्तव्य क्या है? देवताओं, पवित्रात्मा ऋषियों तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण कैसे होगा?’ मन-ही-मन इन सब बातोंको सोचकर और कर्तव्य-अकर्तव्यका विचार करके महायशस्वी बृहस्पतिजी देवताओंके साथ इन्द्रके पास चले; वे तुरंत ही उस जलाशयपर जा पहुँचे, जिसमें इन्द्र छिपे हुए थे और जिसके तटपर भयानक चाण्डालीके रूपमें ब्रह्महत्या खड़ी थी। वे सम्पूर्ण देवता और महर्षि जलाशयके किनारे बैठ गये। गुरु बृहस्पतिजीने स्वयं ही इन्द्रको पुकारा। उनकी आवाज सुनकर इन्द्र उठकर खड़े हो गये। उस समय उन्हें अपने


* एकोऽपि ब्रह्महा यत्र राष्ट्रे वसति निर्भयः। अकालमरणं तत्र साधूनामुपजायते॥
राजा पापयुतो यस्मिन् राष्ट्रे वसति तत्र वै। दुर्भिक्षं चैव मरणं तथैवोपद्रवा द्विजाः॥
भवन्ति बहवोऽनर्थाः प्रजानां नाशहेतवे। तस्माद्राज्ञा प्रकर्तव्यो धर्मः श्रद्धापरेण हि॥
तथा प्रकृतयो राज्ञः शुचित्वेन प्रतिष्ठिताः।
(स्क० पु०, मा० के० १५। १८-२१)