भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 59

३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गुरु बृहस्पतिजीका दर्शन हुआ। इन्द्रके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने सामने खड़े हुए बृहस्पतिजीको तथा वहाँ आये हुए सम्पूर्ण तपस्वी मुनियोंको शीघ्रतापूर्वक प्रणाम किया। फिर दीनवदन हो अपने ही किये हुए अज्ञानसूचक महान् कुकर्मोंपर मन-ही-मन भलीभाँति विचार करके वे बोले—'प्रभो! इस समय मेरेद्वारा पालन करनेयोग्य कौन-सा कर्तव्य है? बताइये!' उदार बुद्धिवाले भगवान् बृहस्पतिने हँसकर उत्तर दिया—'इन्द्र! पहले तुमने जो कुछ किया था, उसी कर्मका यह फल आज तुम्हें मिल रहा है। केवल भोगसे ही इसका क्षय होगा। धर्मशास्त्रकारोंने ब्रह्महत्याके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा है। उनकी दृष्टिमें ब्रह्महत्या दूर करनेके लिये कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं। अनजानमें जो पाप हो जाता है, उसीके निवारणका उपाय धर्मशास्त्रज्ञ विद्वानोंने बताया है। जो पाप स्वेच्छापूर्वक जान-बूझकर किया जाता है, उसके प्रतिकारका कोई उपाय नहीं। इच्छापूर्वक जान-बूझकर किया हुआ पाप अनिच्छा या अज्ञानपूर्वक किये हुए पापकी श्रेणीमें नहीं आ सकता। विषय-भेदसे इन दोनों प्रकारके पापोंका प्रायश्चित्त नियत किया गया है। जान-बूझकर किये हुए पापके लिये मरणान्त प्रायश्चित्तका विधान है। अज्ञानजनित पापके लिये विशेष-विशेष प्रायश्चित्त बताया गया है। तुमने जो पाप किया है, वह अनजानमें नहीं हुआ है; तुम्हारे द्वारा स्वयं जान-बूझकर विद्वान् पुरोहित ब्राह्मणका वध किया गया है। अतः उसके निवारणका कोई उपाय नहीं है। जबतक मृत्यु नहीं हो जाती, तबतक तुम इस जलमें ही स्थिरभावसे पड़े रहो। दुर्मते! तुम्हारे सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल तो उसी समय नष्ट हो गया, जब तुमने ब्राह्मणकी हत्या की थी। जैसे छेदवाले घड़ेमें थोड़ा भी जल नहीं ठहरता, उसी प्रकार पापी मनुष्यका पुण्य प्रतिक्षण नष्ट होता रहता है।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'गुरुदेव! इसमें सन्देह नहीं कि मेरे कुकर्मसे ही मुझे ऐसी दुर्दशा प्राप्त हुई है। अब आप इन देवर्षियोंके साथ शीघ्र ही अमरावतीपुरीको पधारें और देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आपके मनमें जो अच्छे प्रतीत हों, उन्हें इन्द्र बना लें। मैं तो इस ब्रह्महत्यासे आवृत्त होनेके कारण अब मरे हुएके ही समान हूँ।' इन्द्रके यों कहनेपर बृहस्पतिको आगे करके सम्पूर्ण देवता तुरंत अमरावतीपुरीमें लौट आये और इन्द्रका जो विचार था, वह सब शचीके सामने उन्होंने यथार्थरूपसे कह सुनाया। सब देवता बार-बार विचार करने लगे कि अब इस राज्यका संचालन करनेके लिये हमें क्या करना चाहिये। इसी समय अमित तेजस्वी देवर्षि नारद इच्छानुसार घूमते हुए वहाँ आ पहुँचे और देवताओंद्वारा पूजित होकर बोले—'देवगण! आपलोग अनमने कैसे हो रहे हैं?' उनके पूछनेपर देवताओंने इन्द्रकी सारी करतूतें कह सुनायीं। तब नारदजी बोले—'देवताओ! इन्द्रके ये सारे चरित्र मैंने पहलेसे ही सुन रखे हैं, अब तो इस महान् पापके कारण इन्द्रकी सारी श्रेष्ठता चली गयी। आप सब देवता सर्वज्ञ हैं, तपस्या और पराक्रमसे सम्पन्न हैं; अतः आपलोग चंद्रवंशी राजा नहुषको इन्द्र बना लें। इस राज्यपर उन्हें शीघ्र ही बिठा लेना चाहिये। महात्मा नहुषने यज्ञकी दीक्षा लेकर निन्यानबे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये हैं।'

सब देवताओं और महर्षियोंने इन्द्रका राज्य नहुषको सौंप दिया। तबसे अगस्त्य आदि सभी महर्षि नहुषकी सेवामें उपस्थित रहने लगे। गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, विद्याधर, महानाग, सुपर्ण और पक्षी आदि जो भी स्वर्गवासी प्राणी थे, वे सब नहुषकी सेवा करने लगे।

इस प्रकार उत्तम कलाओंसे सुशोभित तथा सम्पूर्ण देवताओंसे सुपूजित राजा नहुष जब स्वर्गलोकके अधिपति हो गये, तब उन्हें महान् कामानल सन्तप्त करने लगा। राजा नहुषने पूछा—