संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४३
नामक यज्ञ करो। यज्ञके बिना कार्य सिद्ध नहीं होगा।' 'ऐसा ही करूँगा' यों कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करनेके पश्चात् दैत्यराज बलिने यज्ञ करनेका विचार किया। बलिको हृदय बड़ा उदार था। उन्होंने यज्ञके लिये जो-जो पदार्थ आवश्यक थे, उन सबका प्रयत्नपूर्वक संग्रह किया। महामना शुक्रने वह महायज्ञ आरम्भ कराया। यज्ञकी दीक्षा लेकर राजा बलिने अग्निदेवको हविष्यसे तृप्त किया। विधिपूर्वक यज्ञ-कर्मद्वारा जब अग्निदेवको आहुति दी जा रही थी उसी समय अग्निमेंसे बड़ा ही अद्भुत रथ प्रकट हुआ। उसमें चार घोड़े जुते हुए थे। अनेक ध्वज फहरा रहे थे। वह महान् कान्तिमान् रथ भाँति-भाँतिके शस्त्रोंसे संयुक्त और अनेकानेक अस्त्रोंसे अलङ्कृत था। रथ प्रकट होनेके पश्चात् शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर बलिने 'अवभृथ-स्नान' किया। फिर उस रथकी पूजा करके राजा बलि उसपर आरूढ़ हुए और दैत्योंकी सेना साथ लेकर इन्द्रसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। देवपुरीको दैत्योंद्वारा घिरी हुई देख वे श्रेष्ठ देवता बहुत देरतक परस्पर विचार करके बृहस्पतिजीसे बोले— 'महाभाग! अब हम क्या करें। दैत्योंके प्रधान-प्रधान वीर युद्धकी इच्छासे यहाँ आ पहुँचे हैं।'
उनकी बात सुनकर बृहस्पतिजीने कहा— 'देवताओ! ये दैत्यलोग अभी-अभी यज्ञ समाप्त करके शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर यहाँ आये हैं। ये सभी इस समय तपस्या और पराक्रमके द्वारा अजेय हैं।' गुरुका यह वचन सुनकर सम्पूर्ण देवता लज्जित हो गये। इन्द्रकी भी बुद्धि काम नहीं दे रही थी। वे गुरुकी फटकार पाकर लज्जायुक्त और चिन्तामग्न हो गये। सब देवता भयसे व्याकुल हो कश्यपजीके पवित्र आश्रमपर गये। वहाँ उन सबने माता अदितिसे दैत्योंकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। वह अप्रिय समाचार सुनकर पुत्रवत्सला अदितिने कश्यपजीसे कहा— 'महर्षे! देवताओंपर बड़ी भारी विपत्ति आयी है; मेरी बात सुनें और सुनकर उसके लिये कोई उपाय करें। प्रजापते! देवता अमरावती छोड़कर आपके आश्रममें आये हैं। आप उनकी रक्षा करें।' अदितिकी बात सुनकर कश्यपने कहा— 'भामिनि! इस समय असुरोंका क्षय बड़ी भारी तपस्याके द्वारा ही हो सकता है। देवताओंकी कार्य-सिद्धि बहुत शीघ्र नहीं हो सकती। महाभागे! मैं तुम्हारे मनोरथकी सिद्धिके लिये यह व्रत बतला रहा हूँ। शुभे! इसे प्रयत्नपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करो। देवि! भाद्रपदमासमें दशमी तिथिको मनुष्य संयम-नियमके साथ पवित्रतापूर्वक रहकर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये एकभुक्तव्रत करे (एक ही बार भोजन करे)। सुन्दरि! भगवद्भक्तोंको चाहिये कि वे सम्पूर्ण मनोवांछित वरोंके ईश्वर साक्षात् श्रीहरिकी प्रार्थना करें। प्रार्थनाका मन्त्र इस प्रकार है—
तव भक्तोऽस्म्यहं नाथ दशम्यादि दिनत्रयम्।
व्रतं चराम्यहं विष्णो अनुज्ञां दातुमर्हसि॥
'हे नाथ! मैं आपका भक्त हूँ और दशमीसे लेकर तीन दिनतक व्रत करना चाहता हूँ। विष्णो! इसके लिये आप आज्ञा दें।'
'इसी मन्त्रसे जगदीश्वर श्रीहरिकी प्रार्थना करनी चाहिये। एक ही बार भोजन करे। वह एक बारका भोजन भी केलेके पत्तेमें ही ग्रहण करना चाहिये। उस भोजनमें नमक वर्जित है। व्रती पुरुष एकादशी तिथिको यत्नपूर्वक उपवास करे और रात्रिकालमें विशेष चेष्टा करके जागता रहे। फिर द्वादशी तिथिमें विधिपूर्वक भलीभाँति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कुटुम्बी-जनोंके साथ पारण करे। इस प्रकार बारह महीनोंतक प्रतिमास आलस्य छोड़कर इस व्रतका अनुष्ठान करे। वर्षके अन्तमें पुनः भाद्रपदमास आनेपर एकादशीको अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीकी विष्णु प्रतिमा बनाकर उसे कलशपर स्थापित करे। उसीमें यत्नपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रती पुरुष सब दोषोंकी शान्तिके लिये श्रवण-नक्षत्रयुक्त पापनाशिनी द्वादशी तिथिको उपवास करे। महाभागे! इस प्रकार तुम इस कल्याणमय व्रतका अनुष्ठान करो।'