भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये लिंगपूजनपूर्वक प्रदक्षिणा और नमस्कार करनेसे अवश्य कल्याण होता है। ऐसी उत्तम बुद्धि रखकर प्रयत्नपूर्वक लिंगपूजन करना चाहिये। कनेर, मदार, भटकटइया, धतूर, शतपत्र, अमलतास, पुन्नाग (सँदैसरा), मौलसिरी, नागकेसर, नीलकमल, कदम्ब, आक तथा नाना प्रकारके कमल आदि पुष्प तीनों कालमें सदा पवित्र जानने चाहिये। चमेली, बेला, सेवती, श्यामपुष्प, कुटज, कर्णिकार, कुसुम्भ, लाल कमल— ये पुष्प विशेषतः सायंकालमें शिवलिंगपूजनके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं। कमलके फूल तीनों कालमें पवित्र माने गये हैं। रात्रिमें केवल कुमुदके फूल विशेष पवित्र बताये गये हैं। इस प्रकार पूजा-भेदको जानकर शिवलिंगका पूजन करना चाहिये। विधिज्ञ पुरुषोंको शिवालयमें सदा शास्त्रीय विधिको पालन करना चाहिये। शिवलिंग और नन्दिकेश्वरके बीचमें होकर अथवा अर्धान्तरकी परिक्रमा नहीं करनी चाहिये। यदि कोई करता है तो पापका भागी होता है। इस इन्द्रने राजस्वभावका आश्रय लेकर वैसी ही प्रदक्षिणा (जिसका कि निषेध किया गया है) की है। इसीलिये इसका किया हुआ सब कुछ निष्फल हो गया और यही कारण है कि आज वृत्रासुरने इन्द्रको अपना ग्रास बना लिया। देवताओ! अब तुम्हीं लोग महारुद्र-विधानके अनुसार शिवलिंगपूजन करो, जिससे इन्द्र शीघ्र ही छुटकारा पा सकें।'

आकाशवाणीके कथनानुसार देवताओंने प्रतिदिन भगवान् शंकरका पूजन और दशांश हवन आरम्भ किया। तब देवराज इन्द्र भगवान् शिवके प्रसादसे सहसा वृत्रासुरका पेट फाड़कर बाहर निकल आये। हाथी, वज्र, किरीट और कुण्डलसहित परम शोभासम्पन्न महातेजस्वी इन्द्रको देखकर सब देवता, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषि-मुनि बड़े प्रसन्न हुए। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। अनेक शंखोंकी ध्वनि होने लगी। इन्द्रके संकटमुक्त होते ही समस्त देवलोक-निवासियोंमें एक ही साथ महान् हर्षोल्लास छा गया। इन्द्र जहाँ संकटमुक्त हुए थे, वहाँ शची देवी भी आ पहुँचीं। महर्षियोंने शचीके साथ इन्द्रका अभिषेक किया तथा सबने यत्नपूर्वक उनके लिये पुण्याहवाचन किया। विप्रवरो! इस प्रकार जब महर्षियोंने इन्द्रका अभिषेक किया, तब इस पृथ्वीपर अधिकाधिक मंगल-उत्सव होने लगे। इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण किया हुआ वृत्रासुरका अत्यन्त अद्भुत शरीर वहीं गिरकर मेरुगिरिके शिखरकी भाँति सुशोभित होने लगा। उसी भूमिमें ब्रह्महत्या है, जहाँ वृत्रासुरका भयानक शरीर गिरा था। गंगा और यमुनाके बीचमें जो भूमि है, जिसे अन्तर्वेदी कहते हैं, वह पुण्य-भूमि बतायी गयी है। वह लोकपावन भूमि सर्वत्र प्रसिद्ध है। वृत्रासुरके वधसे उत्पन्न होनेवाली ब्रह्महत्या जिस देशमें प्रविष्ट हुई, वह पापी बताया गया है। उस मल-भूमिमें ही वृत्रासुरका महान् मस्तक पड़ा था जिसे इन्द्र आदि देवताओंने छः महीनोंमें काटा है। इस प्रकार वृत्रासुरका वध करके इन्द्रने विजय प्राप्त की और वे शचीनाथ निर्भय होकर इन्द्रासनपर विराजमान हुए।


बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, अदितिके व्रत-तपस्यासे सन्तुष्ट हो भगवान्‌का वामनरूपमें अवतार, बलिके पूर्वजन्मका प्रसंग तथा बलिपर वामनजीकी कृपा

लोमशजी कहते हैं—इसी बीचमें दैत्योंने पाताल-निवासी राजा बलिके पास आकर इन्द्रकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। उनकी यह बात सुनकर उदार बुद्धिवाले विरोचनपुत्र बलिने शुक्राचार्यसे पूछा—'भगवन्! इन्द्र किस प्रकार हमारे अधीन हो सकते हैं।' शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'दैत्यराज! तुम विश्वजित्