भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 70
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४१

'इसी प्रकार फल, दीप आदि तथा नैवेद्य और ताम्बूल आदि सामग्रियाँ क्रमशः चढ़ाकर विधिज्ञ पुरुष भगवान् शिवकी पूजा करे तथा रात्रिमें यत्नपूर्वक जागरण करे। अपने घरमें या देवालयमें चंदोवा तनाकर अद्भुत सामग्रियोंसे सजा हुआ एक मण्डप बनावे। उसमें गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा भगवान् सदाशिवकी पूजा करे। इन्द्र! प्रदोष-व्रतके उद्यापनकी यही विधि है। विधिज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिके लिये इसी प्रकारसे सब कुछ करे।'

गुरु बृहस्पतिजीने जो कुछ बताया, उसके अनुसार इन्द्रने सब विधिका पालन किया।

नमुचिके मारे जानेपर सब देवता हर्ष और उत्साहमें भरे हुए थे। उनका दैत्योंके साथ घोर युद्ध हुआ। देवताओं और दैत्योंका संहार करनेवाले उस घोर संग्राममें अत्यन्त भयंकर तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। इसी समय पूर्वोक्त प्रकारसे भगवान् शंकरकी आराधना करके इन्द्र भी युद्धमें लग गये। उन्होंने देवताओंको साथ लेकर वृत्रासुरका पीछा किया। व्योमासुरने यमराजके साथ तथा तीक्ष्णकोपने अग्निके साथ युद्ध आरम्भ किया। वायुके साथ धूम और नैर्ऋतके साथ अतिकोपन लड़ने लगा। कुबेरके साथ कूष्माण्ड तथा ईशके साथ दुःसह भिड़ गया। इनके सिवा और भी बहुतसे महाबली दैत्य देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध करने लगे। उन्होंने गदा, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, तोमर, मुद्गर, ऋष्टि, भिन्दिपाल, पास, प्रास तथा मुष्टिक आदिसे प्रहार किया। उसी प्रकार देवता भी दधीचिकी हड्डियोंसे बने हुए उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा असुरोंको विदीर्ण करने लगे। देवताओंकी मार खाकर दैत्य पुनः पराजयको प्राप्त हुए। उन्हें भयभीत देख वृत्रासुरने समझाया— 'वीरो! युद्ध स्वर्गका द्वार है, इसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। जिनकी संग्राममें मृत्यु होती है, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। विद्वान् पुरुष जहाँ कहीं भी सम्भव हो संग्राममें मृत्युकी अभिलाषा करते हैं। जो लोग युद्ध छोड़कर भागते हैं, वे निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं। महापातकी मनुष्य भी यदि गौ, ब्राह्मण, भृत्य, कुटुम्ब तथा स्त्रीकी रक्षाके लिये हाथमें शस्त्र लेकर युद्ध करें तथा वे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो जायें अथवा युद्धस्थलमें ही प्राण त्याग दें तो उन्हें निश्चय ही उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। वे ज्ञानियोंके लिये भी दुर्लभ उत्कृष्ट पदको प्राप्त कर लेते हैं। अतः तुमलोगोंको अपने स्वामीके कार्य-साधनमें पूर्णतः तत्पर रहकर युद्ध करना चाहिये।' वृत्रके इस प्रकार समझानेपर असुरोंने उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और देवताओंके साथ ऐसा घमासान युद्ध आरम्भ किया, जो सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर था। इधर मारनेकी इच्छासे इन्द्रको आते देख वृत्रासुर ठठाकर हँस पड़ा; उसका वह अट्टहास इन्द्रको भी भयभीत कर देनेवाला था। वीर वृत्रासुर बड़ा तेजस्वी था। उस समय वह दैत्योंका अधिपति बना हुआ था। उसके मनमें सुरश्रेष्ठ इन्द्रको निगल जानेकी इच्छा हुई और वह बहुत बड़ा मुँह फैलाकर इन्द्रकी ओर बढ़ा। समीप आनेपर उसने ऐरावत हाथी, वज्र और किरीटसहित इन्द्रको सहसा निगल लिया और वह नाचने तथा गर्जना करने लगा। पलक मारते-मारते इन्द्र वृत्रासुरके ग्रास बन गये। वहाँ उपस्थित रहकर यह दुर्घटना देखनेवाले देवताओंमें बड़ा हाहाकार मचा। धरती काँप उठी। हजारों उल्कापात होने लगे तथा सम्पूर्ण चराचर जगत्में अन्धकार छा गया। उस समय सब देवता चिन्तामग्न हो ब्रह्माजीके पास गये और वृत्रासुरकी सारी करतूत उन्होंने ब्रह्माजीसे कह सुनायी। सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके भगवान् शंकरका स्तवन किया। उसी समय आकाशवाणी हुई—'इन्द्रने प्रदोषव्रतका अनुष्ठान करते समय कुछ विपरीत कार्य कर डाला है। जो मूर्ख शिवनिर्माल्य, अर्घा, शिवलिंगकी छाया तथा देव-मन्दिरका लंघन करते हैं, वे शिव-गणोंमें प्रधान चण्डेशके द्वारा दण्डनीय हैं; इसमें