संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इस प्रकार पंचामृतद्वारा भगवान् वृषभध्वजको स्नान कराना चाहिये। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष ताँबेके अर्घ्यपात्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे—
( अर्घ्य-मन्त्र )
अर्च्योऽसि त्वमुमाकान्त त्वर्घ्येणानेन वै प्रभो।
गृहाण त्वं मया दत्तं प्रसन्नो भव शंकर॥
‘उमावल्लभ! प्रभो! आप इस अर्घ्यद्वारा पूजन करनेयोग्य हैं। भगवान् शंकर! मेरे दिये हुए अर्घ्यको आप ग्रहण करें और मुझपर प्रसन्न हों।’
( पाद्य-मन्त्र )
मया दत्तं तु ते पाद्यं पुष्पगन्धसमन्वितम्।
गृहाण देवदेवेश प्रसन्नो वरदो भव॥
‘देवदेवेश! मेरे द्वारा आपको समर्पित गन्ध-पुष्पयुक्त यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) आप ग्रहण करें तथा प्रसन्न होकर मेरे लिये वरदायक बनें।’
( आसनसमर्पण-मन्त्र )
विष्टरं विष्टरेणैव मया दत्तं च वै प्रभो।
शान्त्यर्थं तव देवेश वरदो भव मे सदा॥
‘प्रभो! मैंने आपके सन्तोषके लिये कुशनिर्मित आसन समर्पित किया है। देवेश्वर! आप मेरे लिये सदा वरदायक बने रहें।’
( आचमन-मन्त्र )
आचमनं मया दत्तं तव विश्वेश्वर प्रभो।
गृहाण परमेशान तुष्टो भव ममाद्य वै॥
‘प्रभो! विश्वेश्वर! मैंने आपको यह आचमनार्थ जल समर्पित किया है। परमेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और आज मुझपर प्रसन्न हों।’
( यज्ञोपवीत-मन्त्र )
ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं ब्रह्मकर्मप्रवर्तकम्।
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं तव प्रभो॥१
‘प्रभो! यह सुवर्णरंगका (पीत) यज्ञोपवीत मैंने आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है; यह ब्रह्मग्रन्थिसे युक्त है तथा ब्रह्मकर्म (वैदिक यज्ञ-यागादि तथा भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म)-में लगानेवाला है।’
( वस्त्र-मन्त्र )
एतद् वासो मया दत्तं सोत्तरीयं सुशोभनम्।
गृहाण त्वं महादेव ममायुष्यप्रदो भव॥
‘महादेवजी! मैंने यह चादरसहित परम सुन्दर वस्त्र आपको भेंट किया है; आप इसे ग्रहण करें और मुझे आयु प्रदान करें।’
( चन्दन-मन्त्र )
सुगन्धं चन्दनं देव मया दत्तं तु ते प्रभो।
भक्त्या परमया शम्भो सुगन्धं कुरु मां भव॥
‘देव! शम्भो! मैंने आपको बड़ी भक्तिसे सुगन्धित चन्दन समर्पित किया है; सबके जन्मदाता भगवान् शिव! आप मुझे उत्तम गन्धसे युक्त करें।’
( धूप-मन्त्र )
धूपं विशिष्टं परमं सर्वौषधिविजृम्भितम्।
गृहाण परमेशान मम शान्त्यर्थमेव च॥
‘परमेश्वर! सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा बहुत ही विशिष्ट बनी हुई यह धूप आपकी सेवामें समर्पित है। मेरी शान्तिके लिये आप इसे ग्रहण करें।’
( दीप-मन्त्र )
दीपं हि परमं शम्भो घृतप्रज्वलितं मया।
दत्तं गृहाण देवेश मम ज्ञानप्रदो भव॥
‘शम्भो! मैंने घीसे जलाया हुआ यह उत्तम दीप आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है। देवेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और मेरे लिये ज्ञानदाता बनें।’
( आरती-मन्त्र )
दीपावलिं मया दत्तां गृहाण परमेश्वर।
आरार्तिकप्रदानेन मम तेजःप्रदो भव॥२
‘परमेश्वर! मेरी दी हुई यह दीप-माला आप ग्रहण करें, तथा इस आरती उतारनेसे सन्तुष्ट होकर आप मुझे तेज प्रदान करें।’
१. पाठान्तर इस प्रकार है—
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं च शंकर। गृहाण परया तुष्ट्या तुष्टो भव तु सर्वदा॥
२. ये पूजासम्बन्धी मन्त्र स्क० पु०, मा० के० अध्याय १७ के श्लोक १२१ से १३६ तक आये हैं।