संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३९
'पार्वती-देवीके इस प्रकार शाप देनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ चित्ररथ सहसा स्वर्गसे नीचे गिर पड़ा। वही इस समय आसुरी योनिमें आकर वृत्रासुरके नामसे प्रसिद्ध हुआ है। विश्वकर्माकी भारी तपस्यासे युक्त होनेके कारण इस समय वृत्रासुर अजेय बतलाया जाता है। इसलिये तुम प्रदोषकालमें विधिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये महादैत्य वृत्रासुरका वध करो।'
गुरु बृहस्पतिकी यह बात सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस समय मुझे इस प्रदोषव्रतके उद्यापनकी विधि बतलाइये।' बृहस्पतिजीने कहा—'कार्तिकमास आनेपर शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी हो तो वह व्रतकी सिद्धिके लिये ग्राह्य है। आज वह तिथि स्वतःप्राप्त है। इसमें चाँदीका वृषभ बनवाना चाहिये। उस वृषभकी पीठपर सुन्दर सिंहासन रखना चाहिये। उस सिंहासनपर उमाकान्त भगवान् शिवकी स्थापना करनी चाहिये। भगवान्के तीन नेत्र, पाँच मुख और दस भुजाएँ हों। उनके आधे अंगमें सती-साध्वी पार्वतीका निवास हो। इस प्रकार उमा और महेश्वरकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। उस प्रतिमाको वृषभकी पीठपर वस्त्रसे ढके हुए ताँबेके पात्रमें स्थापित करके रात्रिमें श्रद्धा और विधिके साथ जागरण करना चाहिये। पहले यत्नपूर्वक प्रतिमाको पंचामृतसे स्नान कराना चाहिये। देवराज! मैं पूजाके मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो—
( दुग्धसे स्नान करानेका मन्त्र ) गोक्षीरधाम देवेश गोक्षीरेण मया कृतम्। स्नपनं देवदेवेश गृहाण परमेश्वर ॥ 'गायके दूधमें निवास करनेवाले देवेश! देवदेवेश्वर ! परमेश्वर ! मैंने गायके दूधसे आपको स्नान कराया है, कृपया इसे स्वीकार करें।'
( दधि-स्नान-मन्त्र ) दध्ना चैव महादेव स्नपनं कार्यते मया। गृहाण च मया दत्तं सुप्रसन्नो भवाद्य वै॥ 'महादेवजी! मैं दहीसे आपको स्नान करवा रहा हूँ। मेरे द्वारा समर्पित यह दधि-स्नान आप स्वीकार करें तथा आज मुझपर निश्चय ही अत्यन्त प्रसन्न हों।'
( घृत-स्नान-मन्त्र ) सर्पिषा च मया देव स्नपनं क्रियतेऽधुना। गृहाण श्रद्धया दत्तं तव प्रीत्यर्थमेव च॥ 'देव! अब मैं घीसे आपको स्नान करा रहा हूँ। मेरे द्वारा आपकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक समर्पित यह घृत-स्नान आप अंगीकार करें।'
( मधु-स्नान-मन्त्र ) इदं मधु मया दत्तं तव तुष्ट्यर्थमेव च। गृहाण त्वं हि देवेश मम शान्तिप्रदो भव॥ 'देवेश्वर ! आपके सन्तोषके लिये मेरा दिया हुआ यह मधु आप ग्रहण करें तथा मेरे लिये शान्तिदायक बनें।'
( शर्करा-स्नान-मन्त्र ) सितया देवदेवेश स्नपनं क्रियते मया। गृहाण श्रद्धया दत्तां सुप्रसन्नो भव प्रभो॥ 'देवदेवेश्वर ! मैं मिश्री (या शर्करा)-से आपको स्नान करा रहा हूँ। प्रभो! श्रद्धापूर्वक दी हुई इस मिश्री (या शर्करा)-को आप स्वीकार करें तथा मुझपर भलीभाँति प्रसन्न हों।'