भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दर्शनं करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है! जो लिंगरूप, लिंग (कारण) तथा कारणोंके भी अधिपति हैं, उन्हें नमस्कार है! महाप्रलयरूप रुद्रको नमस्कार है! प्रणवके अर्थभूत ब्रह्मरूप शिवको नमस्कार है! जो कारणोंके भी कारण, मृत्युंजय तथा स्वयम्भू-रूप हैं, उन्हें नमस्कार है! हे श्रीत्र्यम्बक ! हे नीलकण्ठ ! हे शर्व ! हे गौरीपते ! आप सम्पूर्ण मंगलोंके हेतु हैं; आपको नमस्कार है!' १

'प्रदोष-व्रत करनेवालेको महादेवजीके इन सौ नामोंका पाठ अवश्य करना चाहिये। महामते इन्द्र ! इस प्रकार तुमसे मैंने शिव-प्रदोष-व्रतकी विधि बतलायी है। महाभाग ! शीघ्रतापूर्वक इस व्रतका पालन करो। तत्पश्चात् युद्ध करना। भगवान् शिवकी कृपासे तुम्हें विजय आदि सब कुछ प्राप्त होगा।'

'एक समयकी बात है, राजा चित्ररथ विमानपर बैठकर नाना प्रकारके द्वीपोंका दर्शन करते हुए भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलास पर्वतपर गया। वहाँ उसने परम अद्भुत एवं अनुपम छबिवाले भगवान् शंकरके दर्शन किये। वे अपने आधे अंगमें पार्वती देवीको बिठाकर शोभा पा रहे थे। कर्पूरके समान गौरवर्ण, कमलनयन भगवान् शिवको पार्वती देवीके साथ देखकर राजा चित्ररथने उपहासपूर्वक कहा—'शम्भो ! संसारमें जो विषयी मनुष्य आदि हैं तथा स्त्रियोंके वशीभूत रहनेवाले जो दूसरे-दूसरे लोग हैं, वे तथा हम-जैसे अज्ञानी जीव भी जनसमुदायमें संकोचवश स्त्री-सेवन नहीं करते।' यह सुनकर गिरिराजनन्दिनी उमाने कहा—'अरे दुरात्मन् ! रे मूढ़ ! तूने मेरे साथ बैठे हुए भगवान् शिवका उपहास किया है। अतः इस कर्मका फल तू शीघ्र ही देखेगा। जो समतायुक्त चित्तवाले साधु पुरुषोंका उपहास करता है, वह देवता हो या मनुष्य, उसे अधमसे भी अधम जानना चाहिये। २ तू देवता और द्विज दोनोंकी श्रेणीसे बहिष्कृत है। अपनेको बड़ा ज्ञानी माननेवाले तुझ अधमको आज मैं दैत्य बनाये देती हूँ।'


१. नमो रुद्राय नीलाय भीमाय परमात्मने।कपर्दिने सुरेशाय व्योमकेशाय वै नमः॥
वृषभध्वजाय सोमाय सोमनाथाय शम्भवे।दिगम्बराय भर्गाय उमाकान्ताय वै नमः॥
तपोमयाय भव्याय शिवश्रेष्ठाय विष्णवे।व्यालप्रियाय व्यालाय व्यालानां पतये नमः॥
महीधराय व्याघ्राय पशूनां पतये नमः।पुरान्तकाय सिंहाय शार्दूलाय मखाय च॥
मीनाय मीननाथाय सिद्धाय परमेष्ठिने।कामान्तकाय बुद्धाय बुद्धीनां पतये नमः॥
कपोताय विशिष्टाय शिष्टाय सकलात्मने।वेदाय वेदजीवाय वेदगुह्याय वै नमः॥
दीर्घाय दीर्घरूपाय दीर्घार्थायविनाशिने।नमो जगत्प्रतिष्ठाय व्योमरूपाय वै नमः॥
गजासुरमहाकालायान्धकासुरभेदिने ।नीललोहितशुक्लाय चण्डमुण्डप्रियाय च॥
भक्तिप्रियाय देवाय ज्ञात्रे ज्ञानाव्ययाय च।महेशाय नमस्तुभ्यं महादेव हराय च॥
त्रिनेत्राय त्रिवेदाय वेदाङ्गाय नमो नमः।अर्थाय चारुरूपाय परमार्थाय वै नमः॥
विश्वभूपाय विश्वाय विश्वनाथाय वै नमः।शंकराय च कालाय कालावयवरूपिणे॥
अरूपाय विरूपाय सूक्ष्मसूक्ष्माय वै नमः।श्मशानवासिने भूयो नमस्ते कृत्तिवाससे॥
शशाङ्कशेखरायाशायोगभूमिशयाय च।दुर्गाय दुर्गपाराय दुर्गावयवसाक्षिणे॥
लिंगरूपाय लिंगाय लिंगानां पतये नमः।नमः प्रलयरूपाय प्रणवार्थाय वै नमः॥

नमो नमः कारणकारणाय मृत्युञ्जयायात्मभवस्वरूपिणे।
श्रीत्र्यम्बकायासितकण्ठशर्व गौरीपते सकलमङ्गलहेतवे नमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। ७६–९०)

२. साधूनां समचित्तानामुपहासं करोति यः। देवो वाप्यथवा मर्त्यः स विज्ञेयोऽधमाधमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। १०८)