भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पतिव्रता अदितिने देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये पूर्ण एकाग्रताके साथ कश्यपजीके बताये हुए उस व्रतका पालन किया। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करनेसे भगवान् श्रीहरि सन्तुष्ट हो गये। ब्राह्मणो! उस समय श्रवण-नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथिको भगवान्‌का 'वामन' रूपमें प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मचारी बालकका रूप धारण करके परम शोभायमान दिखायी देते थे। उनके दो भुजाएँ थीं, कमलके समान खिले हुए सुन्दर नेत्र थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। वे वनमालासे अलंकृत थे। अदिति देवी पूजाके मध्यमें ही भगवान्‌का इस रूपमें दर्शन पाकर आश्चर्यचकित हो उठीं। उस समय उन्होंने कश्यपजीके साथ भगवान्‌का इस प्रकार स्तवन किया—'जो कारणके भी परम कारण हैं उन विश्वात्मा, विश्वस्रष्टा तथा अजन्मा श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। अनन्तरूप श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। जिनका परम धाम अनन्त है तथा जो साक्षात् परमात्मरूप हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। हे सच्चिदानन्दमय परमात्मदेव! आप पर, अपर तथा ज्ञानवान् सबके आत्मा हैं। आपको नमस्कार है। परावरात्मन्! (कार्य-कारणरूप) आपका स्वरूप सबसे श्रेष्ठ है, आपका बोध कभी कुण्ठित नहीं होता। आपको बारंबार नमस्कार है।'*

इस प्रकार अदितिद्वारा स्तुति की जानेपर देवताओंके पालक भगवान् विष्णु देवमाता अदितिसे बोले—'देवि! मैं तुम्हारी उत्कृष्ट तपस्यासे सन्तुष्ट होकर इसी शरीरसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ।' भगवान्‌का वचन सुनकर अदितिने कहा—'भगवन्! महाबली असुरोंने देवताओंको परास्त कर दिया है। जनार्दन! अब सभी देवता आपकी शरणमें आये हैं, आप उन शरणागतोंकी रक्षा करें।' संतोंके आश्रय तथा वैकुण्ठधामके स्वामी एकमात्र श्रीहरिने अदितिकी बात सुनकर तथा देवताओं और राजा बलिकी सारी चेष्टाएँ जानकर मन-ही-मन विचार किया कि आज मुझे कौन-सा कार्य करना चाहिये, जिससे देवताओंको विजय प्राप्त हो और प्रधान-प्रधान दैत्योंको भी हार खानी पड़े।

उधर बलि आदि असुरोंको यह मालूम नहीं था कि देवता नाना प्रकारके रूप धारण करके स्वर्गसे निकलकर कश्यपजीके आश्रमपर चले गये हैं। उस समय दैत्योंने अमरावतीपुरीकी चहारदीवारीपर चढ़कर देवराज इन्द्रको शीघ्र मार डालनेकी इच्छासे ज्यों ही उसके भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उन्हें वह सारी नगरी सूनी दिखायी दी। तब शुक्राचार्यने महाभिषेककी विधिसे असुरोंद्वारा घिरे हुए राजा बलिको इन्द्रके सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। इस प्रकार स्वर्गलोकके राज्यपर प्रतिष्ठित हुए विरोचनकुमार बलि वहाँकी उत्तम विभूतिके द्वारा महेन्द्रसे भी अधिक शोभायमान हुए। ऋषि, अप्सरा, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा असुरसमुदाय इन्द्रकी ही भाँति उनकी सेवा करने लगे। सम्पूर्ण


* प्रादुर्बभूव द्वादश्यां श्रवणेन तदा द्विजः। वटुरूपधरः श्रीमान् द्विभुजः कमलेक्षणः॥
अतसीपुष्पसङ्काशो वनमालाविभूषितः। तं दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा पूजामध्येऽदितिस्तदा॥
कश्यपेन समायुक्ता सास्तौषीत् कमलेक्षणा।

अदितिरुवाच
नमो नमः कारणकारणाय विश्वात्मने विश्वसृजेऽभवाय।
अनन्तरूपाय नमो नमस्ते त्वनन्तधाम्ने परमात्मरूपिणे॥
परापराणां परमात्मदैवतं चिन्मात्रकं ज्ञानवतां स्वरूपिणे।
वरेण्यरूपाय परावरात्मनकुण्ठबोधाय नमो नमस्ते॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। २४—२८)

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