संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४५
प्राणियोंमें दानकी दृष्टिसे राजा बलि ही सबसे बढ़कर दाता हैं। याचक जिन-जिन कामनाओंको प्राप्त करनेकी इच्छा करते, दानवराज बलि सम्पूर्ण याचकोंको वही-वही वस्तु प्रदान करते थे।
शौनकजीने पूछा—महाभाग सूतजी! देवराज इन्द्र तो स्वर्गमें रहकर कभी दान नहीं देते हैं। राजा बलि कैसे दाता हुए? यह सब यथार्थरूपसे बतलाइये।
लोमशजी बोले—ब्राह्मणो! इन्द्र पहले जन्ममें याज्ञिक रहे हैं। उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके अमरावतीपुरीका राज्य प्राप्त किया है। अब वे केवल भोग-लोलुप रह गये हैं। अभीष्ट फल पानेके पश्चात् इन्द्रमें कृपणता आ गयी है। आज जो इन्द्र है वह कभी कीड़ा हो सकता है तथा पहलेका कीट इन्द्रके रूपमें उत्पन्न हो जाता है। इस विषयमें दानसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा साधन नहीं है। (निष्काम) दानसे ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञानसे मोक्ष। इसमें संशय नहीं है।
अब विरोचनपुत्र बलिने पूर्वजन्ममें जो कुछ किया था उसे सुनो—प्राचीन कालमें देवताओं और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला एक महापापी जुआरी था। वह सदा परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहता था। एक दिन उसने कपटपूर्ण जुएके द्वारा बहुत धन जीता। फिर अपने हाथोंसे स्वस्तिक (पानका तिकोना बीड़ा) बनाकर तथा गन्ध और माला आदि सामग्री जुटाकर एक वेश्याको भेंट देनेके लिये वह उसके घरकी ओर दौड़ा। रास्तेमें उसके पैर लड़खड़ा गये और उसी समय वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। गिरनेपर क्षणभरके लिये उसे मूर्च्छा आ गयी; जब मूर्च्छा दूर हुई तब पूर्वजन्मके किसी पुण्यके प्रभावसे उसके मनमें सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। जुआरी दुःखी होकर खेद एवं वैराग्यको प्राप्त हुआ। मूर्ख और जुआरी होनेपर भी उसने पृथ्वीपर पड़ी हुई गन्ध, पुष्प आदि श्रेष्ठ सामग्रीको भगवान् शिवकी सेवामें समर्पित कर दिया। जीवनमें केवल यही एक पुण्य उसके द्वारा सम्पन्न हुआ था। मृत्युके बाद जब यमराजके दूत उसे यमलोक ले गये, तब उस पापीसे सबको भय देनेवाले यमराजने कहा—'ओ मूर्ख! तू अपने पापके कारण बड़े-बड़े नरकोंमें यातना भोगनेके योग्य है।' उसने कहा—'यमराज! यदि मेरा कोई पुण्य भी हो तो उसका भलीभाँति विचार कर लीजिये।' तब चित्रगुप्तने कहा—'तुमने देहान्त होनेके समय पृथ्वीपर पड़े हुए कुछ गन्ध और पुष्प आदिको भगवान् शिवके उद्देश्यसे दान किया है, परमात्मा शिवको वह सामग्री समर्पित की है; उस सत्कर्मके फलसे तुम्हें तीन घड़ीके लिये इन्द्रका प्रसिद्ध पद प्राप्त होगा। चित्रगुप्तकी बात सुनकर जुआरीने कहा—'मैं सबसे पहले अपना शुभ कर्म भोगूँगा।' उसके ऐसा कहनेपर उदारबुद्धिवाले बृहस्पतिजी सम्पूर्ण देवताओंके साथ तत्काल वहाँ आ पहुँचे और उस जुआरीको ऐरावत हाथीपर चढ़ाकर इन्द्रभवनमें ले गये। वहाँ पवित्रात्मा बृहस्पतिने इन्द्रको समझाया—'पुरन्दर! तुम मेरी आज्ञासे इस जुआरीको तीन घड़ीके लिये अपने सिंहासनपर बिठाओ।' गुरुकी बात मानकर इन्द्र उदासीनभावसे राज्य छोड़कर अन्यत्र चले गये। तदनन्तर जुआरीको देवराजके भवनमें पहुँचाया गया।
तब जुआरीने वहाँ दान करना आरम्भ किया। महादेवजीके उस प्रिय भक्तने 'ऐरावत' हाथी अगस्त्यको दे दिया। उसकी बुद्धि बड़ी उदार थी। उसने 'उच्चैःश्रवा' नामक घोड़ा विश्वामित्रको दे दिया। उसका महान् यश फैला हुआ था। उसने 'कामधेनु' गाय महर्षि वसिष्ठको दे दी और 'चिन्तामणि' नामक रत्न गालव मुनिको समर्पित कर दिया। उस महातेजस्वी दाताने 'कल्पवृक्ष' उठाकर कौण्डिन्य मुनिको दे दिया। जुआरी होकर भी वह बड़ा भाग्यशाली था, उसने भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये वैसे-वैसे अनेक प्रकारके रत्न ऋषि-मुनियोंको सहर्ष दान कर दिये। जबतक तीन घड़ी पूरी नहीं हुई तबतक वह दान देता ही रहा। तीन घड़ीके बाद फिर