भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वह स्वर्गसे चला गया। इन्द्र अमरावतीके सिंहासनपर बैठकर बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले—'गुरुदेव! ऐरावत हाथी नहीं दिखायी देता, यही दशा उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेकी भी है। पारिजात आदि सभी पदार्थ किसीने चुरा लिये हैं।' तब बृहस्पतिजी बोले—'जुआरीने यहाँ आकर महान् कर्म किया है, जबतक उसकी सत्ता रही है उसके भीतर ही उसने आज ऐरावत आदि सभी वस्तुएँ ऋषियोंको दान कर दी है। बड़ी भारी सत्ता हस्तगत होनेपर जो स्वाधीन होते हैं और प्रमादमें न पड़कर सदा भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे ही भगवान् शंकरके प्रिय भक्त हैं। वे कर्मफलोंका परित्याग कर केवल ज्ञानका आश्रय ले परमपदको प्राप्त होते हैं।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने पूछा—'आचार्य! अब हमारा क्या कर्तव्य है, यह शीघ्र बतलानेकी कृपा करें।' बृहस्पतिजीने कहा—'इन्द्र! अपनी समृद्धिके लिये ये सारी बातें प्रायः यमराजसे कहनी चाहिये।' 'ठीक है' ऐसा कहकर देवराज इन्द्र गुरु बृहस्पतिके साथ सहसा वहाँसे चल पड़े। अपना कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे जब इन्द्र संयमनीपुरीमें पहुँचे तब यमराजने उनका बड़ा सत्कार किया। उस समय इन्द्रने कहा—'धर्मराज! तुमने मेरा पद एक दुरात्मा जुआरीको दे दिया, किंतु उसने वहाँ पहुँचकर बहुत बुरा काम किया। तुम सच मानो उसने मेरे सभी रत्न इन ऋषियोंको दान कर दिये हैं। तुम सब कुछ जानते हो, फिर भी एक जुआरीको मेरा स्थान कैसे दे दिया?'

तब धर्मराजने इन्द्रसे इस प्रकार कहा—'तुम बड़े-बड़े देवेश्वरोंके राजा हो। बूढ़े हो गये, किंतु अभीतक तुम्हारी राज्यविषयक आसक्ति दूर नहीं हुई। केवल सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके एक ही जन्मके उपार्जित पुण्यका फल यहाँ तुमने प्राप्त किया। परंतु जुआरीने तुम्हारी अपेक्षा महान् पुण्यका उपार्जन किया है। अब धन देकर या चरणोंमें मस्तक झुकाकर विशेषतः अगस्त्य आदि सभी मुनियोंकी प्रार्थना करके तुम्हें अपने ऐरावत आदि रत्न प्राप्त करने चाहिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीको चले गये। वहाँ जाकर सम्पत्तिशालियोंमें सबसे श्रेष्ठ इन्द्रने बहुत धन देकर ऋषियोंसे अपनी वस्तुएँ लौटायीं। इस प्रकार अपने रत्न पाकर महातेजस्वी इन्द्र शचीदेवीके साथ अपनी पुरीमें गये। यमराजने जुआरीको पुनः जन्म दिया। वह अपने किसी कर्मविपाकसे विरोचनका पुत्र हुआ। उस समय उसकी माताका नाम सुरुचि था। सुरुचि विरोचनकी रानी थी। उसके पिताका नाम वृषपर्वा था। वह उदार मनवाला जुआरी जब सुरुचिके गर्भमें आकर स्थित हुआ, तबसे प्रह्लादकुमार विरोचन तथा सुरुचिका मन धर्म और दानमें अधिक लगने लगा। उसीने गर्भमें आकर माता-पिताकी मति बहुत ही उत्तम कर दी थी। वैसी बुद्धि बड़े-बड़े मनीषियोंके लिये भी दुर्लभ है। विरोचनका पुत्र जब गर्भमें था, उसी समय इन्द्र दैत्यराज विरोचनको मारनेकी इच्छासे भिक्षुक ब्राह्मणका रूप धारणकर उसके घर गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! मुझे अपनी रुचिके अनुसार कुछ दान मिलना चाहिये।' याचककी बात सुनकर विरोचनने हँसते हुए कहा—'विप्रवर! यदि आपकी इच्छा हो तो मैं इस समय अपना