भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वह स्वर्गसे चला गया। इन्द्र अमरावतीके सिंहासनपर बैठकर बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले—'गुरुदेव! ऐरावत हाथी नहीं दिखायी देता, यही दशा उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेकी भी है। पारिजात आदि सभी पदार्थ किसीने चुरा लिये हैं।' तब बृहस्पतिजी बोले—'जुआरीने यहाँ आकर महान् कर्म किया है, जबतक उसकी सत्ता रही है उसके भीतर ही उसने आज ऐरावत आदि सभी वस्तुएँ ऋषियोंको दान कर दी है। बड़ी भारी सत्ता हस्तगत होनेपर जो स्वाधीन होते हैं और प्रमादमें न पड़कर सदा भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे ही भगवान् शंकरके प्रिय भक्त हैं। वे कर्मफलोंका परित्याग कर केवल ज्ञानका आश्रय ले परमपदको प्राप्त होते हैं।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने पूछा—'आचार्य! अब हमारा क्या कर्तव्य है, यह शीघ्र बतलानेकी कृपा करें।' बृहस्पतिजीने कहा—'इन्द्र! अपनी समृद्धिके लिये ये सारी बातें प्रायः यमराजसे कहनी चाहिये।' 'ठीक है' ऐसा कहकर देवराज इन्द्र गुरु बृहस्पतिके साथ सहसा वहाँसे चल पड़े। अपना कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे जब इन्द्र संयमनीपुरीमें पहुँचे तब यमराजने उनका बड़ा सत्कार किया। उस समय इन्द्रने कहा—'धर्मराज! तुमने मेरा पद एक दुरात्मा जुआरीको दे दिया, किंतु उसने वहाँ पहुँचकर बहुत बुरा काम किया। तुम सच मानो उसने मेरे सभी रत्न इन ऋषियोंको दान कर दिये हैं। तुम सब कुछ जानते हो, फिर भी एक जुआरीको मेरा स्थान कैसे दे दिया?'

तब धर्मराजने इन्द्रसे इस प्रकार कहा—'तुम बड़े-बड़े देवेश्वरोंके राजा हो। बूढ़े हो गये, किंतु अभीतक तुम्हारी राज्यविषयक आसक्ति दूर नहीं हुई। केवल सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके एक ही जन्मके उपार्जित पुण्यका फल यहाँ तुमने प्राप्त किया। परंतु जुआरीने तुम्हारी अपेक्षा महान् पुण्यका उपार्जन किया है। अब धन देकर या चरणोंमें मस्तक झुकाकर विशेषतः अगस्त्य आदि सभी मुनियोंकी प्रार्थना करके तुम्हें अपने ऐरावत आदि रत्न प्राप्त करने चाहिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीको चले गये। वहाँ जाकर सम्पत्तिशालियोंमें सबसे श्रेष्ठ इन्द्रने बहुत धन देकर ऋषियोंसे अपनी वस्तुएँ लौटायीं। इस प्रकार अपने रत्न पाकर महातेजस्वी इन्द्र शचीदेवीके साथ अपनी पुरीमें गये। यमराजने जुआरीको पुनः जन्म दिया। वह अपने किसी कर्मविपाकसे विरोचनका पुत्र हुआ। उस समय उसकी माताका नाम सुरुचि था। सुरुचि विरोचनकी रानी थी। उसके पिताका नाम वृषपर्वा था। वह उदार मनवाला जुआरी जब सुरुचिके गर्भमें आकर स्थित हुआ, तबसे प्रह्लादकुमार विरोचन तथा सुरुचिका मन धर्म और दानमें अधिक लगने लगा। उसीने गर्भमें आकर माता-पिताकी मति बहुत ही उत्तम कर दी थी। वैसी बुद्धि बड़े-बड़े मनीषियोंके लिये भी दुर्लभ है। विरोचनका पुत्र जब गर्भमें था, उसी समय इन्द्र दैत्यराज विरोचनको मारनेकी इच्छासे भिक्षुक ब्राह्मणका रूप धारणकर उसके घर गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! मुझे अपनी रुचिके अनुसार कुछ दान मिलना चाहिये।' याचककी बात सुनकर विरोचनने हँसते हुए कहा—'विप्रवर! यदि आपकी इच्छा हो तो मैं इस समय अपना

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४७

मस्तक भी दे सकता हूँ। इसके सिवा यह अपना अकण्टक राज्य भी आपको समर्पित कर दूँगा।'

विरोचनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सोच-विचारकर कहा—'महाभाग! मुझे अपना मुकुटमण्डित मस्तक उतारकर दे दीजिये।' ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर प्रह्लादपुत्र विरोचनने बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने ही हाथसे अपना मस्तक काटकर शीघ्रतापूर्वक इन्द्रको दे दिया। आर्त प्राणियोंको अपनी शक्तिके अनुसार जो कुछ दिया जाता है, वह दान महान् पुण्यका हेतु होता है; उसका फल अक्षय बताया जाता है। तीनों लोकोंमें दानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है।* विरोचनका वह दान दैत्य, नरेन्द्र तथा नाग—इन तीनोंके लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया। पूर्वजन्मका वह जुआरी ही विरोचनका महातेजस्वी पुत्र हुआ। पिताके मरनेपर जब उसका जन्म हो गया तब उसकी पतिव्रता माताने अपना शरीर त्याग दिया और वह तत्काल पतिलोकको चली गयी। शुक्राचार्यने उसी पुत्रको पिताके सिंहासनपर अभिषिक्त किया। वही महायशस्वी कुमार लोकमें बलिके नामसे विख्यात हुआ।

हम यह बात पहले ही बता आये हैं कि राजा बलिसे त्रस्त होकर सम्पूर्ण महाबली देवता कश्यपजीके शुभाश्रमपर चले गये थे। देवपुरीमें महायशस्वी बलि जब इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हुए तब वे अपनी तपस्यासे स्वयं ही सूर्य बनकर तपने लगे, स्वयं ही इन्द्र, अग्नि और वायुका काम करने लगे। महात्मा बलिने धर्मराजके न रहनेपर भी धर्मलोकका संचालन किया। वे स्वयं ही ईशान होकर ईशानकोणमें विराजमान हुए। वे ही नैर्ऋत्यकोण और पश्चिममें क्रमशः निर्ऋति तथा वरुण हुए। राजा बलि ही उत्तर दिशामें धनाध्यक्ष कुबेर बनकर रहने लगे। इस प्रकार वे अकेले ही तीनों लोकोंका पालन करते थे। पूर्वजन्ममें जुआरीके रूपमें रहकर उन्होंने भगवान् शंकरका पूजन किया था। उस पूर्वाभ्यासके ही कारण बलि इस जन्ममें भी शिव-पूजापरायण थे और बड़े-बड़े दान किया करते थे। एक दिन श्रीमान् राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्यके साथ दैत्येन्द्रोंसे घिरे हुए अपनी सभामें बैठे थे। उस समय उन्होंने दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—'सम्पूर्ण असुर पाताल छोड़कर यहीं मेरे समीप निवास करें। इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।' यह सुनकर शुक्राचार्य हँस पड़े और बलिको समझाते हुए इस प्रकार बोले—'सुव्रत! यदि तुम यहीं आकर निवास करना चाहते हो तो सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी आराधना करो। वह भी यहाँ नहीं, कर्मभूमि भारतवर्षमें उपस्थित होकर करो। इस कार्यमें तुम्हें विलम्ब नहीं करना चाहिये।' 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर मनस्वी महात्मा बलि तत्काल स्वर्गलोकको छोड़कर दैत्यों तथा शुक्राचार्यजीके साथ भूलोकमें चले आये।


* तद्दानं च महापुण्यमार्तेभ्यो यत्प्रदीयते।
स्वशक्त्या यच्च किञ्चिच्च तदानन्त्याय कथ्यते। दानात् परतरं नान्यत् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। ४१-४२)

४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उन्होंने सेवकोंको भी साथ ही ले लिया था। नर्मदा नदीके तटपर भृगुकच्छ नामसे प्रसिद्ध जो महान् तीर्थ है, वहाँ पहुँचकर दैत्यराजने सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर अपने अधिकारमें किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा ले अनेक अश्वमेध यज्ञोंद्वारा उन्होंने बड़ी भक्तिके साथ भगवान्‌का आराधन किया। विरोचनपुत्र बलि सत्यवादियोंमें सबसे श्रेष्ठ थे। उन्होंने ब्रह्मा और आचार्यका वरण करके सोलह ऋत्विजोंका भी वरण किया। फिर महात्मा शुक्रने भलीभाँति परीक्षा लेकर बलिको यज्ञकी दीक्षा दी और उनके द्वारा निन्यानबे यज्ञोंका अनुष्ठान करवाया। तत्पश्चात् बलिने अन्तिम अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका विचार किया। जबतक उनके सौ यज्ञ पूरे हों, उसके पहले मैं पूर्वोक्त प्रसंग बतला देना चाहता हूँ। पहले कहा जा चुका है कि अदिति देवीने उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया और उस व्रतसे सन्तुष्ट होकर भगवान् श्रीहरि वामन ब्रह्मचारीके रूपमें उनके पुत्र होकर प्रकट हुए। परमेष्ठी ब्रह्माने आकर उन्हें यज्ञोपवीत दिया। महात्मा चन्द्रमाने दण्डकाष्ठ प्रदान किया। परम अद्भुत मृगचर्म और मेखला मँगायी गयी। पृथ्वी देवीने उन्हें चरणपादुका भेंट की। इसी तरह और लोगोंने भी वटुरूपधारी भगवान् विष्णुको अन्य आवश्यक वस्तुएँ अर्पित कीं।

तदनन्तर कश्यप और अदितिको प्रणाम करके महातेजस्वी वामनजी यजमान बलिकी यज्ञशालामें गये। उस समय सुरेश्वरगण उन वेदान्तवेद्य श्रीविष्णुकी महिमाका गान कर रहे थे। अनेक प्रकारके रूप और वेष धारण करनेवाले भगवान्‌ने उस यज्ञमें पहुँचकर सामवेदकी ऋचाओंका विधिपूर्वक गान किया। सामगानके अनन्तर वे इस प्रकार बोले—'राजन्! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादजी हुए जो बड़े तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा विष्णुभक्त हैं; जिन्होंने दैत्यराजकी सभामें अतिशय तेजस्वी भगवान् नृसिंहको प्रकट किया था। महाभाग! उन्हीं प्रह्लादजीके पुत्र तुम्हारे पिताजी थे, जो संसारमें विरोचनके नामसे विख्यात हुए थे। उन महात्माने स्वयं ही अपना मस्तक दान करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया था। राजन्! तुम उन्हीं महात्मा विरोचनके पुत्र हो। तुमने बड़े उत्तम यशका विस्तार किया है। तुम्हारे यशरूपी महान् दीपककी ज्योतिमें सम्पूर्ण देवता पतंगोंके समान दग्ध हो गये हैं। तुमने इन्द्रको भी जीत लिया है, इसमें संशय नहीं है। सुव्रत! मैं तुम्हारे सब चरित सुन चुका हूँ। तुम बड़े मनस्वी हो तथा तीनों लोकोंमें अधिक-से-अधिक दान करनेवाले दाताके रूपमें तुम्हारी ख्याति है। तथापि मेरे लिये तुम्हें तीन पग पृथ्वी देनी चाहिये।' तब विरोचनकुमार बलिने हँसकर कहा—'महाभाग! मैं पर्वत, बड़े-बड़े जंगल तथा सम्पूर्ण द्वीपोंसहित समूची पृथ्वी तुम्हें दूँगा, तुम मेरी दी हुई इस भूमिको ग्रहण करो।' वामनजीने कहा—'दैत्यराज! स्वयं चलते समय मेरे तीन पगोंसे जितनी पृथ्वी मापी जाय, उतनी ही मुझे दीजिये।' ब्रह्मचारीकी बात सुनकर बलिने हँसते हुए कहा—'बहुत अच्छा, लीजिये।' यों कहकर बलिने कश्यपकुमार वामनजीका भलीभाँति पूजन किया। उस समय बड़े-बड़े ऋषि तथा मुनीश्वर महातेजस्वी बलिके सौभाग्यकी सराहना कर रहे थे। वामनजीका पूजन करके राजा बलि ज्यों ही उन्हें दान देनेको उद्यत हुए त्यों ही शुक्राचार्यने उन्हें रोक दिया और कहा—'दैत्यराज! ब्रह्मचारीके रूपमें ये साक्षात् विष्णु हैं। इन्हें तुम दान न देना। ये तो इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं और तुरंत तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाल रहे हैं। अतः अध्यात्मतत्त्वका प्रकाश करनेवाले ये विष्णु तुम्हारे द्वारा इस समय पूजा पानेके योग्य नहीं हैं। इन्होंने ही पहले मोहिनीरूप धारण किया था। उस समय देवताओंको तो अमृत पिलाया और राहुको मार डाला। इन्होंने ही दैत्योंका संहार किया है और महाबली कालनेमि भी इन्हींके हाथों मारा गया है। ये ही ईश्वर हैं और ये ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। महामते!

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ४९ ---|---

अब तुम अपने मनसे हित और अहित सबका विचार करके कोई काम करो।'

गुरु शुक्राचार्यके इस प्रकार समझानेपर राजा बलिने हँसकर मेघगर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'गुरुदेव! जिन वाक्योंद्वारा आपने मुझे विचलित किया है, वे सब मेरे हितकी दृष्टिसे ही कहे गये हैं। तथापि विचारदृष्टिसे देखनेपर आपके हितकारक वचन भी मेरे लिये अहितकारक ही होंगे। ब्रह्मचारीका रूप धारण करके आये हुए इन भगवान् विष्णुको मैं इनकी माँगी हुई वस्तु अवश्य दूँगा। ये विष्णु सम्पूर्ण कर्मों और उनके फलोंके भी स्वामी हैं। इसलिये दानके सबसे उत्तम पात्र हैं। जिनके हृदयमें ये सदा विराजमान रहते हैं वे मनुष्य भी सर्वोत्तम पात्र माने जाते हैं, यह बात ध्रुव सत्य है। जिनके नामसे यहाँ सब कुछ पवित्र कहा जाता है; जिनके चिन्तनसे ये वेद, यज्ञ, मन्त्र तथा तन्त्र आदि सभी पूर्णताको प्राप्त होते हैं, वे ही ये समस्त विश्वके स्वामी सर्वात्मा श्रीहरि आज कृपा करके मेरा उद्धार करनेके लिये ही यहाँ पधारे हैं। इस बातको आप यथार्थ मानें। इसमें संशय नहीं है।'१

राजा बलिकी यह बात सुनकर शुक्राचार्य कुपित हो उठे। उन्होंने धर्मवत्सल दैत्यराजको रोषपूर्वक शाप देना आरम्भ किया। वे बोले—'ओ मूर्ख! तू मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके दान करना चाहता है, इसलिये राज्यलक्ष्मीसे वंचित हो जा।' अथाह बोधवाले अपने महात्मा शिष्यको इस प्रकार शाप देकर शुक्राचार्यने अपने आश्रमको चले जानेका निश्चय किया। जब वे चले गये तब विरोचनकुमार बलि वामनजीकी पूजा करके उन्हें भूमिदान करनेको उद्यत हुए। दैत्यराजकी पतिव्रता पत्नी महारानी विन्ध्यावलि वहाँ आकर पतिदेवके अर्धांगरूपमें सुशोभित हुई। राजा बलि विधि-विधानके ज्ञाता थे। उन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचारीके चरण पखारकर संकल्पके साथ भगवान् विष्णुको पृथ्वी दान की। उस महान् संकल्पको स्वीकार करते ही अजन्मा भगवान् विष्णु बढ़ने लगे। वे ही सम्पूर्ण जगत्‌के प्रभु तथा उत्पत्तिस्थान हैं। उन्होंने एक ही पैरसे सारी पृथ्वी माप ली। दूसरे पगसे ऊपरके सभी लोक व्याप्त कर लिये। उनका वह द्वितीय पग सत्यलोकमें जाकर ठहरा था। परमेष्ठी ब्रह्माने अपने कमण्डलुके जलसे भगवान्‌के उस चरणको पखारा। भगवान्‌के चरण पखारनेसे जो चरणोदक तैयार हुआ, उसीसे सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली तथा सबके लिये परम मंगलमयी श्रीगंगाजी प्रकट हुईं, जिन्होंने अपने पावन जलसे तीनों लोकोंको पवित्र किया, सगरके सभी पुत्रोंका उद्धार किया तथा जिनके जलसे महाराज भगीरथने उस समय भगवान् शंकरका जटाजूट भर दिया था।२ भगवान् विष्णुकी चरणधूलिसे युक्त 'गंगा' नामक तीर्थ सब तीर्थोंमें प्रधान है। इसे ब्रह्माजीने प्रकट किया और राजा भगीरथने भूतलपर उतारा है। सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को भगवान्‌ने दो ही पगोंसे


१. दास्यामि भिक्षितं तस्मै विष्णवे बटुरूपिणे। पात्रीभूतो ह्ययं विष्णुः सर्वकर्मफलेश्वरः॥
येषां हृदि स्थितो नित्यं ते वै पात्रतमा ध्रुवम्। यस्य नाम्ना सर्वमिह पवित्रमिदमुच्यते॥
येन वेदाश्च यज्ञाश्च मन्त्रतन्त्रादयो ह्यमी। सर्वे सम्पूर्णातां यान्ति सोऽयं विश्वेश्वरो हरिः॥
आगतः कृपया मेऽद्य सर्वात्मा हरिरीश्वरः। उद्धर्तुं मां न सन्देह एतज्ज्ञानीहि तत्त्वतः॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। २-६)

२. सत्यलोकस्थितेनैव ब्रह्मणा परमेष्ठिना। कमण्डलुगतेनैवाम्भसा चावनिनेज ह॥
तत्पादसम्पर्कजलाच्च जाता भागीरथी सर्वसुमङ्गला च।
यया त्रिलोकी च कृता पवित्रा यया च सर्वे सगराः समुद्धृताः॥
यया कपर्दी परिपूरितो वै शम्भोस्तदानीं च भगीरथेन।
(स्क० पु०, मा० के० १९। १४-१६)

५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

माप लिया। फिर उस विराट् स्वरूपको छोड़कर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन पुनः वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपने आसनपर विराजमान हुए। उस समय देवता, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध और चारण यज्ञपति भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये बलिके यज्ञमें आये। ब्रह्माजीने वहाँ आकर परमात्मा श्रीहरिका स्तवन किया। गन्धर्वपतियोंने गीत गाये तथा अप्सराओं, विद्याधरियों और किन्नरोंने विशेष समारोहके साथ नृत्य किया। महात्मा बलिके यज्ञ-मण्डपमें प्रह्लादजी भी पधारे। अन्यान्य दैत्यपति भी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचे। उस समय भगवान् वामनने बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिसे हँसकर पूछा—'देवि! तुम्हारे पतिके द्वारा आज मुझे तीन पग पृथ्वी मिलनी चाहिये। उसकी पूर्ति इस समय कहाँसे होगी, इसका उत्तर शीघ्र दो।' विन्ध्यावलि बड़ी साध्वी थी। उसे इस घटनासे तनिक भी विस्मय नहीं हुआ। वह भगवान् त्रिविक्रमसे इस प्रकार बोली—'देव! आप समस्त लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आपने अपना भारी डग बढ़ाकर यह त्रिलोकी माप ली है। इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् आपसे व्याप्त है। संसारके एकमात्र बन्धु आप ही हैं। आपके स्वरूपकी तुलना कहीं नहीं है। भला हम-जैसे लोग आपको क्या दे सकते हैं? इसलिये इस समय मैं जो निवेदन करती हूँ, उसीके अनुसार कार्य कीजिये। मेरे स्वामीने इस समय आपको तीन पग भूमि देनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मेरे पूज्य पतिदेव तीनों पगोंके लिये स्थान इस प्रकार दे रहे हैं—प्रभो! देवेश्वर! आप अपना पहला पग मेरे मस्तकपर रखिये। जगत्पते! दूसरा पग मेरे इस बालकके मस्तकपर स्थापित कीजिये तथा जगन्नाथ! अपना तीसरा पग मेरे पतिके मस्तकपर रख दीजिये। केशव! इस प्रकार ये तीन पग मैं आपको दूँगी।'

विन्ध्यावलिकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और राजा बलिसे मधुर वाणीमें बोले—'तात! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो—मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ। महामते! सम्पूर्ण दाताओंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण किये देता हूँ।' भगवान् वामनने ऐसा कहकर विरोचनकुमार बलिको बन्धनसे मुक्त कर दिया और उन्हें छातीसे लगा लिया। तब बातचीत करनेमें चतुर राजा बलि इस प्रकार बोले—'प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न किया है। अतः आपके चरणारविन्दोंके सिवा दूसरी कोई वस्तु मैं नहीं चाहता। देव! जनार्दन! आपके चरण-कमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे। देवेश्वर! वह सनातन भक्ति बार-बार निरन्तर बढ़ती रहे।'

बलिके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वामनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—'राजन्! तुम अपने भाई-बन्धु और सम्बन्धियोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ।' यह सुनकर दैत्यराज बलि बोले—'देवदेव! आप ही बताइये, सुतललोकमें मेरा क्या काम है? मैं तो आपके पास ही रहूँगा, इसके विपरीत कुछ भी कहना उचित नहीं है।' तब भगवान् हृषीकेश राजा बलिके प्रति अत्यन्त कृपालु होकर बोले—'राजन्! मैं सदा तुम्हारे समीप रहूँगा। असुरश्रेष्ठ! तुम खेद न करो, मेरी बात

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५१

सुनो। मैं सुतललोकमें तुम्हारा द्वारपाल होकर रहूँगा, मेरे इस वचनको तुम वरदान समझो। आज मैं तुम्हारे लिये वरदायक होकर उपस्थित हूँ। अपने वैकुण्ठवासी पार्षदोंके साथ तुम्हारे घरमें निवास करूँगा।' अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दैत्यराज बलि असुरोंके साथ सुतललोकमें चले गये। वहाँ बाणासुर आदि सौ पुत्रोंके साथ वे सुखपूर्वक निवास करने लगे। महाबाहु बलि दाताओंके भी परम आश्रय हैं। तीनों लोकोंके याचक राजा बलिके पास जाते हैं और उनके द्वारपर विराजमान भगवान् विष्णु स्वयं उन्हें मुँहमाँगी वस्तुएँ देते हैं। कोई भोगकी कामना लेकर जाय या मोक्षकी, जिनकी जैसी रुचि होती है, उसीके अनुसार, उनको वह वस्तु वे समर्पित करते हैं।

भगवान् शंकरकी कृपासे ही राजा बलि ऐसे महत्त्वशाली हुए हैं। पूर्वकालमें जुआरीके रूपमें उन्होंने परमात्मा शिवके उद्देश्यसे जो दान किया था उसीका यह फल है। अपवित्र भूमिमें पहुँचकर गिरी हुई गन्ध, पुष्प आदि सामग्रीको भी परमात्मा शिवकी सेवामें समर्पित करके जब बलिने इतनी उन्नति की, तब जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे महादेवजीकी सेवामें गन्ध, पुष्प और जल अर्पण करते हैं उनके लिये तो कहना ही क्या है? वे साक्षात् भगवान् शिवके समीप जाते हैं। ब्राह्मणो! भगवान् शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय देवता नहीं है। जो गूँगे हैं, अन्धे हैं, पंगु और जड़ हैं तथा जाति-बहिष्कृत, चाण्डाल, श्वपच और अन्त्यज हैं; वे भी यदि सदा भगवान् शिवके भजनमें तत्पर रहें तो परम गतिको प्राप्त होते हैं। अतः सम्पूर्ण मनीषी पुरुषोंके लिये भी भगवान् शिव ही सदा पूजनीय हैं। पूजनीय ही नहीं, विद्वानोंके द्वारा वे सदा चिन्तनीय और वन्दनीय भी हैं। परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता पुरुष अपने हृदयमें विराजमान भगवान् महेश्वरका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं।


तारकासुरको ब्रह्माजीका वरदान, हिमालयके घर सतीका पार्वतीरूपमें अवतार, शंकरजीके रोषसे कामदेवका भस्म होना तथा पार्वतीकी उग्र तपस्या

ऋषियोंने पूछा— महाभाग सूतजी! दक्षकुमारी सती जब अपने पिता दक्षके यज्ञमें अग्निप्रवेश करके अन्तर्धान हो गयीं तब पुनः कब और कहाँ प्रकट हुईं? वे पुनः किस प्रकार उन्हें मिलीं?

सूतजी बोले— ब्राह्मणो! दक्षकुमारी सतीदेवी जब अपने पिताके यज्ञमें अन्तर्धान हो गयीं, तब अपनी शक्तिसे बिछुड़े हुए भगवान् महेश्वर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। वे लीला-देह धारणकर भृंगी और नन्दीके साथ हिमालयपर्वतपर रहने लगे। इसी समय नमुचिके पुत्र तारकासुरने बड़ी भारी तपस्या करके ब्रह्माजीको सन्तुष्ट किया। ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हुए और उस दुरात्माको इच्छानुसार वर देनेके लिये उद्यत हो बोले—'तुम कोई वर माँगो।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर तारकासुर बोला—'प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अजर, अमर और अजेय बना दीजिये।'

ब्रह्माजीने कहा— तू अमर कैसे हो सकता है? जो इस संसारमें जन्म ले चुका है, उसकी मृत्यु अटल है।

तारकासुर बोला— तब मुझे 'अजेय' बना दीजिये।

ब्रह्माजीने कहा— दैत्यराज! तू 'अजेय' होगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु एक बालकको छोड़कर अन्य सबसे ही तेरी अजेयता रहेगी।

इस प्रकार वरदान पाकर तारकासुर बड़ा बलवान् हो गया। उस समय देवतालोग राजा मुचुकुन्दका

५२

* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सहारा लेकर तारकासुरके साथ युद्ध करते और विजयी होते थे। मुचुकुन्दके ही बलसे देवताओंने विजय प्राप्त की। तब उन्होंने सोचा—'इन दिनों हमें निरन्तर युद्धमें रहना पड़ता है, ऐसे समयमें हमारा क्या कर्तव्य है? अथवा भवितव्यता ही ऐसी है।' ऐसा विचार कर वे ब्रह्माजीके लोकमें गये और उनके सामने खड़े होकर स्तुति करने लगे। स्तुतिके पश्चात् वे बोले—'महाभाग ! प्रभो ! आप दैत्यपतियोंसे हमारी रक्षा करें।' उसी समय आकाशवाणी हुई—'देवताओ ! तुम जितनी जल्दी हो सके मेरी आज्ञाका यथावत् पालन करो। भगवान् शिवके जब कोई महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तब वही पुनः युद्धमें तारकासुरका वध करेगा, इसमें संशय नहीं है। सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले भगवान् शंकर जिस किसी उपायसे पत्नीका पाणिग्रहण करें, वह तुम्हें करना चाहिये। इसके लिये महान् प्रयत्न करो। मेरा यह वचन अन्यथा न होने पावे।'

यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सब बृहस्पतिजीको आगे करके हिमालयपर्वतपर आये और इस प्रकार कहने लगे—'महाभाग हिमालय ! तुम समस्त पर्वतोंके स्वामी हो, यक्ष और गन्धर्व तुम्हारा सेवन करते हैं, हम तुमसे कुछ निवेदन करेंगे, हम सब देवताओंकी बात तुम्हें माननी चाहिये।'

लोमशजी कहते हैं—देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हँसकर बोले—'एक तो मैं अचल हूँ, चल-फिर नहीं सकता, दूसरे मेरी पाँखें कट गयी हैं, अतः उड़ नहीं सकता। ऐसी दशामें मैं आपलोगोंके किस काम आ सकता हूँ। देवताओ ! यदि तारकासुरके संहारमें मेरी सहायता आवश्यक है तो मैं पूछता हूँ, किस उपायसे आपलोग तारकासुरका वध करना चाहते हैं, वह शीघ्र बतलावें; क्योंकि वह कार्य तो मेरा ही है।' तब देवताओंने आकाशवाणीद्वारा कही हुई सब बातें कह सुनायीं। सुनकर हिमवान्ने कहा—'जब शिवजीके बुद्धिमान् पुत्रद्वारा ही तारकासुरका वध होनेवाला है, तब देवताओंके सब कार्य शुभ हों और आकाशवाणीकी कही हुई यह बात सच निकले। इसके लिये आपलोगोंको विशेष यत्न करना चाहिये।'

देवता बोले—गिरिराज ! आप देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवान् शंकरके विवाहके लिये स्वयं ही एक कन्या उत्पन्न करें।

तब हिमवान्ने अपनी पत्नीसे कहा—सुमुखि ! तुम्हें एक श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न करनी चाहिये। यह सुनकर मेनाने हँसते हुए कहा—'महामते ! मैंने आपकी बात सुन ली; परंतु कन्या स्त्रियोंको शोकमें डालनेवाली होती है, अतः इस विषयमें दीर्घकालतक विचार करके आपको अपनी बुद्धिसे जो हितकर प्रतीत हो, वह बतावें।' अपनी प्रियतमा मेनाकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् हिमवान्ने परोपकारयुक्त वचन कहा—'देवि ! जिस प्रकारसे दूसरोंके जीवनकी रक्षा हो, परोपकारी पुरुषोंको वही करना चाहिये।' इस प्रकार पतिकी प्रेरणा पाकर सौभाग्यवती रानी मेनाने बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने गर्भमें कन्याको धारण किया। कुछ कालके अनन्तर मेनाके गर्भसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो 'गिरिजा' नामसे प्रसिद्ध हुई। सबको सुख देनेवाली उस देवीके प्रकट होनेपर देवताओंके नगाड़े बज उठे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज गाने तथा सिद्ध-चारण स्तुति करने लगे। उस समय देवताओंने फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा की। सम्पूर्ण त्रिलोकीमें प्रसन्नता छा गयी। महासती गिरिजाका जब जन्म हुआ, उस समय दैत्योंके मनमें भय समा गया और देवता, महर्षि, चारण तथा सिद्धगण बड़े आनन्दको प्राप्त हुए।

सती-साध्वी गिरिजा हिमालयके घरमें दिनोंदिन बढ़ने लगी। वह कल्याणी कन्या जब आठ वर्षकी हो गयी, उस समय महादेवजी हिमालयकी कन्दरामें बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। भगवान्के वीरभद्र आदि सभी पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरे रहते थे।

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५३

एक दिन परम बुद्धिमान् हिमवान् अपनी कन्या पार्वतीको साथ लेकर तपस्यामें लगे हुए महादेवजीके पास उनके चरणोंका दर्शन करनेके लिये गये। हिमवान्ने देखा— सबके स्वामी भगवान् शिव तपस्यामें लगे हुए हैं। उनके नेत्र बंद हैं, मस्तकपर जटा-जूट शोभा पा रहा है, जिसे चन्द्रमाकी कला विभूषित किये हुए है। वे वेदान्तवेद्य परमात्मा शिव एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हैं। दर्शन करके हिमवान्ने भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाया और मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। हिमाचल बड़े धैर्यवान् एवं उत्कृष्ट प्राणियोंके आश्रय हैं। वाणीका रहस्य समझनेवाले विद्वानोंमें उनका स्थान बहुत ऊँचा है। उन्होंने सम्पूर्ण विश्वका एकमात्र मंगल करनेवाले भगवान् शिवसे इस प्रकार वार्तालाप किया—'महादेव! मैं आपके प्रसादसे बड़ा सौभाग्यशाली हूँ। देवेश्वर! आप मुझे इस कन्याके साथ प्रतिदिन अपने दर्शनके लिये आनेकी आज्ञा दें।' यह सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने कहा—'पर्वतराज! इस कुमारी कन्याको घरमें छोड़कर ही आप प्रतिदिन मेरे दर्शनके लिये आ सकते हैं, अन्यथा मेरा दर्शन नहीं होगा।' तब हिमाचलने मस्तक झुकाकर पुनः महादेवजीसे कहा—'भगवन्! क्या कारण है कि मुझे इस कन्याके साथ यहाँ नहीं आना चाहिये?' भगवान् शंकरने हँसते हुए उत्तर दिया— 'यह कुमारी सुन्दर कटि-भागसे सुशोभित पतले अंगोंवाली तथा मृदु वचन बोलनेवाली है। अतः मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ कि इस कन्याको मेरे समीप न ले आना।' भगवान् शंकरका यह निष्ठुर वचन सुनकर गौरांगी पार्वती, तपस्वी शिवसे इस प्रकार बोलीं—'शम्भो! आप तपःशक्तिसे सम्पन्न हैं और बड़ी भारी तपस्यामें लगे हुए हैं। आप-जैसे महात्माके मनमें जो यह विचार उत्पन्न हुआ है, वह केवल इसलिये कि यह तपस्या निर्विघ्न चलती रहे। परंतु मैं आपसे पूछती हूँ—आप कौन हैं और यह सूक्ष्म प्रकृति क्या है? भगवन्! आप इस विषयपर भलीभाँति विचार करें।'

महादेवजी बोले—सुन्दरी! मैं उत्तम तपस्याके द्वारा ही प्रकृति (माया)-का नाश करता हूँ। प्रकृतिसे विलग रहकर अपने यथार्थ स्वरूपमें स्थित होता हूँ। इसलिये सिद्धपुरुषोंको प्रकृतिका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये।

श्रीपार्वतीजीने कहा—शंकर! आपने जिस उत्तम वाणीके द्वारा जो कुछ भी कहा है, क्या वह प्रकृति नहीं है? फिर आप प्रकृतिसे अतीत कैसे हैं? मेरी यह बात सुनकर आपको तत्त्वका यथार्थ निर्णय करना चाहिये। यह सम्पूर्ण जगत् सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है। प्रभो! हमें वाणीद्वारा विवाद करनेसे क्या प्रयोजन? शंकर! आप जो सुनते हैं, खाते हैं और देखते हैं, वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। प्रकृतिसे परे होकर आप इस हिमालय पर्वतपर इस समय तपस्या किसलिये करते हैं? प्रकृतिसे आप मिले हुए हैं, क्या इस बातको नहीं जानते? यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और आपकी यह बात सत्य है, तो आपको अब मुझसे भय नहीं मानना चाहिये।

महादेवजी बोले—साधुभाषिणी पार्वती! तुम प्रतिदिन मेरी सेवा करो।

अब वे प्रतिदिन पार्वतीके साथ उनका दर्शन करने लगे। इस प्रकार भगवान् शिवकी उपासना करते हुए पुत्री और पिताका कुछ समय व्यतीत हो गया। तब पार्वतीजीके लिये देवताओंके मनमें बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'भगवान् महेश्वर गिरिजाका पाणिग्रहण कैसे करेंगे?' तब उन्होंने कामदेवका आवाहन किया। आवाहन करते ही इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेवाला कामदेव अपनी पत्नी रति और सखा वसंतके साथ आया और देवसभामें देवराजके सम्मुख उपस्थित हो गर्वयुक्त वचन बोलने लगा—'शचीपते! शीघ्र आज्ञा दीजिये, आज मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ। मेरा स्मरणमात्र करनेसे कितने ही तपस्वी अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो

५४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चुके हैं। इन्द्र! मेरे बल और पराक्रमको आप अच्छी तरह जानते हैं। शक्तिनन्दन पराशरको भी मेरे पराक्रमका ज्ञान है; इसी प्रकार ये भृगु आदि बहुत-से अन्य ऋषि-मुनि भी मेरी शक्ति जानते हैं। महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न क्रोध ही मेरा भाई है। हम दोनोंने सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को परास्त किया है। सबको हमने मोहमहासागरमें डुबो दिया है।'

कामदेवके गर्वीले वचन सुनकर इन्द्रने उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा— 'वीरवर! पूर्वकालमें तुमने जो-जो कार्य किये हैं, उनका किसी प्रकार वर्णन नहीं हो सकता। हम सब देवता तुमसे परास्त हो चुके हैं। मदन! तुम सदैव हमको जीतनेमें समर्थ हो। इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम भगवान् शंकरपर चढ़ाई करो। महामते! ऐसी चेष्टा करो जिससे भगवान् शिव पार्वतीके साथ विवाह कर लें।'

देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर सम्पूर्ण विश्वका मन मोह लेनेवाला मदन अप्सराओंको साथ लेकर बड़ी उतावलीके साथ चला। हिमालयपर पहुँचकर योद्धाओंमें श्रेष्ठ कामदेव रति और वसन्तके साथ सब ओर सुशोभित दिखायी देने लगा। उसके मनमें पिनाकपाणि भगवान् शंकरपर विजय पानेकी अभिलाषा जाग उठी थी। रम्भा, उर्वशी, पुंजिकस्थला, सुकेशी, मिश्रकेशी, सुन्दरी तिलोत्तमा तथा इसी श्रेणीकी अन्यान्य अप्सराएँ वहाँ कामदेवके कार्यमें सहायता देनेके लिये आयीं। वहाँका आकाश असमयमें ही कोकिलाओंसे आच्छादित हो गया। अशोक, चम्पा, आम, जूही, कदम्ब, नीप, चिरौंजी, कटहल, अमलतास, चमेली, अंगूरकी लताएँ तथा अनेक प्रकारके नागकेसर वृक्ष हरे-भरे एवं फले-फूले दिखायी देने लगे। इसी समय धनुर्धर कामदेवने देवदारु वृक्षकी छायामें बैठकर अपने धनुषपर पाँच बाण चढ़ाये और भगवान् शंकरकी ओर दृष्टिपात किया। वे उत्तम आसनपर विराजमान हो तपस्यामें संलग्न थे। उनके जटा-जूटमें गंगाजी विराजमान थीं। चन्द्रमाकी कला उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रही थी। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी। तपस्यामें तत्पर हो रुद्राक्षमाला और विभूतिसे भूषित होकर वे बड़ी शोभा पा रहे थे। वसन्तसहित कामदेवने जब महादेवजीको अपने बाणसे बींधनेकी इच्छा की, उसी समय परम मंगलमयी जगज्जननी गिरिजा अपनी सखियोंके साथ पूजन करनेके लिये भगवान् सदाशिवके समीप आयीं। वे चन्द्रमाकी किरणोंके समान मनोहर थीं। उन्होंने भगवान् नीलकण्ठके कण्ठमें धतूरेके फूलोंकी माला पहना दी और सुन्दर वदनारविन्दसे सुशोभित त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवकी शोभा निहारने लगीं। इसी बीचमें वसन्तकी सहायता पानेवाले कामदेवने संमोहन नामक बाणसे भगवान् महेश्वरको बींध डाला। बाणका आघात लगनेपर शंकरजीने धीरेसे नेत्र खोलकर श्रीपार्वतीजीकी ओर देखा, जो सम्पूर्ण मंगलोंको भी मंगलमय बनानेवाली एकमात्र देवी हैं। लोकपावनी गिरिराजनन्दिनीकी ओर दृष्टि डालते ही कामदेवने उन्हें व्याकुल कर दिया। वे पार्वतीके दर्शनमात्रसे मोहित हो गये। फिर सहसा अपनी स्थितिका ध्यान आते ही भगवान् शिवके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन खेद प्रकट करते हुए कहा— 'मैं स्वतन्त्र हूँ, निर्विकार हूँ, तो भी आज इस पार्वतीके दर्शनसे मोहित क्यों हो गया? कहाँसे, किससे और किसने मेरा यह अप्रिय कार्य किया है।' तदनन्तर शंकरजीने सब दिशाओंकी ओर दृष्टि दौड़ायी। उसी समय दक्षिण दिशामें कामदेव दिखलायी दिया, जो हाथमें धनुष लेकर भगवान् सदाशिवपर प्रहार करनेके लिये उद्यत था। उसने चढ़े हुए धनुषको खींचकर मण्डलाकार कर रखा था और पुनः बाण सन्धान करके मदनान्तक शिवको बींधना ही चाहता था। तबतक भगवान् महेश्वरकी रोषपूर्ण दृष्टि उसके ऊपर पड़ी। भगवान्ने तीसरा नेत्र खोलकर उसकी ओर देखा। देखते ही मदन आगकी उठती हुई लपटोंमें घिर गया। उसे भस्म होते देख देवताओंमें बड़ा हाहाकार मचा।

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५५

देवता बोले—देवदेव! महादेव! आप देवताओंको वर दीजिये। हमने ही गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी सहायताके लिये कामदेवको यहाँ भेजा था, उसका कोई अपराध नहीं था। आपने महातेजस्वी कामको व्यर्थ ही दग्ध किया है। विश्वके एकमात्र बन्धु भगवान् शिव! आपको अपने उत्कृष्ट तेजसे इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहिये। शम्भो! आपके द्वारा इस पार्वतीके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसीसे हमारा सब कार्य सिद्ध होगा। महादेव! तारकासुरने हम सब देवताओंको बहुत सताया है। उसके भयसे हमारी रक्षा करनेके लिये इस कामदेवको जीवन-दान दें। आप पार्वतीजीका पाणिग्रहण करें। महाभाग! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें आप अपनी शक्ति लगावें। गजासुरसे आपहीने हम सब देवताओंका उद्धार किया है। कालकूट विषसे भी आपहीने हमारी रक्षा की है। भगवन्! यह कामदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आया था। यह हमारे उपकारमें संलग्न रहा है। अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिये।

तब भगवान् महेश्वरने देवताओंसे रुष्ट होकर कहा—‘देवगण! तुम सबको कामनारहित होना चाहिये। इन्द्रादि देवता जब-जब कामदेवको आगे रखकर चले हैं तब-तब अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हुए हैं, दुःखमें पड़े हैं और दीनताके भागी हुए हैं। अतः मैंने सबकी शान्तिके लिये कामदेवको जलाया है। तुम सब देवता, असुर, महर्षि तथा दूसरे प्राणी भी अब निर्भय होकर तपस्यामें मन लगाओ। आज सम्पूर्ण जगत्को मैंने काम और क्रोधसे शून्य कर दिया है। देवताओ! यह पापी काम दुःखकी जड़ है। अतः आज मैं इसे जीवन-दान नहीं दूँगा। तुम अवसरकी प्रतीक्षा करो।’ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर सब महर्षियोंने उनसे कहा—‘शम्भो! आपने जो कुछ कहा है, सब हमारे लिये परम कल्याणकारी है। किंतु देवेश्वर! हम भी कुछ निवेदन करना चाहते हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनें। जिस प्रकार इस संसारकी सृष्टि हुई है, उसके अनुसार (संकल्परूप) काम ही इसका अधिष्ठान है। कामके बिना यह सृष्टि कैसे होगी। यह विश्व काममय है; इससे ऊपर उठे हुए आप परमेश्वर ही निष्काम हैं।’ इतना कहकर मुनि, सिद्ध और चारणोंने भगवान् सदाशिवकी स्तुति और वन्दना की। तदनन्तर वे वहाँसे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये। कामदेवको जलाकर महादेवजी अदृश्य हो गये। उस समय पार्वतीजी वहाँ रतिको रोती हुई देखकर बोलीं—‘सखी! तुम शोक न करो, मैं कामदेवको जीवन दिलाऊँगी।’ पार्वतीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर पतिव्रता रतिने पतिको पुनः प्राप्त करनेके लिये बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की।

तदनन्तर पार्वती भी वहीं रहकर तपस्यामें लग गयीं। उस समय माता-पिताने उन्हें रोकते हुए कहा—‘बेटी! अभी तू बालिका है, शीघ्र घर चल। तू तपस्याका श्रम उठाने योग्य नहीं है।’

पार्वती बोलीं—माता और पिताजी! मैं घर नहीं चलूँगी। आप मेरी प्रतिज्ञा सुनें। मैं उत्तम तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको पुनः यहीं बुलाकर उनका वरण करूँगी।

यों कहकर मनस्विनी पार्वती एकाग्रचित्त हो, बड़ी उग्र तपस्याके द्वारा भगवान् शिवका आराधन करने लगीं। उस समय जया, विजया, माधवी, सुलोचना, सुश्रुता, श्रुता, शुकी, प्रम्लोचा, सुभगा, श्यामा, चित्रांगी, वारुणी और सुधा—ये तथा और भी बहुत-सी सखियाँ गिरिराजनन्दिनीकी सेवामें रहने लगीं। परमात्मा रुद्रने कामदेवको जहाँ दग्ध किया था, वहीं एक वेदी बनाकर पार्वतीजी उसपर विराजमान हुईं। वे अन्न और फल त्यागकर केवल हरे पत्ते खाकर रहने लगीं। तत्पश्चात् हरे पत्ते भी छोड़ दिये और सूखे पत्तोंपर निर्वाह करने लगीं। आगे चलकर जब उन्होंने सूखे पत्ते भी त्याग दिये तब वे ‘अपर्णा’ नामसे विख्यात हुईं। सूखे पत्ते छोड़नेपर वे कुछ कालतक केवल जलपर रहीं। फिर उसे भी

५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

छोड़कर वायु पीकर रहने लगीं। इस प्रकार सती-साध्वी गिरिजा दीर्घकालतक तपस्यामें लगी रहीं। भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये मनमें उत्तम निष्ठा रखकर पार्वती उग्र तपस्याद्वारा आराधन करती रहीं। पार्वतीके उस महान् तपसे सम्पूर्ण चराचर जगत् सन्तप्त होने लगा, तब देवता और असुर सब मिलकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये।

देवता बोले— भगवन्! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है। हम देवताओंकी रक्षा करनेयोग्य आप ही हैं।

देवताओंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने मन-ही-मन चिन्तन किया। चिन्तनसे उन्हें ज्ञात हुआ कि पार्वतीकी तपस्यासे बड़ी अद्भुत दावाग्नि प्रकट हुई है। यह जानकर ब्रह्माजी बड़ी शीघ्रतासे परम अद्भुत क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने अतिशोभायमान शेषशय्यापर सोये हुए भगवान् विष्णुका दर्शन किया। लक्ष्मी देवी उनके दोनों चरणारविन्दोंकी निरन्तर सेवा कर रही थीं। गरुड़जी कुछ दूरपर मस्तक झुकाये हाथ जोड़े प्रभुकी सेवामें खड़े थे। श्री, कान्ति, तुष्टि, वृत्ति और दया आदि देवियाँ भी भगवान्की सेवामें संलग्न थीं। नौ शक्तियोंसे सम्पन्न भगवान् विष्णु अपने पार्षदोंसे घिरे हुए थे। कुमुद, कुमुदाक्ष, सनक, सनन्दन, महाभाग सनातन, प्रसुप्त, विजय, अरिजित्, जयन्त, जयत्सेन, परम कान्तिमान् जय, सनत्कुमार, उत्तम तपस्वी नारद, तुम्बुरु, महाशंख पांचजन्य, कौमोदकी गदा, सुदर्शन चक्र तथा परम अद्भुत शार्ङ्गनामक धनुष— ये सब वहाँ ब्रह्माजीको मूर्तिमान् दिखायी दिये।^* सब देवताओंने परमात्मा भगवान् विष्णुके समीप जाकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहा— 'महाविष्णो! हम पार्वतीजीकी अत्यन्त उग्र तपस्यासे जले जा रहे हैं और सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हैं; आप हमारी रक्षा करें, रक्षा करें।'

तब शेषनागकी शय्यापर बैठे हुए परमेश्वर श्रीहरि इस प्रकार बोले— 'देवताओ! आज तुम लोगोंको साथ लेकर परमेश्वर महादेवजीके पास चलता हूँ। हम सब लोग मिलकर उनसे प्रार्थना करें कि वे पार्वतीजीके साथ विवाह करनेको उद्यत हों। भगवान् शिव पुराणपुरुष हैं, सबके अधीश्वर हैं, वे सबके लिये वरेण्य (वरणीय अथवा सेव्य) हैं, उत्तम स्वरूपकी पराकाष्ठा हैं तथा वे ही परात्पर परमात्मा हैं। इस समय वे तपस्यामें लगे हैं, हम सब लोग उन्हींकी शरणमें चलें।'


^* ज्ञात्वा ब्रह्मा जगामाशु क्षीराब्धिं परमाद्भुतम्। तत्र सुप्तं सुपर्यङ्के शेषाख्ये चातिशोभने॥
लक्ष्म्या पादोपयुगलं सेव्यमानं निरन्तरम्। दूरस्थेनापि तार्क्ष्येण नतकन्धरधारिणा॥
सेव्यमानं श्रिया कान्त्या तुष्ट्या वृत्त्या दयादिभिः। नवशक्तियुतं विष्णुं पार्षदैः परिवारितम्॥
कुमुदोऽथ कुमुदांश्च सनकश्च सनन्दनः। सनातनो महाभागः प्रसुप्तो विजयोऽरिजित्॥
जयन्तश्च जयत्सेनो जयश्चैव महाप्रभः। सनत्कुमारः सुतपा नारदश्चैव तुम्बुरुः॥
पाञ्चजन्यो महाशङ्खो गदा कौमोदकी तथा। सुदर्शनं तथा चक्रं शार्ङ्गं च परमाद्भुतम्॥
एतानि वै रूपवन्ति दृष्टानि परमेष्ठिना।
(स्क० पु०, मा० के० २१। ७९–८५)

  • माहे‍श्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५७

देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवका पार्वतीजीके पास जाना और उनके प्रेमकी परीक्षा ले उनकी तपस्याको सफल बनाना

सूतजी कहते हैं—भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर सब देवता पिनाकधारी महादेवजीका दर्शन करनेके लिये गये। भगवान् शिव समुद्रके उस पार उत्तम समाधि लगाये योगासनपर विराजमान थे। उनके पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरे हुए थे। वे सर्पराज वासुकिको छातीसे चिपकाये हुए यज्ञोपवीतकी भाँति धारण करते थे। कम्बल और अश्वतर—इन दोनों नागोंको उन्होंने दोनों कानोंका कुण्डल बना रखा था। कर्कोटक और कुलिकसे उत्तम कंकणका काम लेते हुए उन्हें अपने दोनों हाथोंमें धारण किया था। शंख और पद्म नामक नागका भुजबंद धारण करके वे बड़ी शोभा पा रहे थे। पहनने योग्य वस्त्रके स्थानपर उन्होंने बाघका चमड़ा लपेट रखा था। वे मस्तकपर भागीरथी गंगा तथा अर्धचन्द्रयुक्त जटाजूट धारण किये बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओंके साथ विराजमान थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी और कण्ठमें नील चिह्न सुशोभित था। भगवान्‌के पास ही उनके वाहन नन्दिकेश्वर भी थे। ऐसी अद्भुत शोभासे युक्त सुरश्रेष्ठ शिवका समस्त देवताओंने दर्शन किया। उस समय ब्रह्मा, विष्णु, ऋषि, देवता और दानवोंने वेदों और उपनिषदोंके अनेक सूक्तोंद्वारा भगवान् शिवका स्तवन किया।

श्रीब्रह्माजी बोले—कामदेवका अन्त करनेवाले श्रीरुद्रदेवको नमस्कार है। जो प्रकाशस्वरूप होनेके कारण 'भर्ग' नाम धारण करते हैं, तीनों लोकोंमें जिनका सौभाग्य सबसे बढ़कर है, उन त्रिनेत्रधारी भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्‌के भरण-पोषण करनेवाले बन्धु हैं तथा यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। भगवन्! आप समस्त लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले पिता, माता और ईश्वर हैं; आप ही जगत्‌के स्वामी तथा रक्षक हैं, प्रभो! आप हमारा उद्धार करें।

तब उत्तम योगसे युक्त दयालु परमात्मा महेश्वर शम्भुने धीरे-धीरे समाधिसे विश्राम लिया और देवताओंसे इस प्रकार कहा—'परम भाग्यवान् ब्रह्मा आदि देवताओ! तुम लोग मेरे समीप क्यों आये हो? इस समय यहाँ आनेका कारण बतलाओ।'

उनके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीने देवताओंके महत्त्वपूर्ण कार्यका परिचय देते हुए कहा—'भगवन्! तारकासुरने देवताओंको महान् कष्ट पहुँचाया है। वह देवताओंका घोर शत्रु है। अतः हमारी प्रार्थना है कि आप पार्वतीजीका पाणिग्रहण करें। गिरिराज हिमवान्‌द्वारा दी हुई गिरिजाको आप पाणिग्रहणकी विधिसे अंगीकार करें।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर महादेवजीने हँसते हुए कहा—'जब मैं सर्वसुन्दरी गिरिजादेवीका वरण कर लूँगा, तब समस्त सुरेश्वर तथा ऋषि-मुनि भी सकामभावसे युक्त हो जायँगे और निष्कामभावसे पूर्ण परमार्थके पथपर चलनेमें असमर्थ होंगे। अतः मैंने सबके पारमार्थिक कार्यकी सिद्धिके लिये कामदेवको भस्म किया था। मेरे विचारसे तो कामदेवके दग्ध होनेसे ही देवताओंका महान् कार्य सिद्ध हुआ है। इस कामदहनरूपी कार्यसे तुम सब लोग निष्काम हो गये हो। अब जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम लोग भी हो गये। अतः हमलोग अब प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त दुष्कर तथा परम उत्तम तपका अनुष्ठान करें और करावें। कामदेवके न रहनेसे तुम सब देवता समाधि लगाकर परमानन्दमें निमग्न हो सदा सुखी रहोगे। काम तो नरकमें ही ले जानेवाला है। उसीसे

५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


क्रोधका जन्म होता है। क्रोधसे सम्मोह होता है और सम्मोहसे मनुष्य जल्दी ही भ्रममें पड़ जाता है। अतः सभी श्रेष्ठ देवता काम, क्रोधका परित्याग करके शास्त्रों और संतोंके सदुपदेशोंको मानें—उनके अनुसार जीवन बनावें।'

वृषभके चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले भगवान् महादेवने इस प्रकार उत्तम बातें सुनाकर देवताओं तथा ऋषि-मुनियोंको भलीभाँति समझाया। तत्पश्चात् वे पुनः ध्यान लगाकर मौन हो गये। तब वे सब देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। फिर शिवजीने बुद्धिके द्वारा मनको आत्मामें एकाग्र करके अपने स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन किया—'जो परसे भी अत्यन्त परे, अपने-आपमें स्थित, मल आदि दोषोंसे रहित, विघ्न-बाधाओंसे शून्य, निरंजन (निर्लिप्त) तथा निराभास (मिथ्या ज्ञानसे रहित) है, जिसके विषयमें विवेकी विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं, जहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा नक्षत्र आदि दूसरी किसी ज्योतिका प्रकाश नहीं, जहाँ वायुकी भी गति कुण्ठित हो जाती है, जो विचारदृष्टिसे भी केवल (अद्वितीय) सद्वस्तु है, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतर वस्तुओंसे भी परे है, जिसका कोई नाम या संकेत नहीं है, जो चिन्तनका विषय नहीं है, जिसमें विकारका सर्वथा अभाव है, जो रोग और शोकसे सर्वथा दूर है, विशुद्ध ज्ञान ही जिसका स्वरूप है, सर्वत्यागी संन्यासी जिसे प्राप्त होते हैं, जो शब्द या वाणीकी पहुँचसे परे है, निर्गुण और निर्विकार है, सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, जो ज्ञानगम्य होकर भी वास्तवमें अगम्य है, वेदान्त और आगम भी मूक होकर ही ('नेति-नेति'की भाषामें) जिसका सर्वदा प्रतिपादन करते हैं, वही सबके ईश्वर पिनाकधारी भगवान् वृषध्वज परमार्थ वस्तु (परब्रह्म परमात्मा) हैं।* उन्होंने ही कामदेवका नाश किया है। वे साक्षात् परमेश्वर होकर भी 'तप' का सेवन करते हैं।'

लोमशजी कहते हैं—उधर पार्वती देवी बड़ी कठोर तपस्यामें लगी हुई थीं। उस तपस्यासे उन्होंने भगवान् शंकरको जीत लिया। देवीकी तपस्यासे हार मानकर भगवान् शिव समाधिसे विरत हो, तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ पार्वतीजी विराजमान थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा—देवी गिरिजा सखियोंसे घिरी हुई 'वेदी' पर बैठी हैं और चन्द्रमाकी कलाके समान प्रकाशित हो रही हैं। महादेवजीने उन्हें देखकर तत्काल ब्रह्मचारीका वेष धारण कर लिया और उसी स्वरूपसे सखियोंकी मण्डलीमें उपस्थित होकर पूछा— 'सखियो! यह सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या अपनी सहेलियोंके बीचमें क्यों बैठी है? यह कौन है? किसकी पुत्री है? कहाँसे आयी है और किस लिये तपस्या कर रही है?'

तब जयाने उत्तर दिया—ब्रह्मचारीजी! ये गिरिराज हिमवान्की कन्या हैं और तपस्याद्वारा परमेश्वर रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त करना चाहती हैं।'

जयाकी यह बात सुनकर वटुरूपधारी शिव ठाठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'सखियो! यह पार्वती भोली-भाली है। इसे अपने हित


* आत्मानमात्मना कृत्वा आत्मन्येवमचिन्तयत् ॥
परात्परतरं स्वस्थं निर्मलं निरवग्रहम् । निरञ्जनं निराभासं यन्मुह्यन्ति च सूरयः॥
भानुर्न भात्यग्निरथो शशी वा न ज्योतिरेवं न च मारुतो हि।
यत्केवलं वस्तु विचारतोऽपि सूक्ष्मात् परं सूक्ष्मतरात्परं च ॥
अनिर्देश्यमचिन्त्यं च निर्विकारं निरामयम् । ज्ञप्तिमात्रस्वरूपं च न्यासिनो यान्ति यत्र वै ॥
शब्दातीतं निर्गुणं निर्विकारं सत्तामात्रं ज्ञानगम्यं त्वगम्यम्।
यत्तद् वस्तु सर्वदा कथ्यते वै वेदान्तैश्चागमैर्मूकभूतैः ॥
तद्वस्तुभूतो भगवान् स ईश्वरः पिनाकपाणिर्भगवान् वृषध्वजः ॥
(स्क० पु०, मा० के० २२। ३२-३७)

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५९

और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। भला, रुद्रकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता है? अरी! रुद्र तो अमंगलरूप हैं। हाथमें कपाल धारण करते हैं। मरघटका निवास ही उन्हें अधिक प्रिय है। जिस दिन इसके वरण कर लेनेपर रुद्रका इसके साथ सम्बन्ध होगा उसी दिनसे यह शुभांगी पार्वती भी अशुभरूप हो जायगी। रुद्र वही हैं न, जिन्हें दक्षके शापसे ब्राह्मणोंने यज्ञबहिष्कृत कर दिया है। अत्यन्त भयानक विषवाले जो-जो सर्प थे वे ही उनके अंगोंके आभूषण बने हुए हैं। रुद्र अपने अंगोंमें चिताकी राख लगाते हैं, चमड़ेका वस्त्र पहनते हैं, अमांगलिक वस्तुएँ धारण करते हैं तथा निरन्तर भूत, प्रमथ और पिशाचोंसे घिरे रहते हैं। इस सुकुमारी कन्याको उस रुद्रसे क्या लेना है। सखियोंको चाहिये कि इसे ऐसा करनेसे रोकें। मनोहर रूपवाले देवराज इन्द्र, परम तेजस्वी धर्मराज, वरुण, कुबेर, वायु तथा अग्निको छोड़कर रुद्रके प्रति इसका अनुराग कैसे हुआ?'

परमेश्वर शिवने इस प्रकारकी बहुत-सी बातें वहाँ कहीं। पार्वती सखियोंके मध्यमें बैठकर तपस्यामें संलग्न थीं। उन्होंने वटुरूपधारी रुद्रकी बातें सुनकर उनके प्रति रोष प्रकट करते हुए कहा—'जया! साध्वी विजया! विश्वसुन्दरी प्रम्लोचा! और महाभागा सुलोचना! मैं तुमलोगोंसे कहती हूँ—मैंने जो कुछ किया है, ठीक किया है। परंतु तुम्हें इस ब्रह्मचारीसे क्या काम है जो इसकी कठोर बातें सुनती हो। ब्रह्मचारीका रूप धारण करके यह कोई महादेवजीका निन्दक आ गया है, ऐसा समझो। सखियो! ऐसे व्यक्तिसे अपना क्या प्रयोजन है? जो महात्माओंकी निन्दा करनेवाले, पापी, कृतघ्न, वेददूषक, वेदभ्रष्ट और मर्यादाहीन हैं, उन लोगोंके साथ बुद्धिमान् पुरुषोंको वार्तालाप नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा सुनकर जो तुरंत वहाँसे उठकर दूसरे स्थानपर नहीं चले जाते, वे प्रतिष्ठाहीन मानव पापके भागी होते हैं।'*

गिरिजाका वचन सुनकर विजया वटुरूपधारी रुद्रसे सहसा कुपित होकर बोली—'ब्रह्मचारी! जाओ, जाओ यहाँसे; अब तुम्हें यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरना चाहिये।' विजया बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी। उसने इस प्रकार फटकारकर विवाद करनेवाले वटुरूपधारी शिवको विदा कर दिया। वे तत्काल अन्तर्धान हो गये। सम्पूर्ण सखियोंमेंसे किसीने नहीं देखा कि वे कहाँ चले गये? तदनन्तर भगवान् महेश्वर पार्वतीजीके सामने अपना वास्तविक स्वरूप धारण करके फिर सहसा वहीं प्रकट हो गये। ध्यानमें लगी हुई पार्वतीदेवी जब अपने ध्यानगत स्वरूपको ढूँढ़ रही थीं, उसी समय उनके हृदयस्थित देवता बाहर दिखायी देने लगे। विशाल नेत्रोंवाली सुशीला गिरिजाने आँख खोलकर देखा तो सर्वलोकमहेश्वर देवदेवेश्वर शिव सामने दृष्टिगोचर हुए। उन कैलाशनिवासी शंकरके दो भुजाएँ, एक मुख और अद्भुत स्वरूप था। मस्तकपर जटाओंका जूड़ा बँधा हुआ था। उसमें चन्द्रमाकी कला शोभा पा रही थी। भगवान्ने हाथीका चमड़ा पहन रखा था। उनके कानोंमें कुण्डलके स्थानपर महाभाग कम्बल और अश्वतर—ये दो नाग विराज रहे थे। परम कान्तिमान् सर्पराज वासुकिको हार बना लिया गया था। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े सर्पोंके ही कंगन पड़े थे जो बड़ी शोभा दे रहे थे। इस प्रकार रुद्रने सर्पोंके आभूषण बनाये थे। ऐसा स्वरूप धारणकर भगवान् शिव पार्वतीके सामने खड़े हुए और शीघ्रतापूर्वक बोले—'कल्याणी!


* ये निन्दकाश्च पापाश्च कृतघ्ना वेददूषकाः। वेदभ्रष्टा ह्यप्रतिष्ठा अवाच्यास्ते मनीषिभिः॥
आर्याणां निन्दनं श्रुत्वा ये न यान्ति त्वरान्विताः। स्थानान्तरं ह्यप्रतिष्ठास्तेऽपि स्युः पापिनो जनाः॥
(स्क० पु०, मा० के० २२।६३-६४)

६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तुम वर माँगो।' उस समय सतीसाध्वी पार्वतीजीको बड़ी लज्जा आयी। उन्होंने शंकरजीसे कहा— 'देवेश! आप मेरे सनातन स्वामी हैं, क्या आपको पहलेकी घटनाका कुछ स्मरण है? प्रभो! मैं वही सती हूँ जिसके लिये आपने दक्ष-यज्ञका विनाश किया था। वही आप हैं और वही मैं हूँ। तारकासुरके वधरूप देवकार्यकी सिद्धिके लिये मैं मेनाके गर्भसे प्रकट हुई हूँ। आपसे मेरे द्वारा एक पुत्र होगा। इसलिये महेश्वर! आप मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करें। आपको ऋषियोंके साथ हिमवान्‌के पास जाना चाहिये और उनसे मेरे लिये याचना करनी चाहिये। मेरे पिता हिमवान् आपकी आज्ञाका पालन करेंगे इसमें सन्देह नहीं है। पूर्वकालमें जब मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय भी मेरे पिताने ही मुझे आपकी सेवामें समर्पित किया था। महाभाग! हमारा और आपका विवाह देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये हो रहा है।'

तब महादेवजीने पार्वतीसे हँसते हुए कहा— देवि अहंकाररूपा प्रकृतिसे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। महत्तत्त्वसे तामस अहंकारकी उत्पत्ति हुई। तामस अहंकारसे सर्वव्यापी आकाश प्रकट हुआ। आकाशसे वायु और वायुसे अग्निकी उत्पत्ति हुई। अग्निसे जल और जलसे पृथ्वी हुई। सुमुखि! पृथ्वी आदि भूत तथा भौतिक वस्तुएँ जो भी दृष्टिमें आती हैं उन सबको नश्वर समझो। अविनाशी तो आत्मा ही है जो एक होकर भी अनेकताको प्राप्त हुआ है, निर्गुण होकर भी गुणोंसे आवृत हो रहा है, जो सदा अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला है किंतु इस समय दूसरेसे प्रकाश ग्रहण करनेवाला बन गया है, स्वतन्त्र होकर भी परतन्त्र-सा हो गया है। देवि! प्रकृतिरूपसे तुमने ही महत्तत्त्वको प्रकट किया है। यह सम्पूर्ण मायामय जगत् तुम्हारे द्वारा ही रचा गया है। तीनों गुणोंका कार्य तुमने ही प्रकट किया है। तुम्हीं त्रिगुणमयी सूक्ष्म प्रकृति हो और मैं सदा तुम्हारे सब व्यापारोंका साक्षीमात्र हूँ। मैं हिमालयके पास नहीं जाऊँगा। उनसे किसी प्रकार याचना नहीं करूँगा। क्योंकि किसीके सामने 'दीजिये' ऐसा वचन मुँहसे निकालनेपर पुरुष उसी क्षण लघुताको प्राप्त हो जाता है।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर हिमवान् अपनी धर्मपत्नी मेना तथा दूसरे पर्वतोंके साथ वहाँ आये। पार्वतीजीने जब उन्हें देखा तो वे उठकर खड़ी हो गयीं और अपने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तब हिमालयने मधुर वाणीमें पूछा—'साध्वी! तुमने जैसे-तैसे यहाँ रहकर क्या किया है?'

पार्वती बोलीं—पिताजी! मैंने यहाँ उत्तम तपस्याके द्वारा कामनाशक महादेवजीकी आराधना की है। मेरा वह महान् कार्य, जो अन्य सब लोगोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आज सिद्ध हो गया। महादेवजी सन्तुष्ट होकर यहीं मेरा वरण करनेके लिये पधारे थे; किंतु जब मैंने यह कहा कि मेरे पिताकी अनुपस्थितिमें इस समय आप मेरा पाणिग्रहण कैसे कर सकते हैं; तब वे जिस मार्गसे आये थे उसीसे लौट गये।

* माहे‍श्वरखण्ड-केदारखण्ड *६१

पार्वतीकी यह बात सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित धर्मात्मा हिमवान्‌को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी पुत्रीसे बोले—‘अब हम सब लोग घरको चलें।’ उस समय सब लोग एकत्र हो पार्वतीको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर हिमवान् पार्वतीको अपने घर ले आये। देवतालोग दुन्दुभि बजाने लगे। उनके शंख और तूर्य भी बज उठे। इस प्रकार अपने पिताके घरमें आयी हुई पार्वती उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित होने लगीं। वे मन-ही-मन सदा भगवान् शिवका चिन्तन करती रहती थीं। श्रेष्ठ देवता भी उनके प्रति पूज्यभाव रखते थे।


### सप्तर्षियोंका आगमन, शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय, समस्त देवताओंका शिवकी बारातमें आगमन, हिमवान्‌द्वारा स्वागत तथा मण्डपमें कन्यादानकी तैयारी

लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान् महेश्वरके भेजे हुए सप्तर्षिगण सहसा हिमवान्‌के पास आये। उन्हें आया देख हिमवान्‌के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने शीघ्र उठकर उन सबका स्वागत-सत्कार किया। फिर मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक पूछा—‘महर्षियो! आपलोग कैसे पधारे हैं? अपने आगमनका कारण बतलाइये।' तब सप्तर्षियोंने कहा—'पर्वतराज! हम लोग भगवान् शिवके भेजे हुए हैं, यहाँ आपके पास आये हैं। आपकी कन्याको देखना ही हमारे आनेका उद्देश्य है। अतः शीघ्र अपनी कन्या हमें दिखाइये।' 'बहुत अच्छा' कहकर हिमवान्‌ने पार्वतीको वहाँ बुलाया और सप्तर्षियोंसे हँसते हुए कहा—'यही मेरी कन्या है, किंतु इस समय मुझे आपसे एक विशेष बात कहनी है। जो तपस्वियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, परम विरक्त हैं और कामदेवका नाश करनेवाले हैं, जिन्होंने कामके शरीरको जलाकर उन्हें अनंग बना डाला है; ऐसे भगवान् शंकर अब विवाहके इच्छुक कैसे हो गये? जो अधिक समीप या अधिक दूर रहनेवाला हो, (अपनेसे) अत्यन्त धनी अथवा सर्वथा निर्धन हो, जिसकी कोई आजीविका न हो तथा जो मूर्ख हो, ऐसे पुरुषको कन्या देना अच्छा नहीं माना गया है। जो मूर्ख, विरक्त, स्वयं ही अपनेको बड़ा माननेवाला, रोगी तथा प्रमादी हो, ऐसे पुरुषको कन्या नहीं देनी चाहिये।\* अतः मुनिवरो! आपके साथ भलीभाँति विचार करके ही मुझे महादेवजीको अपनी कन्या देनी है, यही मेरा उत्तम निश्चय है।'

तब महर्षियोंने कहा—जिन्होंने तीव्र तपस्या की है और उस तपके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की है, उन पार्वती देवीके ऊपर आज भगवान् शिव बहुत प्रसन्न हैं। पर्वतराज! तुम्हें पार्वती और भगवान् शिवकी महिमाका थोड़ा भी ज्ञान नहीं है। अतः तुम हमारी बात मानो। अपनी पुत्री पार्वतीको परमात्मा भगवान् शिवकी सेवामें दे दो।

पवित्रात्मा ऋषियोंका यह वचन सुनकर गिरिराज हिमवान् बड़ी उतावलीके साथ समस्त पर्वतोंसे बोले—‘हे मेरु! हे निषध! हे गन्धमादन! हे

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\* अत्यासन्ने चातिदूरे अत्याढ्ये धनवर्जिते । वृत्तिहीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ॥  
मूढाय च विरक्ताय आत्मसम्भाविताय च । आतुराय प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत् ॥  
(स्क० पु०, मा० के० २३।८-९)

६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मन्दराचल! और हे मैनाक! तुम सब लोग अपनी यथोचित सम्मति दो, जिससे वैसा ही किया जाय।' तब बातचीत करनेमें कुशल मेनाने कहा—'नाथ! इस समय आपसमें विचार करनेसे क्या लाभ? यह कार्य तो तभी सम्पन्न हो गया था जब इस बड़भागिनी कन्याने जन्म लिया था। यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भगवान् शिवके लिये ही इसका अवतार हुआ है। अतः यह शिवको ही दी जानी चाहिये। इसने भगवान् रुद्रकी आराधना की है और रुद्रने भी वरदान देकर इसका आदर किया है। महाभागा पार्वती साक्षात् सती ही है। अतः यह शिवको ही ब्याही जाय। वह वैवाहिक कृत्य हमारे द्वारा भगवान् शिवकी पूजामें निमित्त बनेगा।'

मेनाकी यह बात सुनकर हिमवान् बहुत सन्तुष्ट हुए। तदनन्तर सप्तर्षियोंने वहाँसे पुनः लौटकर भगवान् शिवसे उनकी प्रेयसी पार्वतीका सब वृत्तान्त इस प्रकार कहा—'देवेश्वर! गिरिराज हिमवान्ने अपनी कन्या आपको दे दी, इसमें संशय नहीं है। अब देवताओंको साथ ले शीघ्र ही पार्वतीसे विवाह करनेके लिये जाइये।' ऋषियोंका यह वचन सुनकर परमेश्वर शिवने कहा—'विवाह कैसे होगा और कौन-कौन उसमें चलेंगे, यह सब बात विस्तारपूर्वक बताओ।' तब उन ऋषियोंने भगवान् सदाशिवसे हँसकर कहा—'देव! भगवान् विष्णुको बुलाना चाहिये। साथ ही ब्रह्मा, इन्द्र, ऋषिगण, यक्ष, गन्धर्व, नाग, सिद्ध, विद्याधर, किन्नर, अप्सरागण तथा अन्य लोगोंको भी शीघ्र बुलाइये।' ऋषियोंकी यह बात सुनकर महादेवजीने देवर्षि नारदसे कहा—'तुम शीघ्र जाकर भगवान् विष्णुको बुला लाओ। उसके बाद ब्रह्मा, इन्द्र तथा अन्य देवगणोंको भी ले आना।' लोकपावन नारदने भगवान् शिवकी आज्ञा शिरोधार्य की और तुरंत वहाँसे भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् विष्णु एक श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हैं। देवी लक्ष्मी उनकी सेवा कर रही हैं। भगवान्‌के चार भुजाएँ हैं। वे सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति नील कमलके समान श्याम है। कानोंमें बहुमूल्य रत्नजटित मनोहर कुण्डल झलमला रहे हैं। मस्तकपर परम सुन्दर विशाल मुकुट शोभा पा रहा है, जिसमें जड़े हुए उत्तम रत्नोंकी प्रभासे वे और भी प्रकाशित हो रहे हैं। गलेमें सुन्दर वैजयन्तीकी बनी हुई वनमाला शोभा दे रही है। इस प्रकार त्रिभुवनमें एकमात्र सुन्दर वे सनातन देव विष्णु वैकुण्ठमें विराज रहे हैं।*

ऋषियोंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ नारदजी ब्रह्मवीणा बजाते हुए भगवान् विष्णुके समीप गये और शंकरजीका सन्देश सुनाते हुए बड़े आदरसे बोले—'महाविष्णो! शीघ्र चलिये, महादेवजी विवाहके लिये उतावले हो रहे हैं। उनकी ओरसे सब कार्योंकी व्यवस्था करनेवाले केवल आप ही हैं।' नारदजीकी बात सुनकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन नारदजी तथा पार्षदोंको साथ ले वहाँसे चल दिये। भगवान् विष्णु योगेश्वरोंके भी प्रभु हैं, महान् हैं तथा परमात्मा हैं। वे उस समय गरुड़पर आरूढ़ हो श्रेष्ठ देवताओंके साथ आकाशमार्गसे भगवान् शिवके समीप गये।


* ददर्श देवं परमासने स्थितं श्रिया च देव्या परिसेव्यमानम्।
चतुर्भुजं देववरं महाप्रभुं नीलोत्पलश्यामतनुं वरेण्यम्॥
महाहैरलावृतचारुकुण्डलं महाकिरीटोत्तमरत्नभास्वरम्।
सुवैजयन्त्या वनमालयान्वितं सनातनं तं भुवनैकसुन्दरम्॥
(स्क० पु०, मा० के० २३। ३४-३५)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६३

योगीजन जिनके चरणारविन्दोंका सदा चिन्तन करते हैं, वे महादेवजी भगवान् विष्णुको आया देख उठकर खड़े हो गये और आनन्दमग्न हो उन्हें छातीसे लगा लिया। फिर भगवान् हरि और हर दोनों एक ही आसनपर विराजमान हुए। दोनोंने एक-दूसरेकी कुशल पूछी। तत्पश्चात् श्रीमहादेवजी बोले—'विष्णो! पार्वतीकी तपस्यासे मैं उसके वशमें हो गया हूँ और आज उसका पाणिग्रहण करनेके लिये हिमवान्‌के घर चलना चाहता हूँ।' यह बातचीत हो ही रही थी कि ब्रह्माजी भी इन्द्र तथा सम्पूर्ण लोकपालोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। इसी प्रकार सब असुर, यक्ष, दानव, नाग, पक्षी, अप्सरा और महर्षि भी आये। सबने एकत्र होकर भगवान् शिवसे एक स्वरमें कहा—'महादेवजी! अब आप हमलोगोंके साथ हिमवान्‌के घर पधारिये, पधारिये।' तब भगवान् विष्णुने भी इस प्रस्तावके अनुरूप बात कही—'शम्भो! आपको गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार ही यहाँ वैवाहिक कर्म करना चाहिये। जैसे नान्दीमुख श्राद्ध और मण्डपकी स्थापना आदि आवश्यक कार्य हैं।' भगवान् विष्णुके कथनानुसार महादेवजीने अपने हितके लिये सब कुछ वैसा ही किया। आभ्युदयिक श्राद्धकर्ममें जिनका पूजन उचित और आवश्यक है, ऐसे ब्रह्मादि देवताओंकी उन्होंने पूजा की। ब्रह्माजीके साथ कश्यप मुनिने नवग्रहोंका पूजन किया। अत्रि, वशिष्ठ, गौतम, भागुरि, भृगु, बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि, पराशर, मार्कण्डेय, शिलावाक्, शून्यपाल, अक्षतस्रम्, अगस्त्य, च्यवन तथा गोभिल—ये और दूसरे भी बहुत-से महर्षि शिवजीके समीप आये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन सबने वहाँ विधिपूर्वक शास्त्रोक्त रीतिसे शुभकर्म सम्पन्न किये। चण्डी देवी सब भूतोंसे घिरी हुई सबके आगे-आगे चलीं। उन्होंने अपने मस्तकपर सोनेका कलश ले रखा था। चण्डीके पीछे भगवान् शिवके गण थे और गणोंके पीछे इन्द्र आदि देवता, लोकपाल और ऋषि चल रहे थे। ऋषियोंके पीछे भगवान् विष्णुके महातेजस्वी कुमुद आदि पार्षद थे जो भगवान्‌के असंख्य भावोंको शीघ्र ही समझ लेनेवाले तथा बड़े मनोहर थे। परम पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले तथा विश्वके एकमात्र बन्धु परमात्मा भगवान् श्रीहरि शिवजीके साथ-साथ चल रहे थे। तीनों लोकोंके एकमात्र पालक भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ अपने वाहन गरुड़जीकी पीठपर बैठे थे। बड़े-बड़े मुनीश्वर अपने हाथोंमें सुन्दर चँवर लिये हवा कर रहे थे। सर्वेश्वर श्रीहरि उन सबके साथ बड़ी शोभा पा रहे थे। इसी प्रकार ब्रह्माजी भी चारों वेदों, छहों वेदांगों, आगमों, इतिहासों और पुराणोंके साथ अपने वाहन हंसपर विराजमान थे। ब्रह्मा, विष्णु, देवेश्वरगण तथा ऋषिवृन्दसे घिरे हुए भगवान् शिव अपने वाहन वृषभपर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे सम्पूर्ण योगेश्वरोंके लिये भी दुर्लभ तथा अगम्य हैं। वेद, देवता, सिद्ध और महर्षिगण जिसे धर्म कहते हैं, उसी धर्मस्वरूप, धर्मवत्सल वृषभपर महादेवजी आरूढ़ थे। मातृकाएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर अपनी मधुर वाणीद्वारा भगवान् शिवके लिये मंगलाचार करती थीं। इस प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देव-दानवोंके साथ सब प्रकारसे अलंकृत हो नारियोंमें श्रेष्ठ पार्वतीजीका पाणिग्रहण करनेके लिये गिरिराज हिमवान्‌के घर गये।

उधर गिरिराज हिमालय भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी पुत्रीके लिये उसी प्रकार सब मंगलाचार करा रहे थे। उन्होंने गर्गजीको पुरोहित बनाकर महान् वैभवके द्वारा मांगलिक भूमि निर्माण करायी। विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा बड़े आदरके साथ अत्यन्त विस्तृत मण्डप तैयार कराया, जो बहुत-सी वेदियोंके कारण अतिशय मनोहर जान पड़ता था। वह मण्डप अनेक प्रकारके गुणोंसे तथा भाँति-भाँतिके

६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आश्चर्यभरे दृश्योंसे सुशोभित था। उसका विस्तार हजारों योजनका था। वह अपनी दिव्य निर्माण-कलासे देवताओंका भी मन मोहे लेता था।

तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता नारदजीको आगे करके हिमवान्‌के परम अद्भुत भवनमें एक साथ गये। उसे विश्वकर्माने विचित्र ढंगसे बनाया था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यभरी बातें देखनेमें आती थीं। वह यज्ञ-मण्डप अत्यन्त पवित्र और उत्तम था। बहुत लोगोंने सर्वश्रेष्ठ बताकर उसकी प्रशंसा की थी। उसकी कारीगरी अद्भुत थी। वह मन और बुद्धिके लिये अतर्क्य था। बुद्धिमान् विश्वकर्माने इस प्रकार विचित्र यज्ञ-मण्डपकी रचना की थी। वे सम्पूर्ण देवेश्वर ऋषियोंके साथ उस मण्डपमें प्रवेश करना ही चाहते थे तबतक हिमवान्‌की दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। हिमवान्‌ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उन सबके ठहरनेके लिये बड़े मनोहर गृह प्रदान किये। गन्धर्व, सिद्ध, प्रमथ, यक्ष, देव, नाग तथा अप्सराएँ—इनमें जो जहाँ सुखपूर्वक रह सके, उन्हें वहीं विश्रामस्थान हिमालयने दिया।

हिमवान्‌से सम्मानित होकर सब देवताओंने अपने परिवार और वाहनोंसहित उस मण्डपमें आनन्दपूर्वक निवास किया। विश्वकर्माने उसमें बहुत विस्तृत अवकाश बना रखा था। ब्रह्माजीके निवासके लिये अत्यन्त प्रकाशमान स्थान बनाया गया था। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके लिये दूसरा भवन बना था जो अत्यन्त विचित्र और बहुत ही प्रकाशमान था। विश्वकर्माने उसे अपने हाथों सँवारकर अत्यन्त मनोहर बना रखा था। इसी प्रकार चण्डीगृह भी उन्होंने बड़ा सुन्दर बनाया था। उसके अतिरिक्त विश्वकर्माने जो एक अत्यन्त विचित्र, परम मनोहर, महान् मंगलमय, श्रेष्ठ देवताओं‌द्वारा प्रशंसित, कैलासके समान अतिशय प्रभापूर्ण तथा अत्यन्त शोभायमान भवन बना रखा था, उसीमें हिमवान्‌ने महान् वैभवके साथ भगवान् शिवको ठहराया। इसी समय मेनादेवी अपनी सखियों तथा ऋषिमुनियोंके साथ भगवान् शिवकी आरती उतारनेके लिये आयीं। उस समय जो बाजे बज रहे थे, उनके शब्दसे तीनों लोक गूँज उठे। मेनाने तपस्वी शिवकी अपने हाथों आरती उतारी। वे बड़ी सती-साध्वी थीं। जामाताको देखकर उन्हें पार्वतीकी कही हुई सब बातें स्मरण हो आयीं और वे विस्मय-विमुग्ध हो उठीं। मेना मन-ही-मन कहने लगीं—‘अहो! पार्वतीके पहले मेरे समीप जो कुछ कहा था, उससे कहीं अधिक सौन्दर्य इस समय मैं महादेवजीके अंगोंमें देख रही हूँ। यह सौन्दर्य तो अनिर्वचनीय है।’ इस प्रकार विस्मयमें डूबी हुई मेनादेवी अपने घरमें लौट आयीं।

उस समय पार्वती स्नान करके मंगलपीठपर बैठी थीं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंने सब ओरसे उन्हें घेरकर आरती उतारी। तदनन्तर गर्गाचार्यने कहा—‘विद्वानो! आपलोग इसी समय पाणिग्रहणके लिये भगवान् शंकरको इस मण्डपमें ले आवें। इस कार्यमें शीघ्रता होनी चाहिये।’ गर्गाचार्यका वचन सुनकर गिरिराज हिमवान्‌के सब मन्त्री भगवान् शंकरके पास गये और उन्होंने तीन कलशोंके जलसे मांगलिक विधिके अनुसार भगवान् सदाशिवको स्नान कराया तथा उनकी आरती भी उतारी। स्नान करके सुन्दर वस्त्र धारण कर लेनेके पश्चात् शंकरजीका उन सबने पुनः पूजन किया। उसके बाद उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित करके हाथीकी पीठपर चढ़ाया। उस समय भगवान् शिवके मस्तकपर बहुत बड़ा छत्र तना हुआ था, उस छत्रसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। ऊपरसे चाँदौवा तना था और सब ओरसे उनके लिये चँवर डुलाये जा रहे थे। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा सब लोकपाल ‘वर’ के आगे-आगे चलते हुए उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न दिखायी देते थे। उस यात्राके समय शंख, भेरी, पटह आनक और गोमुख आदि बाजे बज रहे थे। सम्पूर्ण गायक उत्तम मांगलिक गीत गा

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *६५

रहे थे। अरुन्धती, अनसूया, सावित्री तथा मातृकाओंसे घिरी हुई लक्ष्मीजी भी उस शोभायात्रामें सम्मिलित थीं। इन सबके साथ जगत्के एकमात्र बन्धु भगवान् शिव अपने उत्तम तेजसे सुशोभित हो रहे थे। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, श्रेष्ठ लोकपाल तथा महर्षिगण भी उनके साथ थे। साक्षात् वायुदेव पंखा कर रहे थे। चन्द्रमाने उनके सिरपर छत्र लगा रखा था। सूर्य आगे रहकर अपने तेजसे तप रहे थे। देवराज इन्द्र हाथमें बेंतकी छड़ी लेकर छड़ीदारका काम कर रहे थे। इस प्रकार देवता और पर्वत भगवान् शिवके आगे चलते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय देवता और मुनि भगवान् शिवके ऊपर फूल बरसा रहे थे, जिससे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। सामने हिमवान्‌का सुन्दर भवन था जो महान् वैभवके कारण सब ओरसे शोभासम्पन्न दिखायी देता था। उस घरका आँगन सोनेका बना हुआ था। वहाँ द्वारपर भगवान् शिवकी विशेषरूपसे पूजा हुई। फिर मनुष्य, देवता और दानवोंके द्वारा पूजित होकर उन्होंने उस भवनमें प्रवेश किया। इस प्रकार अन्तःपुरमें पहुँचकर भगवान् शिव यज्ञ-मण्डपमें पधारे। उस समय नाना प्रकारकी स्तुतियोंसे परमेश्वर शिवके गुण गाये जा रहे थे। वहाँ पहुँचनेपर गिरिराज हिमवान्‌ने महेश्वरको हाथीसे उतारा और मंगलपीठपर बिठाकर सखियोंसहित मेना तथा पुरोहितने उनकी विशेषरूपसे आरती की। वहाँ मधुपर्क आदिकी जो आवश्यक विधि है, वह सब ब्रह्माजीकी आज्ञासे पुरोहितने तत्काल सम्पन्न की। तत्पश्चात् अन्तर्वेदीमें प्रवेश करके, जहाँ ‘तन्वंगी’ पार्वती समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो वेदीके ऊपर विराजमान थीं, वहीं महादेवजी भी लाये गये। उनके साथ भगवान् विष्णु और ब्रह्मा भी थे। बृहस्पति आदि विद्वान् लग्नकी प्रतीक्षा कर रहे थे। गर्ग और वशिष्ठ मुनि जहाँ घड़ीका स्थान था, वहीं बैठे थे। ज्यों ही घड़ी पूरी हुई, गर्गाचार्यने ॐकारका उच्चारण करके हाथ जोड़कर निवेदन किया। अब मंगलमय पुण्य मुहूर्त आ गया। पार्वती ने अपने हाथकी अंजलिमें अक्षत लेकर उसे शिवके ऊपर छोड़ा। फिर दही, अक्षत और कुशके जलसे उनका भलीभाँति पूजन किया।

इसी समय गर्गाचार्यके आदेशसे हिमवान् अपनी पत्नी मेनाके साथ वहाँ कन्यादान करनेको उद्यत हुए। मेना सोनेका कलश लेकर उनकी अर्द्धांगिनी बनी हुई थीं। परम सौभाग्यवती मेना समस्त आभरणोंसे विभूषित होकर हिमवान्‌के साथ बैठी थीं। उस समय हिमवान्‌ने सबको वर देनेवाले भगवान् विश्वनाथसे कहा—‘आज मैं ब्रह्माजी तथा भगवान् विष्णुका संग पाकर और अपने पुरोहित परम महात्मा गर्गजीके साथ बैठकर देवाधिदेव भगवान् शंकरको कन्यादान करता हूँ। विप्रवर! इस समय कन्यादानके लिये उत्तम बेला आयी है। इसमें आप संकल्प पढ़ें।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर वहाँ आये हुए सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने हिमवान्‌की बात स्वीकार की। वे सभी शुभ समयके ज्ञाता थे। उन्होंने तिथि, मास, नक्षत्र आदिका यथावत् उच्चारण किया। फिर हिमवान् भगवान् शंकरसे इस प्रकार बोले।

हिमवान्‌ने कहा—तात! महाभाग! आप अपने गोत्रका नाम बतावें और अपने कुलका विशेषरूपसे परिचय दें।

भगवान् शंकरके मुखारविन्दसे इस प्रश्नका कोई उत्तर नहीं मिला। उस समय नारदजी बहुत हँसे और अपनी वीणा बजाने लगे। यह देख बुद्धिमान् हिमवान्‌ने उन्हें मना करते हुए कहा—‘प्रभो! आप वीणा न बजाइये।’ पर्वतके ऐसा कहनेपर नारदजी बोले—‘गिरिराज! तुमने साक्षात् शिवजीसे उनका गोत्र बतानेके लिये कहा है; परंतु इनका गोत्र और कुल तो ‘नाद’ ही है। भगवान् शंकर न तो किसी कुलमें उत्पन्न हुए हैं और न इनका किसी