भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 81, कुल 1406 में से

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सहारा लेकर तारकासुरके साथ युद्ध करते और विजयी होते थे। मुचुकुन्दके ही बलसे देवताओंने विजय प्राप्त की। तब उन्होंने सोचा—'इन दिनों हमें निरन्तर युद्धमें रहना पड़ता है, ऐसे समयमें हमारा क्या कर्तव्य है? अथवा भवितव्यता ही ऐसी है।' ऐसा विचार कर वे ब्रह्माजीके लोकमें गये और उनके सामने खड़े होकर स्तुति करने लगे। स्तुतिके पश्चात् वे बोले—'महाभाग ! प्रभो ! आप दैत्यपतियोंसे हमारी रक्षा करें।' उसी समय आकाशवाणी हुई—'देवताओ ! तुम जितनी जल्दी हो सके मेरी आज्ञाका यथावत् पालन करो। भगवान् शिवके जब कोई महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तब वही पुनः युद्धमें तारकासुरका वध करेगा, इसमें संशय नहीं है। सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले भगवान् शंकर जिस किसी उपायसे पत्नीका पाणिग्रहण करें, वह तुम्हें करना चाहिये। इसके लिये महान् प्रयत्न करो। मेरा यह वचन अन्यथा न होने पावे।'

यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सब बृहस्पतिजीको आगे करके हिमालयपर्वतपर आये और इस प्रकार कहने लगे—'महाभाग हिमालय ! तुम समस्त पर्वतोंके स्वामी हो, यक्ष और गन्धर्व तुम्हारा सेवन करते हैं, हम तुमसे कुछ निवेदन करेंगे, हम सब देवताओंकी बात तुम्हें माननी चाहिये।'

लोमशजी कहते हैं—देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हँसकर बोले—'एक तो मैं अचल हूँ, चल-फिर नहीं सकता, दूसरे मेरी पाँखें कट गयी हैं, अतः उड़ नहीं सकता। ऐसी दशामें मैं आपलोगोंके किस काम आ सकता हूँ। देवताओ ! यदि तारकासुरके संहारमें मेरी सहायता आवश्यक है तो मैं पूछता हूँ, किस उपायसे आपलोग तारकासुरका वध करना चाहते हैं, वह शीघ्र बतलावें; क्योंकि वह कार्य तो मेरा ही है।' तब देवताओंने आकाशवाणीद्वारा कही हुई सब बातें कह सुनायीं। सुनकर हिमवान्ने कहा—'जब शिवजीके बुद्धिमान् पुत्रद्वारा ही तारकासुरका वध होनेवाला है, तब देवताओंके सब कार्य शुभ हों और आकाशवाणीकी कही हुई यह बात सच निकले। इसके लिये आपलोगोंको विशेष यत्न करना चाहिये।'

देवता बोले—गिरिराज ! आप देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवान् शंकरके विवाहके लिये स्वयं ही एक कन्या उत्पन्न करें।

तब हिमवान्ने अपनी पत्नीसे कहा—सुमुखि ! तुम्हें एक श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न करनी चाहिये। यह सुनकर मेनाने हँसते हुए कहा—'महामते ! मैंने आपकी बात सुन ली; परंतु कन्या स्त्रियोंको शोकमें डालनेवाली होती है, अतः इस विषयमें दीर्घकालतक विचार करके आपको अपनी बुद्धिसे जो हितकर प्रतीत हो, वह बतावें।' अपनी प्रियतमा मेनाकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् हिमवान्ने परोपकारयुक्त वचन कहा—'देवि ! जिस प्रकारसे दूसरोंके जीवनकी रक्षा हो, परोपकारी पुरुषोंको वही करना चाहिये।' इस प्रकार पतिकी प्रेरणा पाकर सौभाग्यवती रानी मेनाने बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने गर्भमें कन्याको धारण किया। कुछ कालके अनन्तर मेनाके गर्भसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो 'गिरिजा' नामसे प्रसिद्ध हुई। सबको सुख देनेवाली उस देवीके प्रकट होनेपर देवताओंके नगाड़े बज उठे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज गाने तथा सिद्ध-चारण स्तुति करने लगे। उस समय देवताओंने फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा की। सम्पूर्ण त्रिलोकीमें प्रसन्नता छा गयी। महासती गिरिजाका जब जन्म हुआ, उस समय दैत्योंके मनमें भय समा गया और देवता, महर्षि, चारण तथा सिद्धगण बड़े आनन्दको प्राप्त हुए।

सती-साध्वी गिरिजा हिमालयके घरमें दिनोंदिन बढ़ने लगी। वह कल्याणी कन्या जब आठ वर्षकी हो गयी, उस समय महादेवजी हिमालयकी कन्दरामें बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। भगवान्के वीरभद्र आदि सभी पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरे रहते थे।

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