संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५३
एक दिन परम बुद्धिमान् हिमवान् अपनी कन्या पार्वतीको साथ लेकर तपस्यामें लगे हुए महादेवजीके पास उनके चरणोंका दर्शन करनेके लिये गये। हिमवान्ने देखा— सबके स्वामी भगवान् शिव तपस्यामें लगे हुए हैं। उनके नेत्र बंद हैं, मस्तकपर जटा-जूट शोभा पा रहा है, जिसे चन्द्रमाकी कला विभूषित किये हुए है। वे वेदान्तवेद्य परमात्मा शिव एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हैं। दर्शन करके हिमवान्ने भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाया और मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। हिमाचल बड़े धैर्यवान् एवं उत्कृष्ट प्राणियोंके आश्रय हैं। वाणीका रहस्य समझनेवाले विद्वानोंमें उनका स्थान बहुत ऊँचा है। उन्होंने सम्पूर्ण विश्वका एकमात्र मंगल करनेवाले भगवान् शिवसे इस प्रकार वार्तालाप किया—'महादेव! मैं आपके प्रसादसे बड़ा सौभाग्यशाली हूँ। देवेश्वर! आप मुझे इस कन्याके साथ प्रतिदिन अपने दर्शनके लिये आनेकी आज्ञा दें।' यह सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने कहा—'पर्वतराज! इस कुमारी कन्याको घरमें छोड़कर ही आप प्रतिदिन मेरे दर्शनके लिये आ सकते हैं, अन्यथा मेरा दर्शन नहीं होगा।' तब हिमाचलने मस्तक झुकाकर पुनः महादेवजीसे कहा—'भगवन्! क्या कारण है कि मुझे इस कन्याके साथ यहाँ नहीं आना चाहिये?' भगवान् शंकरने हँसते हुए उत्तर दिया— 'यह कुमारी सुन्दर कटि-भागसे सुशोभित पतले अंगोंवाली तथा मृदु वचन बोलनेवाली है। अतः मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ कि इस कन्याको मेरे समीप न ले आना।' भगवान् शंकरका यह निष्ठुर वचन सुनकर गौरांगी पार्वती, तपस्वी शिवसे इस प्रकार बोलीं—'शम्भो! आप तपःशक्तिसे सम्पन्न हैं और बड़ी भारी तपस्यामें लगे हुए हैं। आप-जैसे महात्माके मनमें जो यह विचार उत्पन्न हुआ है, वह केवल इसलिये कि यह तपस्या निर्विघ्न चलती रहे। परंतु मैं आपसे पूछती हूँ—आप कौन हैं और यह सूक्ष्म प्रकृति क्या है? भगवन्! आप इस विषयपर भलीभाँति विचार करें।'
महादेवजी बोले—सुन्दरी! मैं उत्तम तपस्याके द्वारा ही प्रकृति (माया)-का नाश करता हूँ। प्रकृतिसे विलग रहकर अपने यथार्थ स्वरूपमें स्थित होता हूँ। इसलिये सिद्धपुरुषोंको प्रकृतिका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये।
श्रीपार्वतीजीने कहा—शंकर! आपने जिस उत्तम वाणीके द्वारा जो कुछ भी कहा है, क्या वह प्रकृति नहीं है? फिर आप प्रकृतिसे अतीत कैसे हैं? मेरी यह बात सुनकर आपको तत्त्वका यथार्थ निर्णय करना चाहिये। यह सम्पूर्ण जगत् सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है। प्रभो! हमें वाणीद्वारा विवाद करनेसे क्या प्रयोजन? शंकर! आप जो सुनते हैं, खाते हैं और देखते हैं, वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। प्रकृतिसे परे होकर आप इस हिमालय पर्वतपर इस समय तपस्या किसलिये करते हैं? प्रकृतिसे आप मिले हुए हैं, क्या इस बातको नहीं जानते? यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और आपकी यह बात सत्य है, तो आपको अब मुझसे भय नहीं मानना चाहिये।
महादेवजी बोले—साधुभाषिणी पार्वती! तुम प्रतिदिन मेरी सेवा करो।
अब वे प्रतिदिन पार्वतीके साथ उनका दर्शन करने लगे। इस प्रकार भगवान् शिवकी उपासना करते हुए पुत्री और पिताका कुछ समय व्यतीत हो गया। तब पार्वतीजीके लिये देवताओंके मनमें बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'भगवान् महेश्वर गिरिजाका पाणिग्रहण कैसे करेंगे?' तब उन्होंने कामदेवका आवाहन किया। आवाहन करते ही इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेवाला कामदेव अपनी पत्नी रति और सखा वसंतके साथ आया और देवसभामें देवराजके सम्मुख उपस्थित हो गर्वयुक्त वचन बोलने लगा—'शचीपते! शीघ्र आज्ञा दीजिये, आज मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ। मेरा स्मरणमात्र करनेसे कितने ही तपस्वी अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो