संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चुके हैं। इन्द्र! मेरे बल और पराक्रमको आप अच्छी तरह जानते हैं। शक्तिनन्दन पराशरको भी मेरे पराक्रमका ज्ञान है; इसी प्रकार ये भृगु आदि बहुत-से अन्य ऋषि-मुनि भी मेरी शक्ति जानते हैं। महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न क्रोध ही मेरा भाई है। हम दोनोंने सम्पूर्ण चराचर जगत्को परास्त किया है। सबको हमने मोहमहासागरमें डुबो दिया है।'
कामदेवके गर्वीले वचन सुनकर इन्द्रने उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा— 'वीरवर! पूर्वकालमें तुमने जो-जो कार्य किये हैं, उनका किसी प्रकार वर्णन नहीं हो सकता। हम सब देवता तुमसे परास्त हो चुके हैं। मदन! तुम सदैव हमको जीतनेमें समर्थ हो। इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम भगवान् शंकरपर चढ़ाई करो। महामते! ऐसी चेष्टा करो जिससे भगवान् शिव पार्वतीके साथ विवाह कर लें।'
देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर सम्पूर्ण विश्वका मन मोह लेनेवाला मदन अप्सराओंको साथ लेकर बड़ी उतावलीके साथ चला। हिमालयपर पहुँचकर योद्धाओंमें श्रेष्ठ कामदेव रति और वसन्तके साथ सब ओर सुशोभित दिखायी देने लगा। उसके मनमें पिनाकपाणि भगवान् शंकरपर विजय पानेकी अभिलाषा जाग उठी थी। रम्भा, उर्वशी, पुंजिकस्थला, सुकेशी, मिश्रकेशी, सुन्दरी तिलोत्तमा तथा इसी श्रेणीकी अन्यान्य अप्सराएँ वहाँ कामदेवके कार्यमें सहायता देनेके लिये आयीं। वहाँका आकाश असमयमें ही कोकिलाओंसे आच्छादित हो गया। अशोक, चम्पा, आम, जूही, कदम्ब, नीप, चिरौंजी, कटहल, अमलतास, चमेली, अंगूरकी लताएँ तथा अनेक प्रकारके नागकेसर वृक्ष हरे-भरे एवं फले-फूले दिखायी देने लगे। इसी समय धनुर्धर कामदेवने देवदारु वृक्षकी छायामें बैठकर अपने धनुषपर पाँच बाण चढ़ाये और भगवान् शंकरकी ओर दृष्टिपात किया। वे उत्तम आसनपर विराजमान हो तपस्यामें संलग्न थे। उनके जटा-जूटमें गंगाजी विराजमान थीं। चन्द्रमाकी कला उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रही थी। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी। तपस्यामें तत्पर हो रुद्राक्षमाला और विभूतिसे भूषित होकर वे बड़ी शोभा पा रहे थे। वसन्तसहित कामदेवने जब महादेवजीको अपने बाणसे बींधनेकी इच्छा की, उसी समय परम मंगलमयी जगज्जननी गिरिजा अपनी सखियोंके साथ पूजन करनेके लिये भगवान् सदाशिवके समीप आयीं। वे चन्द्रमाकी किरणोंके समान मनोहर थीं। उन्होंने भगवान् नीलकण्ठके कण्ठमें धतूरेके फूलोंकी माला पहना दी और सुन्दर वदनारविन्दसे सुशोभित त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवकी शोभा निहारने लगीं। इसी बीचमें वसन्तकी सहायता पानेवाले कामदेवने संमोहन नामक बाणसे भगवान् महेश्वरको बींध डाला। बाणका आघात लगनेपर शंकरजीने धीरेसे नेत्र खोलकर श्रीपार्वतीजीकी ओर देखा, जो सम्पूर्ण मंगलोंको भी मंगलमय बनानेवाली एकमात्र देवी हैं। लोकपावनी गिरिराजनन्दिनीकी ओर दृष्टि डालते ही कामदेवने उन्हें व्याकुल कर दिया। वे पार्वतीके दर्शनमात्रसे मोहित हो गये। फिर सहसा अपनी स्थितिका ध्यान आते ही भगवान् शिवके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन खेद प्रकट करते हुए कहा— 'मैं स्वतन्त्र हूँ, निर्विकार हूँ, तो भी आज इस पार्वतीके दर्शनसे मोहित क्यों हो गया? कहाँसे, किससे और किसने मेरा यह अप्रिय कार्य किया है।' तदनन्तर शंकरजीने सब दिशाओंकी ओर दृष्टि दौड़ायी। उसी समय दक्षिण दिशामें कामदेव दिखलायी दिया, जो हाथमें धनुष लेकर भगवान् सदाशिवपर प्रहार करनेके लिये उद्यत था। उसने चढ़े हुए धनुषको खींचकर मण्डलाकार कर रखा था और पुनः बाण सन्धान करके मदनान्तक शिवको बींधना ही चाहता था। तबतक भगवान् महेश्वरकी रोषपूर्ण दृष्टि उसके ऊपर पड़ी। भगवान्ने तीसरा नेत्र खोलकर उसकी ओर देखा। देखते ही मदन आगकी उठती हुई लपटोंमें घिर गया। उसे भस्म होते देख देवताओंमें बड़ा हाहाकार मचा।