संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५५
देवता बोले—देवदेव! महादेव! आप देवताओंको वर दीजिये। हमने ही गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी सहायताके लिये कामदेवको यहाँ भेजा था, उसका कोई अपराध नहीं था। आपने महातेजस्वी कामको व्यर्थ ही दग्ध किया है। विश्वके एकमात्र बन्धु भगवान् शिव! आपको अपने उत्कृष्ट तेजसे इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहिये। शम्भो! आपके द्वारा इस पार्वतीके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसीसे हमारा सब कार्य सिद्ध होगा। महादेव! तारकासुरने हम सब देवताओंको बहुत सताया है। उसके भयसे हमारी रक्षा करनेके लिये इस कामदेवको जीवन-दान दें। आप पार्वतीजीका पाणिग्रहण करें। महाभाग! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें आप अपनी शक्ति लगावें। गजासुरसे आपहीने हम सब देवताओंका उद्धार किया है। कालकूट विषसे भी आपहीने हमारी रक्षा की है। भगवन्! यह कामदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आया था। यह हमारे उपकारमें संलग्न रहा है। अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिये।
तब भगवान् महेश्वरने देवताओंसे रुष्ट होकर कहा—‘देवगण! तुम सबको कामनारहित होना चाहिये। इन्द्रादि देवता जब-जब कामदेवको आगे रखकर चले हैं तब-तब अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हुए हैं, दुःखमें पड़े हैं और दीनताके भागी हुए हैं। अतः मैंने सबकी शान्तिके लिये कामदेवको जलाया है। तुम सब देवता, असुर, महर्षि तथा दूसरे प्राणी भी अब निर्भय होकर तपस्यामें मन लगाओ। आज सम्पूर्ण जगत्को मैंने काम और क्रोधसे शून्य कर दिया है। देवताओ! यह पापी काम दुःखकी जड़ है। अतः आज मैं इसे जीवन-दान नहीं दूँगा। तुम अवसरकी प्रतीक्षा करो।’ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर सब महर्षियोंने उनसे कहा—‘शम्भो! आपने जो कुछ कहा है, सब हमारे लिये परम कल्याणकारी है। किंतु देवेश्वर! हम भी कुछ निवेदन करना चाहते हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनें। जिस प्रकार इस संसारकी सृष्टि हुई है, उसके अनुसार (संकल्परूप) काम ही इसका अधिष्ठान है। कामके बिना यह सृष्टि कैसे होगी। यह विश्व काममय है; इससे ऊपर उठे हुए आप परमेश्वर ही निष्काम हैं।’ इतना कहकर मुनि, सिद्ध और चारणोंने भगवान् सदाशिवकी स्तुति और वन्दना की। तदनन्तर वे वहाँसे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये। कामदेवको जलाकर महादेवजी अदृश्य हो गये। उस समय पार्वतीजी वहाँ रतिको रोती हुई देखकर बोलीं—‘सखी! तुम शोक न करो, मैं कामदेवको जीवन दिलाऊँगी।’ पार्वतीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर पतिव्रता रतिने पतिको पुनः प्राप्त करनेके लिये बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की।
तदनन्तर पार्वती भी वहीं रहकर तपस्यामें लग गयीं। उस समय माता-पिताने उन्हें रोकते हुए कहा—‘बेटी! अभी तू बालिका है, शीघ्र घर चल। तू तपस्याका श्रम उठाने योग्य नहीं है।’
पार्वती बोलीं—माता और पिताजी! मैं घर नहीं चलूँगी। आप मेरी प्रतिज्ञा सुनें। मैं उत्तम तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको पुनः यहीं बुलाकर उनका वरण करूँगी।
यों कहकर मनस्विनी पार्वती एकाग्रचित्त हो, बड़ी उग्र तपस्याके द्वारा भगवान् शिवका आराधन करने लगीं। उस समय जया, विजया, माधवी, सुलोचना, सुश्रुता, श्रुता, शुकी, प्रम्लोचा, सुभगा, श्यामा, चित्रांगी, वारुणी और सुधा—ये तथा और भी बहुत-सी सखियाँ गिरिराजनन्दिनीकी सेवामें रहने लगीं। परमात्मा रुद्रने कामदेवको जहाँ दग्ध किया था, वहीं एक वेदी बनाकर पार्वतीजी उसपर विराजमान हुईं। वे अन्न और फल त्यागकर केवल हरे पत्ते खाकर रहने लगीं। तत्पश्चात् हरे पत्ते भी छोड़ दिये और सूखे पत्तोंपर निर्वाह करने लगीं। आगे चलकर जब उन्होंने सूखे पत्ते भी त्याग दिये तब वे ‘अपर्णा’ नामसे विख्यात हुईं। सूखे पत्ते छोड़नेपर वे कुछ कालतक केवल जलपर रहीं। फिर उसे भी