भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 85, कुल 1406 में से

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५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

छोड़कर वायु पीकर रहने लगीं। इस प्रकार सती-साध्वी गिरिजा दीर्घकालतक तपस्यामें लगी रहीं। भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये मनमें उत्तम निष्ठा रखकर पार्वती उग्र तपस्याद्वारा आराधन करती रहीं। पार्वतीके उस महान् तपसे सम्पूर्ण चराचर जगत् सन्तप्त होने लगा, तब देवता और असुर सब मिलकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये।

देवता बोले— भगवन्! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है। हम देवताओंकी रक्षा करनेयोग्य आप ही हैं।

देवताओंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने मन-ही-मन चिन्तन किया। चिन्तनसे उन्हें ज्ञात हुआ कि पार्वतीकी तपस्यासे बड़ी अद्भुत दावाग्नि प्रकट हुई है। यह जानकर ब्रह्माजी बड़ी शीघ्रतासे परम अद्भुत क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने अतिशोभायमान शेषशय्यापर सोये हुए भगवान् विष्णुका दर्शन किया। लक्ष्मी देवी उनके दोनों चरणारविन्दोंकी निरन्तर सेवा कर रही थीं। गरुड़जी कुछ दूरपर मस्तक झुकाये हाथ जोड़े प्रभुकी सेवामें खड़े थे। श्री, कान्ति, तुष्टि, वृत्ति और दया आदि देवियाँ भी भगवान्की सेवामें संलग्न थीं। नौ शक्तियोंसे सम्पन्न भगवान् विष्णु अपने पार्षदोंसे घिरे हुए थे। कुमुद, कुमुदाक्ष, सनक, सनन्दन, महाभाग सनातन, प्रसुप्त, विजय, अरिजित्, जयन्त, जयत्सेन, परम कान्तिमान् जय, सनत्कुमार, उत्तम तपस्वी नारद, तुम्बुरु, महाशंख पांचजन्य, कौमोदकी गदा, सुदर्शन चक्र तथा परम अद्भुत शार्ङ्गनामक धनुष— ये सब वहाँ ब्रह्माजीको मूर्तिमान् दिखायी दिये।^* सब देवताओंने परमात्मा भगवान् विष्णुके समीप जाकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहा— 'महाविष्णो! हम पार्वतीजीकी अत्यन्त उग्र तपस्यासे जले जा रहे हैं और सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हैं; आप हमारी रक्षा करें, रक्षा करें।'

तब शेषनागकी शय्यापर बैठे हुए परमेश्वर श्रीहरि इस प्रकार बोले— 'देवताओ! आज तुम लोगोंको साथ लेकर परमेश्वर महादेवजीके पास चलता हूँ। हम सब लोग मिलकर उनसे प्रार्थना करें कि वे पार्वतीजीके साथ विवाह करनेको उद्यत हों। भगवान् शिव पुराणपुरुष हैं, सबके अधीश्वर हैं, वे सबके लिये वरेण्य (वरणीय अथवा सेव्य) हैं, उत्तम स्वरूपकी पराकाष्ठा हैं तथा वे ही परात्पर परमात्मा हैं। इस समय वे तपस्यामें लगे हैं, हम सब लोग उन्हींकी शरणमें चलें।'


^* ज्ञात्वा ब्रह्मा जगामाशु क्षीराब्धिं परमाद्भुतम्। तत्र सुप्तं सुपर्यङ्के शेषाख्ये चातिशोभने॥
लक्ष्म्या पादोपयुगलं सेव्यमानं निरन्तरम्। दूरस्थेनापि तार्क्ष्येण नतकन्धरधारिणा॥
सेव्यमानं श्रिया कान्त्या तुष्ट्या वृत्त्या दयादिभिः। नवशक्तियुतं विष्णुं पार्षदैः परिवारितम्॥
कुमुदोऽथ कुमुदांश्च सनकश्च सनन्दनः। सनातनो महाभागः प्रसुप्तो विजयोऽरिजित्॥
जयन्तश्च जयत्सेनो जयश्चैव महाप्रभः। सनत्कुमारः सुतपा नारदश्चैव तुम्बुरुः॥
पाञ्चजन्यो महाशङ्खो गदा कौमोदकी तथा। सुदर्शनं तथा चक्रं शार्ङ्गं च परमाद्भुतम्॥
एतानि वै रूपवन्ति दृष्टानि परमेष्ठिना।
(स्क० पु०, मा० के० २१। ७९–८५)

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