भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 86
  • माहे‍श्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५७

देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवका पार्वतीजीके पास जाना और उनके प्रेमकी परीक्षा ले उनकी तपस्याको सफल बनाना

सूतजी कहते हैं—भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर सब देवता पिनाकधारी महादेवजीका दर्शन करनेके लिये गये। भगवान् शिव समुद्रके उस पार उत्तम समाधि लगाये योगासनपर विराजमान थे। उनके पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरे हुए थे। वे सर्पराज वासुकिको छातीसे चिपकाये हुए यज्ञोपवीतकी भाँति धारण करते थे। कम्बल और अश्वतर—इन दोनों नागोंको उन्होंने दोनों कानोंका कुण्डल बना रखा था। कर्कोटक और कुलिकसे उत्तम कंकणका काम लेते हुए उन्हें अपने दोनों हाथोंमें धारण किया था। शंख और पद्म नामक नागका भुजबंद धारण करके वे बड़ी शोभा पा रहे थे। पहनने योग्य वस्त्रके स्थानपर उन्होंने बाघका चमड़ा लपेट रखा था। वे मस्तकपर भागीरथी गंगा तथा अर्धचन्द्रयुक्त जटाजूट धारण किये बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओंके साथ विराजमान थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी और कण्ठमें नील चिह्न सुशोभित था। भगवान्‌के पास ही उनके वाहन नन्दिकेश्वर भी थे। ऐसी अद्भुत शोभासे युक्त सुरश्रेष्ठ शिवका समस्त देवताओंने दर्शन किया। उस समय ब्रह्मा, विष्णु, ऋषि, देवता और दानवोंने वेदों और उपनिषदोंके अनेक सूक्तोंद्वारा भगवान् शिवका स्तवन किया।

श्रीब्रह्माजी बोले—कामदेवका अन्त करनेवाले श्रीरुद्रदेवको नमस्कार है। जो प्रकाशस्वरूप होनेके कारण 'भर्ग' नाम धारण करते हैं, तीनों लोकोंमें जिनका सौभाग्य सबसे बढ़कर है, उन त्रिनेत्रधारी भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्‌के भरण-पोषण करनेवाले बन्धु हैं तथा यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। भगवन्! आप समस्त लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले पिता, माता और ईश्वर हैं; आप ही जगत्‌के स्वामी तथा रक्षक हैं, प्रभो! आप हमारा उद्धार करें।

तब उत्तम योगसे युक्त दयालु परमात्मा महेश्वर शम्भुने धीरे-धीरे समाधिसे विश्राम लिया और देवताओंसे इस प्रकार कहा—'परम भाग्यवान् ब्रह्मा आदि देवताओ! तुम लोग मेरे समीप क्यों आये हो? इस समय यहाँ आनेका कारण बतलाओ।'

उनके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीने देवताओंके महत्त्वपूर्ण कार्यका परिचय देते हुए कहा—'भगवन्! तारकासुरने देवताओंको महान् कष्ट पहुँचाया है। वह देवताओंका घोर शत्रु है। अतः हमारी प्रार्थना है कि आप पार्वतीजीका पाणिग्रहण करें। गिरिराज हिमवान्‌द्वारा दी हुई गिरिजाको आप पाणिग्रहणकी विधिसे अंगीकार करें।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर महादेवजीने हँसते हुए कहा—'जब मैं सर्वसुन्दरी गिरिजादेवीका वरण कर लूँगा, तब समस्त सुरेश्वर तथा ऋषि-मुनि भी सकामभावसे युक्त हो जायँगे और निष्कामभावसे पूर्ण परमार्थके पथपर चलनेमें असमर्थ होंगे। अतः मैंने सबके पारमार्थिक कार्यकी सिद्धिके लिये कामदेवको भस्म किया था। मेरे विचारसे तो कामदेवके दग्ध होनेसे ही देवताओंका महान् कार्य सिद्ध हुआ है। इस कामदहनरूपी कार्यसे तुम सब लोग निष्काम हो गये हो। अब जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम लोग भी हो गये। अतः हमलोग अब प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त दुष्कर तथा परम उत्तम तपका अनुष्ठान करें और करावें। कामदेवके न रहनेसे तुम सब देवता समाधि लगाकर परमानन्दमें निमग्न हो सदा सुखी रहोगे। काम तो नरकमें ही ले जानेवाला है। उसीसे