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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • माहे‍श्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५७

देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवका पार्वतीजीके पास जाना और उनके प्रेमकी परीक्षा ले उनकी तपस्याको सफल बनाना

सूतजी कहते हैं—भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर सब देवता पिनाकधारी महादेवजीका दर्शन करनेके लिये गये। भगवान् शिव समुद्रके उस पार उत्तम समाधि लगाये योगासनपर विराजमान थे। उनके पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरे हुए थे। वे सर्पराज वासुकिको छातीसे चिपकाये हुए यज्ञोपवीतकी भाँति धारण करते थे। कम्बल और अश्वतर—इन दोनों नागोंको उन्होंने दोनों कानोंका कुण्डल बना रखा था। कर्कोटक और कुलिकसे उत्तम कंकणका काम लेते हुए उन्हें अपने दोनों हाथोंमें धारण किया था। शंख और पद्म नामक नागका भुजबंद धारण करके वे बड़ी शोभा पा रहे थे। पहनने योग्य वस्त्रके स्थानपर उन्होंने बाघका चमड़ा लपेट रखा था। वे मस्तकपर भागीरथी गंगा तथा अर्धचन्द्रयुक्त जटाजूट धारण किये बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओंके साथ विराजमान थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी और कण्ठमें नील चिह्न सुशोभित था। भगवान्‌के पास ही उनके वाहन नन्दिकेश्वर भी थे। ऐसी अद्भुत शोभासे युक्त सुरश्रेष्ठ शिवका समस्त देवताओंने दर्शन किया। उस समय ब्रह्मा, विष्णु, ऋषि, देवता और दानवोंने वेदों और उपनिषदोंके अनेक सूक्तोंद्वारा भगवान् शिवका स्तवन किया।

श्रीब्रह्माजी बोले—कामदेवका अन्त करनेवाले श्रीरुद्रदेवको नमस्कार है। जो प्रकाशस्वरूप होनेके कारण 'भर्ग' नाम धारण करते हैं, तीनों लोकोंमें जिनका सौभाग्य सबसे बढ़कर है, उन त्रिनेत्रधारी भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्‌के भरण-पोषण करनेवाले बन्धु हैं तथा यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। भगवन्! आप समस्त लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले पिता, माता और ईश्वर हैं; आप ही जगत्‌के स्वामी तथा रक्षक हैं, प्रभो! आप हमारा उद्धार करें।

तब उत्तम योगसे युक्त दयालु परमात्मा महेश्वर शम्भुने धीरे-धीरे समाधिसे विश्राम लिया और देवताओंसे इस प्रकार कहा—'परम भाग्यवान् ब्रह्मा आदि देवताओ! तुम लोग मेरे समीप क्यों आये हो? इस समय यहाँ आनेका कारण बतलाओ।'

उनके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीने देवताओंके महत्त्वपूर्ण कार्यका परिचय देते हुए कहा—'भगवन्! तारकासुरने देवताओंको महान् कष्ट पहुँचाया है। वह देवताओंका घोर शत्रु है। अतः हमारी प्रार्थना है कि आप पार्वतीजीका पाणिग्रहण करें। गिरिराज हिमवान्‌द्वारा दी हुई गिरिजाको आप पाणिग्रहणकी विधिसे अंगीकार करें।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर महादेवजीने हँसते हुए कहा—'जब मैं सर्वसुन्दरी गिरिजादेवीका वरण कर लूँगा, तब समस्त सुरेश्वर तथा ऋषि-मुनि भी सकामभावसे युक्त हो जायँगे और निष्कामभावसे पूर्ण परमार्थके पथपर चलनेमें असमर्थ होंगे। अतः मैंने सबके पारमार्थिक कार्यकी सिद्धिके लिये कामदेवको भस्म किया था। मेरे विचारसे तो कामदेवके दग्ध होनेसे ही देवताओंका महान् कार्य सिद्ध हुआ है। इस कामदहनरूपी कार्यसे तुम सब लोग निष्काम हो गये हो। अब जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम लोग भी हो गये। अतः हमलोग अब प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त दुष्कर तथा परम उत्तम तपका अनुष्ठान करें और करावें। कामदेवके न रहनेसे तुम सब देवता समाधि लगाकर परमानन्दमें निमग्न हो सदा सुखी रहोगे। काम तो नरकमें ही ले जानेवाला है। उसीसे

५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


क्रोधका जन्म होता है। क्रोधसे सम्मोह होता है और सम्मोहसे मनुष्य जल्दी ही भ्रममें पड़ जाता है। अतः सभी श्रेष्ठ देवता काम, क्रोधका परित्याग करके शास्त्रों और संतोंके सदुपदेशोंको मानें—उनके अनुसार जीवन बनावें।'

वृषभके चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले भगवान् महादेवने इस प्रकार उत्तम बातें सुनाकर देवताओं तथा ऋषि-मुनियोंको भलीभाँति समझाया। तत्पश्चात् वे पुनः ध्यान लगाकर मौन हो गये। तब वे सब देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। फिर शिवजीने बुद्धिके द्वारा मनको आत्मामें एकाग्र करके अपने स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन किया—'जो परसे भी अत्यन्त परे, अपने-आपमें स्थित, मल आदि दोषोंसे रहित, विघ्न-बाधाओंसे शून्य, निरंजन (निर्लिप्त) तथा निराभास (मिथ्या ज्ञानसे रहित) है, जिसके विषयमें विवेकी विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं, जहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा नक्षत्र आदि दूसरी किसी ज्योतिका प्रकाश नहीं, जहाँ वायुकी भी गति कुण्ठित हो जाती है, जो विचारदृष्टिसे भी केवल (अद्वितीय) सद्वस्तु है, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतर वस्तुओंसे भी परे है, जिसका कोई नाम या संकेत नहीं है, जो चिन्तनका विषय नहीं है, जिसमें विकारका सर्वथा अभाव है, जो रोग और शोकसे सर्वथा दूर है, विशुद्ध ज्ञान ही जिसका स्वरूप है, सर्वत्यागी संन्यासी जिसे प्राप्त होते हैं, जो शब्द या वाणीकी पहुँचसे परे है, निर्गुण और निर्विकार है, सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, जो ज्ञानगम्य होकर भी वास्तवमें अगम्य है, वेदान्त और आगम भी मूक होकर ही ('नेति-नेति'की भाषामें) जिसका सर्वदा प्रतिपादन करते हैं, वही सबके ईश्वर पिनाकधारी भगवान् वृषध्वज परमार्थ वस्तु (परब्रह्म परमात्मा) हैं।* उन्होंने ही कामदेवका नाश किया है। वे साक्षात् परमेश्वर होकर भी 'तप' का सेवन करते हैं।'

लोमशजी कहते हैं—उधर पार्वती देवी बड़ी कठोर तपस्यामें लगी हुई थीं। उस तपस्यासे उन्होंने भगवान् शंकरको जीत लिया। देवीकी तपस्यासे हार मानकर भगवान् शिव समाधिसे विरत हो, तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ पार्वतीजी विराजमान थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा—देवी गिरिजा सखियोंसे घिरी हुई 'वेदी' पर बैठी हैं और चन्द्रमाकी कलाके समान प्रकाशित हो रही हैं। महादेवजीने उन्हें देखकर तत्काल ब्रह्मचारीका वेष धारण कर लिया और उसी स्वरूपसे सखियोंकी मण्डलीमें उपस्थित होकर पूछा— 'सखियो! यह सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या अपनी सहेलियोंके बीचमें क्यों बैठी है? यह कौन है? किसकी पुत्री है? कहाँसे आयी है और किस लिये तपस्या कर रही है?'

तब जयाने उत्तर दिया—ब्रह्मचारीजी! ये गिरिराज हिमवान्की कन्या हैं और तपस्याद्वारा परमेश्वर रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त करना चाहती हैं।'

जयाकी यह बात सुनकर वटुरूपधारी शिव ठाठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'सखियो! यह पार्वती भोली-भाली है। इसे अपने हित


* आत्मानमात्मना कृत्वा आत्मन्येवमचिन्तयत् ॥
परात्परतरं स्वस्थं निर्मलं निरवग्रहम् । निरञ्जनं निराभासं यन्मुह्यन्ति च सूरयः॥
भानुर्न भात्यग्निरथो शशी वा न ज्योतिरेवं न च मारुतो हि।
यत्केवलं वस्तु विचारतोऽपि सूक्ष्मात् परं सूक्ष्मतरात्परं च ॥
अनिर्देश्यमचिन्त्यं च निर्विकारं निरामयम् । ज्ञप्तिमात्रस्वरूपं च न्यासिनो यान्ति यत्र वै ॥
शब्दातीतं निर्गुणं निर्विकारं सत्तामात्रं ज्ञानगम्यं त्वगम्यम्।
यत्तद् वस्तु सर्वदा कथ्यते वै वेदान्तैश्चागमैर्मूकभूतैः ॥
तद्वस्तुभूतो भगवान् स ईश्वरः पिनाकपाणिर्भगवान् वृषध्वजः ॥
(स्क० पु०, मा० के० २२। ३२-३७)

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५९

और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। भला, रुद्रकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता है? अरी! रुद्र तो अमंगलरूप हैं। हाथमें कपाल धारण करते हैं। मरघटका निवास ही उन्हें अधिक प्रिय है। जिस दिन इसके वरण कर लेनेपर रुद्रका इसके साथ सम्बन्ध होगा उसी दिनसे यह शुभांगी पार्वती भी अशुभरूप हो जायगी। रुद्र वही हैं न, जिन्हें दक्षके शापसे ब्राह्मणोंने यज्ञबहिष्कृत कर दिया है। अत्यन्त भयानक विषवाले जो-जो सर्प थे वे ही उनके अंगोंके आभूषण बने हुए हैं। रुद्र अपने अंगोंमें चिताकी राख लगाते हैं, चमड़ेका वस्त्र पहनते हैं, अमांगलिक वस्तुएँ धारण करते हैं तथा निरन्तर भूत, प्रमथ और पिशाचोंसे घिरे रहते हैं। इस सुकुमारी कन्याको उस रुद्रसे क्या लेना है। सखियोंको चाहिये कि इसे ऐसा करनेसे रोकें। मनोहर रूपवाले देवराज इन्द्र, परम तेजस्वी धर्मराज, वरुण, कुबेर, वायु तथा अग्निको छोड़कर रुद्रके प्रति इसका अनुराग कैसे हुआ?'

परमेश्वर शिवने इस प्रकारकी बहुत-सी बातें वहाँ कहीं। पार्वती सखियोंके मध्यमें बैठकर तपस्यामें संलग्न थीं। उन्होंने वटुरूपधारी रुद्रकी बातें सुनकर उनके प्रति रोष प्रकट करते हुए कहा—'जया! साध्वी विजया! विश्वसुन्दरी प्रम्लोचा! और महाभागा सुलोचना! मैं तुमलोगोंसे कहती हूँ—मैंने जो कुछ किया है, ठीक किया है। परंतु तुम्हें इस ब्रह्मचारीसे क्या काम है जो इसकी कठोर बातें सुनती हो। ब्रह्मचारीका रूप धारण करके यह कोई महादेवजीका निन्दक आ गया है, ऐसा समझो। सखियो! ऐसे व्यक्तिसे अपना क्या प्रयोजन है? जो महात्माओंकी निन्दा करनेवाले, पापी, कृतघ्न, वेददूषक, वेदभ्रष्ट और मर्यादाहीन हैं, उन लोगोंके साथ बुद्धिमान् पुरुषोंको वार्तालाप नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा सुनकर जो तुरंत वहाँसे उठकर दूसरे स्थानपर नहीं चले जाते, वे प्रतिष्ठाहीन मानव पापके भागी होते हैं।'*

गिरिजाका वचन सुनकर विजया वटुरूपधारी रुद्रसे सहसा कुपित होकर बोली—'ब्रह्मचारी! जाओ, जाओ यहाँसे; अब तुम्हें यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरना चाहिये।' विजया बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी। उसने इस प्रकार फटकारकर विवाद करनेवाले वटुरूपधारी शिवको विदा कर दिया। वे तत्काल अन्तर्धान हो गये। सम्पूर्ण सखियोंमेंसे किसीने नहीं देखा कि वे कहाँ चले गये? तदनन्तर भगवान् महेश्वर पार्वतीजीके सामने अपना वास्तविक स्वरूप धारण करके फिर सहसा वहीं प्रकट हो गये। ध्यानमें लगी हुई पार्वतीदेवी जब अपने ध्यानगत स्वरूपको ढूँढ़ रही थीं, उसी समय उनके हृदयस्थित देवता बाहर दिखायी देने लगे। विशाल नेत्रोंवाली सुशीला गिरिजाने आँख खोलकर देखा तो सर्वलोकमहेश्वर देवदेवेश्वर शिव सामने दृष्टिगोचर हुए। उन कैलाशनिवासी शंकरके दो भुजाएँ, एक मुख और अद्भुत स्वरूप था। मस्तकपर जटाओंका जूड़ा बँधा हुआ था। उसमें चन्द्रमाकी कला शोभा पा रही थी। भगवान्ने हाथीका चमड़ा पहन रखा था। उनके कानोंमें कुण्डलके स्थानपर महाभाग कम्बल और अश्वतर—ये दो नाग विराज रहे थे। परम कान्तिमान् सर्पराज वासुकिको हार बना लिया गया था। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े सर्पोंके ही कंगन पड़े थे जो बड़ी शोभा दे रहे थे। इस प्रकार रुद्रने सर्पोंके आभूषण बनाये थे। ऐसा स्वरूप धारणकर भगवान् शिव पार्वतीके सामने खड़े हुए और शीघ्रतापूर्वक बोले—'कल्याणी!


* ये निन्दकाश्च पापाश्च कृतघ्ना वेददूषकाः। वेदभ्रष्टा ह्यप्रतिष्ठा अवाच्यास्ते मनीषिभिः॥
आर्याणां निन्दनं श्रुत्वा ये न यान्ति त्वरान्विताः। स्थानान्तरं ह्यप्रतिष्ठास्तेऽपि स्युः पापिनो जनाः॥
(स्क० पु०, मा० के० २२।६३-६४)

६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तुम वर माँगो।' उस समय सतीसाध्वी पार्वतीजीको बड़ी लज्जा आयी। उन्होंने शंकरजीसे कहा— 'देवेश! आप मेरे सनातन स्वामी हैं, क्या आपको पहलेकी घटनाका कुछ स्मरण है? प्रभो! मैं वही सती हूँ जिसके लिये आपने दक्ष-यज्ञका विनाश किया था। वही आप हैं और वही मैं हूँ। तारकासुरके वधरूप देवकार्यकी सिद्धिके लिये मैं मेनाके गर्भसे प्रकट हुई हूँ। आपसे मेरे द्वारा एक पुत्र होगा। इसलिये महेश्वर! आप मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करें। आपको ऋषियोंके साथ हिमवान्‌के पास जाना चाहिये और उनसे मेरे लिये याचना करनी चाहिये। मेरे पिता हिमवान् आपकी आज्ञाका पालन करेंगे इसमें सन्देह नहीं है। पूर्वकालमें जब मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय भी मेरे पिताने ही मुझे आपकी सेवामें समर्पित किया था। महाभाग! हमारा और आपका विवाह देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये हो रहा है।'

तब महादेवजीने पार्वतीसे हँसते हुए कहा— देवि अहंकाररूपा प्रकृतिसे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। महत्तत्त्वसे तामस अहंकारकी उत्पत्ति हुई। तामस अहंकारसे सर्वव्यापी आकाश प्रकट हुआ। आकाशसे वायु और वायुसे अग्निकी उत्पत्ति हुई। अग्निसे जल और जलसे पृथ्वी हुई। सुमुखि! पृथ्वी आदि भूत तथा भौतिक वस्तुएँ जो भी दृष्टिमें आती हैं उन सबको नश्वर समझो। अविनाशी तो आत्मा ही है जो एक होकर भी अनेकताको प्राप्त हुआ है, निर्गुण होकर भी गुणोंसे आवृत हो रहा है, जो सदा अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला है किंतु इस समय दूसरेसे प्रकाश ग्रहण करनेवाला बन गया है, स्वतन्त्र होकर भी परतन्त्र-सा हो गया है। देवि! प्रकृतिरूपसे तुमने ही महत्तत्त्वको प्रकट किया है। यह सम्पूर्ण मायामय जगत् तुम्हारे द्वारा ही रचा गया है। तीनों गुणोंका कार्य तुमने ही प्रकट किया है। तुम्हीं त्रिगुणमयी सूक्ष्म प्रकृति हो और मैं सदा तुम्हारे सब व्यापारोंका साक्षीमात्र हूँ। मैं हिमालयके पास नहीं जाऊँगा। उनसे किसी प्रकार याचना नहीं करूँगा। क्योंकि किसीके सामने 'दीजिये' ऐसा वचन मुँहसे निकालनेपर पुरुष उसी क्षण लघुताको प्राप्त हो जाता है।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर हिमवान् अपनी धर्मपत्नी मेना तथा दूसरे पर्वतोंके साथ वहाँ आये। पार्वतीजीने जब उन्हें देखा तो वे उठकर खड़ी हो गयीं और अपने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तब हिमालयने मधुर वाणीमें पूछा—'साध्वी! तुमने जैसे-तैसे यहाँ रहकर क्या किया है?'

पार्वती बोलीं—पिताजी! मैंने यहाँ उत्तम तपस्याके द्वारा कामनाशक महादेवजीकी आराधना की है। मेरा वह महान् कार्य, जो अन्य सब लोगोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आज सिद्ध हो गया। महादेवजी सन्तुष्ट होकर यहीं मेरा वरण करनेके लिये पधारे थे; किंतु जब मैंने यह कहा कि मेरे पिताकी अनुपस्थितिमें इस समय आप मेरा पाणिग्रहण कैसे कर सकते हैं; तब वे जिस मार्गसे आये थे उसीसे लौट गये।

* माहे‍श्वरखण्ड-केदारखण्ड *६१

पार्वतीकी यह बात सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित धर्मात्मा हिमवान्‌को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी पुत्रीसे बोले—‘अब हम सब लोग घरको चलें।’ उस समय सब लोग एकत्र हो पार्वतीको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर हिमवान् पार्वतीको अपने घर ले आये। देवतालोग दुन्दुभि बजाने लगे। उनके शंख और तूर्य भी बज उठे। इस प्रकार अपने पिताके घरमें आयी हुई पार्वती उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित होने लगीं। वे मन-ही-मन सदा भगवान् शिवका चिन्तन करती रहती थीं। श्रेष्ठ देवता भी उनके प्रति पूज्यभाव रखते थे।


### सप्तर्षियोंका आगमन, शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय, समस्त देवताओंका शिवकी बारातमें आगमन, हिमवान्‌द्वारा स्वागत तथा मण्डपमें कन्यादानकी तैयारी

लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान् महेश्वरके भेजे हुए सप्तर्षिगण सहसा हिमवान्‌के पास आये। उन्हें आया देख हिमवान्‌के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने शीघ्र उठकर उन सबका स्वागत-सत्कार किया। फिर मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक पूछा—‘महर्षियो! आपलोग कैसे पधारे हैं? अपने आगमनका कारण बतलाइये।' तब सप्तर्षियोंने कहा—'पर्वतराज! हम लोग भगवान् शिवके भेजे हुए हैं, यहाँ आपके पास आये हैं। आपकी कन्याको देखना ही हमारे आनेका उद्देश्य है। अतः शीघ्र अपनी कन्या हमें दिखाइये।' 'बहुत अच्छा' कहकर हिमवान्‌ने पार्वतीको वहाँ बुलाया और सप्तर्षियोंसे हँसते हुए कहा—'यही मेरी कन्या है, किंतु इस समय मुझे आपसे एक विशेष बात कहनी है। जो तपस्वियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, परम विरक्त हैं और कामदेवका नाश करनेवाले हैं, जिन्होंने कामके शरीरको जलाकर उन्हें अनंग बना डाला है; ऐसे भगवान् शंकर अब विवाहके इच्छुक कैसे हो गये? जो अधिक समीप या अधिक दूर रहनेवाला हो, (अपनेसे) अत्यन्त धनी अथवा सर्वथा निर्धन हो, जिसकी कोई आजीविका न हो तथा जो मूर्ख हो, ऐसे पुरुषको कन्या देना अच्छा नहीं माना गया है। जो मूर्ख, विरक्त, स्वयं ही अपनेको बड़ा माननेवाला, रोगी तथा प्रमादी हो, ऐसे पुरुषको कन्या नहीं देनी चाहिये।\* अतः मुनिवरो! आपके साथ भलीभाँति विचार करके ही मुझे महादेवजीको अपनी कन्या देनी है, यही मेरा उत्तम निश्चय है।'

तब महर्षियोंने कहा—जिन्होंने तीव्र तपस्या की है और उस तपके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की है, उन पार्वती देवीके ऊपर आज भगवान् शिव बहुत प्रसन्न हैं। पर्वतराज! तुम्हें पार्वती और भगवान् शिवकी महिमाका थोड़ा भी ज्ञान नहीं है। अतः तुम हमारी बात मानो। अपनी पुत्री पार्वतीको परमात्मा भगवान् शिवकी सेवामें दे दो।

पवित्रात्मा ऋषियोंका यह वचन सुनकर गिरिराज हिमवान् बड़ी उतावलीके साथ समस्त पर्वतोंसे बोले—‘हे मेरु! हे निषध! हे गन्धमादन! हे

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\* अत्यासन्ने चातिदूरे अत्याढ्ये धनवर्जिते । वृत्तिहीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ॥  
मूढाय च विरक्ताय आत्मसम्भाविताय च । आतुराय प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत् ॥  
(स्क० पु०, मा० के० २३।८-९)

६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मन्दराचल! और हे मैनाक! तुम सब लोग अपनी यथोचित सम्मति दो, जिससे वैसा ही किया जाय।' तब बातचीत करनेमें कुशल मेनाने कहा—'नाथ! इस समय आपसमें विचार करनेसे क्या लाभ? यह कार्य तो तभी सम्पन्न हो गया था जब इस बड़भागिनी कन्याने जन्म लिया था। यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भगवान् शिवके लिये ही इसका अवतार हुआ है। अतः यह शिवको ही दी जानी चाहिये। इसने भगवान् रुद्रकी आराधना की है और रुद्रने भी वरदान देकर इसका आदर किया है। महाभागा पार्वती साक्षात् सती ही है। अतः यह शिवको ही ब्याही जाय। वह वैवाहिक कृत्य हमारे द्वारा भगवान् शिवकी पूजामें निमित्त बनेगा।'

मेनाकी यह बात सुनकर हिमवान् बहुत सन्तुष्ट हुए। तदनन्तर सप्तर्षियोंने वहाँसे पुनः लौटकर भगवान् शिवसे उनकी प्रेयसी पार्वतीका सब वृत्तान्त इस प्रकार कहा—'देवेश्वर! गिरिराज हिमवान्ने अपनी कन्या आपको दे दी, इसमें संशय नहीं है। अब देवताओंको साथ ले शीघ्र ही पार्वतीसे विवाह करनेके लिये जाइये।' ऋषियोंका यह वचन सुनकर परमेश्वर शिवने कहा—'विवाह कैसे होगा और कौन-कौन उसमें चलेंगे, यह सब बात विस्तारपूर्वक बताओ।' तब उन ऋषियोंने भगवान् सदाशिवसे हँसकर कहा—'देव! भगवान् विष्णुको बुलाना चाहिये। साथ ही ब्रह्मा, इन्द्र, ऋषिगण, यक्ष, गन्धर्व, नाग, सिद्ध, विद्याधर, किन्नर, अप्सरागण तथा अन्य लोगोंको भी शीघ्र बुलाइये।' ऋषियोंकी यह बात सुनकर महादेवजीने देवर्षि नारदसे कहा—'तुम शीघ्र जाकर भगवान् विष्णुको बुला लाओ। उसके बाद ब्रह्मा, इन्द्र तथा अन्य देवगणोंको भी ले आना।' लोकपावन नारदने भगवान् शिवकी आज्ञा शिरोधार्य की और तुरंत वहाँसे भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् विष्णु एक श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हैं। देवी लक्ष्मी उनकी सेवा कर रही हैं। भगवान्‌के चार भुजाएँ हैं। वे सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति नील कमलके समान श्याम है। कानोंमें बहुमूल्य रत्नजटित मनोहर कुण्डल झलमला रहे हैं। मस्तकपर परम सुन्दर विशाल मुकुट शोभा पा रहा है, जिसमें जड़े हुए उत्तम रत्नोंकी प्रभासे वे और भी प्रकाशित हो रहे हैं। गलेमें सुन्दर वैजयन्तीकी बनी हुई वनमाला शोभा दे रही है। इस प्रकार त्रिभुवनमें एकमात्र सुन्दर वे सनातन देव विष्णु वैकुण्ठमें विराज रहे हैं।*

ऋषियोंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ नारदजी ब्रह्मवीणा बजाते हुए भगवान् विष्णुके समीप गये और शंकरजीका सन्देश सुनाते हुए बड़े आदरसे बोले—'महाविष्णो! शीघ्र चलिये, महादेवजी विवाहके लिये उतावले हो रहे हैं। उनकी ओरसे सब कार्योंकी व्यवस्था करनेवाले केवल आप ही हैं।' नारदजीकी बात सुनकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन नारदजी तथा पार्षदोंको साथ ले वहाँसे चल दिये। भगवान् विष्णु योगेश्वरोंके भी प्रभु हैं, महान् हैं तथा परमात्मा हैं। वे उस समय गरुड़पर आरूढ़ हो श्रेष्ठ देवताओंके साथ आकाशमार्गसे भगवान् शिवके समीप गये।


* ददर्श देवं परमासने स्थितं श्रिया च देव्या परिसेव्यमानम्।
चतुर्भुजं देववरं महाप्रभुं नीलोत्पलश्यामतनुं वरेण्यम्॥
महाहैरलावृतचारुकुण्डलं महाकिरीटोत्तमरत्नभास्वरम्।
सुवैजयन्त्या वनमालयान्वितं सनातनं तं भुवनैकसुन्दरम्॥
(स्क० पु०, मा० के० २३। ३४-३५)

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६३

योगीजन जिनके चरणारविन्दोंका सदा चिन्तन करते हैं, वे महादेवजी भगवान् विष्णुको आया देख उठकर खड़े हो गये और आनन्दमग्न हो उन्हें छातीसे लगा लिया। फिर भगवान् हरि और हर दोनों एक ही आसनपर विराजमान हुए। दोनोंने एक-दूसरेकी कुशल पूछी। तत्पश्चात् श्रीमहादेवजी बोले—'विष्णो! पार्वतीकी तपस्यासे मैं उसके वशमें हो गया हूँ और आज उसका पाणिग्रहण करनेके लिये हिमवान्‌के घर चलना चाहता हूँ।' यह बातचीत हो ही रही थी कि ब्रह्माजी भी इन्द्र तथा सम्पूर्ण लोकपालोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। इसी प्रकार सब असुर, यक्ष, दानव, नाग, पक्षी, अप्सरा और महर्षि भी आये। सबने एकत्र होकर भगवान् शिवसे एक स्वरमें कहा—'महादेवजी! अब आप हमलोगोंके साथ हिमवान्‌के घर पधारिये, पधारिये।' तब भगवान् विष्णुने भी इस प्रस्तावके अनुरूप बात कही—'शम्भो! आपको गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार ही यहाँ वैवाहिक कर्म करना चाहिये। जैसे नान्दीमुख श्राद्ध और मण्डपकी स्थापना आदि आवश्यक कार्य हैं।' भगवान् विष्णुके कथनानुसार महादेवजीने अपने हितके लिये सब कुछ वैसा ही किया। आभ्युदयिक श्राद्धकर्ममें जिनका पूजन उचित और आवश्यक है, ऐसे ब्रह्मादि देवताओंकी उन्होंने पूजा की। ब्रह्माजीके साथ कश्यप मुनिने नवग्रहोंका पूजन किया। अत्रि, वशिष्ठ, गौतम, भागुरि, भृगु, बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि, पराशर, मार्कण्डेय, शिलावाक्, शून्यपाल, अक्षतस्रम्, अगस्त्य, च्यवन तथा गोभिल—ये और दूसरे भी बहुत-से महर्षि शिवजीके समीप आये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन सबने वहाँ विधिपूर्वक शास्त्रोक्त रीतिसे शुभकर्म सम्पन्न किये। चण्डी देवी सब भूतोंसे घिरी हुई सबके आगे-आगे चलीं। उन्होंने अपने मस्तकपर सोनेका कलश ले रखा था। चण्डीके पीछे भगवान् शिवके गण थे और गणोंके पीछे इन्द्र आदि देवता, लोकपाल और ऋषि चल रहे थे। ऋषियोंके पीछे भगवान् विष्णुके महातेजस्वी कुमुद आदि पार्षद थे जो भगवान्‌के असंख्य भावोंको शीघ्र ही समझ लेनेवाले तथा बड़े मनोहर थे। परम पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले तथा विश्वके एकमात्र बन्धु परमात्मा भगवान् श्रीहरि शिवजीके साथ-साथ चल रहे थे। तीनों लोकोंके एकमात्र पालक भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ अपने वाहन गरुड़जीकी पीठपर बैठे थे। बड़े-बड़े मुनीश्वर अपने हाथोंमें सुन्दर चँवर लिये हवा कर रहे थे। सर्वेश्वर श्रीहरि उन सबके साथ बड़ी शोभा पा रहे थे। इसी प्रकार ब्रह्माजी भी चारों वेदों, छहों वेदांगों, आगमों, इतिहासों और पुराणोंके साथ अपने वाहन हंसपर विराजमान थे। ब्रह्मा, विष्णु, देवेश्वरगण तथा ऋषिवृन्दसे घिरे हुए भगवान् शिव अपने वाहन वृषभपर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे सम्पूर्ण योगेश्वरोंके लिये भी दुर्लभ तथा अगम्य हैं। वेद, देवता, सिद्ध और महर्षिगण जिसे धर्म कहते हैं, उसी धर्मस्वरूप, धर्मवत्सल वृषभपर महादेवजी आरूढ़ थे। मातृकाएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर अपनी मधुर वाणीद्वारा भगवान् शिवके लिये मंगलाचार करती थीं। इस प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देव-दानवोंके साथ सब प्रकारसे अलंकृत हो नारियोंमें श्रेष्ठ पार्वतीजीका पाणिग्रहण करनेके लिये गिरिराज हिमवान्‌के घर गये।

उधर गिरिराज हिमालय भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी पुत्रीके लिये उसी प्रकार सब मंगलाचार करा रहे थे। उन्होंने गर्गजीको पुरोहित बनाकर महान् वैभवके द्वारा मांगलिक भूमि निर्माण करायी। विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा बड़े आदरके साथ अत्यन्त विस्तृत मण्डप तैयार कराया, जो बहुत-सी वेदियोंके कारण अतिशय मनोहर जान पड़ता था। वह मण्डप अनेक प्रकारके गुणोंसे तथा भाँति-भाँतिके

६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आश्चर्यभरे दृश्योंसे सुशोभित था। उसका विस्तार हजारों योजनका था। वह अपनी दिव्य निर्माण-कलासे देवताओंका भी मन मोहे लेता था।

तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता नारदजीको आगे करके हिमवान्‌के परम अद्भुत भवनमें एक साथ गये। उसे विश्वकर्माने विचित्र ढंगसे बनाया था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यभरी बातें देखनेमें आती थीं। वह यज्ञ-मण्डप अत्यन्त पवित्र और उत्तम था। बहुत लोगोंने सर्वश्रेष्ठ बताकर उसकी प्रशंसा की थी। उसकी कारीगरी अद्भुत थी। वह मन और बुद्धिके लिये अतर्क्य था। बुद्धिमान् विश्वकर्माने इस प्रकार विचित्र यज्ञ-मण्डपकी रचना की थी। वे सम्पूर्ण देवेश्वर ऋषियोंके साथ उस मण्डपमें प्रवेश करना ही चाहते थे तबतक हिमवान्‌की दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। हिमवान्‌ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उन सबके ठहरनेके लिये बड़े मनोहर गृह प्रदान किये। गन्धर्व, सिद्ध, प्रमथ, यक्ष, देव, नाग तथा अप्सराएँ—इनमें जो जहाँ सुखपूर्वक रह सके, उन्हें वहीं विश्रामस्थान हिमालयने दिया।

हिमवान्‌से सम्मानित होकर सब देवताओंने अपने परिवार और वाहनोंसहित उस मण्डपमें आनन्दपूर्वक निवास किया। विश्वकर्माने उसमें बहुत विस्तृत अवकाश बना रखा था। ब्रह्माजीके निवासके लिये अत्यन्त प्रकाशमान स्थान बनाया गया था। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके लिये दूसरा भवन बना था जो अत्यन्त विचित्र और बहुत ही प्रकाशमान था। विश्वकर्माने उसे अपने हाथों सँवारकर अत्यन्त मनोहर बना रखा था। इसी प्रकार चण्डीगृह भी उन्होंने बड़ा सुन्दर बनाया था। उसके अतिरिक्त विश्वकर्माने जो एक अत्यन्त विचित्र, परम मनोहर, महान् मंगलमय, श्रेष्ठ देवताओं‌द्वारा प्रशंसित, कैलासके समान अतिशय प्रभापूर्ण तथा अत्यन्त शोभायमान भवन बना रखा था, उसीमें हिमवान्‌ने महान् वैभवके साथ भगवान् शिवको ठहराया। इसी समय मेनादेवी अपनी सखियों तथा ऋषिमुनियोंके साथ भगवान् शिवकी आरती उतारनेके लिये आयीं। उस समय जो बाजे बज रहे थे, उनके शब्दसे तीनों लोक गूँज उठे। मेनाने तपस्वी शिवकी अपने हाथों आरती उतारी। वे बड़ी सती-साध्वी थीं। जामाताको देखकर उन्हें पार्वतीकी कही हुई सब बातें स्मरण हो आयीं और वे विस्मय-विमुग्ध हो उठीं। मेना मन-ही-मन कहने लगीं—‘अहो! पार्वतीके पहले मेरे समीप जो कुछ कहा था, उससे कहीं अधिक सौन्दर्य इस समय मैं महादेवजीके अंगोंमें देख रही हूँ। यह सौन्दर्य तो अनिर्वचनीय है।’ इस प्रकार विस्मयमें डूबी हुई मेनादेवी अपने घरमें लौट आयीं।

उस समय पार्वती स्नान करके मंगलपीठपर बैठी थीं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंने सब ओरसे उन्हें घेरकर आरती उतारी। तदनन्तर गर्गाचार्यने कहा—‘विद्वानो! आपलोग इसी समय पाणिग्रहणके लिये भगवान् शंकरको इस मण्डपमें ले आवें। इस कार्यमें शीघ्रता होनी चाहिये।’ गर्गाचार्यका वचन सुनकर गिरिराज हिमवान्‌के सब मन्त्री भगवान् शंकरके पास गये और उन्होंने तीन कलशोंके जलसे मांगलिक विधिके अनुसार भगवान् सदाशिवको स्नान कराया तथा उनकी आरती भी उतारी। स्नान करके सुन्दर वस्त्र धारण कर लेनेके पश्चात् शंकरजीका उन सबने पुनः पूजन किया। उसके बाद उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित करके हाथीकी पीठपर चढ़ाया। उस समय भगवान् शिवके मस्तकपर बहुत बड़ा छत्र तना हुआ था, उस छत्रसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। ऊपरसे चाँदौवा तना था और सब ओरसे उनके लिये चँवर डुलाये जा रहे थे। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा सब लोकपाल ‘वर’ के आगे-आगे चलते हुए उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न दिखायी देते थे। उस यात्राके समय शंख, भेरी, पटह आनक और गोमुख आदि बाजे बज रहे थे। सम्पूर्ण गायक उत्तम मांगलिक गीत गा

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रहे थे। अरुन्धती, अनसूया, सावित्री तथा मातृकाओंसे घिरी हुई लक्ष्मीजी भी उस शोभायात्रामें सम्मिलित थीं। इन सबके साथ जगत्के एकमात्र बन्धु भगवान् शिव अपने उत्तम तेजसे सुशोभित हो रहे थे। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, श्रेष्ठ लोकपाल तथा महर्षिगण भी उनके साथ थे। साक्षात् वायुदेव पंखा कर रहे थे। चन्द्रमाने उनके सिरपर छत्र लगा रखा था। सूर्य आगे रहकर अपने तेजसे तप रहे थे। देवराज इन्द्र हाथमें बेंतकी छड़ी लेकर छड़ीदारका काम कर रहे थे। इस प्रकार देवता और पर्वत भगवान् शिवके आगे चलते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय देवता और मुनि भगवान् शिवके ऊपर फूल बरसा रहे थे, जिससे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। सामने हिमवान्‌का सुन्दर भवन था जो महान् वैभवके कारण सब ओरसे शोभासम्पन्न दिखायी देता था। उस घरका आँगन सोनेका बना हुआ था। वहाँ द्वारपर भगवान् शिवकी विशेषरूपसे पूजा हुई। फिर मनुष्य, देवता और दानवोंके द्वारा पूजित होकर उन्होंने उस भवनमें प्रवेश किया। इस प्रकार अन्तःपुरमें पहुँचकर भगवान् शिव यज्ञ-मण्डपमें पधारे। उस समय नाना प्रकारकी स्तुतियोंसे परमेश्वर शिवके गुण गाये जा रहे थे। वहाँ पहुँचनेपर गिरिराज हिमवान्‌ने महेश्वरको हाथीसे उतारा और मंगलपीठपर बिठाकर सखियोंसहित मेना तथा पुरोहितने उनकी विशेषरूपसे आरती की। वहाँ मधुपर्क आदिकी जो आवश्यक विधि है, वह सब ब्रह्माजीकी आज्ञासे पुरोहितने तत्काल सम्पन्न की। तत्पश्चात् अन्तर्वेदीमें प्रवेश करके, जहाँ ‘तन्वंगी’ पार्वती समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो वेदीके ऊपर विराजमान थीं, वहीं महादेवजी भी लाये गये। उनके साथ भगवान् विष्णु और ब्रह्मा भी थे। बृहस्पति आदि विद्वान् लग्नकी प्रतीक्षा कर रहे थे। गर्ग और वशिष्ठ मुनि जहाँ घड़ीका स्थान था, वहीं बैठे थे। ज्यों ही घड़ी पूरी हुई, गर्गाचार्यने ॐकारका उच्चारण करके हाथ जोड़कर निवेदन किया। अब मंगलमय पुण्य मुहूर्त आ गया। पार्वती ने अपने हाथकी अंजलिमें अक्षत लेकर उसे शिवके ऊपर छोड़ा। फिर दही, अक्षत और कुशके जलसे उनका भलीभाँति पूजन किया।

इसी समय गर्गाचार्यके आदेशसे हिमवान् अपनी पत्नी मेनाके साथ वहाँ कन्यादान करनेको उद्यत हुए। मेना सोनेका कलश लेकर उनकी अर्द्धांगिनी बनी हुई थीं। परम सौभाग्यवती मेना समस्त आभरणोंसे विभूषित होकर हिमवान्‌के साथ बैठी थीं। उस समय हिमवान्‌ने सबको वर देनेवाले भगवान् विश्वनाथसे कहा—‘आज मैं ब्रह्माजी तथा भगवान् विष्णुका संग पाकर और अपने पुरोहित परम महात्मा गर्गजीके साथ बैठकर देवाधिदेव भगवान् शंकरको कन्यादान करता हूँ। विप्रवर! इस समय कन्यादानके लिये उत्तम बेला आयी है। इसमें आप संकल्प पढ़ें।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर वहाँ आये हुए सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने हिमवान्‌की बात स्वीकार की। वे सभी शुभ समयके ज्ञाता थे। उन्होंने तिथि, मास, नक्षत्र आदिका यथावत् उच्चारण किया। फिर हिमवान् भगवान् शंकरसे इस प्रकार बोले।

हिमवान्‌ने कहा—तात! महाभाग! आप अपने गोत्रका नाम बतावें और अपने कुलका विशेषरूपसे परिचय दें।

भगवान् शंकरके मुखारविन्दसे इस प्रश्नका कोई उत्तर नहीं मिला। उस समय नारदजी बहुत हँसे और अपनी वीणा बजाने लगे। यह देख बुद्धिमान् हिमवान्‌ने उन्हें मना करते हुए कहा—‘प्रभो! आप वीणा न बजाइये।’ पर्वतके ऐसा कहनेपर नारदजी बोले—‘गिरिराज! तुमने साक्षात् शिवजीसे उनका गोत्र बतानेके लिये कहा है; परंतु इनका गोत्र और कुल तो ‘नाद’ ही है। भगवान् शंकर न तो किसी कुलमें उत्पन्न हुए हैं और न इनका किसी

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विशेष कुलसे ही सम्बन्ध है। ये गोत्रोंके भी परम गति हैं। महादेवजी नादमें प्रतिष्ठित हैं और नाद उनमें प्रतिष्ठित है। अतः भगवान् शिव नादमय हैं और नादसे ही उपलब्ध होते हैं। परंतप ! यही भाव व्यक्त करनेके लिये मैंने इस समय वीणा बजायी है। इनके गोत्र और कुलका नाम ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। भगवान् शिवका कोई रूप नहीं है, इसीलिये किसी कुलमें उत्पन्न न होनेके कारण ये अकुलीन कहलाते हैं। गिरिश्रेष्ठ ! इसीलिये तुम्हारे ये 'जामाता' गोत्ररहित हैं। राजन् ! मेरे बहुत कहनेसे क्या लाभ। इनके अंशमात्रसे मोहित होकर ये ऋषिलोग भी इनके स्वरूपको यथावत्रूपसे नहीं जानते। यह कन्या कौन है, इस बातको अभी तुम भी ठीक-ठीक नहीं जानते। शिव और पार्वती—इन दोनोंसे ही सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति होती है तथा इन्हीं दोनोंके आधारपर यह टिका हुआ है।'

महात्मा नारदका यह वचन सुनकर हिमवान् आदि समस्त पर्वत और इन्द्र आदि सब देवता विस्मित होकर उन्हें 'साधुवाद' देने लगे। भगवान् महेश्वरकी गम्भीरताको जानकर वहाँ आये हुए सब विद्वान् आश्चर्यचकित हो परस्पर कहने लगे—जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजीके द्वारा इस सम्पूर्ण विशाल विश्वकी सृष्टि हुई है, जिनसे अभिन्न होनेके कारण यह समस्त जगत् परात्पररूप तथा आत्मबोधस्वरूप है, स्वतन्त्र परमेश्वररूपसे जाननेयोग्य है, वे भगवान् शिव ही अपने त्रिभुवनमय स्वरूपसे युक्त होकर सर्वत्र विराज रहे हैं।

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हिमवान्द्वारा कन्यादान, बारातका भोजन और बिदाई, शिवमहिमा तथा कुमारका जन्म

**लोमशजी कहते हैं—**तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञासे हिमवान्ने कन्यादान किया— 'इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर! भार्यार्थं प्रतिगृह्णीष्व' (हे परमेश्वर! मैं अपनी यह कन्या आपको धर्मपत्नी बनानेके लिये अर्पित करता हूँ, कृपया स्वीकार करें) यह वाक्य बोलकर उन्होंने अपनी कन्या दे दी। फिर कमलके समान नेत्रोंवाले वे दोनों दम्पति (वर-वधू) वेदीके बाहर लाये गये तथा उन पार्वती और परमेश्वरको बाहरकी ही वेदीपर बिठाया गया। जब होमका कार्य आरम्भ हुआ तब ब्रह्माजी भगवान् शिवके समीप ही ब्रह्मासनपर विराजमान हो गये। हवन पूरा होनेपर ब्राह्मणलोग शान्तिपाठ करने लगे। उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उच्चस्वरसे बोले जानेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे वहाँकी सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। तत्पश्चात् देवांगनाओंने महादेवजीकी आरती उतारी तथा ऋषिपत्नियोंने उनका पूजन किया। गिरिराज हिमालयके घरकी स्त्रियोंने भी वरकी आरती उतारी। संगीतज्ञोंमें कुशल गन्धर्व आदिने अपने गीतोंसे तथा महर्षियोंने स्तुतियोंद्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न किया। उदार चित्तवाले गिरिराज हिमालयने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और वहाँ पधारे हुए अन्य लोगोंको भी बहुमूल्य रत्न भेंट किये। इसके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु आदि देवेश्वर भगवान् शिवको आगे करके भोजनमें तत्पर हुए। हिमालयने उन सबका सत्कार किया। उन सबने एक साथ मिलकर और एक ही स्थानपर पंक्ति लगाकर लिंगी और शृंगीके साथ भोजन किया। कोई-कोई गण पंक्तिसे अलग होकर भोजन कर रहे थे। उन्होंने अपने लिये पृथक् पात्र बना रखा था। नन्दी तथा वीरभद्र आदि महात्मा भगवान् शिवके पीछे बैठकर भोजन कर रहे थे। इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि-मुनियोंने भी भगवान् महेश्वरके पास ही भोजन किया।

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चण्डीके गणोंने भी वहाँ भोजन किया। वेताल, क्षेत्रपाल, कूष्माण्ड, भैरव, शाकिनी, डाकिनी, यक्षिणी, मातृका आदि चौंसठ योगिनी तथा अन्यान्य योगीजन भी वहाँ भोजनमें सम्मिलित थे। भगवान् शिवके उन महात्मा गणोंकी संख्या ग्यारह करोड़ थी। ऋषि और देवता आदिके विषयमें तो मैंने पहले ही कह दिया है।

इस प्रकार वे सब बराती खा-पीकर संतुष्ट हुए। उन सबके चित्तमें बड़ा हर्ष था। ब्रह्मा आदि सभी देवता विश्राम करनेके लिये अपने-अपने डेरोंपर गये। इस तरह हिमवान्ने बड़े विस्तारके साथ परम मंगलमय और अतिशय शोभायमान वह वैवाहिक उत्सव सम्पन्न किया। अन्तिम दिन हिमवान्ने उत्साहपूर्ण हृदयसे वस्त्र, आभूषण और भाँति-भाँतिके रत्न भेंट करके देवाधिदेव भगवान् शिवका पूजन किया। तत्पश्चात् वे विष्णुभगवान्के पूजनमें संलग्न हुए। सुन्दर-सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंद्वारा उन्होंने लक्ष्मीसहित विष्णुका पूजन किया। इसी प्रकार ब्रह्माजीकी, बृहस्पतिजी और इन्द्राणीसहित इन्द्रकी तथा अन्य लोकपालोंकी भी पृथक्-पृथक् पूजा की। तदनन्तर वस्त्राभूषणों तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे भूत, प्रमथ और गुह्यक-गणोंसहित चण्डीदेवीका भी पूजन किया। इनके अतिरिक्त भी जो लोग वहाँ पधारे थे, उन सबका हिमवान्ने यथावत् सत्कार किया। इस प्रकार उस समय हिमवान्के द्वारा सब देवता, ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, चारण, मनुष्य तथा अप्सरा—इन सबका भलीभाँति सत्कार किया गया।

इसके बाद भगवान् विष्णुने भी उसी तरह सब पर्वतोंका सत्कार किया। सह्याचल, विन्ध्याचल, मैनाक, गन्धमादन, माल्यवान्, मलय, महेन्द्र, मन्दराचल तथा मेरु—इन सबका श्रीहरिने प्रयत्नपूर्वक पूजन किया। श्वेतकूट, श्वेतगिरि, नीलगिरि, उदयगिरि, शृंगाचल, अस्ताचल, मानसाचल, कैलास तथा लोकालोक पर्वतका पूजन ब्रह्माजीने किया। इस प्रकार सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी वहाँ पूजा की गयी। साथ ही सम्पूर्ण पर्वतवासियोंका भी पूजन किया गया। भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके साथ सबके स्वागत-सत्कारका कार्य समुचित रूपसे सम्पन्न किया। दूसरे दिन बारात लौटी। हिमालयने अपने बन्धुओंके साथ गन्धमादन पर्वततक वरका अनुगमन किया। शिव और पार्वती दोनों महातेजस्वी दम्पति हाथीपर आरूढ़ हो शोभा पा रहे थे। ब्रह्माजी विमानपर और भगवान् विष्णु गरुड़पर बैठे थे। इन्द्र ऐरावतपर और कुबेर पुष्पक विमानपर विराज रहे थे। पाशधारी वरुण मगरपर तथा यमराज भैंसेपर सवार थे। नैर्ऋत प्रेतपर और अग्निदेव बकरेपर चढ़े थे। वायुदेव मृगपर तथा ईशान वृषभपर आरूढ़ थे। इस प्रकार ये सब लोकपाल और ग्रह अपनी-अपनी सेनाओंके साथ वरको घेरे हुए चल रहे थे। प्रमथ आदि गण भी वरयात्रामें सम्मिलित थे। जिनके कन्यादानरूपी महान् दानसे भगवान् शंकर सन्तुष्ट हुए, वे गिरिराज हिमवान् तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये।

जिनकी जिह्वाके अग्रभागपर सदा भगवान् शंकरका दो अक्षरोंवाला नाम (शिव) विराजमान रहता है वे धन्य हैं, वे महात्मा पुरुष हैं तथा वे ही कृतकृत्य हैं। आज भी जिन्होंने ‘शिव’ इस अविनाशी नामका उच्चारण किया है, वे निश्चय ही मनुष्यरूपमें रुद्र हैं; इसमें संशय नहीं है। महादेवजी थोड़ा-सा बिल्वपत्र पाकर भी सदा सन्तुष्ट रहते हैं। फूल और जल अर्पण करनेसे भी प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान् शिव सदा सबके लिये कल्याणस्वरूप हैं। ये पत्र, पुष्प और जलसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसलिये सबको इनकी पूजा करनी चाहिये। शिवजी इस जगत्में मनुष्योंको महान् सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं। ये एक हैं, महान् हैं, ज्योतिःस्वरूप हैं तथा अजन्मा परमेश्वर हैं। महात्मा शिव कार्य और कारण सबसे

६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


परे हैं। ये व्यवधानशून्य, निर्गुण, निर्विकार, निर्बाध, निर्विकल्प, निरीह, निरंजन, नित्ययुक्त, निष्काम, निराधार तथा सदैव नित्यमुक्त हैं।*

ऐसी महिमावाले देवाधिदेव विश्वबन्धु भगवान् शिवका सब देवताओंने पूजन किया। शिवजी सर्वज्ञ हैं, वे स्तुति, ध्यान, पूजन और चिन्तन करनेपर सबको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। महादेवजीकी आराधनासे ही हिमवान् उस समय सबसे श्रेष्ठ, सबसे महान्, सम्पूर्ण सद्गुणोंसे प्रसिद्ध, सर्वगुण-सम्पन्न, महात्मा विश्वेश्वरोंके लिये भी वन्दनीय तथा समस्त पर्वतोंमें श्रेष्ठ हो गये। धर्मात्मा हिमालय जब मेनाके साथ अपने स्थानको लौटे तब उन्होंने सब पर्वतोंको विदा किया।

उधर भगवान् शिवने गन्धमादन पर्वतके एकान्त प्रदेशमें अत्यन्त सुन्दर रूप धारणकर पार्वती देवीके साथ रमण करनेका विचार किया। फिर वे महाप्रभु पार्वतीके साथ महती रतिक्रीड़ामें तत्पर हुए। उन दोनोंका वह महान् सुरतारम्भ उस समय सब लोगोंके लिये अनिष्टकारक, अत्यन्त अद्भुत तथा प्रलयकारी हुआ। वह महती सम्भोग-लीला आरम्भ होनेपर भगवान् शंकरके दुःसह वीर्यसे समस्त चराचर जगत् नष्ट होने लगा। यह देख ब्रह्माजी तथा अध्यात्मज्ञानको प्रकाशित करनेवाले भगवान् विष्णुने अग्निदेवका स्मरण किया। मनसे स्मरण करते ही अग्निदेव बड़ी उतावलीके साथ तत्काल वहाँ आ पहुँचे। फिर उन दोनोंकी आज्ञा पाकर अग्निने केसरके समान कान्तिवाले हंस (संन्यासी)-का रूप धारण करके शिवजीके भवनमें प्रवेश किया। वहाँ आँगनमें पहुँचकर वे बैठ गये और बोले— 'माँ! हाथ ही मेरा पात्र है; इसमें मुझे भिक्षा दो।' तब माता पार्वतीने 'जातवेदा' अग्निको भिक्षा (के रूपमें वीर्य) दे दिया। अग्निने हाथपर भिक्षा लेकर उनकी आँखोंके सामने ही उसे खा लिया। यह देख पार्वतीजी कुपित हो उठीं और अग्निको शाप देती हुई बोलीं— 'अरे ओ भिक्षुक! मेरे शापसे तू शीघ्र ही सर्वभक्षी हो जायगा तथा शंकरजीके इस वीर्यसे तुझे सब ओर बड़ी भारी पीड़ा प्राप्त होगी।'

तदनन्तर अग्निदेवने लोककल्याणकारी भगवान् शंकरसे कहा— 'प्रभो! महादेव! अब मुझे क्या करना चाहिये; सुरश्रेष्ठ! अब मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जिससे मैं सर्वदा सुखी रहूँ और देवताओंका हविष्य वहन करता रहूँ।' तब भगवान् शिवने सब देवताओंके सुनते-सुनते कहा— 'अग्ने! तुम अपने शरीरमें पड़े हुए मेरे वीर्यको स्त्रीके गर्भमें स्थापित कर दो।' यह सुनकर अग्निने कहा— 'भगवान्! आपका तेज दुःसह है, इसे प्राकृत जन कैसे धारण कर सकते हैं।' उस समय नारदजीने अग्निदेवसे कहा— 'तुम मेरी बात मानो; माघ मासमें प्रातःस्नान करके शीतके कारण जो अत्यन्त कष्ट पा रहे हों, वे जब अग्निसेवनके


* ते धन्यास्ते महात्मानः कृतकृत्यास्त एव हि। द्व्यक्षरं नाम येषां वै जिह्वाग्रे संस्थितं सदा ॥
शिव इत्यक्षरं नाम यैरुदीरितमद्य वै। ते वै मनुष्यरूपेण रुद्राः स्युर्नात्र संशयः ॥
किञ्चिदल्लेन सन्तुष्टः पुष्पेणापि तथैव च। तोयेनापि च सन्तुष्टो महादेवो निरन्तरम् ॥
पत्रेण पुष्पेण तथा जलेन प्रीतो भवत्येष सदाशिवो हि।
तस्माच्च सर्वैः परिपूजनीयः शिवो महाभाग्यकरो नृणामिह ॥
एको महान् ज्योतिरजः परेशः परावराणां परमो महात्मा।
निरन्तरो निर्गुणो निर्विकारो निराबाधो निर्विकल्पो निरीहः ॥
निरञ्जनो नित्ययुक्तो निराशो निराधारो नित्यमुक्तः सदैव हि ॥
(स्क० पु०, मा० के० २७। २२-२८)

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६९

लिये आयें तब उनके शरीरमें तुम भगवान् शिवका यह तेज स्थापित कर देना।'

नारदजीकी यह बात मानकर परम कान्तिमान् एवं महान् प्रभावशाली अग्निदेव ब्राह्ममुहूर्तमें बैठकर अपने प्रचण्ड तेजसे प्रज्वलित हो उठे। अग्निको प्रज्वलित देख शीतसे कष्ट पानेवाली कृत्तिकाओंने अग्निसेवनकी इच्छासे वहाँ आनेका विचार किया। उस समय अरुन्धती देवीने उन सबको रोका, तो भी उनकी बात न मानकर वे सब कृत्तिकाएँ आग तापने लगीं। जबतक वे आग तापती रहीं तबतक ही शंकरजीके वीर्यके सभी परमाणु उनके रोमकूपोंमें होकर शरीरमें घुस गये। अब अग्निदेव उस वीर्यसे मुक्त हो गये। फिर तो स्वयं ही उनका वह प्रज्वलित तेज शान्त हो गया। तत्पश्चात् वे कृत्तिकाएँ गर्भवती होकर वहाँसे अपने घरको लौटीं। वहाँ उनके पति महर्षियोंने जब उन्हें शाप दिया तो वे नक्षत्रोंके रूपमें आकाशमें विचरने लगीं। उसी समय उन सबने भगवान् शिवके उस वीर्यको हिमालयके शिखरपर छोड़ दिया। छोड़नेपर वह सहसा तपाये हुए सुवर्णके समान चमक उठा। फिर वह गंगाजीमें डाल दिया गया। गंगाजीमें बहता हुआ वह तेजोमय वीर्य सरकंडोंके समूहसे घिर गया। वहाँ वह तेज छः मुखोंवाले बालकके रूपमें परिणत हो गया। इसका पता लगनेपर सम्पूर्ण देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर नारदजीने आकर शिव और पार्वतीसे उस बालकके जन्मका समाचार कहा—'शिवजीके अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ है'। यह समाचार सुनकर गन्धमादन पर्वतपर निवास करनेवाले समस्त प्रमथगणोंका हृदय आनन्दोल्लाससे भर गया। वहाँ अनेकों पताकाएँ फहराने लगीं। बिल्वपत्रकी बन्दनवारें शोभा पाने लगीं तथा भाँति-भाँतिके वितानोंसे उस पर्वतकी शोभा बढ़ गयी। महात्मा शंकरके पुत्रके जन्मसे वह श्रेष्ठ पर्वत अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था। उस समय सब देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, यक्ष, गन्धर्व, सर्प तथा अप्सराएँ सब-के-सब गंगाके तटपर विराजमान उस गंगापुत्रको देखनेके लिये वहाँ गये। पार्वतीके साथ भगवान् शंकर भी वृषभपर आरूढ़ हो इन्द्रादि देवताओंको साथ ले उस स्थानको चल दिये। देवता, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, विद्याधर और नाग सभी आनन्दमें मग्न थे। वे शिवजीके साथ ही उनके वरदायक पुत्रका दर्शन करनेके लिये गये। शंकरजीके समान प्रतापी उस गंगापुत्रकी ओर देवताओंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें महान् तेज दिखायी दिया, जो तीनों लोकोंमें व्याप्त था। उस तेजसे घिरा हुआ वह बालक तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। उसका मुख बड़ा ही सुन्दर था। अंग-अंग मनोहारिणी शोभासे सम्पन्न था। नासिकाकी बनावट बड़ी सुन्दर थी। वह मन्द-मन्द मुसकराते हुए सबकी ओर देखता था। उसके दाँत बड़े ही स्वच्छ और चमकीले थे। सम्पूर्ण अंगोंमें सुन्दरता खेल रही थी। उसके सिरके बाल सब ओर बिखरे हुए थे। अत्यन्त अद्भुत रूपवाले तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस गंगाकुमारको देखकर सम्पूर्ण देवताओंने उसका वन्दन किया। भगवान् शंकरके समस्त पार्षद, प्रमथगण और वीरभद्र आदि उस बालकको दायें-बायें दोनों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंसहित इन्द्र भी उस समय बालकके समीप आये थे। ऋषि, यक्ष और गन्धर्व भी बालकको सब ओरसे घेरकर पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ गये। कुछ लोग गर्दन झुकाये खड़े रहे। कुछ लोगोंने मस्तक नवाकर प्रणाम किया तथा दूसरोंने उन्हें अपना अविनाशी स्वामी मानकर नमस्कार किया। इस प्रकार वहाँ एक महान् उत्सव छा गया। उसमें विचित्र-विचित्र बाजे बजने लगे। उस अभ्युदय-कालमें ऋषिलोग शान्तिपाठ करने लगे। इतनेहीमें गिरिजापति भगवान् शंकर भी वहाँ आ पहुँचे

७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और पार्वतीके साथ शीघ्र ही वृषभकी पीठसे उतरकर अपने पुत्रको देखा। देखते ही पार्वती वात्सल्यप्रेममें मग्न हो गयीं। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा। वे बड़े वेगसे आगे बढ़ीं और कुमारको छातीसे लगाकर अपने बहते हुए स्तनका दूध पिलाने लगीं। उस समय सम्पूर्ण देवों और देवांगनाओंने आनन्दमग्न होकर पार्वतीजीकी आरती उतारी। जय-जयकारके महान् शब्दसे आकाशमण्डल गूँज उठा। ऋषि-मुनि वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके, गायकोंने गीत गाकर तथा बजानेवालोंने बाजे बजाकर कुमारका अभिनन्दन किया। पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ भगवान् शंकर भी उस महातेजस्वी कुमारको अपनी गोदमें बिठाकर अत्यन्त सुशोभित हुए।


## देवताओंका तारकासुर और उनकी सेनाके साथ संग्राम तथा कुमार कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध

लोमशजी कहते हैं—कुमारको अंकमें लेकर जगदीश्वर रुद्रने इन्द्रादि देवताओंसे कहा—'देवगण! यह बालक बड़ा प्रतापी है। इस समय मेरे इस पुत्रसे तुम्हें कौन-सा काम लेना है, बतलाओ।' तब सम्पूर्ण देवताओंने भगवान् पशुपतिसे इस प्रकार कहा—'प्रभो! इस समय सम्पूर्ण जगत्को तारकासुरसे महान् भय प्राप्त हुआ है, इसलिये हम आज ही उसे मारनेके लिये उद्यत हो यहाँसे प्रस्थान करेंगे।' यों कहकर तथा इस कार्यमें भगवान् शंकरकी अनुमति जानकर वे सम्पूर्ण देवगण सहसा वहाँसे चल पड़े और शंकरजीके पुत्र 'कार्तिकेय'को आगे करके महान् असुर तारकपर चढ़ आये। इस युद्धमें ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता सम्मिलित थे। देवतालोग युद्धके लिये प्रयत्नशील हैं, यह सुनकर महाबली तारकासुर भी बड़ी भारी सेनाके साथ देवताओंसे लोहा लेनेके लिये चल दिया। देवताओंने वहाँ आती हुई तारकासुरकी बड़ी भारी सेनाको देखा।

उसी समय आकाशवाणी हुई—'देवगण! तुम शंकरजीके पुत्रको आगे करके युद्धके लिये उद्यत हो जाओ। संग्राममें दैत्योंको जीतकर निश्चय ही विजयी होओगे।' यह आकाशवाणी सुनकर सब देवता युद्धके लिये उत्सुक हो गये। उसी समय कुमार कार्तिकेयका वरण करनेके लिये मृत्युकन्या 'देवसेना' वहाँ आयी। कुमारने ब्रह्माजीके कहनेसे उसे अंगीकार किया। तबसे शंकरजीके पुत्र कार्तिकेयजी देवसेनापति हो गये। उस समय शंख, नगारे, डंका, ढोल, गोमुख तथा दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे।

देवराज इन्द्र कुमार कार्तिकेयको हाथीपर बिठाकर आगे-आगे चलने लगे। उनके साथ देवताओंकी बड़ी भारी सेना थी और लोकपालोंने भी उन्हें सब ओरसे घेर रखा था। उस समय दुन्दुभि, भेरी और तुर्य आदि अनेक बाजे बज उठे। कुमार इन्द्रको हाथी देकर स्वयं विमानपर जा बैठे। तब इन्द्रने कुमारके मस्तकपर वरुण-
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देवताका छत्र धारण कराया जो बहुमूल्य मणियोंकी प्रभासे प्रकाशित हो रहा था। उसमें भाँति-भाँतिके रत्न लगे हुए थे, जिससे उसकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। वह छत्र चन्द्रमाकी किरणोंके पड़नेसे अत्यन्त शोभायमान जान पड़ता था। उस समय युद्धकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र आदि सम्पूर्ण महाबली देवता अपनी-अपनी सेनाके साथ युद्धमें सम्मिलित हो गये। अपने गणोंके साथ धर्मराज भी वहाँ उपस्थित थे। मरुद्गणोंके साथ वायु, जल-जन्तुओंके साथ वरुण, गुह्यकोंसे घिरे हुए कुबेर, प्रमथगणोंके साथ ईशान और व्याधियोंके साथ नैर्ऋत युद्धके लिये आये थे। इस प्रकार आठों लोकपाल युद्धकी इच्छासे मिलकर तारकासुरको मारनेका विचार करते थे। विश्ववन्द्य शिवपुत्र सेनापति कार्तिकेय आत्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे। उन्हें आगे करके सब देवता पृथ्वीपर उतरे और गंगा-यमुनाके बीच अन्तर्वेदीमें आकर खड़े हुए। तारकासुरके अनुचर भी पातालसे वहीं आ गये और देवताओंका वध करनेके लिये अपनी सेनाके साथ युद्धस्थलमें विचरने लगे। तारकासुर भी विमानपर बैठकर वहाँ आया। उस विमानसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वह असुर बड़ा तेजस्वी था। उसके मस्तकपर छत्र तना हुआ था और सब ओरसे चँवर डुलाये जा रहे थे। इससे दैत्यराज तारक बड़ी शोभा पा रहा था। इस प्रकार देवता और दैत्य अन्तर्वेदीमें आकर बड़ी भारी सेनाके साथ खड़े थे। उन्होंने अपने सैनिकोंके पृथक्-पृथक् व्यूह बना रखे थे। हाथी, ऊँट, भेंड़े, भाँति-भाँतिके घोड़े तथा बहुमूल्य मणियोंसे युक्त विचित्र-विचित्र रथ भी व्यूहके आकारमें खड़े थे। बहुत-से पैदल योद्धा शक्ति, शूल, फरसा, तलवार, तोमर, तीर, पाश, मुद्गर और पट्टिश आदि शस्त्रोंसे सुसज्जित थे। देवता और दैत्योंकी वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरेकी अपेक्षासे सजकर बड़ी शोभा पा रही थीं। उस समय देवताओंने दैत्योंको मार डालनेका विचार किया।

तदनन्तर दोनों सेनाएँ मेघके समान गम्भीर स्वरमें गर्जना करने लगीं। महाबली देवता और असुर एक-दूसरेसे भिड़ गये। उनमें घमासान युद्ध होने लगा। बाणोंकी बौछारोंसे वहाँका सारा मैदान रुण्ड-मुण्डोंसे भर गया। कितने ही धड़ बिना मस्तकके नाच रहे थे। रक्तकी नदियाँ बह चलीं। वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था। थोड़ी ही देरमें देवताओं और दानवोंका संहार करनेवाला वह युद्ध द्वन्द्व-युद्धके रूपमें परिणत हो गया। वायुदेवके साथ दनुकुमार युद्ध करने लगा। जम्भके साथ स्वयं यमराज भिड़ गये। बलके साथ वरुण और पद्मके साथ कुबेर युद्ध करने लगे। अग्निसे संह्लादका सामना हुआ। महाहनु नैर्ऋतिके साथ लोहा लेने लगा। मेघाभ ईशानके साथ और तारकासुर इन्द्रके साथ भिड़ गया। यक्ष, पिशाच, नाग, पक्षी, पितर, व्याधि, ज्वर, सन्निपात तथा भूत, प्रमथ और गुह्यक-गण भी अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्धमें संलग्न हो गये। वे सब-के-सब दृढ़ निश्चय करके द्वन्द्वयुद्धमें तत्पर थे। कभी एक-दूसरेपर विजय पा जाते और कभी परस्पर विजय पाना उनके लिये अत्यन्त कठिन हो जाता था। विजयकी इच्छा रखनेवाले देवता और दानवोंमें जब इस प्रकार घमासान युद्ध चल रहा था उस समय देवतालोग दावानलसे दग्ध हुए बड़े-बड़े वृक्षोंकी भाँति उस युद्धस्थलमें गिरने लगे। गिरकर नष्ट हुए देवताओंकी लाशोंसे उस समय सारी पृथ्वी अत्यन्त भयानक प्रतीत होती थी। तारकासुरने अपनी बड़ी भारी शक्ति चलाकर देवराज इन्द्रको घायल कर दिया। वे तुरंत ही ऐरावत हाथीसे पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्छित हो गये। इसी प्रकार अन्य लोकपाल भी महाबली असुरोंसे पराजित हुए। उस रणभूमिमें युद्धविद्याविशारद कितने ही देवताओंको हार खानी पड़ी।

७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कितनोंको प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा और कितने ही युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए। इस प्रकार देवसेनाको तहस-नहस होती देख महातेजस्वी राजा मुचुकुन्द तारकासुरसे युद्ध करने लगे। इन्द्र बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें छोड़कर तारकासुर मुचुकुन्दके साथ भिड़ गया। इस प्रकार मुचुकुन्द और तारकासुरमें बड़ा भारी युद्ध हुआ। मुचुकुन्द बड़े बलवान् थे। उन्होंने तलवारसे तारकासुरपर ज्यों ही प्रहार किया त्यों ही तारकासुरकी शक्तिसे आहत होकर वे रणभूमिमें गिर पड़े। गिरनेपर भी वे तत्काल उठकर खड़े हो गये और तारकासुरको मारनेके लिये ब्रह्मास्त्र उठाया। तब नारदजीने कहा—'राजन्! तारकासुर मनुष्यके हाथसे नहीं मारा जायगा। अतः उसके ऊपर इस महान् अस्त्रका प्रयोग न करो। भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेय ही तारकासुरको मारनेमें समर्थ हैं। अतः तुम सब लोगोंको शान्त रहना चाहिये।'

नारदजीकी बात सुनकर सब देवता मुचुकुन्दके साथ ही शान्त हो गये। तब वीरभद्रने त्रिशूलसे मारकर तारकासुरको भारी आघात पहुँचाया। तारकासुर सहसा पृथ्वीपर गिरा और क्षणभर मूर्छामें डूबा रहा। फिर चेत होनेपर एक ही मुहूर्तमें वह उठकर खड़ा हो गया और शक्तिसे उसने वीरभद्रपर प्रहार किया। भगवान् शिवके सेवक महाबली वीरभद्रने भी भयानक त्रिशूलसे तारकासुरको पुनः चोट पहुँचायी। इस तरह ये दोनों एक-दूसरेको मारने लगे। भगवान् शिवके गणोंमें जो अत्यन्त युद्धकुशल और वीरभद्रके समान ही पराक्रमी थे, वे बैलपर सवार हो मस्तकपर जटा-जूट धारण किये हाथोंमें त्रिशूल लिये तथा सर्पोंका आभूषण पहने वहाँ आये और वीरभद्रको आगे करके दैत्योंके साथ लोहा लेने लगे। उन्होंने दैत्योंके साथ बड़ा भयानक संग्राम किया। उस युद्धमें प्रमथगण विजयी हुए। उनसे परास्त होकर असुरलोग युद्धसे विमुख हो गये। अत्यन्त पीड़ित होकर उन्हें पराभव स्वीकार करना पड़ा।

अपनी सेनाको तितर-बितर होती देख तारकासुरने दस हजार भुजाएँ प्रकट कीं और सिंहपर सवार हो रणभूमिमें देवताओंका संहार आरम्भ किया। उसने शिवके बहुत-से गणोंको भी मार गिराया। जान पड़ता था वह तीनों लोकोंका संहार कर डालेगा। उसके सैनिकोंने समस्त शिवगणोंको क्षत-विक्षत कर दिया तथा दैत्यसेनाके सिंहोंने शिवगणोंकी सवारीके काम आनेवाले सब बैलोंको मार डाला। इस प्रकार उस रणक्षेत्रमें जब भगवान् शिवके पार्षद मारे जाने लगे तब भगवान् विष्णुने शंकरजीके प्रिय पुत्र कुमार कार्तिकेयसे हँसकर कहा—'कृत्तिकानन्दन! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है जो इस पापी तारकासुरका वध कर सके; अतः तुम्हें ही इसका संहार करना चाहिये।' कार्तिकेय बोले—'भगवन्! यहाँ कौन अपने हैं और कौन पराये, इसका मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है।' यह सुनकर देवर्षि नारदने कहा—'महाबाहो! तुम भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न कुमार हो, इस जगत्के रक्षक और स्वामी हो। देवताओंको सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले भी इस समय तुम्हीं हो। वीरवर! तारकासुरने पहले बड़ी उग्र तपस्या की थी। उसीके प्रभावसे उसने देवताओंपर विजय पायी है, स्वर्गलोकको जीत लिया तथा अजेयता प्राप्त कर ली है। उस दुरात्माने इन्द्र और लोकपालोंको भी परास्त किया है तथा तीनों लोक अपने अधिकारमें कर लिये हैं। वह धर्मात्माओंको सतानेवाला है, अतः तुम्हें उसका वध अवश्य करना चाहिये। आज तुम्हीं रक्षक होकर सबका कल्याण करो।'

नारदजीकी बात सुनकर कुमार कार्तिकेय बड़े जोरसे हँसे और विमानसे उतरकर पैदल चलने लगे। अपने हाथमें बड़ी भारी उल्काके समान देदीप्यमान और अत्यन्त प्रभावशालिनी शक्ति लेकर जब वे रणभूमिमें पैदल ही दौड़ने

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लगे, उस समय बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा अत्यन्त प्रचण्ड उस बालकको आते देख तारकासुर कहने लगा—'अहो! यह कुमार अपने शत्रुभूत बड़े-बड़े दैत्योंका संहार करनेवाला है। अतः इसके साथ मैं ही युद्ध करूँगा। अन्य सब वीरों, सम्पूर्ण गणों, गणाधीशों और लोकपालोंको भी मैं अभी मौतके घाट उतारता हूँ।'

यों कहकर महाबली तारकासुर कुमारसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा। उसने एक अद्भुत शक्ति हाथमें ले ली। वह इन्द्रका अपमान कर चुका था। उसे फिर वेगपूर्वक आते देख बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ इन्द्रने (सावधान होकर) वज्रसे आघात किया। वज्रकी मार खाकर तारकासुर व्याकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। गिरते ही वह पुनः उठकर खड़ा हो गया और बड़े रोषमें भरकर उसने इन्द्रपर शक्तिसे प्रहार किया। इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे थे किंतु तारकासुरने उन्हें पृथ्वीपर गिरा दिया। उनके गिरनेपर देवताओंकी सेनामें बड़ा हाहाकार मचा। इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा देख प्रतापी वीरभद्र अत्यन्त कुपित हो उठे। वे बड़े बलवान् वीर थे। उन्होंने हाथमें त्रिशूल लेकर इन्द्रकी रक्षा करते हुए महादैत्य तारकपर प्रहार किया। शूलके आघातसे आहत होकर तारकासुर पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु वह बड़ा तेजस्वी था। गिरनेपर भी पुनः उठकर खड़ा हो गया। उसने बहुत बड़ी शक्ति लेकर वीरभद्रके वक्षस्थलपर प्रहार किया। उसकी शक्तिके आघातसे वीरभद्र भी धराशायी हो गये। उस समय समस्त शिवगण, सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस बारंबार हाहाकार करने लगे। इतनेहीमें शत्रुओंका नाश करनेवाले महाबली वीरभद्र उठकर खड़े हो गये। उन्होंने एक चमकते हुए त्रिशूलसे जब तारकासुरको मार डालनेका विचार किया, उसी समय कुमार कार्तिकेयने उन्हें मना करते हुए कहा—'महामते! तुम इसका वध न करो।' उन्होंने उस रणभूमिमें जब सिंहनाद किया तब आकाशमें खड़े हुए देवता जय-जयकार करने लगे।

वीरवर कार्तिकेय एक बहुत बड़ी शक्ति लेकर उसके द्वारा तारकासुरको मार डालनेके लिये उद्यत हुए। तारकासुर और कुमार कार्तिकेयमें बड़ा विकट, सब प्राणियोंके लिये भयंकर तथा अत्यन्त दुस्सह संग्राम हुआ। दोनों वीर हाथोंमें शक्ति लिये एक-दूसरेसे जूझ रहे थे। वे शक्तिसे विपक्षीकी शक्तिपर चोट करते थे। दोनोंको उत्साहपूर्वक युद्ध करते देख देवता, गन्धर्व आदि आपसमें कहने लगे—'पता नहीं इस युद्धमें किसकी विजय होगी।' इसी समय आकाशवाणी हुई—'देवताओ! आज कुमार कार्तिकेय तारकासुरको अवश्य मार डालेंगे। तुम सब लोग चिन्ता न करो। सुखपूर्वक स्वर्गलोकमें स्थित रहो।'

आकाशमें प्रकट हुई इस दैवी वाणीको प्रमथगणोंसे घिरे हुए कुमार कार्तिकेयने भी सुना। सुनकर उस भयानक दैत्यको मार डालनेका निश्चय किया। अतिशय बलवान् महाबाहु कुमारने तारकासुरकी छातीमें शक्तिसे प्रहार किया। परंतु दैत्यराज तारकने उस प्रहारकी कोई परवा न करके स्वयं ही क्रोधमें भरकर अपनी शक्तिसे कुमारपर आघात किया। उस प्रहारसे शंकरनन्दन कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये। जब पुनः वे सचेत हुए तो महर्षिगण उनकी स्तुति करने लगे। तब मतवाला सिंह जैसे हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार प्रतापी कुमारने तारकासुरपर गहरा प्रहार किया। उस समय वायुकी गति कुण्ठित हो गयी थी, सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया था, पर्वतों और वनोंसहित समूची पृथ्वी डगमगाने लगी। हिमालय, मेरु, श्वेतकूट, दर्दुर, मलयगिरि, महाशैल, मैनाक, विन्ध्याचल, महागिरि लोकालोक, मानसोत्तर पर्वत, कैलास, मन्दराचल, माल्यवान्, गन्धमादन, उदयाचल, महेन्द्रगिरि तथा अस्ताचल—ये तथा और भी बहुत-से महातेजस्वी पर्वत कुमारकी सर्वथा कुशल चाहते हुए स्नेहसे व्याकुल हो उठे। पार्वतीनन्दन कुमारने सब पर्वतोंको भयभीत देख उन्हें धीरज बँधाते हुए कहा—

७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


‘महाभाग पर्वतगण! आपलोग खेद और चिन्ता न करें। आज मैं यहाँ सबके सामने ही इस महापापी दैत्यका वध करता हूँ।’

इस प्रकार पर्वतोंको और देवताओंको भी आश्वासन देकर शंकरजीके प्रिय पुत्र कुमार कार्तिकेयने मन-ही-मन अपने पिता और माताको प्रणाम किया। फिर हाथमें शक्ति ले उन्होंने दैत्यराज तारकपर बड़े वेगसे प्रहार किया। शक्तिका आघात होते ही असुरोंका स्वामी तारक सहसा धराशायी हो गया। वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति उसका अंग-अंग चूर हो गया। कुमार कार्तिकेयके द्वारा तारकासुर बलपूर्वक मार दिया गया—यह देवताओं, ऋषियों, गुह्यकों, पक्षियों, किन्नरों, चारणों, सिद्धों तथा अप्सराओंने अपनी आँखोंसे देखा। देखकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ और वे सब मिलकर कुमार कार्तिकेयकी स्तुति करने लगे। यह घटना देख-सुनकर तीनों लोकोंके निवासी सहसा आश्चर्यचकित हो उठे। सब-के-सब आनन्दमग्न हो गये। भगवान् शंकर और सती पार्वती भी बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आये और अपने पुत्रको गोदमें बिठाकर पूर्ण सन्तोष प्राप्त किया। उस समय देवताओंने भगवान् शिव और पार्वतीकी आरती उतारी। तत्पश्चात् अपने पुत्रों तथा मेरु आदि पर्वतोंसे घिरे हुए गिरिराज हिमालय भी वहाँ आये और कुमारका स्तवन करने लगे। इसके बाद इन्द्र आदि सब देवताओंने ऋषियोंके साथ गीत और वाद्यकी ध्वनि करते हुए वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक भाँति-भाँतिके सूक्तोंद्वारा कुमारका स्तवन किया। यह कुमार-विजय नामक चरित्र अत्यन्त अद्भुत है। इसमें कुमारके पराक्रम और माहात्म्यका वर्णन है। उनका यह उदार चरित्र अत्यन्त प्राचीन, परमानन्ददायक तथा मनुष्योंको मनोवांछित वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो महात्मा कुमारके इस तारक-वध नामक चरित्रका पाठ या श्रवण करता है, उसके सब पातकोंका नाश हो जाता है।

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यमराजके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवके द्वारा यमराजको आत्मज्ञानका उपदेश

लोमशजी कहते हैं— ब्राह्मणो! एक समय पितरोंके स्वामी यमराज यह सुनकर कि सनातन देव भगवान् शंकर इस जगत्के रक्षक हैं उनके पास गये, और एकाग्रचित्तसे उन्होंने उनका स्तवन किया।

यमराज बोले— पापोंको जलानेवाले भगवान् भर्गको नमस्कार है। देवताओंके पालक प्रकाशस्वरूप महादेवको नमस्कार है। मृत्युपर विजय पानेवाले जटाजूटधारी रुद्रदेवको नमस्कार है। जिनके कण्ठमें नील चिह्न सुशोभित होता है, जो पाप-तापोंका नाश करनेवाले हैं, सर्वव्यापी आकाश जिनका एक अवयवमात्र है, जो सबको अपना ग्रास बनानेवाले काल हैं, कालके भी स्वामी हैं तथा काल ही जिनका स्वरूप है, उन भगवान् शिवको नमस्कार है।

देवदेवेश्वर! आप सबका कल्याण करनेवाले

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *

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हैं। कोई बड़ी भारी तपस्या करे तभी आप उसपर प्रसन्न होते हैं। लोकपितामह ब्रह्माजी भी पुण्यात्मा मनुष्योंपर उनके उत्तम कर्मोंसे ही सन्तुष्ट होते हैं। इसी प्रकार वेदोंद्वारा जानने योग्य सनातन देव भगवान् विष्णु भी अनेक प्रकारके यज्ञों तथा उपवास-व्रतोंसे प्रसन्न होकर मनुष्योंको केवल भक्तिभाव प्रदान करते हैं, जिससे वे मोक्षको प्राप्त हो सकें। दुर्गाजी भी आराधनासे संतुष्ट होनेपर लौकिक भोग और स्वर्गादि सम्पत्तियाँ देती हैं। भगवान् सूर्य अपने उपासकको आयु और आरोग्य प्रदान करते हैं। इसी प्रकार गणेशजी भी अर्घ्य, पाद्य और चन्दन आदिके द्वारा पूजन करने तथा उनके मन्त्रोंका जप करनेपर विघ्नोंका निवारण करते हैं। परंतु आपके पुत्र कार्तिकेयजीने तो इस जगत्‌के सभी प्राणियोंके लिये स्वर्गका द्वार खोल दिया है। इनके दर्शनमात्रसे सब लोग, वे पापी ही क्यों न हों, एकमात्र स्वर्गके अधिकारी हो जाते हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है, लोभ जिन्हें छू भी नहीं सका है, जो काम और रागसे रहित हैं, यज्ञ करनेवाले और धर्मनिष्ठ हैं तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं, वे सब पुण्यात्मा पुरुष जिस उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं, उसीको अधम-से-अधम, पापपरायण चाण्डाल आदि भी कुमार कार्तिकेयके दर्शनमात्रसे पा लेते हैं। उनका यह कर्म महान् आश्चर्यजनक है। कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमामें स्नान करनेसे जो फल होता है, वही फल आपके पुत्रका दर्शनमात्र करनेसे लोग अपनी कई पीढ़ियोंसहित प्राप्त कर लेते हैं।

यमराजका यह वचन सुनकर भगवान् शंकरने कहा—धर्मराज ! जिन पुण्यात्मा मनुष्योंका आन्तरिक पाप नष्ट हो गया है, उनके मनमें श्रद्धाका उदय होता है।* फिर पूर्वपुण्यके प्रभावसे उनके हृदयमें उत्तम तीर्थोंमें जाने और संत-महात्माओंका दर्शन करनेकी प्रबल इच्छा जाग्रत् होती है। धर्मराज ! कुमारके दर्शनसे जो पुण्यफल प्रकट होता है उसके लिये तुम्हें रंचमात्र भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये। कर्मसंयुक्त वचन—कर्तव्यका आदेश देनेवाला वेदवाक्य सबके लिये फलद होता है। सब तीर्थोंका सेवन, यज्ञोंका अनुष्ठान और नाना प्रकारके दान आदि कार्य अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये करने योग्य हैं। फिर शुद्ध अन्तःकरणके द्वारा मनुष्य स्वयं ही अपने आत्माका चिन्तन करे। मैं ही आत्मारूपसे सब प्राणियोंके भीतर स्थित हूँ। मैं नित्य, सत्तायुक्त, अपने-आपमें स्थित रहनेवाला और व्यवधानशून्य हूँ। शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे परे हूँ। मुझमें किसी प्रकारका विकल्प नहीं है। मैं आत्मनिष्ठ, नित्य, नित्ययुक्त और निरीह हूँ। कूटस्थ (निश्चल), कल्पित भेदों और विवादोंसे दूर रहनेवाला, ज्ञानगम्य, अनन्त, स्वतन्त्र तथा स्वयंप्रकाश प्रभु हूँ। वेदवेत्ता विद्वान् इसे ही ज्ञान कहते हैं। वे सर्वत्र आत्मदृष्टि रखते हैं। सर्वातीत भावगम्य तत्त्वको जानकर ज्ञानी पुरुष समतायुक्त बुद्धिसे व्यवहार करते हैं और केवल बोधस्वरूप अपने आत्माको भूल जानेके कारण सब जीवसमूह संसार बन्धनमें बँधे हुए देखे जाते हैं। तत्त्वज्ञानसे रहित बहिर्मुख जीव काम, क्रोध, भय, द्वेष, मोह और मात्सर्यसे युक्त हो एक-दूसरेको दूषित करते रहते हैं। इसलिये गुणभेदसे निर्मित इस प्रपंचको इस प्रकार असत्य जानकर अपने-आपमें स्थित गुणातीत परमात्माका साक्षात्कार ही यथार्थ दर्शन है। जहाँ भेद भी अभेदको, राग भी वैराग्यको और क्रोध भी क्रोधाभावको प्राप्त होता है, वही मेरा परमधाम


* येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । निरस्तमस्ति भो धर्म श्रद्धा मनसि वर्तते ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१। २९)

७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। शब्द वाक्-इन्द्रियका कार्य होनेके कारण अनित्य है—जैसे घट। अतः वह उस परमार्थ वस्तुको प्रकाशित नहीं कर सकता। शब्द वह है, जिससे प्रवृत्तिप्रधान धर्मके लिये प्रेरणा मिलती है। प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा सम्पूर्ण द्वन्द्व जिसमें विलीन हो जाते हैं, वही शाश्वत पद माना गया है। वह व्यवधानशून्य, निर्गुण, बोधस्वरूप, निरंजन (निर्लेप), निर्विकल्प, निरीह, सत्तामात्र, ज्ञानगम्य, स्वतःसिद्ध, स्वयंप्रकाश, वेदवेद्य तथा अगम्य है। प्रेतराज! जिसकी जड़ अनादि कालसे चली आ रही है, मायाके कारण जिसको विचारमें लाना भी कठिन है, उस मायामय संसारसे ऊपर उठकर तथा मायाका सर्वथा परित्याग करके जो ममता और आसक्तिसे रहित हो गये हैं, वे विकल्पशून्य नित्य पदको प्राप्त होते हैं। संसार कल्पनामूलक है। यह कल्पना ही नित्यकी भाँति प्रतीत होती है। जिन्होंने इस कल्पनाको त्याग दिया है वे परमपदको प्राप्त होते हैं। जैसे सीपीमें चाँदीकी प्रतीति, सर्पमें रस्सीकी प्रतीति तथा सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार नित्य परमात्मामें अनित्य संसारकी प्रतीति भी मिथ्या ही है। आत्मा एक है। उसे जान लेनेपर मनुष्य ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुषोंको बन्धन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? क्या कभी आकाशमें फूल होना सम्भव है? ज्ञानीका संसार-बन्धन वैसा ही असत्य है जैसे खरगोशके सींगका होना। इसलिये अब इस विषयमें बहुत-सी व्यर्थ बातें कहनेसे कोई लाभ नहीं है। विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा वीतराग ज्ञानी पुरुष ममताका परित्याग करके परमपदको प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखते हैं। जिन्होंने ममत्वको त्याग दिया है और लोभ तथा मोहको दूर कर दिया है, वे काम-क्रोधसे हीन मानव परमपदको प्राप्त होते हैं। जबतक मनमें काम, लोभ, राग और द्वेष डेरा डाले रहते हैं, तबतक केवल शब्दमात्रका बोध रखनेवाले विद्वान् परमसिद्धि (मुक्ति)-को नहीं प्राप्त होते हैं।* यमराज! जिनके सब पाप दूर हो गये हैं वे समस्त ऋषि-मुनि ज्ञानका प्रवचन करनेवाले तथा ज्ञानाभ्यासके अनुकूल बर्ताव करनेवाले हैं, तथापि ज्ञानवेत्ता नहीं हैं। ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञानगम्य वस्तुको जानकर ही मनुष्य ज्ञानी कहलाता है। कैसे जानना चाहिये, किसके द्वारा जानने योग्य है और किसको जानना अभीष्ट है, वह वस्तु क्या है—ये सब बातें मैं तुम्हारी जानकारीके लिये संक्षेपसे बतलाता हूँ। आत्मा एक ही है तथापि भेदबुद्धि होनेसे वह अनेक-सा दिखायी देता है। जैसे भँवरी देनेवालेकी दृष्टिमें यह पृथ्वी घूमती हुई-सी प्रतीत होती है, उसी प्रकार भेदबुद्धिसे एक आत्मा भी अनेक-सा प्रतीत होता है। अतः विचारके द्वारा ही आत्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। गुरुके मुखसे श्रवणके द्वारा तथा भलीभाँति प्रयोगमें लाये हुए विशेष मननके द्वारा भी आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करना उचित है। इस प्रकार आत्माको जानकर मनुष्य अनायास ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मायाका जाल है। ममतासे उपलक्षित होनेवाला यह महान् संसार मायामय है। ममताको दूर कर देनेपर बन्धनसे अनायास छुटकारा मिल जाता है। मैं कौन हूँ, तुम कौन हो तथा महामायाके आश्रित रहनेवाले अन्य लोग भी कहाँसे आये हैं? यह सारा प्रपंच बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनकी भाँति निरर्थक है, निष्फल है, प्रकाशहीन है तथा धूमसमूहकी भाँति निस्सार है। इसलिये यमराज! तुम सर्वथा


* यैस्त्यक्तो ममताभावो लोभमोहौ निराकृतौ । ते यान्ति परमं स्थानं कामक्रोधविवर्जिताः ॥
यावत् कामश्च लोभश्च रागद्वेषव्यवस्थितिः । नाप्नुवन्ति परां सिद्धिं शब्दमात्रैकबोधकाः ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१। ६३-६४)