भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आश्चर्यभरे दृश्योंसे सुशोभित था। उसका विस्तार हजारों योजनका था। वह अपनी दिव्य निर्माण-कलासे देवताओंका भी मन मोहे लेता था।

तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता नारदजीको आगे करके हिमवान्‌के परम अद्भुत भवनमें एक साथ गये। उसे विश्वकर्माने विचित्र ढंगसे बनाया था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यभरी बातें देखनेमें आती थीं। वह यज्ञ-मण्डप अत्यन्त पवित्र और उत्तम था। बहुत लोगोंने सर्वश्रेष्ठ बताकर उसकी प्रशंसा की थी। उसकी कारीगरी अद्भुत थी। वह मन और बुद्धिके लिये अतर्क्य था। बुद्धिमान् विश्वकर्माने इस प्रकार विचित्र यज्ञ-मण्डपकी रचना की थी। वे सम्पूर्ण देवेश्वर ऋषियोंके साथ उस मण्डपमें प्रवेश करना ही चाहते थे तबतक हिमवान्‌की दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। हिमवान्‌ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उन सबके ठहरनेके लिये बड़े मनोहर गृह प्रदान किये। गन्धर्व, सिद्ध, प्रमथ, यक्ष, देव, नाग तथा अप्सराएँ—इनमें जो जहाँ सुखपूर्वक रह सके, उन्हें वहीं विश्रामस्थान हिमालयने दिया।

हिमवान्‌से सम्मानित होकर सब देवताओंने अपने परिवार और वाहनोंसहित उस मण्डपमें आनन्दपूर्वक निवास किया। विश्वकर्माने उसमें बहुत विस्तृत अवकाश बना रखा था। ब्रह्माजीके निवासके लिये अत्यन्त प्रकाशमान स्थान बनाया गया था। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके लिये दूसरा भवन बना था जो अत्यन्त विचित्र और बहुत ही प्रकाशमान था। विश्वकर्माने उसे अपने हाथों सँवारकर अत्यन्त मनोहर बना रखा था। इसी प्रकार चण्डीगृह भी उन्होंने बड़ा सुन्दर बनाया था। उसके अतिरिक्त विश्वकर्माने जो एक अत्यन्त विचित्र, परम मनोहर, महान् मंगलमय, श्रेष्ठ देवताओं‌द्वारा प्रशंसित, कैलासके समान अतिशय प्रभापूर्ण तथा अत्यन्त शोभायमान भवन बना रखा था, उसीमें हिमवान्‌ने महान् वैभवके साथ भगवान् शिवको ठहराया। इसी समय मेनादेवी अपनी सखियों तथा ऋषिमुनियोंके साथ भगवान् शिवकी आरती उतारनेके लिये आयीं। उस समय जो बाजे बज रहे थे, उनके शब्दसे तीनों लोक गूँज उठे। मेनाने तपस्वी शिवकी अपने हाथों आरती उतारी। वे बड़ी सती-साध्वी थीं। जामाताको देखकर उन्हें पार्वतीकी कही हुई सब बातें स्मरण हो आयीं और वे विस्मय-विमुग्ध हो उठीं। मेना मन-ही-मन कहने लगीं—‘अहो! पार्वतीके पहले मेरे समीप जो कुछ कहा था, उससे कहीं अधिक सौन्दर्य इस समय मैं महादेवजीके अंगोंमें देख रही हूँ। यह सौन्दर्य तो अनिर्वचनीय है।’ इस प्रकार विस्मयमें डूबी हुई मेनादेवी अपने घरमें लौट आयीं।

उस समय पार्वती स्नान करके मंगलपीठपर बैठी थीं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंने सब ओरसे उन्हें घेरकर आरती उतारी। तदनन्तर गर्गाचार्यने कहा—‘विद्वानो! आपलोग इसी समय पाणिग्रहणके लिये भगवान् शंकरको इस मण्डपमें ले आवें। इस कार्यमें शीघ्रता होनी चाहिये।’ गर्गाचार्यका वचन सुनकर गिरिराज हिमवान्‌के सब मन्त्री भगवान् शंकरके पास गये और उन्होंने तीन कलशोंके जलसे मांगलिक विधिके अनुसार भगवान् सदाशिवको स्नान कराया तथा उनकी आरती भी उतारी। स्नान करके सुन्दर वस्त्र धारण कर लेनेके पश्चात् शंकरजीका उन सबने पुनः पूजन किया। उसके बाद उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित करके हाथीकी पीठपर चढ़ाया। उस समय भगवान् शिवके मस्तकपर बहुत बड़ा छत्र तना हुआ था, उस छत्रसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। ऊपरसे चाँदौवा तना था और सब ओरसे उनके लिये चँवर डुलाये जा रहे थे। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा सब लोकपाल ‘वर’ के आगे-आगे चलते हुए उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न दिखायी देते थे। उस यात्राके समय शंख, भेरी, पटह आनक और गोमुख आदि बाजे बज रहे थे। सम्पूर्ण गायक उत्तम मांगलिक गीत गा