भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६३

योगीजन जिनके चरणारविन्दोंका सदा चिन्तन करते हैं, वे महादेवजी भगवान् विष्णुको आया देख उठकर खड़े हो गये और आनन्दमग्न हो उन्हें छातीसे लगा लिया। फिर भगवान् हरि और हर दोनों एक ही आसनपर विराजमान हुए। दोनोंने एक-दूसरेकी कुशल पूछी। तत्पश्चात् श्रीमहादेवजी बोले—'विष्णो! पार्वतीकी तपस्यासे मैं उसके वशमें हो गया हूँ और आज उसका पाणिग्रहण करनेके लिये हिमवान्‌के घर चलना चाहता हूँ।' यह बातचीत हो ही रही थी कि ब्रह्माजी भी इन्द्र तथा सम्पूर्ण लोकपालोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। इसी प्रकार सब असुर, यक्ष, दानव, नाग, पक्षी, अप्सरा और महर्षि भी आये। सबने एकत्र होकर भगवान् शिवसे एक स्वरमें कहा—'महादेवजी! अब आप हमलोगोंके साथ हिमवान्‌के घर पधारिये, पधारिये।' तब भगवान् विष्णुने भी इस प्रस्तावके अनुरूप बात कही—'शम्भो! आपको गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार ही यहाँ वैवाहिक कर्म करना चाहिये। जैसे नान्दीमुख श्राद्ध और मण्डपकी स्थापना आदि आवश्यक कार्य हैं।' भगवान् विष्णुके कथनानुसार महादेवजीने अपने हितके लिये सब कुछ वैसा ही किया। आभ्युदयिक श्राद्धकर्ममें जिनका पूजन उचित और आवश्यक है, ऐसे ब्रह्मादि देवताओंकी उन्होंने पूजा की। ब्रह्माजीके साथ कश्यप मुनिने नवग्रहोंका पूजन किया। अत्रि, वशिष्ठ, गौतम, भागुरि, भृगु, बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि, पराशर, मार्कण्डेय, शिलावाक्, शून्यपाल, अक्षतस्रम्, अगस्त्य, च्यवन तथा गोभिल—ये और दूसरे भी बहुत-से महर्षि शिवजीके समीप आये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन सबने वहाँ विधिपूर्वक शास्त्रोक्त रीतिसे शुभकर्म सम्पन्न किये। चण्डी देवी सब भूतोंसे घिरी हुई सबके आगे-आगे चलीं। उन्होंने अपने मस्तकपर सोनेका कलश ले रखा था। चण्डीके पीछे भगवान् शिवके गण थे और गणोंके पीछे इन्द्र आदि देवता, लोकपाल और ऋषि चल रहे थे। ऋषियोंके पीछे भगवान् विष्णुके महातेजस्वी कुमुद आदि पार्षद थे जो भगवान्‌के असंख्य भावोंको शीघ्र ही समझ लेनेवाले तथा बड़े मनोहर थे। परम पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले तथा विश्वके एकमात्र बन्धु परमात्मा भगवान् श्रीहरि शिवजीके साथ-साथ चल रहे थे। तीनों लोकोंके एकमात्र पालक भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ अपने वाहन गरुड़जीकी पीठपर बैठे थे। बड़े-बड़े मुनीश्वर अपने हाथोंमें सुन्दर चँवर लिये हवा कर रहे थे। सर्वेश्वर श्रीहरि उन सबके साथ बड़ी शोभा पा रहे थे। इसी प्रकार ब्रह्माजी भी चारों वेदों, छहों वेदांगों, आगमों, इतिहासों और पुराणोंके साथ अपने वाहन हंसपर विराजमान थे। ब्रह्मा, विष्णु, देवेश्वरगण तथा ऋषिवृन्दसे घिरे हुए भगवान् शिव अपने वाहन वृषभपर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे सम्पूर्ण योगेश्वरोंके लिये भी दुर्लभ तथा अगम्य हैं। वेद, देवता, सिद्ध और महर्षिगण जिसे धर्म कहते हैं, उसी धर्मस्वरूप, धर्मवत्सल वृषभपर महादेवजी आरूढ़ थे। मातृकाएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर अपनी मधुर वाणीद्वारा भगवान् शिवके लिये मंगलाचार करती थीं। इस प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देव-दानवोंके साथ सब प्रकारसे अलंकृत हो नारियोंमें श्रेष्ठ पार्वतीजीका पाणिग्रहण करनेके लिये गिरिराज हिमवान्‌के घर गये।

उधर गिरिराज हिमालय भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी पुत्रीके लिये उसी प्रकार सब मंगलाचार करा रहे थे। उन्होंने गर्गजीको पुरोहित बनाकर महान् वैभवके द्वारा मांगलिक भूमि निर्माण करायी। विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा बड़े आदरके साथ अत्यन्त विस्तृत मण्डप तैयार कराया, जो बहुत-सी वेदियोंके कारण अतिशय मनोहर जान पड़ता था। वह मण्डप अनेक प्रकारके गुणोंसे तथा भाँति-भाँतिके